रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमाननम् ७९
जायते, तन्मयीभवनमिति यावत् । आनन्दो ह्ययं न लौकिकसुखान्तर-
साधारणः, अनन्तःकरणवृत्तिरूपत्वात् । इत्थं चाभिनवगुप्तमम्मटभट्टादि-
ग्रन्थस्वारस्येन भग्नावरणचिद्विशिष्टो रत्यादिः स्थायी भावो रस इति
स्थितम् ।
वस्तुतस्तु वक्ष्यमाणश्रुतिस्वारस्येन रत्याद्यवच्छिन्ना भग्नावरणा चिदेव
रसः । सर्वथैव चास्या विशिष्टात्मनो विशेषणं विशेष्यं वा चिदंशमादाय
चानन्दप्राचुर्यात् तत्र वृत्तौ बोध्यम् । अनया च वृत्त्यानन्दांशावरणभङ्गे स्वप्रकाश-
चितैव स्वरूपानन्दस्तदुपाधिभूतः स्थायी च प्रकाशेते । अस्यानन्दस्यालौकिकत्वमाह—
आनन्द इत्यादिना । अलौकिकत्वे हेतुः—अनन्तःकरणेत्यादि । न अन्तःकरणस्य
वृत्तिरनन्तःकरणवृत्तिस्तद्रूपत्वादित्यर्थः । लौकिकानन्दो हि वेदान्तमतेऽन्तःकरणवृत्ति-
रूपः। अयं तु आत्मस्वरूपभूतस्तद्विलक्षण इत्याशयः ।
आस्वादस्यानन्दप्रधानत्वाद्, वृत्तौ चानन्दस्य विशेष्यत्वात् श्रुतिसम्मतत्वाच्चा-
नन्दप्रधान एव रस इति स्वमतमाह—वस्तुतस्त्विति । वक्ष्यमाणेति । ‘रसो वै
सः' इत्याद्येति भावः । सर्वथैव = पक्षद्वयेऽपि । विशेषणमिति भग्नावरणचिद्-
अतः यह पक्षान्तर उपस्थित किया गया है कि सहृदय की सहृदयता के प्रभाव से
की गई विभावादि की सामूहिक चर्वणा से रत्यादि स्थायीभाव से उपहित आत्म-
स्वरूपभूत आनन्द के आकार की—आनन्दांशाकारा कोई विलक्षण अन्तःकरणवृत्ति
उसी प्रकार हो जाती जिस प्रकार सविकल्पक समाधि में योगी की आनन्दाकारा
वृत्ति हो जाती है । यहाँ आनन्दाकारा वृत्ति से प्रकाशाकारा वृत्ति भी अपेक्षित
है, क्योंकि उसके बिना प्रकाशांश के आवरण का भङ्ग न होने से वह आनन्द
प्रकाशित न हो सकेगा । अथवा आनन्दांश और प्रकाशांश इन दोनों को विषय
बनाने वाली एक हीं चित्तवृत्ति मानी जा सकती, क्योंकि अलौकिक विभावादि की
सामूहिक चर्वणा से उक्त प्रकार की अलौकिक चित्तवृत्ति सम्भव है । उक्त आनन्दा-
कारा वृत्ति का अभिप्राय यह है कि सहृदय का अन्तःकरण आनन्दमय (आनन्द की
प्रचुरता से सम्पन्न) हो जाता है । यह आनन्द आत्मा का स्वरूप है, अत एव यह
अलौकिक है । इसके विपरीत लोक में जिसे आनन्द कहा जाता है वह तो अन्तः-
करण की इष्टवस्तुविषयक एक वृत्ति है । अत एव रसस्वरूप आनन्द लौकिक
आनन्द से विलक्षण है । इस प्रकार अभिनव गुप्त तथा मम्मट आदि के ग्रन्थों का
स्वारस्य इसी में है कि भग्नावरणा चित् से विशिष्ट रत्यादि स्थायीभाव हीं रस
है । इस पक्ष में प्रधानता स्थायीभाव की है, चित् की नहीं ॥
वस्तुतः रसस्वरूप में भग्नावरण चित् की प्रधानता ही उचित है, क्योंकि
"रसो वै सः" इत्यादि श्रुतियों के अनुसार सच्चिदानन्द तत्त्व हीं पारमार्थिक रस