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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 400, कुल 508 में से

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पृष्ठ 400

३७० रंगनाथ रामायण
शक्तिशाली दानव-सेना भी चली । उनकी सुंदर पताकाएँ फहराने लगीं और उनके आभूषणों
की कांति दीप्त हो उठी । तुरहियों की ध्वनि तथा भीषण सिंहनाद से पृथ्वी को कँपाते हुए
लंका को जलाकर गर्व से झूमनेवाले वानरों पर राक्षसों ने ऐसा आक्रमण किया, जैसे
प्रलय-काल का पवन-समूह प्रलय-काल के बादलों पर आक्रमण करता हो । पहले उन प्रचंड
पराक्रमी वीरों ने दुर्ग के द्वार पर दुर्वार गति से रहनेवाले कपि-सैनिकों पर आक्रमण
करके उन्हें भगा दिया । उन वानरों को भागते देखकर हरिरोम, केसरी आदि बाहु-
बली योद्धाओं ने उन्हें रोका और रोष से भरे हुए दैत्य-वीरों से स्वयं भिड़ गये
और उन पर पर्वतों तथा वृक्षों को फेंकने लगे । किन्तु, राक्षसों ने अपने करवाल, गदा,
शूल, परिघ, चक्र आदि श्रेष्ठ अस्त्रों से उन्हें रोक दिया । तब वानरों ने अपने नखों से
उनका वक्षःस्थल चीर डाला, उनके कानों तथा नाकों को खंडित किया, दाँतों से काटा
और सिरों पर मुष्टियों से प्रहार किया । एक वानर एक दैत्य पर मुष्टि से प्रहार करता था,
तो दूसरा राक्षस उस वानर पर मुष्टि से प्रहार करता था । एक राक्षस किसी कपि
को मार डालता, तो दूसरा कपि उस राक्षस का वध कर डालता था । एक दैत्य किसी
कपि को पकड़ लेता, तो दूसरा दैत्य शीघ्र उस कपि को पकड़ लेता था । एक कपि किसी
राक्षस को घेर लेता तो दूसरा दैत्य शीघ्र उस कपि को घेर लेता । एक राक्षस किसी
कपि को युद्ध करने के लिए ललकारता, तो दूसरा कपि उससे युद्ध करने लगता । कहीं-
कहीं सात-आठ योद्धा एक साथ अपने शत्रु को अकेले घेरकर उसको मुष्टि के प्रहारों से
मार डालते, तब उसके फलस्वरूप दोनों पक्षों के कितने ही कपि तथा राक्षस लड़कर मर
जाते । इस प्रकार, दोनों पक्ष के योद्धा भयंकर सिंहनाद करते हुए घोर युद्ध करने लगे ।
तब रण-भूमि पर्वत-शृंगों, गज, हय तथा राक्षसों के विशाल शरीरों एवं शस्त्रों से भरकर
भयंकर दीखने लगी ।
युद्ध इस प्रकार चल ही रहा था कि कंपन ने एक विशाल गदा उठाकर अंगद पर
प्रहार किया । इस प्रहार से अंगद बहुत ही व्याकुल हुआ, किन्तु शीघ्र ही सँभलकर एक
विशाल पर्वत से उस दैत्य पर प्रहार किया । तब वह राक्षस चूर-चूर होकर मिट्टी में मिल गया ।
यह देख कपिनायक अंगद बड़े दर्प से सिंहनाद करने लगा । कंपन की मृत्यु को देख,
शोणिताक्ष ने अत्यधिक क्रुद्ध होकर अपना रथ अंगद के निकट ले जाकर अंगद पर अक्षतास्त्र
चलाने लगा । अंगद उसकी बाण-वर्षा से विचलित हो उठा । वह तुरंत उस राक्षस के
रथ पर कूद गया और उसका धनुष तोड़ दिया, तो वह राक्षस शीघ्र ही खड्ग लेकर
आकाश की ओर उछला । तब कपि-वीर भी उसके साथ ही आकाश की ओर उछला
और उस राक्षस के हाथ का खड्ग छीनकर उसीसे उस राक्षस पर प्रहार किया । तब
वह राक्षस मूर्च्छित हो गया । तब अंगद यम के समान राक्षस-समूह का संहार करने लगा । इतने
में शोणिताक्ष सचेत हुआ और गदा लेकर अंगद पर आक्रमण किया । प्रजंघ भी उसकी
सहायता के लिए आ गया और गवाक्ष भी उसकी सहायता के लिए आ पहुँचा । यह देख-
कर द्विविद तथा मैन्द अंगद की सहायता के लिए आये । तब उन दोनों दलों में घोर
युद्ध छिड़ गया । जब वानर राक्षसों पर पर्वतों की वर्षा-सी करने लगे, तब प्रजंघ ने देखते-