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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 371, कुल 508 में से

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पृष्ठ 371

तथा शौर्य स्वय रूप धारण करके चल रहा हो । युद्ध करना ही एकमात्र लक्ष्य
बनाकर, बडे गर्व से झूमते हुए, परिघ, भाले, गदा, कोदड, करवाल, मूसल, मुद्गर, परशु,
चक्र आदि आयुधो से सज्जित होकर पदाति-सेना उद्दण्ड गति से चलने लगी ।
इस प्रकार की सेना से युक्त हो, दर्प से भरे हुए कुभकर्ण युद्ध के लिए रवाना हुआ,
तो नगर की स्त्रियो ने उस पर पुष्प-वर्षा की, उसके ऊपर चन्द्र-मडल-समान छत्र
शोभायमान होने लगे और चंद्रमुखी स्त्रियाँ चामर डुलाने लगी । उस समय घोडो की
हिनहिनाहट, हाथियो की चिंगाड, रथो का विपुल रव, निसानो की घोर ध्वनि, पटह, भेरी,
शंख तथा नगाडो का भीषण रव एव घटा, मृदंग और डको के विपुल नाद की सम्मिलित
ध्वनि से पृथ्वी विदीर्ण-सी होने लगी, समुद्र आलोड़ित हुए, दिशाएँ फट गई, आकाश
काँप उठा, दिग्गज धँस गये, सभी जगत् त्रस्त हुए और पर्वत टूटकर गिरने लगे । उस
समय काले-काले बादल ऐसे घोर गर्जन करते हुए बिजलियाँ गिराने लगे, मानो वे राघव
के अनुचर बनकर आये हो और कुभकर्ण को डाटकर कह रहे हो—'हे अत्याचारी दुष्ट
दानव, तुमने ससार को जो दुख दिया था, उसका फल अब भोगो।' तारे टूटकर पृथ्वी
पर ऐसे गिरने लगे, मानो कह रहे हो--'हम इस बात के साक्षी है कि अत्यधिक दहाड़ते हुए
इठलानेवाले इस राक्षस का अग-भग सुग्रीव ने किया था और वह राघव के
हाथो से हत होनेवाला है।' प्रतिकूल पवन ऐसा चलने लगा, मानो वह अपने पूर्ववैर का
प्रतिशोध लेने के लिए राम की आज्ञा से वेग से चल रहा हो । पृथ्वी इस प्रकार कंपित
होने लगी, मानो वह भयभीत हो रही हो कि जब इस अधम राक्षस को राम मार डालेंगे,
तब मुझ पर गिरेगा, उस समय न जाने मुझे कितनी पीडा होगी। खग ऐसे मँडराने लगे,
मानो कह रहे हो--'हे नीच राक्षस, हमें पक्षपाती (पखो से उडनेवाले) मत समझो,
तुम राघव के खगो से (वाणो से) अवश्य मरोगे।' किन्तु इन सबकी उपेक्षा
करते हुए, दुगुने साहस तथा उत्साह के साथ, अपनी क्रुद्ध दृष्टियो से ही वानर-समूह को
भस्मीभूत कर देने का सकल्प करके आनेवाले उस अनुपम वीर ने दुर्ग के बाहर रहने-
वाले कपि-समूह को देखा । कपियो ने भी उस कुभकर्ण को देखा और प्रचण्ड वायु के
आघात से भागनेवाले मेघो के समान जहाँ-तहाँ भागने लगे । कुभकर्ण ने शीघ्र दुर्ग के
बाहर निकलकर सिंह-गर्जन किया। उस दहाड को सुनकर सभी वानर मूर्च्छित होकर गिर
पडे, समुद्र आलोड़ित हुआ और भूमि काँपने लगी तथा देवताओ के मन में भय प्रवेश
कर गया !
७४ वानर-कुंभकर्ण का युद्ध
कुछ ही समय के पश्चात् वानर-वीर सचेत हो गये और यम-सदृश आकारवाले
उस कुभकर्ण से भिड गये। वे सिंह-गर्जन करते हुए, वृक्षो, पर्वतो और शृगो को फेंकने लगे ।
दानव-सेना भी बड़े वेग और तत्परता से उनसे जूझ गई । जैसे प्रलयकाल में समुद्र आपस
में भिड जाते हैं, वैसे ही दोनो सेनाएँ आपस में भिड गई । राक्षसो ने रथ पर आरूढ
होकर शत्रुओ के शरीरो, हड्डियो, जाँघो तथा पसलियो को चूर-चूर कर दिया, रथ के
अश्वो से, उनकी आँतें कंठ, सिर आदि कुचलवा दिये और दिशाओ को भेदनेवाले अपने