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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 325

३१४ झांसी की रानी
[ ५६ ]
रात को मोतीबाई आई । रानी ने भजन सुना । समाप्ति पर काशी-
बाई ने कहा, 'सरकार मैं बडी तोप चलाने का काम सीखना चाहती हूँ।
जब बख्शी जी कडकबिजली चला रहे थे, में उनके पास थी । निशाना
मिलाना, ध्यान के साथ बाहर की स्थिति को परखकर तोप का रुख
बदलना और पलीता छुलाकर बैरी की बडी सेना में भी अकेले खलबली
उत्पन्न कर देना, मुझको बहुत अच्छा लगा ।'
रानी बोली, 'मैने निश्चय कर लिया है । तुम सबको तोप का काम
सिखवाऊँगी । परन्तु पूरी शिक्षा के लिये कुछ समय लगेगा ।'
सुन्दर ने कहा, 'अपने यहा गुलाम गोस तो बहुत चतुर तोपची है
ही, अङ्गरेजी सेना से आया हुआ एक लालता ब्राह्मण भी बहुत अच्छा
ज़ानकार है । उसके ज्ञान का भी लाभ उठाया जाय ।'
'दीवान रघुनाथसिंह भी इस काम को बहुत अच्छा जानते हैं,' मुन्दर
ने उत्साह के साथ कहा ।
एक पल के बहुत छोटे अंश के लिये रानी की आख असाधारण
सजग हुई, और तुरन्त ही शान्त । मुन्दर ने लक्ष नही किया ।
रानी ने मोतीबाई से पूछा, 'तू नाटक खेलना भूल गई कि अभी
आता है ?'
मोतीबाई—'सरकार, जो एक बार पानी में तैरना सीख लेता है,
वह फिर कभी नही भूल सकता । आज्ञा हो तो किसी दिन कोई अच्छा
खेल दिखलाऊँ ?'
रानी—'सुचित्त हो जाऊँ तो किसी दिन अवश्य देखूँगी । तू किस
खेल को सबसे अच्छा समझती है ?'
मोतीबाई—'रत्नावली को । वैसे शकुन्तला, हरिश्चन्द्र, प्रबोध-
चन्द्रोदय भी बहुत अच्छे हैं ।'
रानी—'मैंने सुना है कि ग्वालियर में एक मण्डली हरिश्चन्द्र नाटक
बहुत अच्छा खेलती है ।'