रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमाननम् ८१
अथास्यां सुखांशभाने किं मानमिति चेत् ? समाधावपि तद्भाने किं
मानमिति पर्यनुयोगस्य तुल्यत्वात् । 'सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमती-
न्द्रियम्' इत्यादिः शब्दोऽस्ति तत्र मानमिति चेत् ? अस्त्यत्रापि 'रसो वै सः',
'रसं ह्येवायं लब्ध्वानन्दीभवति' इति श्रुतिः, सकलसहृदयप्रत्यक्षं चेति प्रमाण-
च्छेदकीभूतस्य रत्यादेः व्यञ्जनया प्रतितियोग्यतापादनमन्तरेण अन्तःकरणवृत्तिस्तदा-
कारा न स्यात्, अयोग्यस्य वृत्तिविषयत्वात् । अत एव धर्मादीनामन्तःकरणधर्मत्वाऽ-
विशेषेऽप्ययोग्यत्वान्न सुखादिवद् वृत्तिविषयत्वमिति वेदान्तसिद्धान्तः । तथा
चोक्तान्तःकरणवृत्तिसिद्ध्यर्थं तद्विषये तद्योग्यत्वसम्पादनं व्यञ्जनात्मककाव्यव्यापार-
मन्तरेण न सम्भवतीत्यतस्तन्मात्रभाव्यत्वमुक्तम् ।
अस्याम् = चित्तवृत्त्यात्मकचर्वणायाम् । मूलाऽविद्याविनाशं विनाऽऽनन्दभान-
स्यानभ्युपगमादियमाशङ्का । चर्वणात्मिकाहि चित्तवृत्तिर्न शुद्धचैतन्याकारा, मूला-
विद्यानाशकत्वं पुनः शुद्धचैतन्याकाराया एव वृत्तेरित्ययं शङ्कार्थः । 'रसं ह्येवायं
लब्ध्वा' इत्याद्या श्रुतिः शुद्धचैतन्याकारचित्तवृत्तिविषयिण्येव, न तु तदितरवृत्ति-
विषायिणीति यद्युच्यते तदाऽप्याह प्रमाणान्तरम्—सकलसहृदयप्रत्यक्षमिति । यथा
ब्रह्मानन्देऽनुभवोऽपि प्रमाणं योगिनां तथैवात्रापीति भावः । द्वितीयपक्षे = यद्धेत्युक्त-
अन्यथा वासनारूप में अयोग्य होने से उसका आस्वादन (साक्षि-प्रत्यक्ष) असम्भव
है । अद्वैतमत में भी योग्य अन्तःकरण-धर्मों का हीं साक्षि-प्रत्यक्ष माना गया है,
अयोग्य का नहीं । इसीलिए सुखादि के समान अदृष्ट के भी अन्तःकरण-धर्म होने
पर भी योग्य सुखादि का साक्षि-प्रत्यक्ष होता, अयोग्य अदृष्टादि का नहीं ।
इस चित्तवृत्तिस्वरूप रसचर्वणा में आनन्द का भान कैसे होता—यह प्रश्न तो
समानरूप में निर्विकल्प समाधि में मान्य आनन्द के भान के विषय में भी है । अतः
जिस आधार पर उक्त समाधि में आनन्द का भान होता उसी आधार पर रसचर्वणा
में भी आनन्दांश का भान मानना चाहिए । यदि कहा जाय कि "जो अतीन्द्रिय
आत्यन्तिक सुख है वह बुद्धिवृत्ति से ग्राह्य होता" यह गीतावचन तथा इसी के
समानार्थक वचनान्तर समाधिकाल में आनन्द के भान में प्रमाण हैं तो रसचर्वणा में
भी आनन्दांश के भान के प्रमापक "वह आत्मा तो रस हीं है", "रसस्वरूप
आत्मा को प्राप्त कर हीं यह जीव आनन्दित—आत्मस्वरूपानन्दाकारा वृत्ति से
सम्पन्न होता" इत्यादि श्रुतियाँ हैं । इसके अतिरिक्त, सच्चिदानन्द ब्रह्म के
समान सभी सहृदयों का साक्षात्कारात्मक अनुभव भी इसमें आनन्दांशभान का
प्रमापक है हीं । अतः रसचर्वणा में आनन्द-भान अप्रमाणिक नहीं है । पूर्वोक्त
द्वितीयपक्ष में जो स्थाय्युपहित आनन्द के आकार में चित्त की वृत्ति को रसचर्वणा