झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
लक्ष्मीबाई | ४८३
[ ६० ]
मुन्दर और रघुनाथसिंह ने कुछ भी न खाकर जेबो में कलेवा डाला
और पीठ पर पानी का बर्तन कस लिया । झटपट शर्बत बनाया ।
मुन्दरबाई', रघुनाथसिंह ने कहा, 'रानी साहब का साथ एक क्षण
के लिये भी न छूटने पावे । वे आज अंतिम युद्ध लडने जा रही हैं ।'
मुन्दर—'आप कहा रहेगे ?'
रघुनाथसिंह—'जहा उनकी आज्ञा होगी । वैसे आप लोगो के समीप
ही रहने का प्रयत्न करू गा ।'
मुन्दर—'में चाहती हूँ आप बिलकुल निकट रहे । मुझे लगता है में
आज मारी जाऊँगी । आपके निकट होने से शान्ति मिलेगी ।'
रघुनाथसिंह—'मैं भी नही बचूँगा । रानी साहव को किसी प्रकार
सुरक्षित रखना है । मै तुम्हे तुरन्त ही स्वर्ग मे मिलूंगा । केवल आगे
पीछे की बात है ।' वह जरा सूखी हँसी हँसा ।
मुन्दर ने रघुनाथसिंह की ओर आँसू भरी आँखो से देखा । कुछ
कहने के लिये होठ हिले । रघुनाथसिंह की आँखे भी धुंधली हुईं ।
दूर से दुश्मन के बिगुल के शब्द की भाई कान में पडी । मुन्दर
ने रघुनाथसिंह को मस्तक नवाकर प्रणाम किया और उस ओट मे जल्दी
आँसू पोछ डाले । रघुनाथसिंह ने मुन्दर को नमस्कार किया फिर तुरन्त
दोनो शर्बत लिये हुये रानी के पास पहुँचे ।
मुन्दर ने जूही को पिलाया, रघुनाथसिंह ने रानी को । अङ्गरेजो की
बिगुल का साफ शब्द सुनाई दिया । तोप का धडाका हुआ, गोला सन्ना-
कर ऊपर से निकल गया । रानी ने दूसरा कटोरा नही पी पाया ।
रानी ने रामचन्द्र देशमुख को आदेश किया, 'दामोदर को आज तुम
पीठ पर बाधो । यदि में मारी जाऊँ तो इसको किसी तरह दक्षिण
सुरक्षित पहुंचा देना । तुमको आज मेरे प्राणो से बढकर अपनी रक्षा की
चिन्ता करनी होगी । दूसरी बात यह है कि मारी जाने पर ये विधर्मी
मेरी देह को न छूने पावे । बस । घोडा लाओ ।'
४८४ झाँसी की रानी
मुन्दर घोडा ले आई । उसकी आखे छलछला रही थी । पूर्व दिशा
में अरुणमा फैल गई । अबकी बार कई तोपो का घडाका हुआ ।
रानी मुस्कराईं । बोली, 'यह तात्या की तोपो का जवाब है ।'
मुन्दर की छलकती हुई आखो को देखकर कहा, 'यह समय आसुओ
का नही है, मुन्दर । जा, तुरन्त अपने घोडे पर सवार हो ।'
अपने लिये आये हुये थोडे को देखकर बोली, 'यह अस्तबल को
प्यार करने वाला जानवर है । परन्तु अब दूसरे को चुनने का समय ही
नही है । इसी से काम निकालू गी ।'
जूही के सिर पर हाथ फेर कर कहा, 'जा जूही अपने तोपखाने पर ।
छका तो दे इन बैरियो को आज ।'
जूही ने प्रणाम किया । जाते हुये कह गई, 'इस जीवन का यथोचित
अभिनय आपको न दिखला पाया । खैर ।'
अङ्गरेज़ो के गोलो की वर्षा हो उठी । रानी के सब सरदार और
सवार घोडो पर जम गये, जूही का तोपखाना आग उगलने लगा ।
इतने में सूर्य का उदय हुआ ।
सूर्य की किरणो ने रानी के सुन्दर मुख को प्रदीप्त किया । उनके नेत्रो
की ज्योति दुहरे चमत्कार से भासमान हुई । लाल वर्दी के ऊपर मोती-
हीरो का कठा दमक उठा और, चमक पडी म्यान से निकली हुई तलवार ।
रानी ने घोडे को एड लगाई । पहले ज़रा हिचका फिर तेज हो गया ।
रानी ने सोचा कई दिन का बँधा होगा, थोडी देर में गरम हो जायगा ।
उत्तर और पश्चिम की दिशाओ में तात्या और रावसाहब के मोर्चे
