रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
७८६ रामायणमीमांसा एकविंश
हुए व्यक्तियों को यह अनुभव होता है कि वे उसी जल में स्नान कर रहे हैं जिसमें उनके हजारों पुरुषों ने स्नान
किया था। अपने आप में यह सत्य होते हुए भी शब्दशः यथार्थ नहीं है। एक सरोवर का जल कई वर्षों तक यह
तो दावा कर सकता है कि वह सच्चा परम्परावादी है, क्योंकि उसका जल स्थिर है। किन्तु यही स्थिरता उसमें
सड़न उत्पन्न कर देती है। जिसे देखकर न उसमें स्नान करने का मन होगा और न पीने का ही। इन दोनों
नियमों का पालन करनेवाले सरोवर के समान घोर परम्परावादी व्यक्ति ही हो सकते हैं। दूसरी ओर स्थिरता का
एक प्रतीक समुद्र भी है। अगणित युगों से समुद्र स्थिर है। उसमें अगाध जल विद्यमान है। अतः उसमें मलिनता
का वैसा भय नहीं है जैसा कि सरोवर में। किन्तु उसका जल पीने योग्य बनाने की प्रक्रिया का पण्डित तो मेघ
ही है।
गोस्वामीजी सन्तों की तुलना मेघ से करते हैं। तब उनका तात्पर्य यही है कि भले ही वेद, पुराण परम
प्रमाण हैं। पर जनसमाज को सन्त के माध्यम से ही उनके सच्चे अर्थ का ज्ञान प्राप्त होता है।”
कहना न होगा कि उक्त कथन सुधारवाद के भूत से ही प्रेरित है। यही तो आधुनिक सुधारक भी कहते
हैं कि हम जो कुछ भी कह रहे हैं वह वेदादि शास्त्रों का ही तात्पर्य है। कबीर आदि सन्त तो और आगे बढ़ कर
कहते हैं कि हम वेद से भी आगे की बात कहते हैं। कोई भी व्यक्ति सन्त का बाना धारण कर के वेदविरुद्ध बात
भी वेद के नाम पर कह सकता है। यदि उससे उसका आधारभूत वैदिक प्रमाण पूछा जाय तो वही आपका उत्तर
सुना देगा। यह तो वेदों का सार है शब्दशः वेद नहीं है।
जैन और बौद्ध भी यही कह सकते हैं कि वेदों का सार और वेदों से भी उच्च सिद्धान्त ही हमारा
सिद्धान्त है। अर्थात् यदि शब्दों को देखने की बात न हो तो वेदविरुद्ध बात भी वेद के नाम पर कही जा सकती है।
जैसे समुद्र के जल की आकृति, प्रकृति और स्वाद से मेघ का जल विसदृश होने पर भी मेघ-जल समुद्र का ही है।
उसी तरह हमारी बात भी वेद की आकृति, प्रकृति और स्वाद से विसदृश होने पर भी वेदसम्मत ही है। क्या यह
उत्तर ठीक होगा ? क्या किसी तत्त्व का निर्णय हो सकेगा ?
परस्परविरोधी वादी और प्रतिवादी वेद प्रमाण पूछनेवाले को समुद्रजल के स्वाद से परिचित व्यक्ति का
ही उदाहरण देकर समाधान कर देगा ? किन्तु स्थिति इसके विपरीत हैं। द्वैतवादी, अद्वैतवादी, विशिष्टाद्वैतवादी,
शुद्धाद्वैतवादी तथा द्वैताद्वैतवादी अपनी अपनी बातों को प्रमाणित करने के लिए वेद प्रमाण उपस्थित करते हैं।
उसपर विचार किया जाता है कि क्या इस वैदिक वाक्य के प्रकृति, प्रत्यय, प्रकरण और उपक्रम, उपसंहार आदि के
आधार पर विवक्षित अर्थ सिद्ध होता है या नहीं ? तात्पर्य का निर्धारण भी मनमानी से नहीं होता ।
उपक्रम एवं उपसंहार के शब्दार्थों की एकरूपता, अभ्यास, अपूर्वता, फल, अर्थवाद और उपपत्ति इन
षड्विध लिङ्गों के आधार पर ही तात्पर्य का निर्धारण होता है, मनमाने ढंग से नहीं ।
आधुनिक लोग भी कहते हैं कि वेद की बुद्धिसंगत बातों को हम मानते हैं पर शब्दशः मानने को तैयार
नहीं। क्या तुलसीदास भी ऐसे ही सुधारक थे ? किन्तु वे तो वेद को तर्क से दूषित करनेवाले को कोटि-कोटि
कल्पभर नरक में पड़ने की बात कहते हैं। किसी भी दृष्टान्त की दार्शनिक में आंशिक ही तुल्यता होती है। जब
“पर्वतो वह्निमान् धूमात्” इस अनुमान में महानस का दृष्टान्त दिया जाता है तब धूम और वह्नि का सम्बन्धमात्र
ही ग्राह्य होता है। भले महानस ( रसोईघर ) में रोटी, दाल और चावल पकाया जाता है और पर्वत में वैसा नहीं
होता है तो भी धूम और वह्नि का सम्बन्ध उभयत्र तुल्य ही है। उसी तरह वेद को समुद्र के समान कहने का इतना
ही अर्थ है कि वेद समुद्र के समान गम्भीर एवं अगाध है और सर्वसाधारण के लिए अगम्य है।
अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७८७
जैसे समुद्र-जल स्वयं समुद्र से ग्रहण करने से खारा ही जल मिलता है। परन्तु वही जल मेघ के द्वारा
प्राप्त होता है तो मधुर होता है। उसी तरह मनमानी वेद को पढ़कर उसका मनमानी अर्थ ग्रहण करने पर वह खारे
जल के समान ही अग्राह्य होगा। जैसे मेघ के द्वारा आनीत वही जल मधुर होता है, उसी तरह गुरु-परम्परा से या
आचार्य-परम्परा से अधीत वेद एवं वेदार्थ ही ग्राह्य एवं उपयोगी होगा ।
यह कथन भी मनमानी नहीं है, किन्तु "स्वाध्यायोऽध्येतव्यः" ( शत० ब्रा० ११।५।६ ) इस विधि के
आधार पर ऐसा अर्थ विदित होता है । अत्यन्त अप्राप्त की ही विधि होती है। प्राप्त की विधि में अज्ञातज्ञापकत्व न
होने से प्रामाण्य नहीं होता, क्योंकि अनधिगत अबाधित अर्थज्ञान ही प्रमा कही जाती है उसके असाधारण कारण को
ही प्रमाण कहा जाता है । अध्येतव्य अर्थ के ज्ञान में अध्ययन की हेतुता लोकसिद्ध है । "स्वाध्यायोऽध्येतव्यः"
( शत० ब्रा० ११।५।६ ) यह नियमविधि होने से ही सार्थक हो सकती है ।
गुरु-परम्परा से ही वेदों का अध्ययन करना चाहिये मनमाने तौर से नहीं । वेद को अनुश्रव कहते हैं ।
जिसका अर्थ ही यह है कि वे गुरु-परम्परा से ही सुने जाते हैं । उनका निर्माण नहीं होता। इसी प्रकार अर्थज्ञान
भी पारम्पर्य से ही प्राप्त करना चाहिये इसके लिये भी प्रमाण है—"आचार्यवान् पुरुषो वेद" ( छा० उ०
६।१४।२ ), "आचार्याद् ध्येव विद्या विदिता साधिष्ठं प्रापयति" ( छा० उ० ४।९।३ ), "तद्विज्ञानार्थं
गुरुमेवाभिगच्छेत्समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्" ( मुण्ड० उ० १।२।१२ ) अर्थात् आचार्य-परम्परा से
प्राप्त विद्या ही फलदायिनी होती है। ब्रह्म के जानने के लिए समित्पाणि होकर श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ गुरु का ही
अभिगमन करना चाहिये ।
आजकल पुस्तकें सुलभ हैं । अनेक टीकाएँ एवं तर्जुमे भी हैं । उन्हीं के आधार पर लोग वेद और
पुराण पढ़ते हैं । इसी लिए समुद्र के खारे पानी के समान ही उनको वेदार्थ सर्वथा अग्राह्य ही प्रतीत होता है।
यही आज की नास्तिकता का मुख्य कारण है । उक्त विचारक महाशय भी उसी कोटि के हैं ।
धर्म और ब्रह्म वैदैकसमधिगम्य हैं। अन्य प्रमाणों से उनका बोध होता ही नहीं । इसी लिए भगवान्
शिवजी, राम तथा अन्य समस्त आस्तिक आचार्य तथा गोस्वामी भी धर्म और ब्रह्म के लिए पद पद पर वेद और
पुराणों की दुहाई देते हैं ।
वेदपरम्परा किसी नदी या गङ्गा नदी के समान नहीं मान्य है। गङ्गा में नित्यनूतन जल का प्रवाह उचित
है, क्योंकि गोमुख से लेकर गंगासागर तक भगीरथरथखातावच्छिन्न अविच्छिन्न जलप्रवाह का ही नाम गङ्गा है । उस
प्रवाह में इतर नदियों तथा झरनों की तो बात ही क्या रथ्योदक भी गङ्गाप्रवाह में पड़कर गङ्गा हो जाता है ।
“रथ्योदकमिव गङ्गाप्रवाहपातः पवित्रयति ।” ( भामती ) इसी लिए उस प्रवाह में स्नान करनेवाला यह
ठीक ही अनुभव करता है कि पूर्वजों ने जिस गङ्गा में स्नान किया था उसी में हम भी स्नान कर रहे हैं ।
उक्त परिभाषा के अनुसार भगीरथरथखातावच्छिन्न जलप्रवाह ही गङ्गा है। उसी का माहात्म्य श्रुति,
स्मृति और पुराणों में वर्णित है। वैदिक परम्परा तो गङ्गा के तुल्य तभी मानी जा सकती है जब गङ्गा में जैसे
विभिन्न झरनों, नदियों तथा रथ्याओं के उदक मिलकर गङ्गा हो जाते हैं वैसे ही विभिन्न देश और काल के नये नये
शब्द एवं नये अर्थ वैदिक परम्परा में मिलकर वेद ही हो जाते, परन्तु वेद के सम्बन्ध में ऐसा नहीं कहा जा
सकता है। वेद तो नियत वर्णों की नियत वर्णानुपूर्वी को ही कहते हैं । उनमें तो एक वर्ण और स्वर का व्यत्यास
हो जाने पर वेदत्व ही नहीं रहता ।
'अग्निर्मूर्धा' वेद है 'मूर्धा अग्निः' वेद नहीं है । ज्यों के त्यों शब्दों में भी पौर्वापर्य में परिवर्तन होने से
ही वेदत्व मिट जाता है । इतर ग्रन्थों में मूलपाठ की रक्षा पर पूर्ण ध्यान रखा जाता है। वेदों की आनुपूर्वी किसी
कल्प में नहीं बदलती है । ईश्वर भी आनुपूर्वी बदलने में स्वतन्त्र नहीं होता। यही वेदों की अपौरुषेयता एवं
नित्यता है ।
अनादि काल से शिष्य अपने अपने आचार्यों द्वारा उच्चारित आनुपूर्वी का ही अनुकरण करते हुए समान
आनुपूर्वी का ही अनुकरण करते हुए समान आनुपूर्वी का उच्चारण करते हैं । ईश्वर भी सृष्टि के समय पूर्वकल्प की
