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सर्वकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 867

७९० रामायणमीमांसा एकविंश
वेद के मुख्य देवता जहां इन्द्र, वरुण और अग्नि हैं वहाँ पुराणों में इनके स्थान में ब्रह्मा, विष्णु और शिव
की प्रतिष्ठा की गयी है। त्रिदेवों में भी ब्रह्मा की महिमा कम हो जाती है। मुख्य पूजा शिव और विष्णु को रह जाती
है। पुराणों में उनकी अभिन्नता के प्रतिपादन के साथ कभी कभी उन्हें प्रतिद्वन्द्वी के रूप में भी प्रस्तुत किया जाता है।
रामचरितमानस में वेदों और पुराणों की महिमा और साक्ष्य का वर्णन करते हुए भी भगवान् राम को
ही सर्वोत्कृष्ट पद प्रदान किया है। विष्णु और शिव भी उनके अंश से ही समुद्भूत कहे गये हैं—
"शम्भु विरञ्चि विष्णु भगवाना। उपजहिं जासु अंश विधि नाना। (रा० मा० १।१४३।३)
स्थूल दृष्टि से देखने पर वेद और पुराण परस्पर विरोधी मत का प्रतिपादन करते हुए प्रतीत होते हैं।
तब तीनों के एकत्व का तात्पर्य क्या हो सकता है ?
कई आलोचकों के अनुसार दशरथ, राम, सीता आदि के नाम वेदों में कहीं प्राप्त नहीं होते। वहीं दूसरे
विद्वानों ने इनके नाम अनेक ऋचाओं में खोज निकाले हैं। इन खोजों को प्रामाणिक मानने के बाद भी यह तो
असंदिग्धरूप से कहा ही जा सकता है कि उन्हें वह गौरवपूर्ण पद नहीं प्राप्त है जो पुराणों अथवा रामचरितमानस में
दिया गया है।"
वस्तुतः सारी विडम्बना वेदों और पुराणों के गुरु-परम्परा से अध्ययन न करने का ही परिणाम है। ठीक
ही है मेघ बिना समुद्र का पानी खारा लगता है। आचार्य, गुरु और सन्तों के बिना वेदों का अर्थ और अभिप्राय कैसे
समझ में आये ?
यह ठीक है कि वेदों और पुराणों के तात्पर्य को हृदयङ्गम करने के लिए व्यक्ति को अपनी पूर्वाग्रहयुक्त
बुद्धि के स्थान पर सन्त का आश्रय लेना चाहिये। परन्तु शब्दप्रामाण्यवादी के लिए तो शब्दशः अर्थग्रहण की उपेक्षा
नहीं की जा सकती है। अतः पुराणों के शब्दों की उपेक्षा कर के मनमानी अर्थग्रहण करना वेदार्थ या पुराणार्थ नहीं
ही हो सकता। अतः गुरु, आचार्य या सन्त भी शब्दों के अनुसार ही तात्पर्यार्थ वर्णन करते हैं अन्यथा तात्पर्य वर्णन के
लिए पूर्वोक्त रीति से शब्दों के प्रकृति, प्रत्यय, प्रकरण, उपक्रम, उपसंहार, अभ्यास, अपूर्वता, फल, अर्थवाद, उपपत्ति
षड्विधलिंग के विचार की आवश्यकता ही क्या है ? फिर सन्त तो विभिन्न सभी सम्प्रदायों में होते हैं। फिर तो उन
सन्तों के अनुसार या "बाबावाक्यं प्रमाणम्" के अनुसार भिन्न भिन्न वेदों के तात्पर्य भी होंगे। ऐसी स्थिति में—
"अथातो ब्रह्मजिज्ञासा" ( ब्रह्मसू० १।१।१ )। विचार-पूर्वोत्तरमीमांसा निरर्थक ही हो जायँगी। विचारविनिमय
सम्बन्धी आचार्यों के महान् ग्रन्थ भी निरर्थक हो जायेंगे। फिर तो विचार बिना ही विभिन्न सन्त जो कह दें वही
मान लेना होगा। स्वयं विचार को अवकाश ही नहीं रहेगा। तब तो सांख्य, मीसांसक, जैन, बौद्ध आदि सन्तों के
अनुसार अनीश्वरवाद भी मानना पड़ेगा, क्योंकि श्रद्धालु को शब्दतः विचार करने की आवश्यकता ही नहीं है।
ऐसी स्थिति में यदि कोई वैदिक इतिहास और पुराणों को वेदविरुद्ध होने से, पौरुषेय होने से अप्रमाण
कहे तथा कोई पौराणिक रामचरितमानस को वेदपुराणविरुद्ध होने के कारण अप्रमाण कहे तो उसका क्या समाधान
किया जा सकता है ? यदि केवल सन्त का कहना ही पर्याप्त है तो सन्त को भी वेद-पुराण की दुहाई देने की
क्या आवश्यकता ?
यदि कोई किसी सिद्धान्त को वैदिक सिद्धान्त कहे और उसे वेद से न सिद्ध कर सके तो वह वैदिक
सिद्धान्त कैसे सिद्ध होगा ? जो हम कहते हैं कि श्रद्धालु होकर मान लो, विश्वास करो इतनेमात्र से तो काम नहीं चल
सकता। यदि ऐसी ही बात थी तो रामचरितमानस पर भी ऊहापोह करने की क्या आवश्यकता ? फिर मानसचिन्तन
तथा मानसमुक्तावली की क्या आवश्यकता ? क्या यह विचार अश्रद्धा का द्योतक न होगा ? क्या गोस्वामीजी के
अभिप्रेत अर्थ का अनर्थ करना न होगा ?