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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 373, कुल 508 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 373

[heading] युद्धकांड ३४३ [/heading]

समय जब कपि-सैनिक राक्षसों के प्रहारों से अत्यधिक दुःखी होते थे, तब उनके
नायक अत्यधिक क्रोध से राक्षसों पर पर्वतों और वृक्षों की ऐसी अविरत वर्षा करते कि
दानव धैर्य खोकर कुंभकर्ण की आड़ में जाकर शरण लेते । तब कुंभकर्ण ने उन
दैत्य वीरों को आश्वस्त करके सिंह-नाद करते हुए, धैर्य बँधाया और कहा कि
'भागना मत, भागना मत ।' उसके पश्चात् वह (शत्रुओं पर) आक्रमण करते हुए आनेवाले
वानरों को अपनी क्रुद्ध दृष्टियों से ही मार डालनेवाले की भाँति अपना शूल लेकर, दहाड़ते
हुए, उन पर टूट पडता । रावण का भाई, वह राक्षस-वीर कुंभकर्ण, कपि-समूह के भाग्य-
निर्णायक के समान अथवा क्रुद्ध होकर आनेवाले यम के समान उन वानरों को मारने लगा।
उस क्रूर कुंभकर्ण के समक्ष टिकना असंभव हो गया। कुछ वानर मूर्च्छित हो पृथ्वी पर गिर पड़े,
कुछ रक्त उगलने लगे, कुछ भयभीत हो सेतु की दिशा में भागने लगे और कुछ
बवंडर की भाँति आकाश की ओर उडने लगे ।
वानरों को इस प्रकार भागते हुए देखकर अंगद ने क्रुद्ध होकर कहा—'हे वानरो,
धैर्य तजकर इस प्रकार क्यो भाग रहे हो ? अपने प्रभु के प्रति निष्ठा एव अपना औन्नत्य
छोडकर भागना क्या तुम्हारे लिए उचित है ? तुम महान् वंश में जन्म लिये हुए, श्रेष्ठ
वानर हो । ऐसे तुम इस प्रकार साधारण जीवों की भाँति भाग सकते हो ? रामचंद्र के
समक्ष युद्ध में यदि तुम मारे जाओगे, तो तुम्हें सुन्दर स्वर्ग का राज्य मिल जायगा या यदि तुम
विजय प्राप्त करोगे, तो यश प्राप्त करोगे । इसलिए तुम लौटो, भागो नही ।' ऐसे उपदेश
देते हुए अंगद ने उनमें उत्साह का संचार किया और सभी वानरों को फिर लौटा लाया।
अंगद के उत्साहवर्द्धक उपदेशों को सुनकर वे कहने लगे—'हम राम के लिए अपने प्राणो
की बलि देंगे, उनके प्राणों के आगे हमारे प्राणों का मूल्य ही क्या है ?' फिर, उन्होने
पर्वतों को ले आकर, गर्जन करते हुए पर्वत के समान कुंभकर्ण के विशाल वक्ष पर फेंका,
तो उसने उन पर्वतों को देखते-देखते अपने शूल से चूर-चूर कर दिया । इससे संतुष्ट न
होकर उसने रौद्र रूप धारण कर गदा हाथ में ली और उसे तेजी से घुमाकर वानरों
पर ऐसा प्रहार किया कि दस करोड, सतहत्तर लाख, तीस हजार छह सौ वानर हुंकार
करते हुए पृथ्वी पर मूर्च्छित होकर गिर पडे। फिर, वह अपने हाथो से असंख्य वानरो को
पकड़कर बडी क्रूरता से यों निगलने लगा, जैसे गरुड़ पक्षी जल्दी-जल्दी सर्पों को निगल
जाता है । इस प्रकार, उसने देखते-देखते अस्सी लाख, बीस सहस्र, छह सौ वानरों को निगल
लिया । इसके पश्चात् भी वह नर तथा वानर-भक्षक वहाँ से हटा नही, किन्तु उसी युद्ध-
भूमि में बड़े दर्प के साथ झूमता रहा । उस समय उसके नथुनों तथा कर्ण-पुटों से वानर
बाहर निकलने लगे । किन्तु वह उन्हें तुरंत पकड़कर मसल देता और उनका लोचा बनाकर
चबा जाता । जो लोग उसके डाढ से छूटकर पृथ्वी पर गिर जाते, उन्हें पैरों से
रौंदकर चूर-चूर कर देता । इतने में उसके गदा-प्रहार से आहत हो मूर्च्छित पड़े हुए वानर
सचेत हुए । वे भयंकर सिंहनाद करते हुए पर्वतो तथा वृक्षों को ले आकर बड़े दर्प के साथ
उस राक्षस के समक्ष खडे हुए । क्रोध से जलते हुए द्विविद ने एक विशाल पर्वत को उस
राक्षस के वक्षःस्थल को विदीर्ण करने के निमित्त फेंका । उसके लगते ही कुंभकर्ण
उछलकर गिर पड़ा और एक बड़ी राक्षस-सेना उसके नीचे कुचलकर मर गई ।