झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
लक्ष्मीबाई ३१३
पीरअली ने स्वयं कई जगह अग्नि प्रज्वलित की। जब भीतर पहुंचे तो
वहा कोई न मिला ।
'मालूम होता है गडवड में नवाब साहब निकल भागे। मगर
असबाब सामान तो मौजूद है।'
पीरअली ने उनकी साधारण धन सम्पत्ति लुटवा दी। थोडी देर में
आग शान्त हो गई, परन्तु काफी क्षति हो गई थी।
पीरअली का नाम हो गया कि रानी की सेना के साथ वह नवाब
साहब और नत्थेखा की फौज के खिलाफ लडा। काशीनाथ और सागर-
सिंह ने विश्वास दिलाया। मोतीबाई को आश्चर्य था। परन्तु विजय के
हर्ष में अपने हितचिन्तक पर सन्देह करना ईश्वर के प्रति कृतज्ञता की
मात्रा को कम करना था। इसलिये पीरअली शीघ्र विश्वासपात्र लोगो की
गिनती में मान लिया गया।
रानी ने गुलाम गौसखा, रघुनाथसिंह और भाऊ बख्शी को विशेष
तौर पर पुरस्कृत किया।
दीवान खास में जब रघुनाथसिंह अकेला रह गया तब उसने रानी
से प्रार्थना की।
'सरकार मुझको सब कुछ मिल गया। केवल लड्डू रह गये।'
रानी हँसी मुन्दर पास खडी थी। उससे कहा, 'उस दिन तू ही थाल
उठा लाई थी। आज भी तू ही ला।'
मुन्दर थाल ले आई। बहुत प्रसन्न थी।
रानी ने आदेश दिया, 'अब तू ही खिला भी दे।'
मुन्दर ने रघुनाथसिंह को लड्डू खिलाये। वह हँस-हँसकर लड्डू
खिलाने में सचेष्ट थी, परन्तु रघुनाथसिंह अधिक नही खा सका। उसके
गले में कुछ अटक अटक जाता था।
३१४ झांसी की रानी
[ ५६ ]
रात को मोतीबाई आई । रानी ने भजन सुना । समाप्ति पर काशी-
बाई ने कहा, 'सरकार मैं बडी तोप चलाने का काम सीखना चाहती हूँ।
जब बख्शी जी कडकबिजली चला रहे थे, में उनके पास थी । निशाना
मिलाना, ध्यान के साथ बाहर की स्थिति को परखकर तोप का रुख
बदलना और पलीता छुलाकर बैरी की बडी सेना में भी अकेले खलबली
उत्पन्न कर देना, मुझको बहुत अच्छा लगा ।'
रानी बोली, 'मैने निश्चय कर लिया है । तुम सबको तोप का काम
सिखवाऊँगी । परन्तु पूरी शिक्षा के लिये कुछ समय लगेगा ।'
सुन्दर ने कहा, 'अपने यहा गुलाम गोस तो बहुत चतुर तोपची है
ही, अङ्गरेजी सेना से आया हुआ एक लालता ब्राह्मण भी बहुत अच्छा
ज़ानकार है । उसके ज्ञान का भी लाभ उठाया जाय ।'
'दीवान रघुनाथसिंह भी इस काम को बहुत अच्छा जानते हैं,' मुन्दर
ने उत्साह के साथ कहा ।
एक पल के बहुत छोटे अंश के लिये रानी की आख असाधारण
सजग हुई, और तुरन्त ही शान्त । मुन्दर ने लक्ष नही किया ।
रानी ने मोतीबाई से पूछा, 'तू नाटक खेलना भूल गई कि अभी
आता है ?'
मोतीबाई—'सरकार, जो एक बार पानी में तैरना सीख लेता है,
वह फिर कभी नही भूल सकता । आज्ञा हो तो किसी दिन कोई अच्छा
खेल दिखलाऊँ ?'
रानी—'सुचित्त हो जाऊँ तो किसी दिन अवश्य देखूँगी । तू किस
खेल को सबसे अच्छा समझती है ?'