वेदानुपूर्वी का स्मरण कर के वैसी आनुपूर्वी का उपदेश करते हैं । नवीन आनुपूर्वी का नहीं । “यत्ततः प्रतिषेध्या
नः पुरुषाणां स्वतन्त्रता ।” यदि उनमें नये नये शब्द नये नये अर्थ मिलते रहें । तब वे भी अपौरुषेय एवं अनादि
नहीं रह सकते, फिर तो यह शङ्का बनी रहेगी कि किन्हीं भ्रम, प्रमाद, विप्रलिप्सा, करणापाटव आदि दोषों से
दूषित पुरुषों के भी शब्द और वाक्य वेदों में मिल गये होंगे । अतः वेद अपौरुषेय या ईश्वरवाक्य ही हैं यह नहीं
कहा जा सकता ।
इतिहास और पुराण वैसे ( वेदों जैसे ) अनादि और अपौरुषेय नहीं हैं, किन्तु वे प्रत्येक कल्प में सर्वज्ञ-
कल्प महर्षियों के द्वारा वेदों के अनुसार निर्मित होते हैं । परन्तु सृष्टि से लेकर प्रलयपर्यन्त उनकी आनुपूर्वी एक सी
ही रहती है । उनमें भी नदी के समान नये नये शब्द और मिलते जायें तो वे भी आर्ष वचन के रूप में प्रमाण नहीं
हो सकते । इतना ही क्यों मानस के ही शुद्ध पाठ की रक्षा का प्रयास यही सिद्ध करता है कि किसी भी ग्रन्थ में
यदि नये नये शब्द और अर्थ मिलते रहेंगे तो वह प्रमाण रूप में आदरणीय नहीं हो सकेगा । अन्यथा विविध क्षेपकों
सहित मानस भी गङ्गादि नदी के समान मानस ही माना जाना चाहिये । यदि नदी के समान उसमें नये नये शब्दों
एवं विचारों का सन्निवेश माना जायगा तो वैदिक या आर्ष वचनों की शक्ति और चमत्कृति समाप्त हो जायेगी ।
इतिहास और पुराणों की शब्दानुपूर्वी में परिवर्तन होने पर भी उनके विचार और सिद्धान्त अनादि ही
हैं । किन्हीं भी ग्रन्थों में नदी के समान नये विचारों का सन्निवेश मानने पर तो उनका स्वरूप और प्रामाण्य सर्वथा
भंग ही हो जायगा । प्रकृत में तो जैसे ईश्वर आत्मा नित्य है, स्थिर है उसी प्रकार ईश्वर के नित्यविज्ञान में स्थित
वेदवाणी भी नित्य है ।
जैसे सूर्य और अग्नि एकरस होकर ही संसार का प्रकाशन करते हैं वैसे ही नित्य स्थिर वेद ही स्थिर
सिद्धान्तों का प्रतिपादन करते हैं । स्थिरता होने से सरोवर के समान सड़न आ जायगी एवं सरोवरजल के समान
वेद अग्राह्य हो जायेंगे इत्यादि कल्पना निराधार ही है ।
समुद्र के स्थिर रहने पर भी जैसे अगाधता के कारण उसमें सड़न नहीं होती है, वैसे ही वैदिक शब्द
और अर्थ अपौरुषेय तथा ईश्वरीय होने से वे सदा अगाध एवं निर्विकार ही रहते हैं । सूर्य कल्पपर्यन्त स्थिर रहने पर
भी जैसे निर्विकार रहते हैं, वैसे वेद भी निर्विकार ही रहते हैं । उनकी अस्थिरता ही अशुद्धि एवं विकार का कारण
बनेगी । विकार नहीं अपितु घोर विकार अथवा सर्वनाश का भी कारण बन सकती है जैसे सूर्य, समुद्र आदि की
अस्थिरता घोर विकार अथवा सर्वनाश का कारण बन जाती है । पर इसे सुधारोन्मादयुक्त कथावाचक कैसे समझें ।
मानस में भी यदि नये शब्द, नये विचार और सिद्धान्त आ आ कर मिलते रहेंगे तो वह भी अप्रमाण एवं विकृत
हो जायेगा ।
वैदिकों के यहाँ तो शब्द और अर्थ का औत्पत्तिक नित्य सम्बन्ध माना जाता है । अर्थात् वैदिक शब्द,
उनका अर्थ तथा शब्दार्थ का सम्बन्ध तीनों ही नित्य माने जाते हैं और वस्तुतः वे नित्य हैं ही । इन स्थितियों को
न जानने से ही अनर्गल प्रलाप चल सकते हैं । वस्तुतः विच्छू का मन्त्र भी न जानना और साँप के बिल में अँगुली
डालने के समान वेदों के सम्बन्ध में पूर्वोक्त प्रलाप किये गये हैं ।
अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७८९
गोस्वामीजी वैसे परम्परावादी नहीं थे, यह कहना ही जड़ता है। आचार्य-परम्परा से वेद एवं वेदार्थ
का ग्रहण न करने से ही वे खारे समुद्र के समान अग्राह्य एवं अनिष्टकारक भी हो सकते हैं। वेदों के ही आधार पर
यह सिद्ध है कि किसी भी मन्त्र में एक स्वर के व्यत्यास से वह मन्त्र वाग्वज्र होकर यजमान का ही घातक बन
जाता है—
"मन्त्रो हीनः स्वरतो वर्णतो वा मिथ्याप्रयुक्तो न तमर्थमाह ।
स वाग्वज्रो यजमानं हिनस्ति यथेन्द्रशत्रुः स्वरतोऽपराधात् ॥"
स्वरभेद के कारण 'इन्द्रस्य शत्रुर्घातयिता' यह अभीष्ट तत्पुरुषार्थ न होकर 'इन्द्रशत्रो विवर्धस्व'
'इन्द्रः शत्रुर्घातयिता यस्य' इस बहुव्रीहि के अनुसार अनिष्ट अर्थ होने से ही वृत्र इन्द्र का घातक न बन सका, किन्तु
इन्द्र ही उसका घातक हुआ। अतएव
"श्रुति पुराण बहु कहहिं उपाई। छूट न अधिक अधिक अरुझाई ॥ (रा० मा० ७।११६।३)
इस पंक्ति से उनको श्रुति और पुराणों पर आक्षेप करना अभीष्ट नहीं है। यह तो वेद और पुराणों के
विरोधियों के दिमाग का फितूर है। यदि आलोकरूप सहकारी साधन के अभाव में निर्दोष नेत्र से भी रूप का ज्ञान न
हो तो इसमें नेत्र प्रमाण का दोष नहीं कहा जा सकता। उसी तरह यदि विवेक, वैराग्य, शम, दमादि साधनचतुष्टय-
सम्पत्तिरूप साधन के बिना वेद-वेदान्तों से ब्रह्मात्मसाक्षात्कार न हो तो इसमें वेदप्रमाण का कोई दोष नहीं है।
कहा जाता है कि "दिन रात रामनाम जपने वालों के आचरण और स्वभाव में परिवर्तन नहीं होता, यह
क्या यथार्थ सत्य नहीं है ?" परन्तु इसमें भगवन्नाम का क्या दोष है ? इसमें नामापराधराहित्य का अभाव ही कारण
है। इसी तरह विवेक, वैराग्यादि साधन न होने से ही वेद और पुराणों के उपाय बतलाने पर भी ग्रन्थि नहीं खुलती
उलटे उलझती ही जाती है।
"बादि बिरति बिनु ब्रह्म बिचारू ।" (रा० मा० २।१७६।२ )
"जैसे बिनु बिराग संन्यासी ॥" (रा० मा० १।२५०।२ )
आदि पंक्तियों से उन्होंने अपना अभिप्राय व्यक्त कर दिया है। उन्होंने भक्ति के लिए वेद और पुराणों
को आकर माना है—
"पावन पर्वत वेद पुराना । रामकथा रुचिराकर नाना ।
मर्मी सज्जन सुमति कुदारी। ज्ञान बिराग नयन उरगारी ॥" (रा० मा० ७।११९।७)
यहाँ भी मर्मी सज्जन और सुमति कुदारी न होने से ही वेद-पुराण पावन-पर्वत, रामकथा भी भक्तिमणि
प्रकट नहीं कर सकते । एतावतापि पावन-पर्वत, वेद-पुराण और नाना रामकथा रूप रुचिराकर की कोई न्यूनता
नहीं होती । कारण, जब ज्ञान, विरागरूप नयन न हो तो सफलता कैसे मिल सकती है ?
"आस्तिक हिन्दू वेद को परम प्रमाण मानता है। पुराणों को भी वेद का ही विस्तार स्वीकार किया
जाता है । श्रीव्यास ने करुणा से प्रेरित होकर वेदों का उपबृंहण किया है। वही पुराण कहलाता है । शब्दशः विचार
करने पर यह भी विरोधाभास सत्य ही प्रतीत होता है।
वैदिक मन्त्रों का सर्वाधिक समादृत देवता इन्द्र ही है। उसी को केन्द्रित कर के ऋचाएँ लिखी गयी हैं।
उसी की स्तुतियाँ की गयी हैं। यज्ञ में आहुति देकर उससे विविध वस्तुओं की याचना की गयी है। किन्तु पुराणों
में पहुँचकर इन्द्र अपनी महिमा खो बैठा है। उसके चरित्र की अनेक त्रुटियों का रहस्योद्घाटन किया गया है। वह
दैत्यों से परास्त होता है। अन्त में उनसे त्राण पाने के लिए वह नारायण का आश्रय लेता है।
७९० रामायणमीमांसा एकविंश
वेद के मुख्य देवता जहां इन्द्र, वरुण और अग्नि हैं वहाँ पुराणों में इनके स्थान में ब्रह्मा, विष्णु और शिव
की प्रतिष्ठा की गयी है। त्रिदेवों में भी ब्रह्मा की महिमा कम हो जाती है। मुख्य पूजा शिव और विष्णु को रह जाती
है। पुराणों में उनकी अभिन्नता के प्रतिपादन के साथ कभी कभी उन्हें प्रतिद्वन्द्वी के रूप में भी प्रस्तुत किया जाता है।
रामचरितमानस में वेदों और पुराणों की महिमा और साक्ष्य का वर्णन करते हुए भी भगवान् राम को
ही सर्वोत्कृष्ट पद प्रदान किया है। विष्णु और शिव भी उनके अंश से ही समुद्भूत कहे गये हैं—
"शम्भु विरञ्चि विष्णु भगवाना। उपजहिं जासु अंश विधि नाना। (रा० मा० १।१४३।३)
स्थूल दृष्टि से देखने पर वेद और पुराण परस्पर विरोधी मत का प्रतिपादन करते हुए प्रतीत होते हैं।
तब तीनों के एकत्व का तात्पर्य क्या हो सकता है ?
कई आलोचकों के अनुसार दशरथ, राम, सीता आदि के नाम वेदों में कहीं प्राप्त नहीं होते। वहीं दूसरे
विद्वानों ने इनके नाम अनेक ऋचाओं में खोज निकाले हैं। इन खोजों को प्रामाणिक मानने के बाद भी यह तो
असंदिग्धरूप से कहा ही जा सकता है कि उन्हें वह गौरवपूर्ण पद नहीं प्राप्त है जो पुराणों अथवा रामचरितमानस में
दिया गया है।"
वस्तुतः सारी विडम्बना वेदों और पुराणों के गुरु-परम्परा से अध्ययन न करने का ही परिणाम है। ठीक
ही है मेघ बिना समुद्र का पानी खारा लगता है। आचार्य, गुरु और सन्तों के बिना वेदों का अर्थ और अभिप्राय कैसे
समझ में आये ?
