रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 106, कुल 414 में से
संदर्भ में पढ़ें७४ रसगङ्गाधरः ज्ञानन्
स्वप्रकाशतया वास्तवेन निजस्वरूपानन्देन सह गोचरीक्रियमाणः प्राग्विनि-
विष्टवासनारूपो रत्यादिरेव रसः ॥
कस्याज्ञानस्यापि तावत्कालं निवृत्तिर्दर्शिताैव । सदंशस्त्वनावृत एव । यद्वाऽन्येनैवालोकि-
केन व्यापारेणावरन्निवृत्तिः । ततश्च वासनात्मकरत्यादेरन्तःकरणस्थतया तस्यैव
चान्तःकरणस्य प्रमातृचैतन्यविशेषणतया तत्तच्चैतन्यभेदसाधकत्वाभावेन रत्याद्यव-
च्छिन्नचित आनन्दांशावरणनिवृत्त्या प्रमातृचैतन्यान्दांशावरणनिवृत्तिरपि सम्पन्नैवेति
हेतोरन्तःकरणस्याज्ञानकार्यस्य चैतन्यावरकत्वाभावाद्विशेषणत्वं व्याहतमुपाधित्वं च
कार्यान्वयित्वरूपमागतमेव । अयमेव प्रमातृत्वादिपरिमितधर्माणां प्रमोष उक्तः ।
सर्वज्ञत्वादिपरमात्मस्वरूपापत्तिस्तु नार्थः, अशास्त्रीयत्वादसंगतेश्च । तथा च रत्याद्यव-
च्छिन्नचितः प्रमातृचैतन्यस्य चानन्दांशावरणनिवृत्त्योभयोश्च चितोर्विभाजकैकदेशस्थ-
तयैकत्वेन व्यञ्जनापादितभासनयोग्यत्वस्य रत्यादेः स्वरूपानन्देन सह स्वरूपचितैव
अन्तःकरणोपहितत्वेन साक्षिव्यपदेश्यया भासनम् । इदमेवास्वादनमुच्यते । अनेनैवा-
स्वादेन वा व्यङ्ग्यः प्राग्विनिविशिष्टवासनात्मा रत्यादिरधिगतो रसपदवीम् इति
पूर्वोऽलौकिकव्यापारो व्यञ्जनाभिन्न एव कश्चित् । काव्यमूलकत्वाच्चास्या रस-
हो जाता' और दूसरी ओर वासनारूप में सहृदय के अन्तःकरण में विद्यमान रत्यादि-
स्थायी भाव उद्बोधित होकर आस्वादनयोग्य बन जाते । अथवा व्यञ्जना से
रत्यादि में आस्वाद्ययोग्यता आती और किसी अन्य अलौकिक व्यापार से आवरण-
भङ्ग होता । चिदंश के आवरण के निरस्त हो जाने से आत्मा का प्रमातृत्व
( = अन्तःकरण की विशेषणता जिसके चलते वह चैतन्य प्रकाशित न हो पाता था
वह) भी विनष्ट हो जाता और उसमें साक्षित्व ( अर्थात् अन्तःकरण में उपाधित्व
जिससे वह आत्मा का व्यावर्तक — भेदक होकर भी उसके स्वयंप्रकाशनस्वरूप और
प्रकाशनात्मक कार्य पर आघात नहीं पहुँचा सकता वह) प्रकट हो जाता । अब
अज्ञानावरणरहित आत्मस्वरूप आनन्द के साथ अन्तःकरण में निहित वासनात्मक
रत्यादि स्थायीभाव का साक्षिप्रत्यक्ष होने लगता । इसी साक्षिप्रत्यक्षवेद्य (आस्वाद्य-
मान) स्थायी भाव को 'रस' कहा जाता है । इस साक्षिप्रत्यक्ष को हीं 'रसास्वाद'
कहा जाता है जो रत्याद्युपहित साक्षी के स्वरूप से पृथक् नहीं है । अत एव
आस्वाद्यमान रस तथा आस्वाद में कोई तात्त्विक अन्तर नहीं प्रतीत होता ।
१. यह आवरणभङ्ग इसलिये आवश्यक है चूँकि इसके विना रसास्वाद आनन्द-
स्वरूप नहीं हो सकता । कारण यह है कि अद्वैत वेदान्त के सिद्धान्त में
आनन्द आत्मा का स्वरूप है । सांसारिक पदार्थों में आनन्द की जो प्रतीति
होती वह तो उस आत्मा के आनन्द के सम्पर्क से हीं, स्वरूपतः नहीं ।