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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 376, कुल 508 में से

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पृष्ठ 376

३४६ रंगनाथ रामायण
इस प्रकार वदी तो नही बनेगा . ?' कुंभकर्ण की शक्ति तथा पराक्रम की सभी दानव
प्रशंसा करने लगे और रवि-सुत को छुड़ाने में असमर्थ होकर वानर हाहाकार करने लगे ।
तब हनुमान्, अगद, नील, शरभ, ऋषभ, जाम्बवान्, गिरिभेदी, सुतर, केसरी, पृथु,
हरिरोम, पावकाक्ष, हर, द्विविद, मैन्द, वेगवान्, गवय, शतबली, गज, दुर्दम, समुद्र, बालपाश,
गवाक्ष, कुमुद, ज्योतिर्मुख, सुषेण, दविमुख, देगदर्शी, रंभ, क्रयन, धूम्र, गंधमादन, तार, क्रोधन,
तपन, प्रजंघ, घोराक्ष, जघाल, गोमुख, विमुख, पनस, सन्नाध, संपाती, इन्द्रजाल, विनुत,
सुदंष्ट्रक, श्वेत, दुर्मुख आदि भयंकर आकारवाले उद्दण्ड पराक्रमी एवं वीर वानर
पर्वतो तथा वृक्षो को उठाये हुए ब्रह्माण्ड को विदीर्ण करनेवाले घोर गर्जन करते हुए किसी
भी तरह से सूर्य-पुत्र को छुड़ाने का दृढ़ संकल्प करके उस राक्षस पर टूट पड़ने के लिए
उतावले होने लगे । इतने में नीतिवान् वायुपुत्र ने अपने हस्त-संकेत से उन्हें रोककर उनसे
कहा--'अद्भूत शूर सूर्य-पुत्र अभी मूर्च्छा में पड़े हुए हैं। जब उनकी चेतना लौट आयेगी,
तब वह महान् वीर स्वयं यहाँ चले आयेंगे । यदि हम हठ करके उन्हें राक्षस के हाथ से
छुड़ा लेंगे, तो कपिराज मन-ही-मन दुखी होंगे । अतः, हमें ऐसा नहीं करना चाहिए ।
थोडी देर प्रतीक्षा करो । यदि इस बीच में वे नहीं लौटे, तो कुटिल रावण एवं कुंभकर्ण
को तथा प्रचंड विक्रमी सभी राक्षसों को अपने मुष्टि-घातो से हम मार डालेंगे, स्वर्ग-दीप्तियो
से सुशोभित होनेवाले सातो दुर्गों के साथ लंका का सर्वनाश करके प्रलय मचा देंगे
और सूर्य-पुत्र से मिलकर उन्हें ले आयेंगे ।' हनुमान् के इन वचनों को सुनकर सभी कपि-
वीर मन-ही-मन हर्षित हुए और आकाश-मार्ग में बड़े वेग से उस राक्षस के पीछे-पीछे
चलने लगे । कुंभकर्ण ने इस बात से अनभिज्ञ हो, अपने ढंग से सूर्य-पुत्र को लेकर लंका
में प्रवेश किया ।
तब राजमार्गों राजांतःपुरो तथा ऊँची अट्टालिकाओ पर से नगर की स्त्रियाँ पुष्प-
वृष्टि करने लगीं । इससे सूर्य-पुत्र सचेत हुआ और नगर-मार्ग को चारों ओर आश्चर्य से
देखा । फिर, मन-ही-मन आश्चर्य तथा दुःख का अनुभव करने लगा । वह सोचने लगा-
'हाय, इतनी देर तक मूर्च्छित रहकर मैं इस राक्षस के हाथो में फँस गया । फिर, उसने
अपने हाथों से उस राक्षस के कानों को पकड़कर ऐंठा और उन्हें जोर से खींचा । फिर
उसके नथुनों के साथ नाक को काट डाला और तीव्र गति से आकाश की ओर उड़ गया;
किन्तु राक्षस ने उसे छोड़ा नहीं । उसने सुग्रीव के पैर पकड़कर उसे नीचे की ओर खींच
लिया और नीचे-पटक दिया, किन्तु सुग्रीव फिर से आकाश की ओर उड़कर शीघ्र अपने
प्रभु के पास पहुँच गया । स्वर्ग में सभी देवता आश्चर्यचकित हुए और वानर-समूह घेरकर
उसे प्रणाम करने लगे । तब सभी वानरोके साथ सुग्रीव ने रामचन्द्र के चरणों में प्रणाम किया।
श्रीराम ने बड़े हर्ष से सुग्रीव को हृदय से लगा लिया । सभी कपि आनंदविभोर
हो गये ।
७८. कुंभकर्ण का वानर-सेना को तहस-नहस करना
वह असुरेश्वर अपने नाक तथा कान के नष्ट होने से मन-ही-मन बहुत क्षुब्ध हुआ
और सोचने लगा--'अपनी बहन के अपमान से अत्यंत लज्जित होकर उसका प्रतिकार