यह ठीक है कि वेदों और पुराणों के तात्पर्य को हृदयङ्गम करने के लिए व्यक्ति को अपनी पूर्वाग्रहयुक्त
बुद्धि के स्थान पर सन्त का आश्रय लेना चाहिये। परन्तु शब्दप्रामाण्यवादी के लिए तो शब्दशः अर्थग्रहण की उपेक्षा
नहीं की जा सकती है। अतः पुराणों के शब्दों की उपेक्षा कर के मनमानी अर्थग्रहण करना वेदार्थ या पुराणार्थ नहीं
ही हो सकता। अतः गुरु, आचार्य या सन्त भी शब्दों के अनुसार ही तात्पर्यार्थ वर्णन करते हैं अन्यथा तात्पर्य वर्णन के
लिए पूर्वोक्त रीति से शब्दों के प्रकृति, प्रत्यय, प्रकरण, उपक्रम, उपसंहार, अभ्यास, अपूर्वता, फल, अर्थवाद, उपपत्ति
षड्विधलिंग के विचार की आवश्यकता ही क्या है ? फिर सन्त तो विभिन्न सभी सम्प्रदायों में होते हैं। फिर तो उन
सन्तों के अनुसार या "बाबावाक्यं प्रमाणम्" के अनुसार भिन्न भिन्न वेदों के तात्पर्य भी होंगे। ऐसी स्थिति में—
"अथातो ब्रह्मजिज्ञासा" ( ब्रह्मसू० १।१।१ )। विचार-पूर्वोत्तरमीमांसा निरर्थक ही हो जायँगी। विचारविनिमय
सम्बन्धी आचार्यों के महान् ग्रन्थ भी निरर्थक हो जायेंगे। फिर तो विचार बिना ही विभिन्न सन्त जो कह दें वही
मान लेना होगा। स्वयं विचार को अवकाश ही नहीं रहेगा। तब तो सांख्य, मीसांसक, जैन, बौद्ध आदि सन्तों के
अनुसार अनीश्वरवाद भी मानना पड़ेगा, क्योंकि श्रद्धालु को शब्दतः विचार करने की आवश्यकता ही नहीं है।
ऐसी स्थिति में यदि कोई वैदिक इतिहास और पुराणों को वेदविरुद्ध होने से, पौरुषेय होने से अप्रमाण
कहे तथा कोई पौराणिक रामचरितमानस को वेदपुराणविरुद्ध होने के कारण अप्रमाण कहे तो उसका क्या समाधान
किया जा सकता है ? यदि केवल सन्त का कहना ही पर्याप्त है तो सन्त को भी वेद-पुराण की दुहाई देने की
क्या आवश्यकता ?
यदि कोई किसी सिद्धान्त को वैदिक सिद्धान्त कहे और उसे वेद से न सिद्ध कर सके तो वह वैदिक
सिद्धान्त कैसे सिद्ध होगा ? जो हम कहते हैं कि श्रद्धालु होकर मान लो, विश्वास करो इतनेमात्र से तो काम नहीं चल
सकता। यदि ऐसी ही बात थी तो रामचरितमानस पर भी ऊहापोह करने की क्या आवश्यकता ? फिर मानसचिन्तन
तथा मानसमुक्तावली की क्या आवश्यकता ? क्या यह विचार अश्रद्धा का द्योतक न होगा ? क्या गोस्वामीजी के
अभिप्रेत अर्थ का अनर्थ करना न होगा ?
अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७९१
गोस्वामी वेद-पुराण के पावन पर्वत में ही रामकथा रुचिराकार को सत्ता कहते हैं। परन्तु वेद में राम
और सीता का वर्णन ही न हो और उनका वेदों में कोई महत्त्वपूर्ण पद ही न हो। वेदों में इन्द्र ही परम पूज्य हो
और रामचरितमानस में श्वानतुल्य इन्द्र निन्दनीय हो; क्या यह प्रत्यक्ष वेद-विरोध नहीं है ? इसका समाधान केवल
‘बाबावाक्यम्’ से नहीं हो सकता ।
महानुभाव ! वस्तुतः वेद, पुराण और मानस में विरोध खड़ा करना कुटिलता है। वेद और पुराण को
नीचा दिखाने की दुश्चेष्टा है। इससे तुलसी या मानस की प्रतिष्ठा नहीं बढ़ेगी, किन्तु प्रतिष्ठा घटेगी । तुलसी वाल्मीकि
कवीश्वर को कपीश्वर के समान ही सीताराम-गुणग्राम-पुण्यारण्यविहारी कहते हैं । रामायण को दूषणसहित होने
पर भी दोषरहित कहते हैं। सखर सकोमल कहते हैं। आप वाल्मीकि की भूल सुधार उन्हीं तुलसी द्वारा कराना
चाहते हैं—
“अहो मोह महिमा बलवाना ।”
हाँ, तो अब सुनिये वेद, रामायण और मानस का समन्वय । पहले आपको जानना चाहिये कि वसिष्ठ,
वाल्मीकि, व्यास, जैमिनि, शङ्कर, रामानुज, निम्बार्क, मध्व, वल्लभ, शवरस्वामी, कुमारिल, विद्यारण्य, मधुसूदन,
श्रीधर, उब्बट, महीधर, पाणिनि, पतञ्जलि तथा कात्यायन सभी वैदिक दयानन्दियों को छोड़कर मन्त्र, ब्राह्मण एवं
उपनिषदों को मिलाकर वेद मानते हैं। साथ ही चार संहिता ही वेद नहीं हैं, किन्तु ११३१ ग्यारह सौ एकतीस
संहिताएँ तथा उतने ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद् आदि सब वेद हैं। जिनमें से बहुत आज मर्त्यलोक में अप्राप्त भी
हैं। अतएव उपलब्ध ऋचाएँ उनमें से कुछ अंश ही हैं। यजुःसंहिताएँ एवं उनके ब्राह्मण, उपनिषद् आदि भी वेद
हैं और ऋचाएँ किसी के द्वारा लिखी या निर्मित नहीं होती हैं । किन्तु सभी वेद भगवान् के निःश्वास से
प्रकट होते हैं—
“जाकी सहज श्वास श्रुतिचारी ।” ( रा० मा० १।२०३।३ )
ईश्वर के तुल्य ही वे नित्य एवं अनादि हैं। वेदों में सर्वाधिक समादृत देवता इन्द्र हैं । उनको ही केन्द्रित
करके ऋचाएँ लिखी गयी हैं । ये विचार पाश्चात्य वेदविरोधियों के हैं, आस्तिकों के नहीं ।
बेबर, मैक्समूलर, राय आदि ही दुरभिसन्धिवशात् ऐसा लिखते हैं । यह हमारी रामायणमीमांसा में
स्पष्टरूप से वर्णित है ।
वेदों और उपनिषदों के अनुसार सब वेदों का तात्पर्य सच्चिदानन्द परब्रह्म में ही है—
“जाकी सहज श्वास श्रुतिचारी ।” ( रा० मा० १।२०३।३ )
“ऋचो अक्षरे परमे व्योमन्....यस्तन्न वेद किमृचा करिष्यति ।”
( श्वेता० उ० ४।८ तथा बह्वृचोपनिषत् )
“सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति ।” ( कठउ० २।१५ )
ऋक् उपलक्षित सभी वेदों का तात्पर्य अक्षर ब्रह्म में ही है जो उसको नहीं जानता तो उसे ऋक् से
क्या लाभ ? गीता भी यही कहती है—
“वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः” ( गीता० १५।१५ )
सब वेदों से एकमात्र मैं ही वेद्य हूँ ।
७९२ रामायणमीमांसा एकविंश
जैसे पादुका, शिविका, सिंहासन आदि पर पैर धरने से भी कोई नहीं कह सकता कि मैं पृथिवी पर पैर
नहीं धरता । क्योंकि वे सब भी पृथिवी के विकार हैं। इसी तरह इन्द्र, वरुण, अग्नि का प्रतिपादन भी परमात्मा का
ही प्रतिपादन है, क्योंकि वे सब परमात्मा के ही विकार हैं—
“कथमयथा भवन्ति भुवि दत्तपदानि नृणाम् ।” (भाग० १०।८७।१५–वेदस्तुतिः )
वेदलक्षणा भारती उक्थजड़ों को अपनी अभिधा, लक्षणा, गौणी आदि वृत्तियों से भ्रमित कर देती है।
वेदों में इन्द्र, अग्नि आदि की स्तुतियाँ अवश्य अधिक हैं। परन्तु शिव तथा विष्णु के भी बहुत से मन्त्र हैं। यह
नहीं कहा जा सकता है कि वेदों में जिसका बहुत वर्णन हो वही वेदार्थ है। क्योंकि वेदों में तो कर्मकाण्ड का ही
अधिक वर्णन है। उससे कम उपासना का वर्णन है। ज्ञानकाण्ड का तो बहुत ही कम वर्णन है, तथापि मुख्य ज्ञान-
काण्ड ही है। साध्य-सिद्धि के लिए अधिकांश प्रयास तो साधन में ही करना पड़ता है। कुल्हाड़ी से वृक्ष काटा जाता
है। सारा प्रयास कुठार के उद्यमन तथा निपातन में ही किया जाता है। काष्ठ का द्वैधीभाव फल तो साधन-व्यापार
में ही सम्पन्न होता है। प्राणियों की ब्रह्म-प्राप्ति होने में मल, विक्षेप और आवरण ये तीन ही बाधक होते हैं। तीनों
की निवृत्ति के लिए कर्म, उपासना और ज्ञान की अपेक्षा होती है। प्रत्येक शाखा के लक्ष संख्यावाले वेदों में अस्सी-
हजार मन्त्र और ब्राह्मण कर्म का प्रतिपादन करते हैं। सोलह हजार उपासना का और चार हजार ज्ञानकाण्ड का
प्रतिपादन करते हैं।
कर्मों में भी काम्य कर्मों का प्रतिपादन अधिक है, निष्काम कर्मों का कम, क्योंकि पाशविक काम, कर्म,
ज्ञानरूप मृत्यु का अतिक्रमण करने के लिए पहले वैदिक कर्मज्ञान की अपेक्षा होती है।
“अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते ।” ( ईशोपनिषद् ११ )
इन्द्र, अग्नि आदि कर्म के प्रधान देवता हैं अतः उनका अधिक वर्णन ठीक ही है।
देवता भी ईश्वर के ही अंश हैं। फिर उनका ऐश्वर्य निःसीम नहीं है। परन्तु कर्मफलदाता तो ईश्वर
हैं। देवताओं में निरतिशय सर्वज्ञता नहीं होती। वे जगत् के कारण भी नहीं होते। अनन्त ब्रह्माण्डात्मक विश्व का
कारण परमेश्वर होता है। यह नासदीय आदि सूक्तों और अपरिगणित मन्त्रों एवं उपनिषदों से सिद्ध है।
कर्माङ्गभूत इन्द्र की खूब महिमा वर्णित है। पर उसे जगत् का निरपेक्ष कारण नहीं कहा गया है।
देवतारूप इन्द्र भी उत्कृष्ट कोटि का जीव ही है। यह ब्रह्मसूत्रों की प्रतर्दन-विद्या में स्पष्टतया कहा गया है। इसी लिए
बृहदारण्यक और तैत्तिरीय उपनिषदों में अखण्ड भूमण्डलाधिपति द्रढिष्ठ, बलिष्ठ और धर्मिष्ठ सम्राट् के मानवानन्द से
शतगुणित आनन्द मानवगन्धर्व का माना गया है। उससे सौ गुना देवगन्धर्व का आनन्द और उससे सौ गुना देवों का,
उससे सौ गुना कर्मदेवों का, उससे सौ गुना बृहस्पति का आनन्द, उससे सौ गुना प्रजापति का, उससे सौ गुना ब्रह्मा का,
उससे भी अनन्त गुना अधिक परब्रह्म का आनन्द होता है। ब्रह्मा आदि का आनन्द ब्रह्मानन्द का एक कणमात्र है।