मोतीबाई—'रत्नावली को । वैसे शकुन्तला, हरिश्चन्द्र, प्रबोध-
चन्द्रोदय भी बहुत अच्छे हैं ।'
रानी—'मैंने सुना है कि ग्वालियर में एक मण्डली हरिश्चन्द्र नाटक
बहुत अच्छा खेलती है ।'
लक्ष्मीबाई ३१५
मोतीबाई—'हम लोगो का और ग्वालियर की मण्डली का भी
अभिनय देखा जावे। फिर सरकार तुलना करे। मुझको विश्वास है कि
झासी की बात सिरे पर रहेगी।'
रानी—'मोती, मैं झांसी को हर बात में आगे देखना चाहती हूँ।
अश्वारोहण और अग्नि-विद्या में उस्ताद वजीरखा, अमीरखा; गोलन्दाजी
में गुलाम गौस, सैन्य-सञ्चालन में जवाहरसिंह, रघुनाथसिंह, गायन में
मुगलखा, शस्त्र बनाने में भाऊ बख्शी, कपडे सीने में बलदेव दर्जी, नृत्य में
दुर्गा। ये सब झांसी के गौरव हैं। मै चाहती हूँ कि प्रत्येक विद्या में
झांसी देश भर में सब से आगे रहे, परन्तु होगा यह तभी जब देश को
अङ्गरेजो के पञ्जे से छुटकारा मिल जाय।'
मोतीबाई—'सरकार ने जिस यज्ञ का आरम्भ किया है, वह किसी
न किसी दिन वरदान देगा।'
मुन्दर—'सरकार, ब्राह्मण लोग कहते हैं कि एक यज्ञ भी होना
चाहिये।'
रानी—ब्राह्मणो को यज्ञ और मिष्ट-भोज चाहिये। करा दूँगी,
परन्तु युद्ध के देवता कार्तिकेय, इस युग में बारूद और गोले का होम
अधिक पसन्द करने लगे हैं। और ब्राह्मणो को कलयुग की यह बात कम
मालूम है।'
मुन्दर—'अपने यहा के भट्ट और शास्त्री लोग अनुष्ठान के लिये
बहुत आग्रह कर रहे हैं। कहते हैं कि सब काम छोड कर, पहले उनके
विधान का पालन होना चाहिये।'
रानी—'सब काम छोडकर तो ऐसा न होगा, परन्तु और सब कार्यों
के साथ साथ अवश्य हो जायगा। तो पहला काम यह है कि कल से
तोप चलाना मोतीबाई गौस से, काशीबाई भाऊ बख्शी से, मुन्दर
रघुनाथसिंह से, और सुन्दर • •'
मुन्दर—'सरकार, दीवान दूल्हाजू भी अच्छे जानकार हैं।'
३१६ झाँसी की रानी
रानी—'उस पर ध्यान नही जम रहा था। उस दिन वह ठमठमा
गया था, परन्तु तोप अच्छी चलाता है। ठीक है। उससे सुन्दर सीखे।'
काशीबाई—'उस रात भाऊ बख्शी ने ऐसा प्रहार किया, कि नत्थेखा
इस जन्म में तो भूलेगा नही। मेरे कान तो आज तक सनसना रहे हैं।'
रानी—'अब की बार दिखता है कि गोरो का सामना होगा। तुम
सब की उस समय परीक्षा होगी।'
काशीबाई—'सरकार, हम लोगो की परीक्षा के फल से निराश न
होगी।'
मोतीबाई को एक बात कसक रही थी। उसने प्रसङ्ग-विक्षेप सा
करते हुये कहा।
'सरकार ने कहा था कि सब कार्य साथ साथ चलेंगे, तो नाटकशाला
का भी काम चालू कर दूँ?'
'तुमको उसके लिये विशेष प्रयत्न करना ही क्या पडेगा?' रानी
बोली, 'नृत्य-गान जानती ही हो। अवसर आने पर बतला दूगी।'
मोतीबाई—'सरकार ने दुर्गा के नृत्य के विषय में कहा था। वह
कथक नृत्य बहुत अच्छा करती है, परन्तु प्राचीन नृत्यकला को बिलकुल
नही जानती।'
रानी मुस्कराई।
रानी—'मै भूल गई थी मोती। नृत्य के विषय में झाँसी का गौरव
वास्तव में तुम हो, परन्तु वैरियो को तो गोलो से रिझाना होगा।'
मोतीबाई ने दृढतापूर्वक कहा, 'सरकार, उनको ऐसा रिझाया जावेगा
कि अनन्त काल तक उनकी चर्चा होगी।'
सुन्दर ने अनुरोध किया, 'सरकार, नाटक भी किसी दिन खिलवाया
जाय।'
'अच्छा सुन्दर,' रानी ने कहा, 'मोतीबाई उसकी भी तैयारी करेगी।
यज्ञ की जिस दिन पूर्णाहुति होगी, उसी रात नाटक होगा। मोती, नाटक
के सम्बन्ध में, मै तुझसे कुछ पूछना चाहती हू।'
लक्ष्मीबाई ३१७
मोतीबाई—'आज्ञा हो सरकार।'
रानी—'तू जब अभिनय करती है, तब क्या अपने को बिलकुल भूल
जाती है ?'
मोतीबाई—'बिलकुल तो नही भूल सकती सरकार।'
रानी—'क्या याद रहता है ?'
मोतीबाई—'अपना निजत्व, दर्शक और अभिनय।'
रानी—'क्या सब दर्शक ?'
मोतीबाई—'नहीं सरकार । जो दर्शक विशेष रुचि दिखलाते हैं,
उनके ऊपर प्रायः ध्यान जाता है। तभी अभिनय अच्छा हो सकता है।'
रानी—'तुमको अपने दर्शक याद रहते हैं ?'
मोतीबाई—'यदि वे बार बार नाटकशाला में आवे तो।'
रानी—'तुम्हे अपने कुछ दर्शको का अब भी स्मरण है ?'
मोतीबाई की आंख जरा लजीली हुई, परन्तु उसने तुरन्त सँभल कर
कहा, 'हा सरकार कोई याद रह जाते हैं।'
रानी ने पूछा, 'तुझे कौन सबसे अधिक याद है ?'