थे । दक्षिण में बादा के नवाब का, रानी ने पूर्व की ओर झपट लगाई ।
गत दिवस की हार के कारण अङ्गरेज जनरल सावधान और चिंतित
हो गये थे । इन लोगो ने अपनी पैदल पलटने पूर्व और दक्षिण के बीहड
में छिपा ली और हुज़र* सवारो को कई दिशाओ से आक्रमण करने
*Hussars
लक्ष्मीबाई ४८५
की योजना की। तोपे पीठ पर रक्षा के लिये थी ही हुजूर सवारो ने
पहला हमला कडाबीन बन्दूको से किया। बन्दूको का जवाब बन्दूको से
दिया गया। रानी ने आक्रमण पर आक्रमण करके हुजूर सवारो को पीछे
हटाया। दोनो ओर के सवारो की बेहिसाब दौड से धूल के बादल छा
गये। रानी के रणकौशल के मारे अग्ररेज जनरल थर्रा गये। काफी
समय हो गया, परन्तु अङ्गरेजो को पेशवाई मोर्चों में निकल जाने की
गुन्जायश न मिली।
जूही की तोपे गज़ब ढा रही थी। अङ्गरेज नायक ने इन तोपो का
मुहँ बन्द करना तै किया। हुजर सवार बढते जाते थे, मरते जाते थे,
परन्तु उन्होने इस तरफ की तोपो को चुप करने का निश्चय कर लिया
था। रानी ने जूही की सहायता के लिये कुमुक भेजी। उसी समय उनको
खबर मिली कि पेशवा की अधिकांश ग्वालियर सेना और सरदार 'श्रा ने
महाराज' की शरण मे चले गये।
मुन्दर ने रानी से कहा, 'सवेरे अस्तबल का प्रहरी रिस रिस
कर अपने 'सरकार' का स्मरण कर रहा था। मुझे सन्देह हो गया था
कि ग्वालियरी कुछ गडबड करेंगे।'
'गाठ में समय न होने के कारण कुछ नही किया जा सकता था,'
रानी बोली, 'अब जो कुछ संभव है वह करो।'
इनकी लालकुर्ती अव तलवार खीचकर आगे बढी। उस धूल घूरसित
प्रकाश में भी तलवारो की चमचमाहट ने चकाचौध लगा दी।
कुछ ही समय उपरान्त समाचार मिला कि ग्वालियरी सेना के,
परपक्ष में मिल जाने के कारण रावसाहब के दो मोर्चे छिन गये और
अङ्गरेज उनमे से घुसने लगे हैं। रानी के पीछे पैदल पल्टन थी। उसको
स्थिति संभालने की आज्ञा देकर वह एक ओर आगे बढी। उधर हुज़र-
सवार जूही के तोपखाने पर जा टूटे। जूही तलवार से भिड गई। घिर
गई और मारी गई। मरते समय उसने आह तक नही की। चिर गई
थी। परन्तु शत्रु की तलवार चीरने में, जिस बातमें असमर्थ रही-वह थी
४८६ झाँसी की रानी
जूही की क्षीण मुस्कराहट जो उसके ओठो पर अनन्त दिव्यता की गोद
मे खेल गई ।
वर्दी के कट जाने पर हुजरो ने देखा कि तोपखाने का अफसर गोरे
रङ्ग की एक सुन्दर युवती थी ! और उसके ओठो पर मुस्कराहट थी !!
समाचार मिलते ही रानी ने इस तोपखाने का प्रबन्ध किया ।
इतने में ब्रिगेडियर स्मिथ ने अपने छिपे हुये पैदलो को छिपे हुये
स्थानो से निकाला । वे संगीने सीधी किये रानी के पीछे वाली पैदल
पल्टन पर दो पार्श्वों से झपटे । पेशवा की पैदल पल्टन घबरा गई ।
उसके पैर उखडे । भाग उठी । रानी ने प्रोत्साहन, उत्तेजन दिया ।
परन्तु उनके और उस भागती हुई पल्टन के बीच में गोरो की संगीनें और
हुज़रो के घोडे आचुके थे ।
अङ्गरेजो की कडाबीने, संगीनें और तोपें पेशवाई सेना का सहार कर
उठी । पेशवा की दो तोपे भी उन लोगो ने छीनली । अङ्गरेजी सेना बाढ
पर आई हुई नदी की तरह बढने और फैलने लगी ।
रानी की रक्षा के लिये लालकुर्ती सवार अटूट शौर्य और अपार
विक्रम दिखलाने लगे । न कडाबीन की परवाह, न संगीन का भय और
तलवार तो मानो उनकी ईश्वरीय देन थी । उस तेजस्वी दल ने घण्टो