ब्रह्मानन्द तो अनन्त समुद्र तुल्य है— “इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते" ( बृ० उ० २।५।२१ ) इत्यादि स्थलों में तो
इन्द्रशब्द का अर्थ शुद्ध परमात्मा ही है, देवात्मा नहीं।
इसी तरह—'इन्द्रवरुणं मित्रवरुणम्' ( ऋ० सं० १।१६४।४६ ), 'एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति'
( ऋ० सं १।१६४।४६ ) इत्यादि स्थलों में इन्द्र, वरुण, अग्नि आदि शब्दों का परमेश्वर ही अर्थ है, परिच्छिन्न
देवता नहीं। ब्रह्मसूत्रों के प्रकरणानुसार आकाश, प्राण आदि शब्दों से भी परमात्मतत्त्व ही विवक्षित कहा गया है।
विशेष जानकारी के लिए उन उन प्रकरणों को देखें। परन्तु विष्णु, रुद्र आदि सूक्तों द्वारा शिव या विष्णु को जगत्
का परम कारण परब्रह्म कहा गया है—
“तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः ।
“दिवीव चक्षुराततम्” (ऋ० सं० १।२२।२०), “जागृवांसः समिन्धते ॥” (ऋ० सं० १।२२।२१),
“विष्णोः कर्माणि पश्यत ।”
“इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधाऽस्य निदधे पदम् ।” ( ऋ० सं० १।२२।२० )
“पुरुष एवेदं सर्वम् ।”
“एको रुद्रो न द्वितीयोऽवतस्थे ।
शिव और विष्णु सम्बन्धी थोड़े मन्त्रों में भी उन्हें ईश्वर परमात्मा सर्वकारण कहा गया है । परन्तु इन्द्र,
अग्नि आदि के बहुत मन्त्रों में भी उनकी ईश्वरता का वर्णन नहीं किया गया है ।
“येऽप्यन्यदेवताभक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः ।
तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् ॥” ( गीता ९।२३ )
“लभन्ते च ततः कामान्मयैव विहितान् हि तान् ।” ( गीता ७।२२ )
इन्द्र, वरुण और अग्नि के यजन-पूजन से अपरिगणित फल मिलते हैं । इसी लिए उन्हें कर्मफल देनेवाला
भी कहा जाता है । परन्तु जो अनन्त ब्रह्माण्डों एवं एक एक ब्रह्माण्ड के अनन्त जीवों एवं उनके अनन्त जन्मों एवं
एक एक जन्म के अनन्त कर्मों को जान सकता है वह परमेश्वर ही मुख्य फलदाता है । उन देवताओं की पूजा भी
परमेश्वर की ही पूजा है । उनका भी फल भगवान् ही देते हैं ।
ईश्वर एक ही होता है । उनके नाम और स्वरूप भिन्न हो सकते हैं । परन्तु तत्त्व एक ही होता है । अतः
भिन्न स्थलों में शिव, विष्णु, राम, कृष्ण, सीता, राधा आदि रूप में उसी का वर्णन होता है ।
“यथा अनेक वेष धरि नृत्य करे नट कोई ।
जोइ जोइ रूप दिखावइ आपुनु होइ न सोइ ॥” ( रा० मा ७।७२ )
वेद के ही शिव का शिव, स्कन्द आदि पुराणों में सर्वातिशायी महत्त्व वर्णित है । वेद के ही विष्णु का
विष्णुपुराण और पद्मपुराण में लोकोत्तर माहात्म्य वर्णित है । विष्णुपुराण के अनुसार विष्णु ही राम हैं । वही कृष्ण
हैं । वाल्मीकिरामायण के अनुसार उन्हीं अनन्त ब्रह्माण्डनायक ईश्वर विष्णु का राम के रूप में वर्णन है । पुराणों,
अध्यात्म आदि अनेक रामायणों में भी परब्रह्म रूप में राम का वर्णन है । वाल्मीकिरामायण में राम को कृष्ण भी कहा
गया है—“कृष्णश्चैव बृहद्बलः” श्रीभागवत, ब्रह्मवैवर्त आदि में उसी परमविष्णु का कृष्ण के रूप में वर्णन है ।
भिन्न भिन्न नामों से एक वेदवेद्य परमात्मा का ही वर्णन है । समन्वय कर सकने में असमर्थ अनभिज्ञ लोग
हो भिन्न भिन्न शिव, विष्णु, राम और कृष्ण को अलग अलग मानकर भ्रान्त होते हैं ।
“वेदे रामायणे चैव पुराणे भारते तथा ।
आदावन्ते च मध्ये च हरिः सर्वत्र गीयते ॥”
खण्डन-मण्डन तथा उत्कर्ष-अपकर्ष के वर्णन का तात्पर्य उन उन स्वरूपों की प्रशंसा में ही है, खण्डन या
निन्दा में तात्पर्य नहीं है— “नहि निन्दा निन्द्यं निन्दितुं प्रवर्तते अपितु विधेयं स्तोतुम् ।” निन्दा का तात्पर्य
निन्दा में न होकर विधेय की स्तुति में ही होता है ।
इस दृष्टि से वेदों में कर्माङ्गदेवता के रूप से वर्णित इन्द्र का अधिक वर्णनमात्र देखकर अनभिज्ञ उन्हीं को
सर्वोत्कृष्ट देवता मानने लगते हैं । पुराणों में नहीं, मन्त्रों और ब्राह्मणों में इन्द्र को वृत्र के हनन में विष्णु की
१००
७९४ रामायणमीमांसा एकविंश
सहायता लेनी पड़ी है और वेदों में ही इन्द्र को अहल्या का जार आदि कहा गया है । कौषीतकि उपनिषद् में इन्द्र
स्वयं अपने अनेक दोषों का वर्णन कर के कहता है कि मैंने त्रिशीर्ष त्वाष्ट्र का वध किया । अरुन्मुख यतियों को मारकर
कुत्तों को खाने के लिए दे दिया । परन्तु ब्रह्मज्ञान के प्रभाव से मेरा बाल भी बाँका नहीं हुआ—
“त्रिशीर्षाणं त्वाष्ट्रमहनम् अरुन्मुखान् यतीन् शालावृकेभ्यः प्रायच्छम् लोम च नामीयते ।”
(कौषी० उ० ३।१)
वेदों में ही विष्णु का वर्णन है । विष्णु ही कृष्ण हैं और वही राम हैं । गोपालतापनीय आदि अनेक
उपनिषदों में कृष्ण को ब्रह्म कहा गया है । रामतापनीय आदि अनेकों उपनिषदों में राम को परब्रह्म कहा गया है ।
उनमें रामकथा का भी वर्णन है । अतः यह स्पष्ट है कि भगवच्चरण-पङ्कज में समर्पण बुद्धि से अनुष्ठीयमान कर्मों से
बुद्धि शुद्ध होने पर निष्काम उपासनाओं से मन एकाग्र होता है । एकाग्र मन से ही स्वप्रकाशब्रह्मात्मसम्बन्धी आवरण-
भङ्ग होता है । तभी ब्रह्मात्मसाक्षात्कार होता है । तभी अनन्यप्रेमलक्षणा भक्ति सम्पन्न होती है। इस तरह कर्मकाण्ड
और उपासनाकाण्ड का वर्णन करती हुई श्रुतियों का ब्रह्मसाक्षात्कार में ही उपयोग होने से उनका तात्पर्य ब्रह्म-
साक्षात्कार में ही होता है । ज्ञानकाण्ड स्पष्टरूप से परमेश्वर का प्रतिपादन करते ही हैं ।
दूसरी वह दृष्टि है, जिसके अनुसार अनन्तानन्त ब्रह्माण्ड और तद्गत सभी वस्तुएँ एक-मात्र अनन्त
सत् ब्रह्म का ही विकार या विवर्त हैं, अतः इन्द्र, वरुणादि सभी वस्तुएँ ब्रह्मरूप ही हैं । उनका प्रतिपादन भी ब्रह्म
का ही प्रतिपादन है ।
इसके अतिरिक्त मीमांसकों ने सभी शब्दों की जाति में शक्ति मानी है । घटत्व, पटत्व आदि त्व, तलादि
प्रत्ययों से संवेद्य जाति का भाव ही अर्थ है, क्योंकि भाव अर्थ में ही त्वत्, तलादि प्रत्यय होते हैं । तथा च घटशब्द
का घटत्व अर्थ है, घटत्व का अर्थ है घटका भाव । अन्वय और व्यतिरेक से घटरूप में परिणत मृत्तिका ही घट का भाव
है । वही घटत्व है । मृत्तिकाभाव अपने कारण जल में ही पर्यवसित होता है । अतः सभी शब्दों के जातिवाचक
होने से तत्तद्रूप में परिणत ब्रह्म ही सब शब्दों का अर्थ है । इस प्रकार सभी शब्दों का आपात दृष्टि से तत्तत्प्रसिद्ध
अर्थ होने पर भी सब शब्दों का अन्तिम अर्थ ब्रह्म ही है ।
वेदवेदान्तवेद्य ब्रह्म ही वेदों का ब्रह्म है । वही रामायण का राम है, वही भागवत का कृष्ण, विष्णु-
पुराण का विष्णु एवं शिवपुराण का शिव है । वही शाक्त, सौर, गाणपत्य आदि आगमों का शक्ति, सूर्य और महा-
गणपति भी है । राम, विष्णु और कृष्ण एक ही वस्तु के भिन्न भिन्न नाममात्र हैं । एक-एक ब्रह्माण्ड के भी उत्पादक,
पालक और संहारक भी ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र होते हैं और अनन्तानन्त ब्रह्माण्डों के भी उत्पादक, पालक और संहारक
भी ब्रह्मा, विष्णु तथा रुद्र कहे जाते हैं । एक एक ब्रह्माण्ड के उत्पादक, पालक और संहारक कार्य ब्रह्म होते हैं ।
अनन्तानन्त ब्रह्माण्डों के उत्पादक, पालक एवं संहारक कारण ब्रह्म हैं ।
“यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति तद् ब्रह्म ॥”
(तै० उ० ३।१)
रामायण के राम, भागवत के कृष्ण, विष्णुपुराण के विष्णु एवं शिवपुराण के शिव कारणब्रह्म ही हैं । जो
शम्भु, विरञ्चि और विष्णु राम के अंश से उद्भूत होते हैं वे कार्यब्रह्म हैं, कारणब्रह्म नहीं । कृष्ण के भी एक एक
रोम में अगणित ब्रह्माण्डों का वर्णन है—
“क्वाहं तमोमहदहंखचराग्निवार्भूसंवेष्टिताण्डघटसप्तवितस्तिकायः ।
क्वेदृग्विधाऽविगणिताण्डपराणुचर्यावाताध्वरोमविवरस्य च ते महित्वम् ॥”(भाग० १०।१४।११)
Here is the line-by-line transcription of the Hindi text from the provided image:
अष्टम अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७९५
ब्रह्माजी कहते हैं कि तम प्रकृति, महान्, अहं, आकाश, वायु, तेज, जल, पृथिवी आदि अष्टावरणोंसे
समावृत सात वितस्ति (बित्ता) परिमाणवाला ब्रह्माण्ड का अभिमानी कहाँ ब्रह्मा मैं और कहाँ अनन्त अनन्त ब्रह्माण्ड
जिनके एक एक रोम में परिभ्रमण करते हैं ऐसी आपकी महिमा ।
इसी प्रकार शिव की महिमा का भी वर्णन है। शिवजी के भी अंश से अनेक ब्रह्मा, रुद्र, विष्णु, इन्द्र
आदि उत्पन्न होते हैं। शिवपुराण, शिवरहस्य, स्कन्दपुराण काशीखण्ड, केदारखण्ड आदि में यह स्पष्ट है। अतएव
