रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयुद्धकांड [३४७]
करने के उद्देश्य से अकारण ही सूर्यवंशज राम से वैर ठानकर अत्यधिक शौर्य के साथ
युद्ध करनेवाले रावण के समक्ष मैं इस विकृत शरीर में कैसे जा सकूँगा ? अतएव, मेरे
लिए उचित यही है कि मैं युद्ध-भूमि में वापस चला जाऊँ ।' यों सोचकर वह उद्दण्ड
राक्षस अत्यन्त क्रुद्ध होकर, रक्त-सिक्त शरीर से इस प्रकार रण-भूमि की ओर चल पड़ा,
मानो लाल रंग के झरनों से युक्त नीलाद्रि आ रहा हो अथवा युगांत के समय की प्रचण्ड
अग्नि हो । रणभूमि में पहुँचकर वह क्रुद्ध राक्षस भयंकर गति से वानरों पर टूट पड़ा
और विविध रीतियों से उनका संहार करने लगा । वह कुछ वानरों के पैर पकड़कर उन्हें
तेजी से घुमाता और पृथ्वी पर पटक-पटककर मारता । कुछ वानरों पर मुष्टि-प्रहार करता,
तो कुछ वानरों की आँतों को बाहर खींच लेता । कुछ लोगों पर पद-प्रहार करता और
जब उनका कलेजा और मांस-खंड बाहर निकल आते, तब उन्हें पैरों से कुचल देता । कभी-
कभी वज्र के समान अपनी विशाल बाहुओं को उठाकर शत्रुओं पर ऐसा प्रहार करता कि
वे मिट्टी चाटने लगते । जो वानर उसके शरीर पर चढ़ जाते, उन्हें आश्चर्यजनक रीति
से पकड़ लेता और सामने पड़नेवाले राक्षस को भी अपनी ओर खींचकर उसके कंठ पर
प्रहार करता था । इस प्रकार, उसने हुंकारों तथा दहाड़ों के साथ वानरों के प्राण ले-लेकर
उनके शवों का ढेर-सा लगा दिया । फिर, वह कुछ वानरों को ऊपर उठाकर आकाश की
ओर ऐसे उछाल देता कि युद्ध को देखने के लिए आये हुए देवताओं के विमान घबराकर
लौट जाते । ऊपर फेंके हुए वानरों को नीचे गिरने के पहले ही उनसे टकराने के लिए
दूसरे वानरों को लक्ष्य करके फेंक देता । कुछ वानरों को पकड़कर आकाश में ऐसा घुमाता
कि उनकी हड्डी-पसली चूर-चूर हो जाती । कुछ वानरों को मार-मारकर मूर्च्छित कर देता ।
कुछ लोगों को दोनों हाथों से कसकर पकड़ लेता, फिर उन्हें जहाँ-तहाँ पटककर
दूर फेंक देता । कुछ वानरों को पकड़कर लंका में फेंक देता और कहता-'लो तुम भी
इन वानरों को देखो।' कुछ कपियों को समुद्र में फेंककर कहता-'जिन्होंने तुम्हें बाँधा था,
उन्हें अब तुम डुबो दो।' इस प्रकार, वह दानव अपना प्रताप प्रकट करते हुए उन
वानरों को सभी दिशाओं में फेंकने लगा । पृथ्वी, आकाश तथा सभी दिशाओं में, जहाँ
देखो वहाँ, मरनेवाले, लुढ़कनेवाले, लोटनेवाले, आर्त्तनाद करनेवाले, छटपटानेवाले, हाँफने-
वाले गिरे हुए तथा गिरनेवाले कपि ही भरे थे । सारा रण-रंग इन वानरों के आक्रंदन
से दुस्सह प्रतीत होने लगा । उस कुंभकर्ण का कालांतक के समान अत्युग्र तथा भीषण
आकार देखकर, सुग्रीव दब गया, अंगद भयभीत हो गया, गवाक्ष काँप उठा, गज धैर्य
खो बैठा, ऋषभ विचलित हो गया, नल शंकित हुआ, नील भय-कंपित हो गया, पृथु
विचलित हुआ, शरभ चकित हुआ, धूम्र भय-विह्वल हुआ, पनस थर-थर काँपने लगा,
गंधमादन डर गया, अनिल-कुमार भी थरथराने लगा, ज्योतिर्मुख अत्यन्त भयाकुल हुआ,
जांबवान् मार्ग पकड़कर भागने लगा और शेष सभी वानर अत्यन्त भय-विह्वल
हो उठे ।
तब महान् बली लक्ष्मण ने कुंभकर्ण को सिर से पैर तक देखकर क्रोध से उसके
वक्ष पर सात शर चलाये । उसके बाद भी उन्होंने कई शर चलाये, किन्तु उस क्रूर राक्षस ने