अङ्गरेजो का प्रचण्ड सामना किया । रानी धीरे धीरे पश्चिम-दक्षिण की
ओर अपने मोर्चे की शेष सेना से मिलने के लिये मुडी । यह मिलान
लगभग असंभव था, क्योकि उस भागती हुई पैदल पल्टन और रानी
के बीच में बहुसंख्यक हुज़र सवार और संगीन बरदार पैदल थे । परन्तु
उन बचे खुचे लालकुर्ती वीरो ने अपनी तलवारो की आड़ बनाई ।
रानी ने घोडे की लगाम अपने दातो में थामी और दोनो हाथो से
तलवार चलाकर अपना मार्ग बनाना आरभ कर दिया । दक्षिण-पश्चिम
की ओर सोनरेखा नाला था । आगे चलकर बाबा गङ्गादास की कुटी थी ।
कुटी के पीछे दक्षिण और पश्चिम की ओर हटती हुई पेशवाई पैदल पल्टन ।
लक्ष्मीबाई ४८७
मुन्दर रानी के साथ थी । अगल-बगल रघुनाथसिंह और रामचन्द्र
देशमुख । पीछे कुँवर गुलमुहम्मद और केवल बीस-पच्चीस अवशिष्ट
लाल सवार । अङ्गरेजो ने थोडी देर में इन सबके चारो तरफ घेरा डाल
दिया । सिमट सिमटकर उस घेरे को कम करते जा रहे थे ।
परन्तु रानी की दुहत्थू तलवारे आगे का मार्ग साफ करती चली जा
रही थी । पीछे के वीर सवारो की संख्या घटते घटते नगण्य हो गई ।
उसी समय तात्या ने रुहेली और अवधी सैनिको की सहायता से अङ्गरेजो
के व्यूह पर प्रहार किया । तात्या कठिन से कठिन व्यूह में होकर बच
निकलने की रणविद्या का पारङ्गत पण्डित था । अङ्गरेज थोडे से सवारो
को लालकुर्ती का पीछा करने के लिये छोडकर तात्या की ओर मुड गये ।
सूर्यास्त होने में कुछ बिलम्ब था ।
लालकुर्ती का अंतिम सवार मारा गया । रानी के साथ केवल चार
सरदार और उनकी तलवारे रह गई । पीछे कडाबीन और तलवार
वाले दस-पन्द्रह गोरे सवार । आगे सङ्गीन वाले कुछ गोरे पैदल ।
रानी ने पीछे की तरफ देखा - रघुनाथसिंह और गुलमुहम्मद तलवार
से अङ्गरेज सैनिको की संख्या कम रहे हैं । एक ओर रामचन्द्र देशमुख
दामोदरराव की रक्षा की चिंता में बरकाव कर करके लड़ रहा था । रानी
ने देशमुख की सहायता के लिये मुन्दर को इशारा किया, और वह स्वय
सगीनबरदारो को दोनो हाथो की तलवारो से खटाखट साफ करके आगे
बढने लगी । एक सगीनबरदार की हूल रानी के सीने के नीचे पडी ।
उन्होंने उसी समय तलवारो से उस सगीनबरदार को खतम किया । हूल
करारी थी, परन्तु आतें बच गई ।
रानी ने सोचा, 'स्वराज्य की नीव का पत्थर बनने जा रही हू ।'
रानी के खून बह निकला ।
उस सगीनबरदार के खतम होते ही बाकी भागे । रानी आगे निकल
गई । उनके साथी भी दायें, बायें और पीछे । आठ-दस गोरे घुडसवार
उनको पछियाते हुये ।
४८८ झाँसी की रानी
रघुनाथसिंह पास था। रानी ने कहा, 'मेरी देहं को अङ्गरेज न
छूने पावे।'
गुलमुहम्मद ने भी सुना—और समझ लिया। वह और भी जोर से
लड़ा।
एक अङ्गरेज सवार ने मुन्दर पर पिस्तौल दागी। उसके मुँह से
केवल ये शब्द निकले : 'बाईसाहब, मै मरी। मेरी देह... भगवान्।'
अन्तिम शब्द के साथ उसने एक दृष्टि रघुनाथसिंह पर डाली और वह
लटक गई।
रानी ने मुस्काकर देखा।
रघुनाथसिंह से कहा, 'संभालो उसे। उसके शरीर को वे छूने
पावे।' और वे घोडे को मोड़कर अङ्गरेज सवारो पर तलवारो की
बौछार करने लगी। कई कटे। मुन्दर का मारने वाला मारा गया।
रघुनाथसिंह फुर्ती के साथ घोडे से उतरा। अपना साफा फाडा।
मुन्दर के शव को पीठ पर कसा और घोडे पर सवार होकर आगे बढा।