रामभक्ति की दृष्टि से श्रीराम ही वेदों, पुराणों, तन्त्रों और आगमों में अनेक नामों एवं रूपों में वर्णित हैं। वही नाम-
रूपातीत निर्गुण निर्विशेष रूप में भी वर्णित हैं ।
जब राम, कृष्ण, विष्णु, शिव एक ही वस्तु हैं तब कौन कह सकता है कि वेदों में उनको महत्त्वपूर्ण पद
नहीं प्राप्त है। वेदों में ब्रह्मा का महत्त्वपूर्ण स्थान है । वही ब्रह्मा, विष्णु, राम और कृष्ण हैं ।
सीता का भी मन्त्रों, ब्राह्मणों एवं उपनिषदों में महत्त्वपूर्ण वर्णन है। सीता लाङ्गुलपद्धति के रूप में
वर्णित होती हुई भी निर्विशेष सत्तासामान्यरूप में तथा ऐश्वर्य और माधुर्य की अधिष्ठात्री महालक्ष्मी के रूप में भी
वर्णित है ।
प्रणव बहुत छोटा सा मन्त्र है । परन्तु उसी से सम्पूर्ण वेद का प्रादुर्भाव होता है। वेद उसी की व्याख्या
है। व्यक्ति और समाज को वेदादि शास्त्रानुसारी बनना चाहिए । वेदों, शास्त्रों और पुराणों को समाज के अनुसार
बनाने की रीति भारतीय नहीं है।
फिर यह कहना कहाँ तक सङ्गत है कि "वेदों और पुराणों में बहुत कुछ ऐसा है जिसे शब्दशः ग्रहण
करने पर व्यक्ति और समाज दोनों का अकल्याण ही हो सकता है ।
हरिश्चन्द्र
पूर्वपक्ष - यद्यपि उनमें शतशः ऋषियों और अगणित राजपुरुषों के चरित्रों का वर्णन आता है। धर्म
और जीवन के किसी किसी अङ्ग पर उनसे प्रकाश पड़ता है। किन्तु वे ऋषि या महापुरुष दुर्बलताओं से
सर्वथा शून्य नहीं हैं। उनमें जीवन की समग्रता का आदर्श प्राप्त नहीं होता । महाराज हरिश्चन्द्र की गणना महा-
पुरुषों में की जाती है। सत्यवादिता के प्रतीक के रूप में वे समाज में सर्वमान्य हैं । सत्य की रक्षा के लिए वे बड़ा
से बड़ा बलिदान करने के लिए प्रस्तुत हो जाते हैं । पर उनके जीवन का दूसरा पक्ष भी है। वे सन्तान की कामना
से प्रेरित होकर यह मनौती मान लेते हैं कि सन्तान होने पर मैं बालक का ही बलिदान कर दूंगा। इससे उनकी
मोहान्धता का परिचय मिलता है । लगता है कि वे अनपत्यता के कलङ्क से इतने भयभीत थे कि समाज पुत्रहीन
समझ कर उनको हेय दृष्टि से देखे यह उनको असह्य था। इस कलङ्क को मिटाने के लिए वे इस सीमा तक जाने को
प्रस्तुत होते हैं। सोचा कि पहले पुत्र हो फिर देखा जायगा ।
पुत्र होने के बाद बलिदान के वचन को टालते गये । अन्त में वे अपने पुत्र के प्राणों की रक्षा के लिए
तथा स्वयं की रुग्णता के निवारणार्थ शुनःशेप नाम के बालक को खरीद कर उसका बलिदान करने को प्रस्तुत
होते हैं । महर्षि विश्वामित्र की कृपा से बालक की रक्षा होती है । यह भाग उनके चरित्र के निम्नतम भावों एवं
दुर्बलताओं का परिचायक है ।
हरिश्चन्द्र का एक महापुरुष के रूप में वर्णन करने का भी दुष्परिणाम हो सकता है कि व्यक्ति जीवन के
उत्तरार्द्ध में उनकी सत्यवादिता के स्थान पर बलिदान के द्वारा निःसन्तान को पुत्रप्राप्ति की परम्परा का अन्ध-
विश्वासी बन जाय अपने पुत्र की रक्षा और स्वास्थ्य के लिए दूसरे के पुत्र को बलि देने के लिए सङ्कोच का
अनुभव न करे ।
विश्वामित्र वेद और पुराणों के मन्त्रद्रष्टा ऋषि हैं। उनके त्याग और तपस्या की अद्भुत गाथाओं से
पुराणों के पृष्ठ अङ्कित हैं पर उनका चरित्र भी अपूर्णताओं का पुञ्ज है। अपनी महत्त्वाकाङ्क्षाओं की पूर्ति के लिए
ब्रह्मर्षि वसिष्ठ के सौ पुत्रों को नष्ट कर देना एवं वसिष्ठ का वध करने के लिए प्रस्तुत हो जाना इसी अन्धकार पक्ष
का परिचय देता है । अतः उनके ऋषित्व से समाज दिग्भ्रान्त हो सकता है । वह यह समझकर सन्तुष्ट हो सकता है
कि अपनी महत्त्वाकाङ्क्षा की पूर्ति के लिए यदि विश्वामित्र सब कुछ कर सकते हैं तो हमारे लिए वह और भी
स्वाभाविक है।
वेदों में बहुत कुछ ऐसा अग्राह्य अंश किसी विशेष काल के लिए ही समझना चाहिये । उसे भगवान्
व्यास ने परिष्कृत करने का प्रयास किया था। किन्तु पुराण केवल आदर्श नहीं, अनादर्श भी प्रस्तुत करते हैं। इनके
भी परिष्कार की आवश्यकता थी । यह कार्य रामकथा द्वारा सम्पन्न होता है सारे वेदों और पुराणों में चरित्र की
समग्रता का यदि कोई मापदण्ड हो सकता है तो एकमात्र भगवान् श्रीराम । इतिहास में ऐसे सहस्रों व्यक्ति हुए जो
किसी विशेष घटना के कारण लोकमानस में धूमकेतु के समान अचानक चमक उठे। किन्तु प्रकाश तो सूर्य का ही
है । जो अगणित वर्षों से प्रतिदिन समाज और व्यक्ति को प्रकाश देता है और देता रहेगा ।"
उत्तरपक्ष
यह है वेदों और पुराणों के प्रति आधुनिक मानसवक्ता महाशय की धारणा । उनको यह भी नहीं समझ
में आया है कि हम मानस और उसके आचार्य शिव और परमाराध्य श्रीराम तथा तुलसी का आदर कर रहे हैं
या निरादर कर रहे हैं। शायद उनका ध्यान तुलसी की—
"जो कोइ दूषइ श्रुति करि तरका । परइ ते कोटि कल्प भरि नरका ॥"
इस पंक्ति पर नहीं गया है।
"तुलसी महिमा बेद की को करि सकै बिचार ।
जेहि निन्दत निन्दित भयो बिदित बुद्ध अवतार ॥"
मालूम होता है कि उनकी दृष्टि में जैसे वेद का परिष्कार व्यास ने पुराणों द्वारा किया तथा इतिहास
एवं पुराणों का परिष्कार तुलसी ने मानस द्वारा किया, वैसे ही वे मानस का परिष्कार अपनी मानसमुक्तावली
द्वारा कर रहे हैं। परिष्कार का अर्थ काटछाँट प्रसिद्ध ही है । दोषों को निकाल देना तथा गुणों का आधान करना,
मलापनयन और गुणाधान ही तो परिष्कार हो सकता है, परन्तु सनातन वैदिक परम्परा के यह सर्वथा विरुद्ध है ।
वेद अपौरुषेय होने से अपास्तसमस्तपुंदोषशङ्काकलङ्कपङ्क हैं । वेदों को सदोष मानने का अर्थ है कि
उनका अप्रामाण्य मानना । पुरुष में भ्रम, प्रमाद आदि दोष होते हैं, अतः पौरुषेय ग्रन्थों में दोषों की शङ्का बनी
रहती है। तभी तुलसी वेद को दूषणयुक्त कहनेवाले के लिए कोटिकल्प तक नरकवासी होना कहते हैं । वे तो
रामायण को भी दूषणसहित होने पर भी दोषरहित कहते हैं। परन्तु उक्त वक्ता तुलसी को इतिहास और पुराणों
का भी परिष्कार करनेवाला कहना चाहते हैं ।
राम की दृष्टि में—
"सिबि दधीच हरिचन्द नरेसा । सहेउ धरम हित कोटि कलेसा ।।" (रा० मा० २।९४।२)
अध्यार्थ रामचरितसम्बन्धी लेख ७९७
हरिश्चन्द्र भारतीय संस्कृति के परम आदर्श हैं। विश्वामित्र के तो श्रीरामजी शिष्य ही थे। क्या
श्रीराम और शिवजी और तुलसी ने यह नहीं सोचा कि हम हरिश्चन्द्र को महत्त्व दे रहे हैं। विश्वामित्र को गुरु
मानकर पूज रहे हैं पादसंवाहन कर रहे हैं। परन्तु उसको महत्त्व देने से समाज दिग्भ्रान्त हो जायगा। हरिश्चन्द्र का
अनुकरण कर अपने पुत्र के लिए दूसरे के पुत्रों का बलिदान देगा। विश्वामित्र की तरह अपनी महत्त्वाकाङ्क्षा के लिए
वसिष्ठ जैसे ब्रह्मर्षियों की हत्या करने में न संकुचायेगा।
वस्तुतः—"नैष स्थाणोरपराधो यदेनमन्धो न पश्यति" यह स्थाणु का दोष नहीं है, जो उसे अन्धा
नहीं देख सकता। जो सुधारवाद के व्यामोह से वेद, पुराण और मानस का अर्थ न समझे या उसके अर्थ का अनर्थ
करे तो उसमें न वेदादि का दोष है और न तुलसी आदि का दोष है।
वेदव्याख्याता जैमिनि, शबरस्वामी एवं कुमारिलभट्ट के अनुसार—"आम्नायस्य क्रियार्थत्वादानर्थक्य-
मतदर्थानाम्" (जै० सू० १।२।१) आम्नाय सकल वेदराशि का वैदिक यज्ञादि क्रियाओं के प्रतिपादन में ही
तात्पर्य है। जो क्रियार्थक भाग नहीं है, उसका स्वार्थ में तात्पर्य नही है—
"विधिना त्वेकवाक्यत्वात् स्तुत्यर्थेन विधीनां स्युः" (जै० सू० १।२।७)
जो भाग क्रियार्थक नहीं हैं ऐसे अर्थवाद आदि विध्यर्थ के स्तावक होने से ही प्रमाण हैं। निषिद्ध से
निवृत्ति के लिए निन्दार्थवाद होते हैं। व्यास, शङ्कर, रामानुज आदि पूर्व वेद के काण्डका जैमिनि के समान यज्ञक्रिया
के प्रतिपादन में तात्पर्य मानते हुए भी सम्पूर्ण वेद का विशेषतः वेदान्तों का तात्पर्य परब्रह्म परमेश्वर के ही प्रतिपादन
में मानते हैं। सृष्टि-प्रतिपादक वाक्यों का भी ब्रह्मस्वरूप के निरूपण में ही पर्यवसान है।
वेद के जितने व्याख्यान या इतिहास हैं वे लौकिक इतिहासों के समान नहीं हैं, क्योंकि लौकिक इतिहासों
का उल्लेख घटनाओं के पश्चात् उल्लिखित किया जाता है। किन्तु वेद अनादि एवं नित्य हैं। अतः उनका घटना के
पश्चात् उल्लेख का प्रश्न हो नहीं उठता। किन्तु जैसे किसी विद्यार्थी को गणित विद्या बताने के लिए अध्यापक
कल्पित आख्यायिका का प्रयोग करता है, वैसे ही किसी तत्त्व को समझाने के लिए वेद में भी आख्यानों की कल्पना
की जाती है। अध्यापक कहता है कि रामनगर के रामदत्त ने पाँच रुपये मन के हिसाब से भूसा खरीदा तो डेढ़
हजार रुपये का कितना भूसा हुआ?