क्षण के दशांश के लिये सहेलियो ने एक दूसरे के प्रति दृष्टिपात
किया। मोतीबाई की आंख परवश नीची पड गई। सिर उठाया। कहने
को हुई। जरा सा हँसी। फिर गम्भीर हो गई। खासी।
बोली, 'कोई नाम याद नही आता सरकार।' और हँसी।
रानी को भी हँसी आ गई।
अच्छा जब याद आ जावे तब बतलाना,' रानी ने कहा, 'अभी कोई
जल्दी नही।'
मोती ने निष्कृति की सास ली।'
काशीबाई—'सरकार, इनके साथ जूही भी अभिनय किया करती
थी।'
रानी—'वह भी अब अपना काम कर रही है।'
३१८ झाँसी की रानी
मोतीबाई—'उसने खूब काम किया ओर करेगी ।'
रानी—'उसको भी गुलामगौस से तोप चलाना सिखलाओ । हमको
बहुत तोपचियो की आवश्यकता पडेगी । जिसके पास तोपें ओर तोपची,
उसी के हाथ विजय ।'
काशीबाई--'जहा हमारी श्रीमन्त सरकार होगी, वही विजय
होगी ।'
लक्ष्मीबाई ३१६
[ ६० ]
झांसी के दक्षिण में सागर का जिला और सागर के दक्षिण पश्चिम
में भोपाल रियासत । भोपाल रियासत में आमापानी नाम की गढी थी ।
थोडी दूर पर राहतगढ नाम का किला था । आमापानी के अधिकारी ने
राहतगढ पर कब्जा कर लिया । राहतगढ में बहुत से पठान इकट्ठे हो
गये ।
सागर की सेना ने विद्रोह किया और सागर को लूट लिया । जबलपुर
में विप्लव हुआ । सारे विन्ध्यखण्ड में विप्लव की लपटें बढीं ।
सन् १८५८ के मध्य सितम्बर में जनरल सरह्यू रोज ससैन्य इगलैंड
से बम्बई उतरा । विप्लवकारियो से बदला लेना और विप्लव का दमन
करना उसका दृढ़ निश्चय था ।
उसी महीने में दिल्ली का पतन हुआ । बहादुरशाह कैद कर लिया
गया और उसके दो शाहजादे मार डाले गये । लखनऊ का मुहासिरा
समाप्त हुआ । कानपुर में तात्या टोपे ने अङ्गरेजो के कम से कम तीन
जनरलो को लडाई में हराया । परन्तु दिल्ली के पतन का विप्लवकारियो
पर बुरा प्रभाव पडा ।
लखनऊ के प्रथम पतन पर भी अवध में जनता ने युद्ध जारी रक्खा
अङ्गरेज़ो ने इलाहाबाद फतेहपूर इत्यादि में प्रचण्ड हिंसा वृत्ति से प्रेरित
होकर भीषण और वीभत्स क्रूर कृत्य किये । इनके समाचार झांसी में
आये । बिठूर का पतन हुआ । नाना साहब कठिनाई से रात के समय
अपनी पत्नियो और विमाता को नाव में बिठालाकर निकल पाये और
लखनऊ की बेगम के पास पहुंच पाये । झांसी वालो के संसर्ग में फिर
कभी नही आये । रावसाहब और तात्या टोपे अपनी सेना लेकर कालपी
आ गये और यहाँ से युद्ध की योजनाये प्रयुक्त करने लगे । यह समाचार
भी झांसी आया ।
झांसी में हार खाकर नत्थेखा टीकमगढ मे शान्ति के साथ नही बैठा,
वरन झाँसी के पूर्वीय परगनो में डेढ दो महीने तक लूटमार करता
३२० झांसी की रानी
रहा। उसकी पडवाहा, गरोठा और नौटा की लूट विख्यात है। परन्तु
रानी ने थोडे समय में ही यह सब लूट मार कुचल दी और नत्थेखा को
बिलकुल हट जाना पडा ।
रानी की छोटी सी सेना को दहलाने और हैरान करने के लिये यह
सब काफी था, परन्तु रानी को घबराया हुआ या चिन्तित कभी किसी ने
नही देखा। उनका कार्य सतत, अनवरत जारी था।
वही कार्य क्रम। वही दिन चर्या। वही सद्भावना और जनता की
रक्षा तथा जनता के नायकत्व का वही दृढ सङ्कल्प। 'यदि अकेले ही
स्वराज्य की लडाई लडनी पडे तो लडी जायगी'—यह रानी का अटल
निश्चय था। और उनका अचल विश्वास था कि एक युद्ध और एक
जन्म से ही कार्य पूरी तौर पर सम्पन्न नही होता।
'सम्भवामि युगे युगे'
उन्होने पढा था, उनको याद था और उनके कण-कण में व्याप्त था।
वे अपने युग के उपकरण और साधन काम मे लाती थी। जिस
समाज में उनका जन्म हुआ था, उसी में होकर उनको काम करना था,
परन्तु उस समाज की हथकडियो और बेडियो की उन्होने पूजा नही की।
वे अपने युग से आगे निकल गई थी, किन्तु उन्होने अपने युग और समाज
को साथ ले चलने को, भरसक प्रयत्न किया। झांसी में विशेषतः और
विन्ध्यखण्ड मे साधारणतया, स्त्री की अपेक्षाकृत स्वतन्त्रता और नारीत्व
की स्वस्थता लक्ष्मीबाई के नाम के साथ बहुत सम्बद्ध है।
