झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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थी । पालकी के आगे सवार गेरुआ झंडा फहराता हुआ चलता था ।
उसके आगे सौ घुड़सवार ।
साथ में रणवाद्य, नौबत । पीछे पठानों, मेवातियों और बुन्देलखंडियों
का रिसाला । बगल में प्राय भाऊ बख्शी घोड़े पर सवार ।
मार्ग में विनती भी सुनती थी ।
एक दिन एक भिक्षुक ब्राह्मण आ खड़ा हुआ । काशी से आया
था । पत्नी मर गई थी । दूसरा विवाह करना चाहता था । दरिद्र होने के
कारण लड़की वाला विवाह करने को तैयार न था । चार सौ रुपए की
अटक थी ।
उन्हीं दिनों कुंवर मंडली में एक नया व्यक्ति भर्ती हुआ था । नाम
रामचन्द्र देशमुख । देशमुख को आज्ञा दी, खजाने से इस ब्राह्मण को
पाँच सौ रुपया दिलवा दो ।
देशमुख ने कहा, 'जो हुकुम ।'
ब्राह्मण ने आशीर्वाद दिया ।
रानी ने ब्राह्मण से मुस्कराकर कहा, 'विवाह के समय मुझको न्योता
देना न भूल जाना ।'
ब्राह्मण गद्गद् हो गया । आँखों से आँसू बह पड़े मुँह से एक शब्द
न निकला । साथियों में, सहेलियों में, जनता में, सेना में, ब्राह्मणों में
अब्राह्मणों में विद्युत् वेग के साथ यह बात फैल गई ।
ऐसी रानी के लिये, ऐसी रानी की बात के लिये, ऐसी स्त्री के
सिद्धान्त के लिये, क्यों न लोग सहज ही प्राण दे डालने को सन्नद्ध होते ?
कुंवार का महीना आया । रानी ने श्राद्ध किया । नवरात्र में यज्ञ
का अनुष्ठान । महल के सामने पुस्तकालय था । निकटवर्ती मैदान में
यज्ञ-मंडप खड़ा किया गया । सौ ब्राह्मण हवन करने के लिये नियुक्त किये
गये । अन्य ब्राह्मण विविध विधान के लिये ।
गणेश मन्दिर में अथर्व का आवर्तन अलग हो रहा था । सप्तशती
के पाठके लिये १४ ब्राह्मण दुर्गा के मंदिर में चांदी के शमइयों में घी