रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७८ रसगङ्गाधरः
व्यञ्जकतालवादिव्यापारस्य गकारादौ । विभावादिचर्वणावधित्वादावरण-
भङ्गस्य, निवृत्तायां तस्यां प्रकाशस्याऽऽवृतत्वाद्द्विद्यमानोऽपि स्थायी न
प्रकाशते ।
यद्वा विभावादिचर्वणामहिम्ना सहृदयस्य निजसहृदयतावशोन्मिषितेन
तत्तत्स्थाय्युपहितस्वरूपानन्दाकारा समाधाविव योगिनश्चित्तवृत्तिरुप-
रत्यादेः कथं न सर्वदा प्रकाश इत्यत्र युक्तिमाह--विभावादीत्यादिना । विभावा-
दीनां समवेतानां या चर्वणा तन्मूलकादेवालोकिकव्यापारात् स्थायिनः प्रतीतियोग्य-
तापादनमानन्दांशावरकाज्ञानस्य च निवृत्तिस्तत्प्रकाशनिमित्तमिति चर्वणायाः पूर्वं
'परस्ताच्च विद्यमानोप्यानन्दः स्थायी च न प्रकाशेते इत्याशयः ।
उक्ते पक्षेऽलौकिकव्यापारेण चर्वणोद्भावितेन आनन्दाकारवृत्तिमन्तरेणैवानन्दां-
शावरणनिवृत्तिवर्णनादशास्त्रीयत्वम्, तेन व्यापारेणानन्दाकारवृत्तिस्तया चानन्दां-
शावरणभङ्ग इति स्वीकारेऽलौकिकव्यापारकल्पनेन भावनाया लोकसिद्धा-
वारणनिवर्त्तकत्वस्वभावाऽनभ्युपगमेन च गौरवमित्यतः पक्षान्तरमाह--यद्वे-
त्यादि । विभावादीनां या पुनःपुनरनुसन्धानात्मकभावनाऽपरपर्याया सम्भूय
चर्वणा तस्या महिम्नेति भावः । समाधौ = सविकल्पके समाधौ, निर्विकल्पके
वृत्तिनिरोधात् । अत्र च पक्षे आनन्दोपाधेः स्थायिनः प्रतीतिर्व्यञ्जनयैव बोध्या ।
अत्र च वृत्तावानन्दस्य विशेष्यतया विषयत्वाद्रसेऽपि तस्यैव विशेष्यत्वमुचितमिति
वस्तुतस्तु इत्यादिनाऽनुपदमेव वक्ष्यति । तन्मयीभवनम् = आनन्दमयीभवनम्. तत्त्वं
औपचारिक अनित्यता अन्यत्र भी मानी गई है । जैसे--मीमांसकमत में वर्ण नित्य
है, कण्ठतालु आदि के व्यापारों से वर्ण की अभिव्यक्ति होती, उत्पत्ति नहीं । किन्तु
अभिव्यञ्जक कण्ठतालवादि व्यापारके उत्पाद-विनाश का हीं अभिव्यज्यमान वर्ण पर
आरोप करके वर्ण को भी व्यवहार में अनित्य कह दिया जाता है । अतः वर्ण की
अनित्यता वास्तविक नहीं अपितु औपचारिक हीं है । अतः औपचारिक रूप में रस
को भी अनित्य कह देना असंगत नहीं है। इस प्रकार स्थायीभाव के रसास्वाद से पूर्व
एवं पर काल में विद्यमान रहने पर भी उसका प्रकाश तभी तक होता जब तक
आत्मस्वरूपभूत प्रकाश (और आनन्द) का आवरण निवृत्त रहता, उसके पहले या
बाद में नहीं । यह आवरणभङ्ग विभावादि की चर्वणा जब से जब तक होती तभी
तक होता । इसी लिए सर्वदा स्थायी का प्रकाशन हो नहीं पाता ।
उक्त मत में विभावादि की सामूहिक रूप में की गई चर्वणा से प्रादुर्भूत
अलौकिक व्यापार (व्यञ्जना अथवा उसके अतिरिक्त किसी विलक्षण व्यापार) से
आनन्दाकार चित्तवृत्ति के बिना हीं आनन्दांश के आवरण का भङ्ग बताया गया है
किन्तु आनन्दाकारा वृत्ति के बिना उसके आवरण का भङ्ग शास्त्र-सम्मत नहीं है ।