गुलमुहम्मद बाकी सवारो से उलझा। रानी ने फिर सोनरेखा नाले
की ओर घोडे को बढाया। देशमुख साथ हो गया।
अङ्गरेज सवार चार पाच रह गये थे। गुलमुहम्मद उनको बहकावा
देकर रानी के साथ हो लिया। रानी तेजी के साथ नाले की ढीपर आ
गईं।
घोडे ने आगे बढने से इनकार कर दिया—बिलकुल अड गया।
रानी ने पुचकारा। कई प्रयत्न किये, परन्तु सब व्यर्थ।
वे अङ्गरेज़ सवार आ पहुँचे।
एक गोरे ने पिस्तौल निकाली और रानी पर दागी। गोली उनकी
बाई जघा में पडी। वे गले में मोती-हीरो का दमदमाता हुआ कण्ठा
पहिने हुई थी। उस अङ्गरेज सवार ने रानी को कोई बडा सरदार समझ
कर विश्वास कर लिया कि अब वह कण्ठा मेरा हुआ। रानी ने बाये हाथ
की तलवार फेक कर घोडे की अयाल पकड़ी और दूसरी जांघ तथा हाथ
की सहायता से अपना आसन सँभाला इतने में वह सवार और भी निकट
लक्ष्मीबाई ४८६
आया। रानी ने दाएँ हाथ के वार से उसको समाप्त कर दिया। उस
सवार के पीछे से एक और आगे निकल पड़ा।
रानी ने आगे बढ़ने के लिये फिर एक पैर की एड लगाई।
घोड़ा बहुत प्रयत्न करने पर भी अड़ा रहा। वह दो पैरो से खड़ा हो
गया। रानी को पीछे खिसकना पड़ा। एक जाँघ काम नही कर रही थी।
बहुत पीडा थी। खून के फव्वारे पेट और जाघ के घाव से छूट रहे थे।
गुलमुहम्मद आगे बढ़े हुये अङ्गरेज सवार की ओर लपका।
परन्तु अङ्गरेज सवार ने गुलमुहम्मद के आ पहुँचने के' पहले ही
तलवार का वार रानी के सिर पर किया। वह उनकी दाई ओर पड़ा।
सिर का वह हिस्सा कट गया और दाईं आंख बाहर निकल पड़ी। इसपर
भी उन्होने अपने घातक पर तलवार चलाई और उसका कधा काट दिया।
गुलमुहम्मद ने उस सवार के ऊपर कसकर भरपूर हाथ छोड़ा।
उसके दो टुकड़े हो गये।
बाकी दो तीन अंगरेज सवार बचे थे। उनपर गुलमुहम्मद बिजली की
तरह टूटा। उसने एक को घायल कर दिया। दूसरे के घोड़े को लगभग
अधमरा। वे तीनो मैदान छोड़कर भाग गये। अब वहा कोई शत्रु न था।
जब गुलमुहम्मद मुड़ा तो उसने देखा—रामचन्द्र देशमुख घोड़े से गिरती
हुई रानी को साधे हुये है।
दिन भर के थके मांदे, भूखे-प्यासे, धूल और खून में सने हुये
गुलमुहम्मद ने पश्चिम की ओर मुँह फेर कर कहा, 'खुदा, पाक परवर-
दिगार, रहम, रहम !' ।
उस कट्टर सिपाही की आँखे आसुओ को मानो बरसाने लगी और
ह बच्चो की तरह हिलक हिलक कर रोने लगा।
रघुनाथसिंह और देशमुख ने रानी को घोड़े पर से संभाल कर उतारा
'वेश में आकर उस अडियल घोड़े को एक लात मारी। वह अपने
ॠवल की दिशा में भाग गया।
४६० झाँसी की रानी
रघुनाथसिंह ने देशमुख से कहा, 'एक क्षण का भी विलम्ब नही
होना चाहिये। अपने घोडे पर इनको होशियारी के साथ रक्खो और
बाबा गङ्गादास की कुटी पर चलो। सूर्यास्त हुआ ही चाहता है।'
देशमुख का गला रुँधा हुआ था। बालक दामोदरराव अपनी माता
के लिये चुपचाप रो रहा था।
रामचन्द्र ने पुचकार कर कहा, 'इनकी दवा करेगे, अच्छी हो
जायेगी, रोओ मत।'
रामचन्द्र ने रघुनाथसिंह की सहायता से रानी को सँभालकर अपने
घोडे पर रक्खा।
रघुनाथसिंह ने गुलमुहम्मद से कहा, कुँवर साहब, इस कमज़ोरी से
काम और बिगडेगा। याद करिये, अपने मालिक ने क्या कहा था।
अङ्गरेज अब भी मारते काटते दौड धूप कर रहे हैं। यदि आ गये तो
रानी साहब की देह का क्या होगा?
