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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 375, कुल 508 में से

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पृष्ठ 375

युद्धकांड ३४५
७६. सुग्रीव तथा कुंभकर्ण का युद्ध
तब सुग्रीव ने मन-ही-मन सोचा कि मेरे युद्ध करने का यही अवसर है । फिर,
उस अनुपम पराक्रमी ने, कुल पर्वतो के अधिपति पर आक्रमण करने के लिए आनेवाले
इन्द्र की भाँति अपना शरीर वढाया, तथा प्रचण्ड क्रोध की अग्नि से दीप्त होते हुए सभी
पर्वतो में श्रेष्ठ एक महान् पर्वत को उठाकर बडे वेग से, उस राक्षसेश्वर की ओर बढा,
जिसके मुँह और शरीर वानरो के रक्त से भीगकर विचित्र भद्दापन लिये हुए थे । उसके
पास पहुँचकर सुग्रीव ने कहा- 'हे राक्षस क्या, तुम मुझे नही जानते ? मैं सूर्य का पुत्र हूँ
और प्रख्यात रामचन्द्र का भी पुत्र हूँ । तुम्हारे और मेरे बीच का ही युद्ध योग्य होगा।
तुम व्यर्थ ही इन वानरो को क्यो मार रहे हो ?'
सुग्रीव के इन वचनो को सुनकर कुभकर्ण ने क्रुद्ध होकर कहा- 'हे सुग्रीव, लोग
तुम्हें बडा ही शूर कहते है । क्या, कोई शूर युद्ध किये बिना ही क्रोध करता है ? युद्ध
में अपनी शूरता प्रदर्शित करना ही उचित होगा । इस प्रकार डीग हाँकना तुम्हें शोभा
नही देता।' उसके इतना कहते ही सूर्य-पुत्र ने उस राक्षस पर क्रुद्ध होकर लाये हुए पर्वत को
उस पर पटक दिया । वह पर्वत उस राक्षस के विशाल वक्ष से लग गया और चूर-चूर
हो गया । दोनो पक्षो की सेना इस क्रूर आघात को देखकर हाहाकार करने लगी । उस
महाबली के प्रहार से राक्षस-वीर अत्यन्त सभ्रमिरा हुआ । फिर भी, बडे साहस के साथ
उसने भयकर गर्जन किया और सुग्रीव पर उस विख्यात शूल को चलाया, जो बीस सहस्र
सिर की आहुति के पश्चात् चदन-अक्षत से अर्चित था तथा सुरासुरो के वहन करने के लिए
अशक्य था । तब वह शूल भयकर ज्वालाओ से प्रदीप्त होते हुए पृथ्वी, आकाश तथा
दिशाओ तक अपनी ज्वालाओ को फैलाते हुए, दम हजार अशनियो के समान ध्वनि करते हुए
सूर्य-पुत्र की ओर जाने लगा । उस शूल को ऐसी भयकर गति से आते देखकर हनुमान् ने
बीच में आकर उसे इस प्रकार पकडकर खट-खड कर दिया जैसे गरुड, घनी विष-ज्वालाओं
को उगलनेवाले सर्पराज को पकडकर उसको नष्ट-भ्रष्ट कर देता है । उसके पश्चात्
हनुमान् ने उछलकर सिंह-गर्जन किया, तो सभी वानर उसकी प्रशसा करने लगे । शूल के
टूटने से कुभकर्ण क्रोध से जलते हुए लका के मलयाद्रि-शृग को उठाकर सूर्य-पुत्र पर फेंका।
शृग के सुग्रीव के वक्ष पर लगते ही वह हाँफते हुए पृथ्वी पर गिर पडा ।
७७. कुंभकर्ण का मूर्च्छित सुग्रीव को लंका ले जाना
सुग्रीव के गिरते ही राक्षस बडी हर्ष की ध्वनि करने लगे । तब कुभकर्ण क्रूर रूप
धारण किये पृथ्वी पर पडे हुए उस महाबली सुग्रीव के निकट आया और उसे देखकर
बोला- 'समस्त वानर-सेना के लिए तथा सूर्यकुल-तिलक राम के लिए एकमात्र शक्ति-पुज
यही है । अत, यह कहने की आवश्यकता नही है कि इसके गिरने से सभी वानर शीघ्र
गिर जायेंगे । अब मेरे भाई भी इस सुग्रीव को देख लें ।' इस प्रकार, सोचते हुए वह
उसे उठाकर लका की ओर ऐसे ले चला, मानो कालानल घनघोर बादल को गिराकर
उसे अपनी गुफा में ले जा रहा हो । सभी देवता दुखी होने लगे- 'हाय, सुग्रीव वही
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