वस्तुतः अध्यापक का न रामनगर से प्रयोजन है और न रामदत्त से प्रयोजन है। उसका तात्पर्य केवल
गणित समझाने में है। गणित समझाने के लिए आख्यायिका की कल्पना की है। इसी तरह वेद की आख्यायिका
या इतिहास सब काल्पनिक आख्यानमात्र होते हैं।
वेदों और मन्वादि के अनुसार वैदिक शब्दों के अनुसार ही ईश्वर सृष्टि करता है। अतः उन आख्या-
यिकाओं या इतिहासों के आधार पर घटनाएँ भी हो सकती हैं। अतः वैदिक इतिहास घटनापूर्वक नही होते। किन्तु
घटनाएँ तदनुसार हो सकती हैं। फिर भी आचरण में हिस्ट्री या इतिहास प्रमाण नहीं होता। किन्तु उसमें विधि,
संविधान या कांस्टिट्यूशन कानून का ही आश्रयण किया जाता है—
"प्रजापतिरात्मनो वपामुदखिदत्"
प्रजापति ने अपनी वपा का उत्खनन करके यज्ञ किया। पर उनके अनुसार यह विधि नहीं होती कि मनुष्य
को भी अपनी वपा का उत्खनन करके यज्ञ करना चाहिये। मन्त्र और अर्थवाद का जहाँ प्रत्यक्ष विधि से विरोध न हो
वहाँ लिङ्गबलात् विधि की कल्पना हो सकती है। कल्पित विधि का प्रत्यक्ष विधि से विरोध होने पर कल्पित विधि
बाधित हो जाती है। जहाँ प्रत्यक्ष विधि का विरोध न हो वहाँ कल्पित विधि से भी अनुष्ठान होता है।
७९८ रामायणमीमांसा एकविंश
हरिश्चन्द्र की कथा का सम्बन्ध ऋग्वेदीय ऐतरेय ब्राह्मण से है। अन्यत्र भी उसकी चर्चा है। पुत्रेष्टि याग
का वह अर्थवाद है। पुत्रेष्टि याग की प्रशंसा में ही उसका तात्पर्य है।
“पुत्रेणायं लोको जय्यः कर्मणा पितृलोकः विद्यया देवलोकः।”
इन श्रुतियों के अनुसार पुत्र से मनुष्यलोक की प्राप्ति होती है, कर्म से पितृलोक और विद्या (उपासना)
से देवलोक की प्राप्ति होती है। तीनों से जो विरक्त होता है उसके ही लिए ब्रह्मविद्या का उपदेश है।
“न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः।” (कैवल्योपनिषत् १।२)
“किं प्रजया करिष्यामो येषां नोऽयमात्मायं लोकः।” (बृ० उ० ४।४।२२)
हरिश्चन्द्र जैसे महान् सम्राट् ने भी पुत्र के लिए अपने को सङ्कट में डाला था। अतः पुत्र के लिए पुत्रेष्टि
करनी चाहिये। प्रवृत्ति या निवृत्ति विधि या निषेध के ही बल पर होती है, आख्यान के बल पर नहीं। कई
ऐतिहासिक घटनाएँ दौर्भाग्यपूर्ण भी होती हैं। पर उनका आचरण नहीं किया जाता है। इसी लिए विधि अथवा
निषेध के अनुसार ही प्रवृत्ति या निवृत्ति होती है। वेदों में ही— “न हिंस्यात् सर्वा भूतानि” के अनुसार हिंसा
निषिद्ध है। फिर यदि पुत्रार्थ मनुष्य की हिंसा विहित होती तो उत्सर्ग अपवाद भाव हो सकता था। परन्तु ऐसी कोई
विधि है नहीं। कल्पित विधि ‘न हिंस्यात्’ से विरुद्ध होने के कारण बाधित हो जाती है। अतः हरिश्चन्द्र के
आख्यान पर वैसी दुष्कल्पनाएँ नहीं हो सकती हैं।
विधि का बोध लिङ् या लोट् लकार एवं तव्यादि प्रत्ययों से होता है। कहीं-कहीं अपूर्व द्रव्य देवता का
ज्ञापक वाक्य होने से तो अन्यथा भी अर्थात् लट् लकार से भी विधिका बोध हो जाता है।
हरिश्चन्द्र का सत्यनिष्ठावाला आदर्श सत्यविधि के अनुकूल होने से सत्य एवं अनुकरणीय भी है। वेद
केवल निवृत्तिमार्गीय के ही लिए नहीं हैं। वे राजस, तामस और सात्त्विक सभी प्राणियों के लिए हितोपदेश करते
हैं। वेदों में शत्रुमरण की कामना से श्येनयाग का भी विधान है।
वेदों में जहाँ यज्ञ-पूत्ति के लिए हिंसा-विधि के द्वारा हिंसा विहित है वहाँ ‘न हिंस्यात्’ इस उत्सर्ग का
बाध होता है। परन्तु जहाँ हिंसा की विधि नहीं हैं, किन्तु हिंसा विधेय न होकर हिंसा उद्देश्य है वहाँ ‘न हिंस्यात्’
यह उत्सर्ग वचन निषेध वचन ही प्रबल होता है। श्येनयाग में शत्रुमरण उद्देश्य है विधेय नहीं। अतः वहाँ ‘न
हिंस्यात्’ इस निषेध का ही प्राबल्य होता है। फिर भी श्येनयाग की विधि प्राणी के हितार्थ ही है। हितशासन से ही
वेद शास्त्र कहलाते हैं। अतः उनका तात्पर्य स्वाभाविक राग-द्वेषान्ध की प्रवृत्ति रोकने में ही है। काम, क्रोधादि
जनित प्रवृत्ति को रोक देना सबसे बड़ा प्राणी का हित है।
लौकिक मार्ग से शत्रुहिंसा में प्रवृत्ति अधिक अनिष्टजनक है, क्योंकि हो सकता है कि अस्त्र-शस्त्रादि द्वारा
वध में प्रवृत्त प्राणी को शत्रु ही मार दे अथवा शत्रु का सहायक भी मार सकता है। कथञ्चित् सफलता मिलने पर भी
राजा के द्वारा मृत्युदण्ड का भागी होना पड़े। अतः शास्त्र लौकिक मार्ग से हिंसाप्रवृत्ति को रोकने के लिए उसकी
अपेक्षा निरापद श्येनयाग को शत्रुमरण का साधन बताकर प्राणी की प्रवृत्ति को रोक देता है। एक बार प्रवृत्ति रुक
जाने पर काम, क्रोध का वेग रुक जाने से विचार को अवकाश मिल जाता है। अतः श्येनयाग की प्रवृत्ति भी रुक
सकती है। यदि अधिक क्रोधादि रहा तो भी श्येनयागसम्पादन के लिए अन्य वैदिक विद्वानों को भी बुलाना पड़ेगा
और उनके उपदेश से परिणाम में हानिकारक होने से भी श्येनयाग की प्रवृत्ति रुक सकती है। यदि उपदेश से न
रुकी तो भी सामग्री-सम्पादन की कठिनाई से भी निवृत्ति हो सकती है। यदि उससे भी प्रवृत्ति न रुकी तो श्येनयाग
के अनुष्ठान में बहुत से देवता और ब्राह्मणों की पूजा और दान आदि से कुछ पुण्य भी साथ में अनिवार्यरूप से हो
जायेंगे। श्येनयाग में सफलता होने से वेदोक्त उपाय में दृढ़ विश्वास होने से उसके निवारणार्थ प्रायश्चित्त का
अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७९९
अनुष्ठान कर के अहिंसा, सत्यादि साधनों का अनुष्ठान कर के ब्रह्मज्ञान द्वारा मोक्षप्राप्ति की भी संभावना हो जाती है।
इस तरह शब्दशः विचार करने पर भी श्येनयागविधि का तात्पर्य भी हिंसानिषेध में ही होता है।
इसी तरह पुत्र की कामनावाले प्राणी के लिए पुत्रेष्टि आदि का विधान होता है। अन्य भी काम्य कर्मों
का तात्पर्य कामना-पूर्ति में न होकर पाशविक काम-कर्मनिवृत्ति में ही होता है। माता बच्चों को मोदक प्रदान का
प्रलोभन देकर गुडूची-पान कराती है। बालक मोदक के लोभ से गुडूची-पान करता है। बालक गुडूची-पान का फल
मोदकप्राप्ति समझता है। परन्तु माता तो गुडूची-पान का फल रोगनिवृत्ति ही मानती है। मोदकदान तो केवल
प्रलोभनार्थ ही है। यदि प्रदान न करे तो बालक दूसरे दिन गुडूची-पान नहीं करेगा।
इसी तरह वेद पाशविक काम-कर्म-रूप मृत्यु से छुड़ाकर ब्रह्मज्ञान की ओर लगने के लिए विविध
काम्य कर्मों का विधान करते हैं। जैसे कण्टकेन कण्टकोद्धार होता है, वैसे ही वैदिक काम-कर्म के द्वारा लौकिक
पाशविक काम-कर्म को मिटाया जा सकता है। वैदिक काम-कर्मों द्वारा राजस काम-कर्मों से निवृत्ति करायी जाती है।
अन्त में निष्काम कर्म के द्वारा सब प्रकार के काम-कर्म-ज्ञान को मिटाया जाता है। बुद्धि-शुद्धि, नित्यानित्यविवेक,
वैराग्य, शम, दमादि द्वारा पूर्ण ब्रह्मज्ञान एवं नैष्कर्म्यसम्पत्ति सम्पन्न होती है। जिसका वर्णन इस प्रकार है—
"यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह ।
बुद्धिश्च न विचेष्टते तामाहुः परमां गतिम् ॥" ( क० उ० २।६।१० )
जब कर्मेन्द्रियों के साथ पञ्च ज्ञानेन्द्रियाँ मन के साथ अवस्थित (निरुद्ध) हो जाती हैं और बुद्धि भी
निर्विचेष्ट हो जाती है। उसी को परा गति कहा जाता है। उसी निर्विकल्प समाधि से ब्रह्मात्मतत्त्व का साक्षात्कार
सम्पन्न होता है।
श्रीभागवत में भगवान् उद्धव को यही बतलाते हैं कि जो प्राणी अज्ञ एवं अजितेन्द्रिय होने पर भी
वेदोक्त कर्म नहीं करता वह अवश्य ही विकर्मरूप अधर्म से मृत्यु से पुनः मृत्यु को ही प्राप्त होता है।
"नाचरेद् यस्तु वेदोक्तं स्वयमज्ञोऽजितेन्द्रियः ।
विकर्मणा ह्यधर्मेण मृत्योर्मृत्युमुपैति सः॥" ( भाग० ११।३।४५ )
तस्मात् निःसंग होकर भगवत्समर्पणबुद्धि से वेदोक्त कर्मों का अनुष्ठान करता हुआ प्राणी नैष्कर्म्यसिद्धि को
प्राप्त होता है। स्वर्गादि फलश्रुति तो केवल रोचनार्थ ही है—
"वेदोक्तमेव कुर्वाणो निःसंगोऽर्पितमीश्वरे ।
नैष्कर्म्यसिद्धिं लभते रोचनार्था फलश्रुतिः॥" ( भाग० ११।३।४६ )
इसलिए गीता भी वेदों के अर्थवादों में रतों की निन्दा करके निष्काम कर्म की ही प्रशंसा करती है।
व्यावहारिक दृष्टि से यदि हरिश्चन्द्र भी पहले अत्यन्त कामान्ध रहे हों और उन्होंने पुत्रप्राप्ति के लिए
बलिदान की मनौती भी मानी हो और शुनःशेप को खरीदकर बलिदान देकर भी आत्मरक्षा का प्रयत्न किया भी
हो तो भी अन्त में निष्काम उपासक तथा तत्त्वज्ञान-सम्पन्न होकर एवं महान् सत्यनिष्ठ होकर वे विश्वमान्य
हो गये हैं।
सभी जीव अनादि हैं। प्रथम अवस्था में किसने क्या नहीं किया ? "अन्ते या मतिः सा गतिः।"
अन्त में जैसी मति होती है वैसी ही गति होती है। तपस्या में स्वधर्मानुष्ठान में उच्चपद प्राप्त कराने की सामर्थ्य
होती ही है। तपस्या से वाल्मीकि क्या से क्या हो गये।
८०० रामायणमीमांसा एकविंश
इसी प्रकार विश्वामित्र भी पूर्व में चाहे जैसे रहे हों । परन्तु उन्होंने तीव्र तपस्या द्वारा न केवल अपने
को ही किन्तु अपने पिता, पितामह एवं प्रपितामह को भी ब्राह्मण बना दिया था। तभी तो स्वयं वसिष्ठ ने उनकी
प्रशंसा की और राम ने उन्हें अपना गुरु माना और पादसंवाहन किया । “तपो हि दुरतिक्रमम् ।” तुलसी ने भी
माना कि तप के बल से ब्रह्मा सृष्टि करते हैं, तप के बल से विष्णु पालन करते हैं एवं तपोबल से रुद्र संहार करते
हैं । तप से ही शेष पृथ्वी का भार वहन करते हैं । परन्तु इसका मतलब यह नहीं कि आज भी कोई थोड़ा सा तप
कर के ब्राह्मण बन जाय । जो तपस्या से या योगशक्ति से क्षात्रदेहारम्भक परमाणुओं को विघटित कर के ब्रह्मदेहारम्भक
परमाणुओं को संघटित करने की सामर्थ्य रखता है वही वैसा कर सकता है। जो चूहे को बिल्ली भी नहीं बना सकता
है, वह किसी भी जाति को कैसे बदल सकता है ?