गुलमुहम्मद चौक पडा। साफे के छोर से आँसू पोछे। गला
बिलकुल सूख गया था। आगे बढने का इशारा किया। वे सब द्रुतगति
से बाबा गङ्गादास की कुटी पर पहुँचे।
लक्ष्मीबाई ४६१
[ ६१ ]
विसूरते हुये दामोदरराव को एक ओर बिठला कर रामचन्द्रराव ने
अपनी वर्दी पर रानी को लिटा दिया और बचे हुये साफे के टुकडे प उनके
सिर के घाव को बाधा । रघुनाथसिंह ने अपनी वर्दी पर मुन्दर के शव को
रख दिया । गुलमुहम्मद ने घोडे को जरा दूर पेडो से जा अटकाया ।
बाबा गंगादास ने पहिचान लिया । बोले, 'सीता और सावित्री के
देश की लडकिया हैं ये ।'
रानी ने पानी के लिये मुँह खोला । बाबा गंगादास तुरन्त गंगाजल
ले आये । रानी को पिलाया । उनको कुछ चेत आया ।
मुँह से पीडित स्वर मे धीरे से निकला, 'हर हर महादेव ।' उनका
चेहरा कष्ट के मारे बिलकुल पीला पड गया । अचेत हो गई ।
बाबा गंगादास ने पश्चिम की ओर देखकर कहा, 'अभी कुछ प्रकाश
है । परन्तु अधिक विलम्ब नही । थोडी दूर घास की एक गञ्जी लगी हुई
है । उसी पर चिता बनाओ ।
मुन्दर की ओर देखकर बोले, 'यह इस कुटी में रानी लक्ष्मीबाई के
साथ कई बार आई थी । इसका तो प्राणान्त हो गया है ।'
रघुनाथसिंह के रुद्ध कण्ड से केवल 'जी' निकला ।
उसके मुँह में भी बाबा ने गंगाजल की कुछ बूँदें डाली ।
रानी फिर थोडे से चेत में आईं कम से कम रघुनाथसिंह इत्यादि
को यही जान पडा । दामोदरराव पास आ गया । उसको अवगत हुआ
कि मा बच गई और फिर खड़ी हो जायगी । उत्सुकता के साथ उनकी
ओर टकटकी लगाई ।
रानी के मुँह से बहुत टूटे स्वर में निकला, 'ओ३म् वासुदेवाय नम
इसके उपरान्त उनके मुँह से जो कुछ निकला वह अस्पष्ट था ।
होठ हिल रहे थे । वे लोग कान लगाकर सुनने लगे । उनकी समझ में
केवल तीन टूटे शब्द आये • '
४६२ झांसी की रानी
। ॰ ॰ द ॰ ह ॰ ति ॰॰॰ नै ॰॰ य ॰॰॰ पावक.'मुख मडल प्रदीप्त हो गया ।
– सूर्यास्त हुआ । प्रकाश का अरुण पुञ्ज दिशा की भाल पर था ।
उसकी अगणित रेखाये गगन में फैली हुई थी ।
देशमुख ने बिलख कर कहा, 'झासी का सूर्य अस्त हो गया ।'
रघुनाथसिंह बिलख बिलख कर रोने लगा ।
दामोदरराव ने चीत्कार किया ।
बाबा गगादास ने कहा, 'प्रकाश अनन्त है । वह कण कण को
भासमान कर रहा है । फिर उदय होगा । फिर प्रत्येक कण मुखरित हो
उठेगा ।'
लक्ष्मीबाई ४६३
[ ६२ ]
बाबा गंगादास ने सचेत किया, 'झाँसी की रानी के सिधार जाने
को अस्त होना कहते हो ! यह तुम्हारा मोह है । वह अस्त नही हुई ।
वह अमर हो गईं । कायरता का त्याग करो । उस घास की गञ्जी पर
इन दोनो देवियो के शवो का दाह सस्कार करो अंग्रेज़ इन लोगो की
खोज में आते होगे । शीघ्रता करो ।'
वे दोनो संभले ।
देशमुख ने कहा, 'घास की गञ्जी बडी है ?'
बाबा गंगादास ने उत्तर दिया, 'गञ्जी तो छोटी सी है ।'
देशमुख कष्टपूर्ण स्वर में बोला, 'झाँसी की रानी के दाह के लिये
आज लकडी भी सुलभ नही ! घास की अग्नि तो इन दो शवो को केवल
झोस देगी । सवेरे शत्रु इनके अर्धदग्ध शरीर देखेगे, हँसेगे और शायद
कही फेक देंगे ।'
बाबा ने सिर उठाकर अपनी कुटिया को देखा ।
बोले, 'इस कुटिया में काफी लकड़ी है । उधेड़ डालो । अन्त्येष्टि का
आरम्भ करो ।'
रघुनाथसिंह ने प्रार्थना की, आपकी कुटी की लकडी ! आप एक
कृपा करें तो ।'
बाबा ने पूछा, 'क्या ?'
रघुनाथसिंह ने उत्तर दिया, 'फिर से कुटी बनाने में आपको असुविधा
होगी, इसलिये कुछ भेट ग्रहण करली जावे ।'
बाबा मुस्कराये ।
बोले, 'यह लकडी मेरी नही है । जिन्होने पहले दी थी वे फिर दे,
देंगे । देर मत करो । कुटिया को उधेड़ो ।'
देशमुख ने कहा, 'उसमें का सामान बाहर निकाल लिया जाय ।'
बाबा भीतर से एक कम्बल, तूंबी, चटाई और लगोटी उठालाये ।
४६४ झाँसी की रानी
बोले, 'बस और कुछ नही है। जल्दी करो।'
दोनो शवो को बाहर रखकर, दामोदरराव को एक ओर बिठलाया
और वे तीनो सिपाही कुटी को उधेड़ने में लग गये। बात की बात में
कुटी को तोडकर लकडी इकट्ठी करली ।
गन्जी की कुछ घास घोडो को डाल दी और कुछ से चिता का काम
लिया।
रानी का कठा उतार कर दामोदरराव के पास रख दिया।, मोतियो
की एक छोटी कठी उनके गले में रहने दी। उनका कवच और तवे भी।
चिता पर देशमुख ने रख दिया और अग्नि संस्कार कर दिया। अपनी
और रघुनाथसिंह की वर्दिया भी चिता पर रखदी।
आधी घड़ी में चिता प्रज्वलित हो गई।
उस कुटी की भूमि पर रक्त वह गया था। उसको देशमुख ने धो
डाला।
परन्तु उन रक्त की बूंदो ने पृथ्वी पर जो इतिहास लिख दिया था
वह अमिट रहा।
लक्ष्मीबाई ४६५
[ ९३ ]
कुछ दूरी पर रिसाले की टापो का शब्द सुनाई पडा । वह रिसाला
अग्रेज़ो का था ।
देशमुख—'रानी साहव की तलाश में बैरी घूम रहे हैं।'
रघुनाथसिंह—'आप दामोदरराव को लेकर तुरन्त निकल जाइये।'
देशमुख—'आप दीवान साहब क्या झाँसी की ओर जायेगे ?'
