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सर्वकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 874

अध्यार्थ रामचरितसम्बन्धी लेख ७९७
हरिश्चन्द्र भारतीय संस्कृति के परम आदर्श हैं। विश्वामित्र के तो श्रीरामजी शिष्य ही थे। क्या
श्रीराम और शिवजी और तुलसी ने यह नहीं सोचा कि हम हरिश्चन्द्र को महत्त्व दे रहे हैं। विश्वामित्र को गुरु
मानकर पूज रहे हैं पादसंवाहन कर रहे हैं। परन्तु उसको महत्त्व देने से समाज दिग्भ्रान्त हो जायगा। हरिश्चन्द्र का
अनुकरण कर अपने पुत्र के लिए दूसरे के पुत्रों का बलिदान देगा। विश्वामित्र की तरह अपनी महत्त्वाकाङ्क्षा के लिए
वसिष्ठ जैसे ब्रह्मर्षियों की हत्या करने में न संकुचायेगा।
वस्तुतः—"नैष स्थाणोरपराधो यदेनमन्धो न पश्यति" यह स्थाणु का दोष नहीं है, जो उसे अन्धा
नहीं देख सकता। जो सुधारवाद के व्यामोह से वेद, पुराण और मानस का अर्थ न समझे या उसके अर्थ का अनर्थ
करे तो उसमें न वेदादि का दोष है और न तुलसी आदि का दोष है।
वेदव्याख्याता जैमिनि, शबरस्वामी एवं कुमारिलभट्ट के अनुसार—"आम्नायस्य क्रियार्थत्वादानर्थक्य-
मतदर्थानाम्" (जै० सू० १।२।१) आम्नाय सकल वेदराशि का वैदिक यज्ञादि क्रियाओं के प्रतिपादन में ही
तात्पर्य है। जो क्रियार्थक भाग नहीं है, उसका स्वार्थ में तात्पर्य नही है—
"विधिना त्वेकवाक्यत्वात् स्तुत्यर्थेन विधीनां स्युः" (जै० सू० १।२।७)
जो भाग क्रियार्थक नहीं हैं ऐसे अर्थवाद आदि विध्यर्थ के स्तावक होने से ही प्रमाण हैं। निषिद्ध से
निवृत्ति के लिए निन्दार्थवाद होते हैं। व्यास, शङ्कर, रामानुज आदि पूर्व वेद के काण्डका जैमिनि के समान यज्ञक्रिया
के प्रतिपादन में तात्पर्य मानते हुए भी सम्पूर्ण वेद का विशेषतः वेदान्तों का तात्पर्य परब्रह्म परमेश्वर के ही प्रतिपादन
में मानते हैं। सृष्टि-प्रतिपादक वाक्यों का भी ब्रह्मस्वरूप के निरूपण में ही पर्यवसान है।
वेद के जितने व्याख्यान या इतिहास हैं वे लौकिक इतिहासों के समान नहीं हैं, क्योंकि लौकिक इतिहासों
का उल्लेख घटनाओं के पश्चात् उल्लिखित किया जाता है। किन्तु वेद अनादि एवं नित्य हैं। अतः उनका घटना के
पश्चात् उल्लेख का प्रश्न हो नहीं उठता। किन्तु जैसे किसी विद्यार्थी को गणित विद्या बताने के लिए अध्यापक
कल्पित आख्यायिका का प्रयोग करता है, वैसे ही किसी तत्त्व को समझाने के लिए वेद में भी आख्यानों की कल्पना
की जाती है। अध्यापक कहता है कि रामनगर के रामदत्त ने पाँच रुपये मन के हिसाब से भूसा खरीदा तो डेढ़
हजार रुपये का कितना भूसा हुआ?
वस्तुतः अध्यापक का न रामनगर से प्रयोजन है और न रामदत्त से प्रयोजन है। उसका तात्पर्य केवल
गणित समझाने में है। गणित समझाने के लिए आख्यायिका की कल्पना की है। इसी तरह वेद की आख्यायिका
या इतिहास सब काल्पनिक आख्यानमात्र होते हैं।
वेदों और मन्वादि के अनुसार वैदिक शब्दों के अनुसार ही ईश्वर सृष्टि करता है। अतः उन आख्या-
यिकाओं या इतिहासों के आधार पर घटनाएँ भी हो सकती हैं। अतः वैदिक इतिहास घटनापूर्वक नही होते। किन्तु
घटनाएँ तदनुसार हो सकती हैं। फिर भी आचरण में हिस्ट्री या इतिहास प्रमाण नहीं होता। किन्तु उसमें विधि,
संविधान या कांस्टिट्यूशन कानून का ही आश्रयण किया जाता है—
"प्रजापतिरात्मनो वपामुदखिदत्"
प्रजापति ने अपनी वपा का उत्खनन करके यज्ञ किया। पर उनके अनुसार यह विधि नहीं होती कि मनुष्य
को भी अपनी वपा का उत्खनन करके यज्ञ करना चाहिये। मन्त्र और अर्थवाद का जहाँ प्रत्यक्ष विधि से विरोध न हो
वहाँ लिङ्गबलात् विधि की कल्पना हो सकती है। कल्पित विधि का प्रत्यक्ष विधि से विरोध होने पर कल्पित विधि
बाधित हो जाती है। जहाँ प्रत्यक्ष विधि का विरोध न हो वहाँ कल्पित विधि से भी अनुष्ठान होता है।