विश्वामित्र ने तो मेनका को शाप से ही पहाड़ी बना दिया था । तो भी उस स्थिति तक भी वे ब्राह्मण
नहीं बन सके थे । यद्यपि उनके देह का उपादान ब्राह्माचरु ही था। वे क्षात्र क्षेत्र के कारण ही क्षत्रिय थे । अतः
उनका ब्राह्मण बनना बहुत कठिन नहीं था । तथापि महाभाष्य के अनुसार उनके पिता, पितामह और प्रपितामह
तो सर्वथा क्षत्रिय होते हुए भी उन्हीं के ( विश्वामित्र के ही ) तप से ब्राह्मण हो सके थे । तुलसी भी कहते हैं कि—
“बालमीकि नारद घटयोनी । निज निज मुखन कही निज होनी ॥” (रा० मा० १।२।२ )
ऐसी स्थिति में हरिश्चन्द्र या विश्वामित्र किसी की भी अन्तिम स्थिति का ही स्वरूप देखना चाहिये,
पूर्वरूप देखने का कोई अर्थ नहीं ।
सर्वथापि वेद, रामायण, महाभारत, पुराण, मानस सभी हमारे आदर्श ग्रन्थ हैं । निर्भ्रान्त होकर
इनका प्रामाण्य मानना चाहिये । किसी का अप्रामाण्य नहीं है। किसका क्या अभिप्राय है, यही समझने का प्रयत्न
करना उचित है ।
स्थालीपुलाकन्याय से इतना लिखा गया । इसी प्रकार अन्य भी बहुत सी विवादास्पद बातें पुस्तक में हैं।
पर सबपर विचार करने तथा लिखने का अवकाश न होने से विराम लेते हैं ।
श्रीराम का प्रादुर्भाव मुख्यरूप से मर्त्यो को धर्म-शिक्षा देने के लिए हुआ है । यह श्रीमद्भागवत में
स्पष्ट है—
“मर्त्यावतारस्त्विह मर्त्यशिक्षणं रक्षोवधायैव न केवलं विभोः ॥” (भाग० ५।१९।५ )
परन्तु श्रीभगवान् ने भी धर्म के सम्बन्ध में शास्त्र को ही प्रमाण माना है । उसी के अनुसार चलकर
उन्होंने लोगों को धर्म की शिक्षा दी थी । अतएव यह कहना सही नहीं है कि संसार के अन्य मार्गों का पता तो अन्य
व्यक्तियों को होता हैं परन्तु प्रभु का मार्ग कौन जाने ?
मत समेत जहँ जाय न बानी ।
तरकि न सकहिं सकल अनुमानी ॥” (रा० मा० १।३४०।४ )
इसका अर्थ यह है कि प्रभु का मार्ग स्वयं प्रभु को छोड़कर अन्य कोई नहीं जानता, किन्तु यह प्रभु
के गीता-वचन से ही विरुद्ध है । गीता में भगवान् ने यह नहीं कहा कि जो मैं कहूँ वह धर्म है, किन्तु उन्होंने यही
कहा कि शास्त्रविधि के अनुसार ही कर्त्तव्य को जानकर अनुष्ठान करना चाहिये । जो शास्त्रविधि का उल्लङ्घन करता
है वह सुख, सिद्धि और शान्ति नहीं पाता । अतः शास्त्रविधानोक्त कर्म को जानकर ही उसका अनुष्ठान करना
उचित है—
अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ८०१
“यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः।
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् ॥
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि ॥” ( गीता १६।२३,२४ )
मन समेत जहाँ जाय न बानी” ( रा० मा० १।३४०।४ )
यह भी शास्त्र की ही बात है—‘‘यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह ।”
इस श्रुति का अर्थ उक्त चौपाई में कहा गया है।
सबसे बड़ी बात यह कि बुद्ध भी तो भगवान् ही थे। यदि राम और कृष्ण की बात मानी जाय तो उनकी
वाणी क्यों न मानी जाय ? स्पष्ट है कि वेदविरुद्ध भगवान् की वाणी भी अमान्य ही है। यह गोस्वामी तुलसीदास को
भी मान्य है—
“तुलसी महिमा बेद की को करि सकइ बिचार।
जेहि निन्दत निन्दित भयो बिदित बुद्ध अवतार ॥”
श्रीकृष्ण की गीता उपनिषद्रूप गायों का दुग्धरूप है, वेदसम्मत है। इसी लिए मान्य है। वाल्मीकि-
रामायण वेद का उपबृंहणरूप है। श्रीराम वेदमार्ग के अनुयायी एवं रक्षक हैं। इसी लिए उनकी उक्तियाँ एवं
उनके आचरण धर्म में परम प्रमाण हैं। धर्म और ब्रह्म दोनों ही वेदैकसमधिगम्य हैं। अन्य किसी प्रमाण से विदित
नहीं होते—
“चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः” ( जै० सू० १।१।२ )
“शास्त्रयोनित्वात्” ( ब्र० सू० १।१।३ ) “तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि” (बृ० उ० ३।९।२३)
अतः वेद-शास्त्र ही धर्म और ब्रह्म का स्वरूप बतलाते हैं एवं उनकी प्राप्ति का मार्ग बतलाते हैं। भगवान्
राम और भगवान् कृष्ण भी उन्हीं वेदों का गुणगान करते हैं, यह कभी भी नहीं भूलना चाहिये।
राम ब्रह्म होते हुए भी शास्त्रानुसार ही सब क्रियाएँ करते हैं। इसी लिए धर्म भी उनका अनुसरण
करता है। यही बात ‘आगे राम पीछे सीता लक्ष्मण हैं’ से स्पष्ट होती है। धर्म को मार्गदर्शक नहीं माना जाता।
मार्गदर्शक शास्त्र और आचार्य होते हैं। भागवत के अनुसार राम धर्म के शिक्षक हैं। जब वह स्वयं शास्त्रानुसार
चलते हैं तब सीतारूपिणी सत्क्रिया और लक्ष्मणरूपी धर्म उनके पीछे चलकर सम्पूर्ण संसार का कल्याण करते हैं।
शुद्ध अन्तःकरणवाले की प्रत्येक क्रिया ऐसी होती है, जिसका धर्म समर्थन करता है। परन्तु अन्तःकरण की शुद्धि
भी तो धर्म पर ही निर्भर है। तभी तो श्रीराम ने रामगीता में अन्तःकरण की शुद्धि के लिए वेदोक्त कर्मों का करना
आवश्यक बतलाया था—‘‘आदौ स्ववर्णाश्रम····।” अधर्म के कारण ही अशुद्ध अन्तःकरण में वासना और स्वार्थ
अधिकार जमाते हैं। तभी वह अधर्म में प्रवृत्त होता है।
उपनिषदों तथा गीता ने भी अन्तःकरण को पवित्र करने के लिए स्वधर्मानुष्ठान द्वारा परमेश्वर की
आराधना को ही आवश्यक कहा है—
“वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसाऽनाशकेन ।” ( बृ० उ० ४।४।२२ )
“स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः” ( गीता १८।४६ )
मूल प्रश्न है उन वासनाओं और स्वार्थों को मिटाकर हटाकर शास्त्रानुगामी बनना । यदि अन्तःकरण शुद्ध
हो गया हो तब तो वह प्राणी उपासना और ज्ञान का अधिकारी हो जाता है । यह भी कहना गलत है कि जहाँ
स्वार्थ और वासना का अभाव है वहाँ उसके द्वारा शास्त्र देखकर धर्म का पालन करने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता ।
उसके द्वारा धर्म की क्रिया छोड़कर अधर्म की क्रिया हो नहीं सकती । क्योंकि उस स्थिति में वेदादि शास्त्र सभी
व्यर्थ ही हो जायेंगे । स्वार्थ और वासनाओं के रहने पर जब लाखों उपदेश करने पर भी वह अधर्म ही करेगा और
स्वार्थ तथा वासनाओं के मिटने पर बिना शास्त्र देखे ही धर्म का अनुष्ठान अपने आप ही उससे होगा तब वेद शास्त्र
की आवश्यकता ही क्या है ? फिर भगवान् के द्वारा — निज निज धर्मनिरत श्रुति नीति के उपदेश का क्या अर्थ
है ? गोस्वामीजी के—
“वर्णाश्रम निज निज धरम निरत बेदपथ लोग” ( रा० मा० ७।२० )
की चर्चा का क्या अर्थ है ? यह भी कहना अत्यन्त अशुद्ध है कि वसिष्ठ ने उत्तर दिया—तुम मुझ से पूछते हो यह
धर्म है अथवा अधर्म ? अब अधर्म का निर्णय कैसे हो ?
धर्म का निर्णय शास्त्रों द्वारा किया जाता है—
“तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ ।” ( गीता० १६।२४ )
धर्मनिर्णायक शास्त्र हैं । पर शास्त्रों का अर्थ कौन लगाता है व्यक्ति की बुद्धि ? और तब समस्या जहाँ की
तहाँ अटक जाती है । व्यक्ति की बुद्धि में स्वार्थ है । तो वह शास्त्र का अर्थ भी वैसा ही लगा देगा जिसके द्वारा
उसके स्वार्थ की सिद्धि हो, क्योंकि वसिष्ठजी ने ऐसा न कभी कहा है न कह ही सकते हैं । क्योंकि यह सब मनगढन्त
और शास्त्रविरुद्ध ही है ।
जब स्वार्थरहित एवं वासनारहित कोई है ही नहीं, शास्त्र का अर्थ किसी को लग ही नहीं सकता तो
फिर श्रीराम आदि द्वारा शास्त्र की मान्यता का प्रचार सर्वथा व्यर्थ ही होगा । फिर तुलसी ने भी वेदादि शास्त्र
समझा है कि नहीं ? उनके मानस में भी सब बातें शास्त्र-सम्मत हैं यह भी कैसे निर्णय होगा और मानस का अर्थ
भी किसी को लगता है कि नहीं ? यह भी तो सन्देहास्पद ही रहेगा ?
वस्तुतः वेदादि शास्त्रों के अर्थ आचार्य परम्परा से जाने जाते हैं । सहस्रों ऋषि-महर्षि स्वार्थ और
वासनाओं से रहित होकर शास्त्रार्थ जानते हैं एवं उसका वर्णन करते हैं । वे भी अपने गुरुओं से शास्त्र एवं शास्त्रोक्त
धर्म जानकर स्वार्थ और वासनाओं से रहित होते हैं ।
श्रुति पुरान बहु कहेउ उपाई । छूट न अधिक अधिक अरुझाई ॥” (रा० मा० ७।११६।३)
इस चौपाई का भी अर्थ लेखक ने उल्टा ही समझा है । इसका तो इतना ही अर्थ है कि भगवदनुग्रह के
बिना केवल श्रुति और पुराणों के बताये हुए उपायों के अनुष्ठान में भी अनेक बाधाएँ आ जाती हैं । उपनिषदों ने
भी यह कहा है—
“नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन ।” ( कठ उ० २।२२ )
गीता ने कहा—
नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया ।
शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा ॥” ( गीता ११।५३ )
उक्त वचनों में भक्ति और अनुग्रह की प्रधानता कही गयी है, वेदादि साधनों की निरर्थकता नहीं, क्योंकि—
“नावेदविन्मनुते तं बृहन्तम् ।”
अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ८०३
अवेदवित् भगवान् को नहीं जानता इत्यादि श्रुतियों का विरोध स्पष्ट है । वहाँ भी वही—
“रामनाम एक अङ्क है सब साधन हैं शून्य ।
अङ्क गये सब शून्य हैं अङ्क रहे दश गून ॥”
का ही न्याय लागू होता है । तभी तो जिस भक्तिमणि से ग्रन्थि खुल सकती है उसकी प्राप्ति ही वेद और
पुराण से ही कही गयी है—
“पावन पर्वत वेद पुराना । रामकथा रुचिराकर नाना ॥
मर्मी सज्जन सुमति कुदारी । ज्ञानविराग नयन उरगारी ॥
भावसहित जो खोजहिं प्रानी । पाव भक्ति मणि सब सुखखानी ॥” (रा०मा० ७।११९।७,८)
जैसे राम शास्त्रानुयायी परमधर्मनिष्ठ हैं वैसे ही उनके परमभक्त भरत भी हैं । अतएव उनका समझना,
कहना, करना सब धर्मसार होना उचित है । क्या किसी वेदविरोधी का कहना, समझना, करना भी धर्मसार हो
सकता है ? इसी लिए तो—
“सतां हि सन्देहपदेषु वस्तुषु प्रमाणमन्तःकरणप्रवृत्तयः ।” (अभि० शा० अङ्क १।२१)
वेदादि शास्त्रोक्त धर्मनिष्ठ सज्जनों की अन्तःकरणप्रवृत्तियाँ सन्देहछेदन में परम प्रमाण होती ही हैं ।
गुरु वसिष्ठ के निर्णीत धर्म पर कुचोद्य करना सबसे अधिक दुर्बुद्धि का लक्षण है । यह कहना पूर्णतः असत्य
है कि “वसिष्ठ के प्रत्युत्तर में भरत ने जो प्रश्न उठाये थे वे यथार्थ स्थिति के दिग्दर्शक थे । उनकी जिज्ञासा
वास्तविक अनुभूति पर स्थित थी । इसी लिए गुरु वसिष्ठ को भरत के वाक्यों का उत्तर दे पाना सम्भव नहीं हुआ ।
उन्होंने पूछा वस्तुतः धर्म क्या है ? क्या महाराज श्रीदशरथ ने राम को वन भेजकर धर्म की उचित रक्षा की और
यदि वह धर्म था तो उसका परिणाम प्रत्यक्ष था । धर्म का तात्पर्य यदि समाज का धारण है और संरक्षण है तो
फिर यह कैसा धर्म ? जिसने स्वयं अपने पालन करनेवाले का ही प्राण ले लिया । सारी प्रजा अनाथ हो गयी ।
राम को वन जाना पड़ा । फिर यह धर्म किस कल्याण की सृष्टि करनेवाला है ? जब इसी धर्म का पालन करने के
लिए मुझे कहा जाता है तो मैं यह जानना चाहूँगा कि इसमें किसका हित निहित है ?