रघुनाथसिंह--'झांसी में मेरा अब क्या रक्खा है। मै इन सवारो
को मार कर मरूँगा। ये लोग चिता की ओर आयेंगे। इसे उसेलेंगे।
जाइये तुरन्त जाइये। रात को कही छिप जाना . विश्राम करना।'
देशमुख---'कठे का क्या होगा ?'
रघुनाथसिंह—'मृत सिपाहियो के बाल बच्चो मे बाट देना या कुछ
भी करना।' देशमुख ने दामोदरराव को पीठ पर बाधा और घोडे पर
सवार होकर चल दिया।
रघुनाथसिंह ने गुलमुहम्मद से कहा, 'कुँवर साहब आप भी जाइये।
मेरे घोडे को छोड़ दीजिये, उस विचारे को कोई न कोई रख लेगा।
आवरे में से मेरी बन्दूक और गोली वारूद का झोला लाने की कृपा
करिये।'
गुलमुहम्मद घोडे के पास गया। दोनो के आवरो में से गोली बारूद
और बन्दूकें निकाल ली। और, दोनो घोडो को जीन सहित छोड दिया।
गुलमुहम्मद ने रघुनाथसिंह को बन्दूक और गोली बारूद देते हुये
कहा, 'दीवान साहब, अम कहा जायगा ? अम राहतगढ से जब चला
तब पाचसौ पठान था। अब एक रह गया। अकेला कहा जायगा ? अम
भी मारेगा और मरेगा। बाई, अमको मत हटाओ।'
रघुनाथसिंह ने कहा, 'मै चाहता हू आप जिन्दा रहे, और इनकी
पवित्र हड्डियो और भस्म को किसी गैर को न छूने दे। रहा मे सोजांने
की बहुत जल्दी पड रही है। वे अभी रास्ते में होगे उनमे जल्दी मिलना
है, और बन्दूकें भरने लगा।
४६६ झाँसी की रानी
रघुनाथसिंह पागलो का सा हँसा ।
गुलमुहम्मद ने एक क्षण सोचा । बोला, 'यह फकीर साहब हड्डियों
की हिफाजत करेगा ।'
रघुनाथसिंह ने कहा, 'फकीर नही करेगा । आप चाहे तो कर
सकते है ।'
'अच्छा,' गुलमुहम्मद बोला, 'अम जिन्दा रहेगा । खाक और हड्डियों
पर चबूतरा बना देगा ।'
'अपनी बन्दूक भी मुझको देदो कु वर साहब, रघुनाथसिंह ने प्रस्ताव
किया ।'
गुलमुहम्मद ने प्रतिवाद किया, 'अब कुँवर साहब नही । अम फकीर
बनकर रहेगा । गुलसाईं नाम होगा ।'
उसने अपनी बन्दूक दे दी ।
'इसको भर दीजिये', रघुनाथसिंह ने अनुरोध किया ।
'बस बाई । अब बन्दूक या कोई हथियार नही छुयेगा अम खुदापाक
की याद में बाकी जिन्दगी खतम करेगा ।'
एक तरफ जाकर गुलमुहम्मद ने अपनी वर्दी जलती हुई चिता पर
फेंककर खाक कर दी —केवल साफा रक्खा । उसके एक टुकड़े की
लँगोटी लगाई । बाकी ओढने विछाने को रख लिया ।
खूब हँसकर बोला, 'अब अम बिलकुल आज़ाद हो गया बाई ।'
रघुनाथसिंह ने दोनो बन्दूके भर ली । गोली बारूद के, झोले लटकाये
गुलमुहम्मद के पास गया उसको देखकर विस्मित हुआ ।
बोला, आप तो सचमुच फकीर हो गये ! अच्छा सलाम कुँवर, साईं
साहब । भूल चूक गलती माफ कीजिये ।'
'सलाम,' गुलमुहम्मद ने कहा ।
जिस ओर से टापो का शब्द आ रहा था रघुनाथसिंह उसी दिशा
में गया । पास जाकर एक आड ली । लेट गया । प्रतीति करली कि
अग्रेजो का रिसाला है और कुटी की ओर आ रहा है।
लक्ष्मीबाई ४६७
'धाय धाय' बन्दूक चलाई ।
'धाय धाय' अंग्रेजी रिसाले का जवाब आया ।
काफी समय तक रिसाले के सैनिको को हताहत करता रहा । फिर ?