मङ्गल और शुक्र के दिन रानी, महालक्ष्मी के मन्दिर मे जाया करती
थी. जो लक्ष्मी-फाटक के बाहर, लक्ष्मीताल के ऊपर है। कभी पालकी
मे, कभी घोडे पर। कभी पालकी पर चिक डालकर, कभी बिना चिक के।
कभी साडी पहिन कर, कभी पुरुष वेश मे—सुन्दर साफा बाधे हुये।
कभी बिलकुल अकेली, और कभी धूमधाम के साथ। जब पालकी पर
जाती कुछ स्त्रिया अलङ्कारो से लदी, लाल मखमली जूते पहिने, परतले
मे पिस्तोल लटकाये पालकी का पाया पकडे साथ दौडती हुई जाती
लक्ष्मीबाई ३२१
थी । पालकी के आगे सवार गेरुआ झंडा फहराता हुआ चलता था ।
उसके आगे सौ घुड़सवार ।
साथ में रणवाद्य, नौबत । पीछे पठानों, मेवातियों और बुन्देलखंडियों
का रिसाला । बगल में प्राय भाऊ बख्शी घोड़े पर सवार ।
मार्ग में विनती भी सुनती थी ।
एक दिन एक भिक्षुक ब्राह्मण आ खड़ा हुआ । काशी से आया
था । पत्नी मर गई थी । दूसरा विवाह करना चाहता था । दरिद्र होने के
कारण लड़की वाला विवाह करने को तैयार न था । चार सौ रुपए की
अटक थी ।
उन्हीं दिनों कुंवर मंडली में एक नया व्यक्ति भर्ती हुआ था । नाम
रामचन्द्र देशमुख । देशमुख को आज्ञा दी, खजाने से इस ब्राह्मण को
पाँच सौ रुपया दिलवा दो ।
देशमुख ने कहा, 'जो हुकुम ।'
ब्राह्मण ने आशीर्वाद दिया ।
रानी ने ब्राह्मण से मुस्कराकर कहा, 'विवाह के समय मुझको न्योता
देना न भूल जाना ।'
ब्राह्मण गद्गद् हो गया । आँखों से आँसू बह पड़े मुँह से एक शब्द
न निकला । साथियों में, सहेलियों में, जनता में, सेना में, ब्राह्मणों में
अब्राह्मणों में विद्युत् वेग के साथ यह बात फैल गई ।
ऐसी रानी के लिये, ऐसी रानी की बात के लिये, ऐसी स्त्री के
सिद्धान्त के लिये, क्यों न लोग सहज ही प्राण दे डालने को सन्नद्ध होते ?
कुंवार का महीना आया । रानी ने श्राद्ध किया । नवरात्र में यज्ञ
का अनुष्ठान । महल के सामने पुस्तकालय था । निकटवर्ती मैदान में
यज्ञ-मंडप खड़ा किया गया । सौ ब्राह्मण हवन करने के लिये नियुक्त किये
गये । अन्य ब्राह्मण विविध विधान के लिये ।
गणेश मन्दिर में अथर्व का आवर्तन अलग हो रहा था । सप्तशती
के पाठके लिये १४ ब्राह्मण दुर्गा के मंदिर में चांदी के शमइयों में घी
३२२ झांसी की रानी
के दिये जलाये पाठ करने पर नियुक्त। जब यज्ञ समाप्त हुआ' मुख्य
सकल्प रानी के नाम से और नान्दीश्राद्ध दामोदरराव के हाथ से कराया
गया - पूना तरफ के एक ब्राह्मण ने आक्षेप किया और शास्त्रो के वचन
उद्धृत करने आरम्भ किये । उसकी बात मानी गई । वह विजय-गर्व से
फूल गया ।*
रानी को यह दुःसह हुआ।
रानी ने काशीबाई से कहा, 'काशी तू शान्ति के साथ सोच विचार
किया करती है। ब्राह्मणो का यह विवाद तुझको कैसा लगा ?'
काशी ने उत्तर दिया, 'सरकार, इन लोगो का वितण्डावाद कभी न
झुका, देश का दुर्भाग्य कभी न रुका - ये लोग सदा इसी में मस्त रहे।
मालूम नही भगवान ने इतनी ना समझी क्यो इन शास्त्रज्ञो के ही पल्ले
में परसी है ।'
रानी ने कहा, 'कर्म अच्छा है, परन्तु उसके कराने वाले आकर्मण्य हैं'
'बड़ी बात यह है कि राज्य का भार इन लोगो पर नही है, नही तो
हम सब डूब जाते जाते,' काशी बोली, 'राजकीय समस्याओ के सुलझाने
में यदि ये लोग इतना विवेक खर्च करे तो कितना बड़ा काम हो।'
'काशी,' रानी ने कहा, 'जब ये लोग राजनीति का व्यायाम करते है
तब वितण्डा नही करते । धर्म से ही न जाने ये लोग क्यो ऐसे रूठे हैं।'
विजयादशमी के दिन दरबार हुआ । अंग्रेजो ने जो जागीरे ज़ब्त कर
ली थी, वे वापिस कर दी गईं । नत्थेखा वाली लडाई में जिन लोगो ने
बड़े काम किये थे, उनको या उनके वारिसो को, जो पहले ही पुरस्कृत
नही हो चुके थे, पारितोषिक दिये गये । सागरसिंह और पीरअली भी
खाली हाथ न लौटे ।
जब सागरसिंह सामने आया रानी ने कहा, 'तुमको नवाब साहब की
हवेली में से कितना माल मिला ?'
