झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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विकट ठंड । ऊपर से हड्डी कपाने वाली हवा । कुछ ही दिन पहले
पानी बरस चुका था । ठिठुरी हुई घास के ऊपर बडे बडे ओसकण ।
मृदुल बाल-रवि की रश्मिया उनके ऊपर सरकती हुई । झलकारी
कोरिन कन्धे पर बन्दूक रखे, बगल में बारूद और गोलियो का झोला
लटकाये उनाव फाटक से बाहर हुई । जब हाथ ठिठुर जाते तब बन्दूक
को बगल में दाब लेती और दोनो हाथ ओढनी में छिपा लेती । उनाव
फाटक के उत्तर में एक टौरिया है, जिसको अञ्जनली की टौरिया कहते हैं ।
उसके दक्षिणी सिरे पर अंजनी और हनुमान का एक छोटा सा चबूतरा
है । थोडी देर में झलकारी इसी चबूतरे के पास पहुची और धूप लेने
लगी । ठंडी हवा और सूर्य की कोमल किरणे उसकी बड़ी वडी आखो
को सुरमा सा लगाने लगी ।
जब दिन चढ आया तब वहा से जरा हटकर निशाना बाज़ी करने
लगी । काफी समय तक करती रही ।
अञ्जनी की टौरिया की उपत्यका विषम थी । वहा ऐसे समय कोई
आता जाता न था । लेकिन भेड बकरी और ढोर चरने के लिये आ
निकलते थे । अकस्मात् झलकारी की गोली एक पशु को लगी । उसने
ठीक तौर पर नही देख पाया कि गोली भेड को लगी या बछिया को ।
सन्देह था कि बछिया को लगी, परन्तु मन कहता था कि भेड को लगी
होगी ।
वह बेतहाशा घर आई । पूरन घरू काम कर रहा था । झलकारी
ने उसको अपनी घबराहट का कारण बतलाया । पूरन को हद दर्जे की
खीझ हुई ।
बोला, 'तुमने जा तक न देखी कै बछिया हती कै भेड, और न
काऊ से जा पूँछी कि की कौ ढोर हतौ ?'
झलकारी ने खिसिया कर कहा, 'मैं उतै कीसैं पूछती ? उतै बरेदी
तो हतोइ नई । बरेदी होतो तो ढोर उतैं कैसें आ जाते ?'