एक गोली से मारा गया ।
चिता 'साय-साय' जलती रही ।
गुलमुहम्मद चिता से कुछ दूर जाकर लेट गया । साफे के टुकडे से
अपने को ढका । बेहद थका हुआ था, सो गया । सवेरे जब आँख खुली
देखा कि चिता के स्थान पर कुछ जली हड्डिया बाकी रह गई हैं ।
उसके मुँह से निकल पडा, 'ओफ रानी साहब का सिर्फ यह हड्डी
रह गया है ! और उस हसीन लडकी का !'
फिर तुरन्त उसने अपने मन में कहा, 'ओ कबी नही । वो मरा
नहीं । वो कबी नई मरेगा । वो मुर्दों को जान बख्शता रहेगा ।'
चिता के ठडे हो जाने पर गुलमुहम्मद ने उस स्थान पर एक चबूतरा
बाधा और कही से फूल लाकर उस पर चढाये ।
अंग्रेजी सेना का एक दल रानी की ढूँढ खोज में वहाँ पर आया ।
चबूतरा अभी सूखा न था । उस दल के अगुआ का कुतूहल जागा ।
गुलमुहम्मद से उसने पूछा, ' यह किसका मज़ार है साई साहब ?'
गुलमुहम्मद ने उत्तर दिया, 'अमारे पीर का, वो बोत बड़ा वली
था ।'
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परिशिष्ट
[ १ ]
कई दिन तक अङ्गरेज़ो को रानी के शरीरान्त का पता न लगा । जब
लगा तब जनरल रोज़ ने कहा था, 'यह थी उनमें सर्वश्रेष्ठ और
सर्वोत्कृष्ट वीर । *
अठारह जून के सूर्यास्त के पहिले ही रावसहाब के मोर्चे छीन लिये
गये थे। थोडी देर तक तात्या ने बिगडे को बनाने का अथक परिश्रम
किया, परन्तु अन्त में दोनो को रणक्षेत्र छोडना पडा । रावसाहब छिपते
भटकते चार वर्ष बाद साधु वेश में पकडा गया और उसको बिठूर में फांसी
दी गई। उसके सम्पूर्ण जीवन में उसका परिणाम ही महान् था, और
अङ्गरेजो की प्रति हिंसा की विराटता थी उसको बिठूर में ले जाकर फासी
पर चढाया। तात्या ने निस्सन्देह कभी हार नही मानी। वह लक्ष्मीबाई
के ऊँचे राजनैतिक आदर्श तथा रणपांडित्य का सच्चा अनुयोगी और
उत्तराधिकारी था। जब अङ्गरेजो ने १८५८ के अन्त तक सारे हिन्दुस्तान
को अपने फोजी शिकञ्जे में जकड लिया, तब भी तात्या आधी और
बिजली की तरह तडपता और तडकता रहा और अङ्गरेजो को भूल भुलैया
खिलाता रहा। तात्या को आशा थी कि इतना सब खोजाने पर भी मैं
देश को जगा दूँ गा और खडा कर लूँगा, परन्तु जैसे कि इस अभागे
देश में होता चला आया था, राजपूताने के एक उसके मित्र राजा ने
विश्वासघात करके पकड़वा दिया। तात्या को शिवपुरी में अप्रैल सन्
१८५६ में, फासी दी गई।
तात्या का मरण उसके जीवन से भी बढकर ज्वलन्त था। फांसी
पर चढने के समय वह योगियो की तरह शान्त था। उसने कहा था,
She was the best & the bravest of them all.