वस्तुतः भरत ने कुछ रूढ़िगत वाक्यों को ही वास्तविक धर्म मान लेने की ही धारणा के विरुद्ध मृदु
वाक्यों में बड़ा तीक्ष्ण प्रहार किया है । वे रूढ़िवाक्य जिनकी आज्ञा पालन करना ही सबसे बड़ा धर्म है । अथवा
पिता जिसे देता है वही राज्य का अधिकारी है । क्या वस्तुतः ये वाक्य निर्विवाद हैं ? पुत्र को आज्ञा देता हुआ
स्वयं पिता पितृत्व पर आरूढ़ है या नहीं और यदि उस समय वह स्वयं भी किसी आवेशजन्य भावना से ग्रस्त हो ।
उस समय उसकी आज्ञा का पालन करना स्वयं आज्ञा देनेवाले के हित में होगा या नहीं । दृष्टान्त के रूप में स्वामी
ने सुरापान कर लिया हो नशे में उन्मत्त होकर सेवक को आज्ञा दे कि सामनेवाले व्यक्ति का सिर तोड़ दो । स्वामी
की आज्ञा मानना सेवक का धर्म है, परन्तु ऐसी स्थिति में योग्य सेवक स्वामी की आज्ञा मानने के स्थान पर उस
नशे को ही दूर करने की चेष्टा करेगा । ठीक इसी तरह काम, क्रोध, लोभ या ममता के द्वारा ग्रस्त व्यक्ति भी
उन्मादी ही है । ऐसी स्थिति में पिता की आज्ञा के नाम पर यदि आज्ञा स्वीकार की जाती है तो वह धर्म का
उपहास ही होगा ।” क्योंकि वस्तुतः यह सब कथन शास्त्रीय सिद्धान्तों युक्तियों तथा मानस से भी विरुद्ध ही है ।
यह महान् साहस ही नहीं किन्तु पाप भी है ।
महर्षि वसिष्ठ चक्रवर्ती दशरथ महाराज को परम धार्मिक एवं सत्य के रक्षक मानते हैं कि—
८०४ रामायणमीमांसा एकविंश
“सोचयोग दशरथ नृप नाहीं।
सोचिय बिप्र जो बेद बिहीना। तजि निज धर्म बिषय लवलीना ॥
सोचिय नृपति जो नीति न जाना। जेहि न प्रजा प्रिय प्राण समाना ॥
सोचिय बयसु कृपन धनवानू । जो न अतिथि प्रिय भगति सुजानू ॥
सोचिय सूद्र बिप्र अवमानी। मुखर मानप्रिय ज्ञानगुमानी ॥
सोचिय पुनि पतिबंचक नारी। कुटिल कलहप्रिय इच्छाचारी ॥
सोचिय बटु निज ब्रत परिहरई । जो नहि गुरु आयसु अनुसरई ॥
सोचिय गृही जो मोह बस करइ करमपथ त्याग।
सोचिय यती प्रपंचरत बिगत बिबेक बिराग ॥
बैखानस सोइ सोचन जोगू । तप बिहाइ जेहि भावहि भोगू ॥
सोचिय पिसुन अकारन क्रोधी । जननि जनक गुरु बंधु विरोधी ॥
सब विधि सोचिय पर अपकारी। निज तन पोषक निरदय भारी ॥
सोचनीय सब ही बिधि सोई। जो न छाड़ि छल हरिजन होई ॥
सोचनीय नहिं कोसल राऊ। भुवन चारि दस प्रकट प्रभाऊ ॥”
( रा० मा० २।१७०।२ से १७१।३ तक )
श्रीवसिष्ठजी की एक एक पंक्ति धर्मशास्त्र, सन्त और शिष्ट सम्मत है।
“भयउ न अहइ न अब होनिहारा। भूप भरत जस पिता तुम्हारा ॥
विधि हरिहर सुरपति दिसिनाथा । बरनहिं सब दसरथ गुनगाथा ॥” (रा०मा० २।१७१।४)
क्या ये बातें मिथ्या हैं ? आश्चर्य है अपने आप को एक मानसवक्ता होने का दावा करनेवाला इन तथ्यों
को झुठलाने का साहस करता है—
“कहहु तात केहि भाँति कोउ करइ बड़ाई तासु ।
राम लखन तुम्ह शत्रुहन सरिस सुअन सुचि जासु ॥” ( रा० मा० २।१७२ )
उक्त बातें स्वतःसिद्ध जैसी हैं। जो राम अनन्त ब्रह्माण्डों के नायक परब्रह्म, तद्रूप ही लक्ष्मण, भरत
और शत्रुघ्न जो हिरण्यर्भ, तुरीय अव्याकृत, तुरीय विराट् एवं तुरीय रूप हैं। वे सब जिनके पुत्र के रूप में प्रकट हैं
उन दशरथ की तुलना में किसी शराबी या क्रोधी और कामी को उपस्थित करना कितना बड़ा पाप है।
“सब प्रकार भूपति बड़भागी” । ( रा० मा० २।१७२।१ )
लेखक अपने ज्ञान गुमान में उन्मत्त होकर श्रीराम के पिता का ही नहीं, राम के गुरु वसिष्ठ एवं राम के
गुरु विश्वामित्र तथा श्रीराम के पूर्वज हरिश्चन्द्र की भी छीछ,लेदर करता है ।
महर्षि वसिष्ठ धर्मसम्मत ही बात करते हैं। श्रीभरत को उपदेश करते हैं—
“सिर धरि राजरजायसु करहू ।” ( रा० मा० २।१७२।१ )
राजा ने तुमको राज दिया है। उनके वचन को सत्य बनाना तुम्हारा कर्तव्य है।
“तजे राम जेहि बचनहिं लागी ।
तन परिहरेउ राम बिरहागी ॥” ( रा० मा० २।१७२।२ )
अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ८०५
श्रीदशरथ परम भक्त तो थे ही तभी तो राम के विरहाग्नि में उन्होंने प्राणों को त्याग दिया । इस दृष्टि
से दशरथ के तुल्य दशरथ ही हैं। दूसरा कोई उदाहरण नहीं । श्रीराम के विरह में उन्होंने प्राणों को तृण के तुल्य
छोड़ दिया। उनमें किसी प्रकार के काम, क्रोध, लोभ या ममता की कल्पना कर के सुरापायी का दृष्टान्त देकर
उनकी आज्ञा को उपेक्ष्य कहना आस्तिकता है या नास्तिकता ? समझदार समझें ।
"नृपहि बचन प्रिय नहिं प्रिय प्राना ।।" ( रा० मा० २।१७२।३ )
में दो मत हो ही नहीं सकते। श्रीराम तथा भरत किसी ने भी वसिष्ठ की उक्त बातों का विरोध
नहीं किया । बल्कि सभी ने किसी न किसी रूप में उन्हें दुहराया ही है ।
वसिष्ठ ने श्रीभरत के लिए भी राज करने में दोष नहीं है यही कहा है । काम करना ही चाहिये । राजा
न बनने में अमुक अमुक दोष हैं या पाप लगेगा यह वसिष्ठजी ने कभी भी नहीं कहा है, क्योंकि राज करना तो
रागप्राप्त ही था । कैकेयी ने भरत के हितार्थ ही वैसा वरदान माँगा था। यदि राम के वनगमन का वरदान न
माँगा जाता तो उसके देने में कोई कठिनाई नहीं थी। राम के वनवास न देने से ही वचनभङ्ग का दोष उपस्थित
हो सकता था । भरत को राज दे देने पर भी यदि भरत राज स्वीकार नहीं करते तो इसमें श्रीदशरथ के वचनभङ्ग
का प्रसङ्ग ही नहीं उपस्थित होता । माता कैकेयी भी इस सम्बन्ध में चक्रवर्ती को दोषी नहीं ठहरा सकती थी ।
इसलिए वसिष्ठ ने अनेक दृष्टान्तों से यही कहा था कि यदि भरत राज करते हैं तो इसमें कोई दोष नहीं है, क्योंकि
पिता की आज्ञा से अनुचित काम करने पर भी परशुराम आदि को कोई दोष नहीं लगा था। यद्यपि बड़े भाई के
रहते हुए छोटे भाई का राजा होना अनुचित है, फिर भी पिता की आज्ञा के अनुसार राजा बनने में भरत को कोई
दोष नहीं है ।
"करहु तात पितु वचन प्रमाना ।
करहु सीस धरि भूपरजाई । हुइ तुम्ह कहँ सब भाँति भलाई ॥
परसुराम पितु आज्ञा राखी । मारी मातु लोक सब साखी ॥
तनय ययातिहि यौवन दयऊ । पितु आज्ञा अघ अजस न भयऊ ॥
( रा० मा० २।१७२।३,४ )
क्या महामति लेखक परशुराम और पुरु को पापी कहना चाहता है ?
"अनुचित उचित विचार तजि जे पालहिं पितु बयन ।
ते भाजन सुख सुजस के बसहिं अमरपुर अयन ॥" ( रा० मा० २।१७३ )
उक्त वचन भी निर्विवाद है । श्रीराम, भरत तथा जनक आदि कोई भी उस परम तथ्य का विरोध कैसे
कर सकता है ?
"सुरपुर नृप पावहिं परितोषू । तुम्ह कहँ सुकृत सुजस नहि दोषू ।
बेदबिदित सम्मत सब ही का । जेहि पितु देइ सो पावइ टीका ॥" (रा० मा० १७३।१,२)
अगर इन बातों में किसी को कोई भी आपत्ति होती तो चित्रकूट में कोई भी इसके विरोध में आवाज
उठा सकता था। यद्यपि सामान्य नियम के अनुसार ज्येष्ठ पुत्र ही राज्य का अधिकारी होता है फिर भी राजा चाहे
तो अन्य को भी राज्य दे सकता है । तभी तो यज्ञों में राजा सर्वस्वदान कर सकता है। शतपथश्रुति में भी राजा
अध्वर्यु, होता, उद्गाता, ब्रह्मा आदि के लिए सम्पूर्ण राज्य के प्राची आदि दिशाओं का दान कर देता है। जब
अध्वर्यु आदि राज्य स्वीकार नहीं करते तब उसके बदले में राजा उनको बहुतसा धन प्रदान करता है । श्रीभागवत