*देखिये परिशिष्ट ।
लक्ष्मीबाई ३२३
सागरसिंह ने उत्तर दिया, 'बहुत कम सरकार । पीरअली मेरे गवाह
हैं । वे साथ थे । नवाब साहब की हवेली में आग लगाने वालो में
ये सबसे आगे थे ।' पीरअली आगे बढा ।
बोला, 'श्रीमन्त सरकार, मैने नवाब साहब का बहुत दिनो नमक
अदा किया, परन्तु जब देखा कि वे श्रीमन्त सरकार के विरुद्ध है, तब
उनसे अलग हो गयाँ । बेवस मुझको लडना भी पडा । आग मैंने सबसे
पहले नही लगाई । आग लग चुकी थी । माल अवश्य मैंने सिपाहियो
को बतलाया, क्योकि यह उचित था । थोडा ही मिला । नवाब साहब
पहले ही निकाल ले गये ।'
रानी को अच्छा नही लगा, परन्तु उन्होने कहा कुछ नही ।
रात को नाटक हुआ । पुरुष और स्त्रियो का—दोनो का-अभिनय
स्त्रियो ने ही किया । नाटकशाला भी स्त्रियो के सिवाय पुरुष एक भी
न था । खेल शकुन्तला का था । जूही ने शकुन्तला का अभिनय किया,
मोती ने उसकी सहेली का और काशी ने दुष्यन्त का ।'
नाटक की समाप्ति पर रानी ने मोतीबाई से पूछा, 'पहले भी ऐसा
ही अभिनय किया करती थी ?'
मोतीबाई—'आज, सरकार, हम लोगो ने अच्छे से अच्छा प्रयत्न
किया है ।'
रानी—'जूही तो शकुन्तला जैसी जची, परन्तु इसका दुष्यन्त रद्दी था ।'
जूही—'नही सरकार ।'
रानी को कुछ स्मरण हो आया ।
बोली, 'ठीक कहती है जूही । तेरा और तेरे दुष्यन्त जोहर युद्ध
में देखूँगी ।'
जूही ने निसंकोच कहा, 'सरकार मेरा और मेरे दुष्यन्त का जौहर
देखकर पुरस्कार देगी ।'
काशीबाई हँसकर बोली, 'मुझको तो आगे कभी दुष्यन्त बनना
नही ।'
३२४ झांसी की रानी
रानी ने चुटकी काटी। कहा, 'तब और कोई दुष्यन्द बनेगा।' और
मोतीबाई की ओर देखा। मोतीबाई ने गर्दन मोड़ी। जूही झेरकर पीछे
सट गई।
सहेलियो मे विनोद छागया।
जाते जाते रानी ने मोतीबाई से अकेले में कहा, 'खुदाबख्श से
कहना कि बारूद के कारखाने का ध्यान रक्खे। हमको इतनी बारूद
चाहिए कि हम किले में बैठकर महीनो लड सकें।'
मोतीबाई ने नीचा सिर किये हुये पूछा, 'सरकार् की इस आज्ञा का
कथन मै ही करूँ?'
'और कौन करेगा पगली,' रानी ने हँसकर कहा, 'तात्या टोपे का
भी समाचार मँगवा। देख क्या वे अब भी कालपी मे हैं? उनका झासी
आना जाना बना रहना चाहिए। न मालूम अङ्गरेज कब आजावे।
हम लोग झासी में घिरे हुए अनन्त काल तक तो लड़ नही सकते।
उनको इतना समीप रहना चाहिए कि अटक पडने पर सहायता लेकर,
शीघ्र आसके।'
दूसरे दिन रानी ने दीवान खास में जवाहरसिंह और रघुनाथसिंह
को बुलवाया। रानी कार्य की प्रगति को और तेज़ करना चाहती थी।
रानी — तोपे ऐसी ढल रही हैं न, जो पीछे धक्का न दे और जल्दी
गरम न हो?'
जवाहरसिंह — 'हा सरकार, बख्शी जी और उनके कारीगर इस
विद्या में निपुण हैं।'
रानी — 'बारूद?'
रघुनाथसिंह — 'तीन महीने की लडाई के लिए तैयार है। आज से
कुंवर खुदाबख्श ने और भी तेजी पकड़ी है।'
रानी — 'अच्छी बन्दूके और तलवारें भी बहुत सख्या में चाहिए।'
जवाहरसिंह — 'बन गई हैं और बन रही हैं।'
रानी — 'गोले?'
लक्ष्मीबाई ३२५
जवाहरसिंह—'भाऊ बख्शी आध सेर से लेकर पैंसट सेर तक गोले
तैयार कर रहे हैं। ठोस और पोले–फटने वाले भी।'
रानी—'मैं चाहती हूँ कि इन सब हथियारो के चलाने वाले भी
अधिकता से तैयार किये जावें।'
जवाहरसिंह—'जनता में बहुत उत्साह है। ऊँची-नीची सब जातिया
युद्ध की उमङ्ग से उमड रही हैं।'
रानी—'सबसे अधिक किन लोगो में उत्साह है?'
