रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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३४४ रंगनाथ रामायण
७५. कुंभकर्ण और हनुमान् का युद्ध
- तब हनुमान् अत्यंत क्रोध से आंखो से अग्नि बरसाते हुए, पर्वतो तथा वृक्षो को
को उखाडकर उस राक्षस पर गिराने लगा; किन्तु कुभकर्ण अपने दारुण शूल से उनको
चूर-चूर करते हुए हनुमान् पर आक्रमण करने के निमित्त आगे वढा । तब हनुमान् ने एक
महान् पर्वत को उठाकर उसे कुभकर्ण पर फेंका । यह देखकर असुर भी उसकी
प्रशसा करते हुए कहने लगे कि यह अनुपम वली है । उस पर्वत के गिरने से
कुभकर्ण का सारा शरीर काँप उठा और उसके शरीर से रक्त की अजस्र धाराएँ
वह निकली ।
उससे अत्यत दु खी होकर उस दानव-वीर ने प्रकाश एव ज्वालाओ को व्याप्त करते हुए,
पृथ्वी को विदीर्ण करते हुए, नभ को कँपाते हुए और देवताओ को भयभीत करते हुए
भयकर शूल को हाथ में धारण करके वड़े उल्लास के साथ उसे हनुमान् पर ऐसे चलाया,
जैसे कुमार ने क्रौंचगिरि पर अपनी शक्ति चलाई थी । यह देखकर सभी वानर भय मे
व्याकुल हो गये । उसके लगते ही पवनकुमार का हृदय चरचराकर फट गया और रक्त
की ऐसी धारा छूटी, मानो हनुमान् अपना समस्त क्रोध-रस उगल रहा हो। प्रलय-काल के
घनघोर वादलो के गर्जन के समान हाँफने हुए कपिशेखर हनुमान् पृथ्वी पर गिर पडा ।
यह देखकर कपि-सेना काँप उठी और राक्षस हर्षित हुए ।
युद्धभूमि में अनिलकुमार की ऐसी दशा देखकर नील ने क्रोधाग्नि से जलते हुए
उस कुभकर्ण पर एक महापर्वत से प्रहार किया । अत्यधिक वेग से अपने ऊपर गिरनेवाले
उस पर्वत पर कुभकर्ण ने मुष्टि-घात करके उसे रोका । उसके मुष्टि-घात से वह पर्वत
चिनगारियाँ बिखेरते हुए चूर-चूर हो गया । प्रचड क्रोध से क्षुब्ध हो ऋषभ, शरभ, नील,
गधमादन, गवाक्ष आदि उद्दण्ड वली वानर-वीर, एक साथ भयकर गर्जन करते हुए, उस
कुभकर्ण पर पर्वतो तथा वृक्षो को फेंकते हुए, मुष्टियो तथा चरणो से प्रहार करते हुए,
नाखुनो से चीरते हुए तथा अन्य कई प्रकार से उसे दुख देने लगे । तब भी कुभकर्ण
विचलित नही हुआ । उसने शरभ पर ऐसा प्रचण्ड मुष्टि-घात किया कि वह पृथ्वी पर गिर-
कर छटपटाने लगा । उसके वाद उसने ऋषभ को पकड़कर अपने हाथो से उसे मसलकर
एक पिंड-जैसा वना दिया । उसके पश्चात् उसने अपने घुटने से वीर नील पर ऐसा प्रहार
किया कि वह काँपकर गिर पडा और छटपटाने लगा । फिर, उसने गवाक्ष के निकट
पहुँचकर अपनी हथेली से उस पर ऐसा प्रहार किया कि वह तिलमिला उठा । उसके वाद
उस राक्षस ने वडे क्रोध से गधमादन को अपने वायें हाथ से ऐसा मारा कि वह गिर पड़ा।
इस प्रकार, पाँचो वानर-वीर रक्त उगलते हुए ऐसे गिर पडे, मानो रण का राग-रस उगल
रहे हों । शत्रुओ का वध करने के कारण, वडे दर्प के साथ वह राक्षस अपना शूल घुमाते हुए
भयकर वज्र से युक्त इन्द्र की भाँति, अनुपम दण्ड से युक्त उद्दण्ड यम की भाँति, युद्ध-
भूमि में भीषण गर्जन करते हुए जहाँ-तहाँ घूमने लगा । तनी हुई भौहो से युक्त उसके
मुख से अग्नि-कण ऐसे झरने लगे, जैसे प्रलय के समय रुद्र के शूल से स्फुलिंग विकीर्ण
होते है ।