५०० झांसी की रानी
मैंने जो कुछ किया अपने स्वामी पेशवा की आज्ञा से किया, और कुछ
बुरा नही किया।' नाना साहब का कोई पता नही चला। पहली
नवम्बर सन् १८५८ को विक्टोरिया का विख्यात घोषणा पत्र जारी किया
गया। बादा के नवाब ने आत्मसमर्पण किया और उनको कुछ पैन्शन
मिल गई। कम्पनी का, थोड़े से अङ्गरेज पूँजीपतियो और व्योपारियो का,
राज्य समाप्त हुआ, और यह पुराना देश नये इंगलैंड के समग्र
पूँजीपतियो और व्योपारियो के केन्द्रस्थ शासन के समक्ष हो गया।
झांसी के हृदय में झासी की रानी का राज्य सदा बना रहा-लावनियो
में, फागो में, गांवो और शहरो में किसान और मजदूर उनके सम्बन्ध में
अपने निजत्व को प्रकट करते रहे हैं। उनकी एक स्मृति झासी नगर में
आज भी जनता को पकड़े हुये हैं-होली जलने के बाद की प्रथमा के
दिन झासी वाला होली नही मनाता, वह दिन उसके लिये सूतक का है।
यदि हैदराबाद के निजाम और ग्वालियर के सिन्धिया अङ्गरेजो
का पक्ष न लेते, तो अङ्गरेज १८५८ के बाद इस देश मे बिलकुल नही
ठहर सकते थे।
उनके उस समय चले जाने के पश्चात् यहा क्या होता यह देश के
विवेक और अविवेक के लिये एक बहुत बडी समस्या होती।
उसी समय से अंग्रेजों ने समझ लिया कि हिन्दुस्थानी सेना में चुने
हुये लोग भर्ती किये जाने चाहिये, मारके ऊँचे पदो से उनको दूर रखना,
सारे देश को निश्शस्त्र कर देना और मृग-मरीचिकाएँ दिखलाते रहना
चाहिये।
परन्तु राजाओ और नवाबो को हाथ में रखना सदा आवश्यक
समझा गया।
गोद का कानून स्वीकार किया गया। धार्मिक स्वतन्त्रता मानली
गई। मानो हिन्दुस्थान को बडी गनीमत मिली।
झासी की रानी, तात्या, बहादुरशाह इत्यादि के पीछे जो लोग हुये,
लक्ष्मीबाई ५०१
भारतीय आत्मा की अमरता के साथ उनका अटूट क्रम रहा है । केवल
थोडो के ही नाम बतलाये जा सकते हैं .... ।
'परमहंस रामकृष्णं, स्वामी दयानन्द, विवेकानन्द, महात्मा...और,
और......
( २ )
झासी में जनेऊ का आन्दोलन घोर रूप पकडता, परन्तु बिठूर के
मिहमानो का लिहाज कर के राजा गङ्गाधरराव थोडे नरम पड गये थे ।
तमेरो ने जनेऊ पहिने थे और वे अपने जनेऊ की आन पर मिटने को
तैयार थे । उपन्यास में जाति का नाम नही दिया गया ।
( ३ )
पजनेश ने जिस स्त्री को प्रेम से वशीभूत होकर रख लिया था,
उसकी जात उन्होने अपनी कविता में लिख दी थी । उनका छन्द कवि
की स्वच्छन्दता और उस समय की अवस्था का द्योतक है । पूरा छन्द
इस प्रकार है —
सिवि चूके सची से अप्सरा से इन्द्र चूके
कृष्ण चूके कुब्जा सें सुरत न सभारी है ।
वडे वडे देव और दानव से चूक जात
तुमहू न चूको तो सकल का तुम्हारी है ?
भनपजनेस एक खत्रानी से हमहु चूके
चूक जात जग में बिना सक नरनारी है ।
कोमल तन ललित नैन वसत निसि वासर मन
प्यारी हमारी की लाज गङ्ग धारी है ।
( ४ )
हृदयेश ने अपनी कविता जितनी लिख पाई थी वह पूरी की पूरी
नीचे दी जाती है । मेरे पास हृदयेश की कविता उन्ही के हाथ की लिखी
है, जो मुझको भाई श्री भगवानदास सेठ की कृपा से प्राप्त हुई —
५०३ झांसी की रानी
बडे बडे असराफ गरद कर ऐसौ कलजुग आला
विभचारिन बिस्वन के उर में वर मुक्तन की माला
भन हृदेश पण्डित गुनमण्डित ते धारे मृगछाला
गानतान वारे धनवारे ओढे फिरे दुसाला ।१।
महाबीर वीरन के बेटा बैठे गहे किनाला
खसिया भँडुआ राड मिलावे बाधे फिरे तिपाला
कीमखाब के पैरन वारे भोगे अन्न कसाला
घोडिन की खिजमित कर तिनके परे कानमें बाला ।२।
पतिव्रता लरकन को तरसे बिभचारिन घर लाला
झूठे के मुख लाली देखी साचे के मुख काला
सत्य बचन परमान चलन को परे दुष्ट के जाला
चुगलखोर धानचोर मसखरा परे सेज सुखसाला ।३।
देवमदिरिन दिया न बाती गोरन पै उजियाला
भूमदेव विप्रन के देखो कोडी देत कसाला
रडिन को भोजन को सिन्नी ऊपर पान मसाला
साधुन को नहि चून चनन कौ सेवे देव दिवाला ।४।
चतुर नरन को बदसूरत की कूरन के घर बाला
मूरख बैठे मौज उडावे परबीनन पग छाला
भूपत कृपा करत नीचन पै कर अनीति प्रतिपाला
जबर जोर कलिकाल काल कौ गुन कौ चलै न चाला ।५।
मुसलमान सीतापति सुमरे हिन्दू मुख हकताला
मुसलमान मौसी कर टेरे हिन्दू टेरैं खाला
साची कहे सुनै को बिनती भयो नीच बल वाला
अधरम प्रगट भयो भूतल पै धसगो धरम पताला ।६।
जगतगुरू विप्रन को निन्दत बेनिक पुत्र घर वाला
मुछमुण्डन की दच्छा लै लै फेरे तुलसीमाला ।७।