झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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जूही की क्षीण मुस्कराहट जो उसके ओठो पर अनन्त दिव्यता की गोद
मे खेल गई ।
वर्दी के कट जाने पर हुजरो ने देखा कि तोपखाने का अफसर गोरे
रङ्ग की एक सुन्दर युवती थी ! और उसके ओठो पर मुस्कराहट थी !!
समाचार मिलते ही रानी ने इस तोपखाने का प्रबन्ध किया ।
इतने में ब्रिगेडियर स्मिथ ने अपने छिपे हुये पैदलो को छिपे हुये
स्थानो से निकाला । वे संगीने सीधी किये रानी के पीछे वाली पैदल
पल्टन पर दो पार्श्वों से झपटे । पेशवा की पैदल पल्टन घबरा गई ।
उसके पैर उखडे । भाग उठी । रानी ने प्रोत्साहन, उत्तेजन दिया ।
परन्तु उनके और उस भागती हुई पल्टन के बीच में गोरो की संगीनें और
हुज़रो के घोडे आचुके थे ।
अङ्गरेजो की कडाबीने, संगीनें और तोपें पेशवाई सेना का सहार कर
उठी । पेशवा की दो तोपे भी उन लोगो ने छीनली । अङ्गरेजी सेना बाढ
पर आई हुई नदी की तरह बढने और फैलने लगी ।
रानी की रक्षा के लिये लालकुर्ती सवार अटूट शौर्य और अपार
विक्रम दिखलाने लगे । न कडाबीन की परवाह, न संगीन का भय और
तलवार तो मानो उनकी ईश्वरीय देन थी । उस तेजस्वी दल ने घण्टो
अङ्गरेजो का प्रचण्ड सामना किया । रानी धीरे धीरे पश्चिम-दक्षिण की
ओर अपने मोर्चे की शेष सेना से मिलने के लिये मुडी । यह मिलान
लगभग असंभव था, क्योकि उस भागती हुई पैदल पल्टन और रानी
के बीच में बहुसंख्यक हुज़र सवार और संगीन बरदार पैदल थे । परन्तु
उन बचे खुचे लालकुर्ती वीरो ने अपनी तलवारो की आड़ बनाई ।
रानी ने घोडे की लगाम अपने दातो में थामी और दोनो हाथो से
तलवार चलाकर अपना मार्ग बनाना आरभ कर दिया । दक्षिण-पश्चिम
की ओर सोनरेखा नाला था । आगे चलकर बाबा गङ्गादास की कुटी थी ।
कुटी के पीछे दक्षिण और पश्चिम की ओर हटती हुई पेशवाई पैदल पल्टन ।