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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 372, कुल 508 में से

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पृष्ठ 372

३४२ रंगनाथ रामायण
खड्गों से वानरो के शरीरो के खड-खड कर दिये । इससे संतुष्ट न होकर उन्होने अपने
तीक्ष्ण बाणो से पृथ्वी तथा आकाश को ढक दिया और इस प्रकार बड़ी भयंकर रीति से
वानरो का सहार किया । वानरो ने भी रथो पर कूदकर अपने पदाघातों से उनको पीछे
की ओर ढकेल दिया, उनका जूआ पकड़कर पृथ्वी पर गिरा दिया और उन्हें चूर-चूर करके
दूर फेंक दिया; तीव्र वेग से सारथियो पर कूदकर, अपने पैरो से उन्हें कुचल दिया, उन्हें
पृथ्वी की ओर घसीटकर उनके सिर काटकर फेंक दिये और बड़ी तीव्र गति से रथो पर
कूदकर राक्षस-वीरो को विविध रीतियो से मारने लगे । यह देखकर राक्षस अत्यधिक रोष
से वानरो को घेरकर अपने मदमत्त हाथियो को उन पर चलाकर, उनकी सूँडो से वानरो
को नीचे पटकवाने थे और उनके कपाल तथा भेजा को हाथियो के पैरो के नीचे कुचलवाकर
मिट्टी में मिला देते थे । गजो पर आरूढ राक्षस-सैनिक भयंकर बाण चलाकर वानरो को
खड-खड करके नीचे गिरा देते थे । तब कपि भी क्रोधोन्मत्त होकर हाथियो के दांतो को
पकड़कर, उनको झकझोर कर, उनके गड-स्थलो पर पदाघात करके उन्हें फोड देते थे ।
फिर, उन हाथियो की टाँगें पकड़कर उन्हें पृथ्वी पर ऐसे पटक देते कि उनका रक्त, मास
और हड्डियाँ एक साथ मिलकर एक लोथा बन जाता । उसके उपरान्त वे गजो पर आरूढ
राक्षसो पर अत्यत रौद्र गति से आक्रमण करके, उनके धनुष, हाथ, सिर, घड, कवच आदि
नीचे गिराकर उन्हें मार डालते । अश्वारोही राक्षस-सैनिक एक साथ मिलकर, डीग हाँकते
हुए अश्वो को वानरो पर दौड़ाकर उन पर कई प्रकार से शर-वर्षा करते और अपने पैने
खड्गो से शत्रु-सैनिको के खड्गो को काट देते थे । वानर भी क्रुद्ध होकर घोड़ो के पैर
या पूँछ पकडकर या तो चारो दिशाओ में उछालकर फेंक देते थे, या आकाश की ओर
उछाल देते थे, या पृथ्वी पर पटक देते थे या चीर डालते थे, या पदाघातो से चूर-चूर
कर डालते थे । फिर, अश्वारोहियो को बड़े साहस के साथ पृथ्वी पर पटककर मार
डालते थे । तब पदचर राक्षस बड़े दर्प के साथ आँखो से अग्नि-वर्षा करते हुए उद्दण्ड
गति से वानरो पर बाण चलाने लगे । वे उन्हें भालो से चुभोते थे, वरछियो से भोकते थे,
पैने खड्गो से काटते थे, मुद्गरो से चूर-चूर करते थे और अन्य अस्त्रो से भयंकर
प्रहार करके उनका सहार करते थे । वानर भी उन पदचर सैनिको पर टूट पड़ते और
उनके विविध अस्त्रो को तोड देते थे । वे राक्षसो को चरणो तथा हथेलियो से मारकर
उनके कवचो को फाड़ देते थे, दोनो हाथो से दो राक्षसो को पकड़कर उन्हें एक दूसरे से
टकराकर नीचे गिरा देते थे, उनके शिरो तथा घडो को काट देते थे और इस प्रकार वे
असख्य राक्षसो को मार डालते थे ।
इस प्रकार, दोनो सेनाओ में जब घोर युद्ध चलने लगा, तब युद्ध-भूमि राक्षसो की
मृत्यु-देवता के क्रीडा-सरोवर के समान भयंकर दीखने लगी । उसमें रक्त जल की भाँति,
मास-पेशियाँ विकसित लाल कमल के समान, मुख कमल के जैसे, नेत्र कुमुदो की पक्ति की
भाँति, आंतें मृणालो की भाँति, जमा हुआ भेजा फेन के समान, विपुल केश-समूह भ्रमरो
के समूह की भाँति, असख्य शस्त्र लहरो की भाँति, चामर-समूह हसो की नाईं और धूलि
पराग की भाँति दीखने लगी । सुर तथा खेचर बहुत ही आनदित दीखने लगे । युद्ध के