जवाहरसिंह— सरकार यह बतलाना कठिन है। ठाकुरो और पठानों
में तो स्वाभाविक ही है। कोरियो, तेलियो और काछियो में भी बहुत
उमङ्ग है। वनिये और ब्राह्मण भी पीछे नहीं हैं।'
रानी—'क्या शास्त्रियो में भी?'
जवाहरसिंह— वे भी तो झांसी के ही हैं, परन्तु उनको जब शास्त्र
और पूजन से अवकाश मिलता है तब।'
रानी—'हमारे देश में नीच-ऊँच का भेद न होता तो कितना अच्छा
होता।'
जवाहरसिंह—'भेद तो भगवान ने ही बनाया है, सरकार।'
रानी चुप रही। थोडी देर बाद बोली, मैं चाहती हूँ कि सब जातियो
के चुने हुये लोगो को, तोप बन्दूक का चलाना सिखलाया जावे।'
जवाहरसिंह ने बहुत उत्साह बिना दिखलाए कहा, 'यह काम जारी
है सरकार।'
रानी—'मैं अपनी सहेलियो और कुछ अन्य स्त्रियो को, बहुत अच्छा
गोलन्दाज़ बनाना चाहती हू।'
रघुनाथसिंह—'आज्ञा मिल गई है। उसके अनुसार काम किया
जायगा। अवश्य।'
रानी—'किले में अन्न इत्यादि भी काफ़ी जमा करलो। कुछ ठीक
नही कब घेरा पड़ जाय।'
३२६ झाँसी की रानी
जवाहरसिंह—'काफी अन्न एकत्र किया जा रहा है। और शीघ्र ही
किले के कमठाने में जमा कर लिया जावेगा।'
रानी—'चूना, ईंट, पत्थर भी इकट्ठा कर रखना। कारीगर भी हाथ
में रहे।'
जवाहरसिंह—'जो आज्ञा।'
रानी—'सेना का और युद्ध का कोई भी अङ्ग निर्बल न रहने पावे।'
लक्ष्मीबाई ३२७
[ ६१ ]
उत्तर और पूर्व में अङ्गरेजो की विजय-पराजय का क्रम चालू था।
लखनऊ के पतन के उपरान्त उसका फिर उत्थान हुआ। शहर में,
बगीचो-बारहदरियो में, महलो में युद्ध होता रहा। कानपुर के सूत्र को
तात्या टोपे ने फिर पकडा। वह ग्वालिय रगया और वहा की अङ्गरेजो-
हिन्दुस्थानी सेना को फोडकर अपने साथ ले आया और उसने अङ्गरेजो के
जनरल विंढम को हराया। परन्तु अङ्गरेज़ सत्तरह सहस्र गोरी सेना, नौ
सहस्र गोरखो और बहुसख्यक सिखो का दल लेकर लखनऊ पर पहुँच
गये। विप्लवकारियो ने बहुत करारे युद्ध किये। उत्तर और पूर्व के युद्धो
में तात्या टोपे ने बहुत भाग लिया। अन्त में जब बिठूर मिट गया और
कानपुर अन्तिम बार अङ्गरेजो की अधीनता में चला गया, तब तात्या
कालपी के आसपास से युद्ध करने लगा।
शीत काल आ चुका था। बिहार और अवध में घोर लडाई जारी
थी, परन्तु विप्लवकारियो में व्यवस्था न थी। बडे सरदार या राजा के
निधन पर छोटी स्थिति वाले नायक का नेतृत्व मान्य न होता था, इसलिये
अङ्गरेज धीरे धीरे एक स्थान के बाद दूसरे स्थान को और एक भूखण्ड
के उपरान्त दूसरे भूखण्ड को अधिकृत करते चले जा रहे थे। अङ्गरेजो
की क्रूरताओ ने भी विप्लव को नही दबा पाया था और न गोरखो और
सिखो की सहायता से वे इस देश को पुन प्राप्त कर सकते थे।
विप्लवकारियो मे सामन्त नेता के देहान्त के पश्चात् ही अनुशासन की कमी
उत्पन्न हो जाती थी और इसी कारण उनको हार पर हार खानी पडी।
नही तो तात्या टोपे इत्यादि सेनापतियो के होते हुये बडे बडे अङ्गरेज
जनरल भी मात खा जाते।
यही कारण दक्षिण में काम कर रहा था। जनरल रोज़ ने अपनी
सेना के दो भाग किये। एक को उसने मऊ छावनी की ओर भेजा और
दूसरे को लेकर वह सागर की ओर वढा। राहतगढ सागर से चौबीस
मील के फासले पर था। यहा से पठान जनरल रोज़ का मुकाबिला कर
३२८ झांसी की रानी
रहे थे। चार दिन घनघोर'युद्ध करने के वाद पठानो को किला छोडना
पडा। राहतगढ से १५ मील पर वरोदिया का किला था। यहा वानपूर
के राजा मर्दनसिंह के आश्रय में अङ्गरेज़ी फौज के कुछ विद्रोही थे। रोज़
ने इनको भी हरा दिया और फिर वह सागर की ओर बढा। पूर्व की
ओर गढ़ाकोटा का क़िला पड़ता था। वह विप्लवकारियो के हाथ में था।
उसको लेने के पहले रोज़ ने सागर पर चढ़ाई की।
