झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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विसूरते हुये दामोदरराव को एक ओर बिठला कर रामचन्द्रराव ने
अपनी वर्दी पर रानी को लिटा दिया और बचे हुये साफे के टुकडे प उनके
सिर के घाव को बाधा । रघुनाथसिंह ने अपनी वर्दी पर मुन्दर के शव को
रख दिया । गुलमुहम्मद ने घोडे को जरा दूर पेडो से जा अटकाया ।
बाबा गंगादास ने पहिचान लिया । बोले, 'सीता और सावित्री के
देश की लडकिया हैं ये ।'
रानी ने पानी के लिये मुँह खोला । बाबा गंगादास तुरन्त गंगाजल
ले आये । रानी को पिलाया । उनको कुछ चेत आया ।
मुँह से पीडित स्वर मे धीरे से निकला, 'हर हर महादेव ।' उनका
चेहरा कष्ट के मारे बिलकुल पीला पड गया । अचेत हो गई ।
बाबा गंगादास ने पश्चिम की ओर देखकर कहा, 'अभी कुछ प्रकाश
है । परन्तु अधिक विलम्ब नही । थोडी दूर घास की एक गञ्जी लगी हुई
है । उसी पर चिता बनाओ ।
मुन्दर की ओर देखकर बोले, 'यह इस कुटी में रानी लक्ष्मीबाई के
साथ कई बार आई थी । इसका तो प्राणान्त हो गया है ।'
रघुनाथसिंह के रुद्ध कण्ड से केवल 'जी' निकला ।
उसके मुँह में भी बाबा ने गंगाजल की कुछ बूँदें डाली ।
रानी फिर थोडे से चेत में आईं कम से कम रघुनाथसिंह इत्यादि
को यही जान पडा । दामोदरराव पास आ गया । उसको अवगत हुआ
कि मा बच गई और फिर खड़ी हो जायगी । उत्सुकता के साथ उनकी
ओर टकटकी लगाई ।
रानी के मुँह से बहुत टूटे स्वर में निकला, 'ओ३म् वासुदेवाय नम
इसके उपरान्त उनके मुँह से जो कुछ निकला वह अस्पष्ट था ।
होठ हिल रहे थे । वे लोग कान लगाकर सुनने लगे । उनकी समझ में
केवल तीन टूटे शब्द आये • '