झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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भारतीय आत्मा की अमरता के साथ उनका अटूट क्रम रहा है । केवल
थोडो के ही नाम बतलाये जा सकते हैं .... ।
'परमहंस रामकृष्णं, स्वामी दयानन्द, विवेकानन्द, महात्मा...और,
और......
( २ )
झासी में जनेऊ का आन्दोलन घोर रूप पकडता, परन्तु बिठूर के
मिहमानो का लिहाज कर के राजा गङ्गाधरराव थोडे नरम पड गये थे ।
तमेरो ने जनेऊ पहिने थे और वे अपने जनेऊ की आन पर मिटने को
तैयार थे । उपन्यास में जाति का नाम नही दिया गया ।
( ३ )
पजनेश ने जिस स्त्री को प्रेम से वशीभूत होकर रख लिया था,
उसकी जात उन्होने अपनी कविता में लिख दी थी । उनका छन्द कवि
की स्वच्छन्दता और उस समय की अवस्था का द्योतक है । पूरा छन्द
इस प्रकार है —
सिवि चूके सची से अप्सरा से इन्द्र चूके
कृष्ण चूके कुब्जा सें सुरत न सभारी है ।
वडे वडे देव और दानव से चूक जात
तुमहू न चूको तो सकल का तुम्हारी है ?
भनपजनेस एक खत्रानी से हमहु चूके
चूक जात जग में बिना सक नरनारी है ।
कोमल तन ललित नैन वसत निसि वासर मन
प्यारी हमारी की लाज गङ्ग धारी है ।
( ४ )
हृदयेश ने अपनी कविता जितनी लिख पाई थी वह पूरी की पूरी
नीचे दी जाती है । मेरे पास हृदयेश की कविता उन्ही के हाथ की लिखी
है, जो मुझको भाई श्री भगवानदास सेठ की कृपा से प्राप्त हुई —