नर्मदा के उत्तरी किनारे का अधिकांश भूखण्ड विप्लवकारियो के हाथ
में था। इसको अपने हाथ में किये विना जनरल रोज़ झांसी की ओर
नही बढ सकता था। सागर और झांसी के बीच में बानपूर का राजा
मर्दनसिंह और शाहगढ का राजा बखतबली लोहा लेने को तैयार थे।
अङ्गरेज़ो का प्रधान सेनापति सर कालिन कैम्बेल था। वह उत्तराखंड
के विप्लव के दमन मे सलग्न था। उसका मत था कि जब तक झांसी
नही कुचली जाती, तब तक उत्तराखण्ड हाथ नहीं आता। इसलिये रोज़
सागर के द्वार से झांसी की ओर आ रहा था। बीच में ऊबड-खाबड
भूमि और ऊबड-खाबड लड़ाकू जनसमूह। परन्तु रोज इत्यादि अगरेज़
जनरलो को विश्वास था—जहा विप्लवकारियो के नेता राजा, नवाब,
जागीरदार मारे गये तही विप्लव समाप्त हो जायगा।
लक्ष्मीबाई ३२६
[ ६२ ]
विकट ठंड । ऊपर से हड्डी कपाने वाली हवा । कुछ ही दिन पहले
पानी बरस चुका था । ठिठुरी हुई घास के ऊपर बडे बडे ओसकण ।
मृदुल बाल-रवि की रश्मिया उनके ऊपर सरकती हुई । झलकारी
कोरिन कन्धे पर बन्दूक रखे, बगल में बारूद और गोलियो का झोला
लटकाये उनाव फाटक से बाहर हुई । जब हाथ ठिठुर जाते तब बन्दूक
को बगल में दाब लेती और दोनो हाथ ओढनी में छिपा लेती । उनाव
फाटक के उत्तर में एक टौरिया है, जिसको अञ्जनली की टौरिया कहते हैं ।
उसके दक्षिणी सिरे पर अंजनी और हनुमान का एक छोटा सा चबूतरा
है । थोडी देर में झलकारी इसी चबूतरे के पास पहुची और धूप लेने
लगी । ठंडी हवा और सूर्य की कोमल किरणे उसकी बड़ी वडी आखो
को सुरमा सा लगाने लगी ।
जब दिन चढ आया तब वहा से जरा हटकर निशाना बाज़ी करने
लगी । काफी समय तक करती रही ।
अञ्जनी की टौरिया की उपत्यका विषम थी । वहा ऐसे समय कोई
आता जाता न था । लेकिन भेड बकरी और ढोर चरने के लिये आ
निकलते थे । अकस्मात् झलकारी की गोली एक पशु को लगी । उसने
ठीक तौर पर नही देख पाया कि गोली भेड को लगी या बछिया को ।
सन्देह था कि बछिया को लगी, परन्तु मन कहता था कि भेड को लगी
होगी ।
वह बेतहाशा घर आई । पूरन घरू काम कर रहा था । झलकारी
ने उसको अपनी घबराहट का कारण बतलाया । पूरन को हद दर्जे की
खीझ हुई ।
बोला, 'तुमने जा तक न देखी कै बछिया हती कै भेड, और न
काऊ से जा पूँछी कि की कौ ढोर हतौ ?'
झलकारी ने खिसिया कर कहा, 'मैं उतै कीसैं पूछती ? उतै बरेदी
तो हतोइ नई । बरेदी होतो तो ढोर उतैं कैसें आ जाते ?'
३३० झाँसी की रानी
पूरन चिन्तित था । खोज करने के लिये निकला । यदि भेड मरी है
तो उसका दाम दे दिया जावेगा, जाति में कुछ दण्ड लगेगा वह भुगत
लेगा, परन्तु यदि बछिया मरी है या घायल हो गई है तो आयी महान्
विपद । पूरन सोच रहा था ।
निशाने से उचट कर एक बछिया के पैर में गोली लगी थी । वह
घायल हुई और गिर पडी । बछिया एक ब्राह्मण की थी । मशहूर हुआ
कि बछिया मर गई-झलकारी ने मार डाली । वरेदी अपनी अनुपस्थिति
अस्वीकृत करता था । उसने कहा, 'मेने झलकारी को गोली मारते अपनी
आखो देखा है ।'
शहर में रौरा मच गया । झलकारी कभी कभी रानी के पास जाती
थी । रानी ने स्त्रियो की जो सेना बनाई थी, उसकी एक सिपाही
झलकारी भी थी । सध्या समय साफ सुथरे और रंगीन कपडे पहिन कर
थाली में दिये संवार कर, फूल सजाकर वह मन्दिर में पूजन के लिये
आया करती थी और अपने गले में फूलो का हार डाले भी दिखलाई देती
थी । अन्य जाति की स्त्रिया भी इस प्रकार की स्वतन्त्रता पाये हुई थी,
परन्तु झलकारी की स्वतन्त्रता में एक ओज था-और वह ऊँची जाति
वाले अनेक लोगो को खटकता था ।
'झलकारी ने एक गरीब ब्राह्मण की बछिया मार डाली ।'
'अरे वह इतनी मस्ता गई है कि अपने पति तक की मारपीट
करती है ।'
'वह अच्छो अच्छो को किसी गिनती में नही लेखती ।'
इस प्रकार की स्त्रिया रानी साहब को बदनाम कर रही हैं ।' इत्यादि
उद्गार बाजार में निसृत हो रहे थे ।
'प्रायश्चित्त कराओ ।'
'गधे पर बिठाकर काला मुँह करो ।'
'जब तक प्रायश्चित्त न हो जाय तब तक कुआ, बाजार, पड़ोस सब
बन्द रहे ।'
लक्ष्मीबाई ३३१
'खाना पकाने के लिये कोई पूरन को आगी तक न दे।'
'कोई उसको छुये नही।' इत्यादि व्यवस्थायें भी दे डाली गईं।
पूरन ने खोजकर पता लगा लिया कि वछिया मरी नही है। परन्तु
लोगो को अपनी बात और व्यवस्था वापिस नही लेनी थी, इसलिये
ब्राह्मण को फोड लिया और उसने घायल वछिया को छिपा लिया। कह
दिया कि न जाने कहा गई—मर गई।
कोरियो ने पञ्चायत की। वहिष्कार का दण्ड दिया। उस युग के
हिन्दू के लिये रौरव नरक से बढकर।
काला मुँह करके गधे पर चढाकर बाजार में जुलूस निकालने की
वात तै की। पूरन के बहुत घिघियाने-पतियाने और कुछ और स्त्रियो के
आडे आ जाने के कारण काला मुँह करना तो, निर्णय में से कम कर
दिया गया बाकी सजा बहाल रही।
जिस दिन प्रायश्चित का यह रूप प्रकट होना था, उस दिन शुक्रवार
था सन्ध्या का समय निश्चित था।
उसी दिन रानी महालक्ष्मी के मन्दिर को जाने वाली थी वे हलवाई-
पुरे के पश्चिमी सिरे पर उस दिन अकेली सवार आ रही थी। थोडी
दूर पीछे एक अङ्गरक्षक था।
कुछ अधनगे मगतो ने घेरा।
रानी ने पूछा, 'क्या है?'
उत्तर मिला—'ठन्क के मारे मर रहे हैं। कपडा नही है।'
रानी ने अङ्गरक्षक को बुलाकर आज्ञा दी, 'दीवान से कहो कि शहर
में जितने मागने, भिखारी साधू, फकीर हो, उन सब को एक एक कुर्ती
बनवा दें और एक एक कम्बल दे।'
मगतो को विश्वास हो गया कि आज्ञा का पालन होगा।
हलवाईपुरा के मध्य में पहुची कि पूरन घोडे के सामने जा गिरा।
रानी के पूछने पर उसने अपनी विपत्ति सुनाई। रानी सोच-
विचार में पड गई।
३३२ झाँसी की रानी
'पञ्चायत के निर्णय का कैसे उल्लङ्घन करूँ ?'
'सरकार, बछिया मरी नह्या ।'
'ब्राह्मण को बुलवाओ जसकी बछिया थी ।'
जब तक ब्राह्मण आया, तब तक रानी बाजार वालो से, उनके
बालबच्चो की कुशलवार्ता पूछती रही ।
ब्राह्मण के आने पर रानी ने अपनी सौगन्ध धराकर सच्चा हाल
कहने का आग्रह किया । कोई गुञ्जायश झूठ बोलने के लिये न रही ।
ब्राह्मण ने कहा, 'महाराज, चाहे मारें चाहे पाले, सच बात यह है
कि बछिया मरी नही है । वह मेरे एक नातेदार के यहा दतिया राज्य में
भेज दी गई है ।'
रानी ब्राह्मण को उसके फरेब के लिये कुछ दण्ड देना चाहती थी,
परन्तु बाजार के मुखिया-चौधरी आडे आगये । ब्राह्मण छोड दिया
गया ।
परन्तु बाजार वाले भोचक्के से रह गये । जो लोग झलकारी की
गधा-सवारी का जुलूम देखने के आकाङ्क्षी थे, बहुत निराश हुये । पञ्चो
को अपना निर्णय वापिस लेने मे असुविधा हुई । वापिस लेना पडा,
परन्तु पूरन को एक पगत बछिया के घायल होने के कारण तो भी देनी
पडी । प्रायश्चित्त की ऐसी पङ्गतो में कुछ ब्राह्मण और कुछ अन्य
जातियो के सरपञ्च बुलाये जाते थे । पूरन ने कुछ ब्राह्मण तो न्योत लिये,
परन्तु बाजार के सरपञ्च श्याम चौधरी और मगन गन्दी को नही
बुलाया । ये दोनो बिना निमन्त्रण के पूरन के यहा पहुँच गये । पूरन को
आश्चर्य और परिताप हुआ ।
श्याम चौधरी ने कहा, 'तुम न्योतना भूल गये तो हम पङ्गत में
आना तो नही भूले ।'
ऐसे लोगो के लिये भोजन ब्राह्मण बनाता था और ये लोग भोज में
शरीक होते थे । इसी प्रकार के सहयोग के कारण तत्कालीन समाज के
वे दुखदायक पहलू किसी प्रकार भुगत लिये जाते थे ।