रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७९४ रामायणमीमांसा एकविंश
सहायता लेनी पड़ी है और वेदों में ही इन्द्र को अहल्या का जार आदि कहा गया है । कौषीतकि उपनिषद् में इन्द्र
स्वयं अपने अनेक दोषों का वर्णन कर के कहता है कि मैंने त्रिशीर्ष त्वाष्ट्र का वध किया । अरुन्मुख यतियों को मारकर
कुत्तों को खाने के लिए दे दिया । परन्तु ब्रह्मज्ञान के प्रभाव से मेरा बाल भी बाँका नहीं हुआ—
“त्रिशीर्षाणं त्वाष्ट्रमहनम् अरुन्मुखान् यतीन् शालावृकेभ्यः प्रायच्छम् लोम च नामीयते ।”
(कौषी० उ० ३।१)
वेदों में ही विष्णु का वर्णन है । विष्णु ही कृष्ण हैं और वही राम हैं । गोपालतापनीय आदि अनेक
उपनिषदों में कृष्ण को ब्रह्म कहा गया है । रामतापनीय आदि अनेकों उपनिषदों में राम को परब्रह्म कहा गया है ।
उनमें रामकथा का भी वर्णन है । अतः यह स्पष्ट है कि भगवच्चरण-पङ्कज में समर्पण बुद्धि से अनुष्ठीयमान कर्मों से
बुद्धि शुद्ध होने पर निष्काम उपासनाओं से मन एकाग्र होता है । एकाग्र मन से ही स्वप्रकाशब्रह्मात्मसम्बन्धी आवरण-
भङ्ग होता है । तभी ब्रह्मात्मसाक्षात्कार होता है । तभी अनन्यप्रेमलक्षणा भक्ति सम्पन्न होती है। इस तरह कर्मकाण्ड
और उपासनाकाण्ड का वर्णन करती हुई श्रुतियों का ब्रह्मसाक्षात्कार में ही उपयोग होने से उनका तात्पर्य ब्रह्म-
साक्षात्कार में ही होता है । ज्ञानकाण्ड स्पष्टरूप से परमेश्वर का प्रतिपादन करते ही हैं ।
दूसरी वह दृष्टि है, जिसके अनुसार अनन्तानन्त ब्रह्माण्ड और तद्गत सभी वस्तुएँ एक-मात्र अनन्त
सत् ब्रह्म का ही विकार या विवर्त हैं, अतः इन्द्र, वरुणादि सभी वस्तुएँ ब्रह्मरूप ही हैं । उनका प्रतिपादन भी ब्रह्म
का ही प्रतिपादन है ।
इसके अतिरिक्त मीमांसकों ने सभी शब्दों की जाति में शक्ति मानी है । घटत्व, पटत्व आदि त्व, तलादि
प्रत्ययों से संवेद्य जाति का भाव ही अर्थ है, क्योंकि भाव अर्थ में ही त्वत्, तलादि प्रत्यय होते हैं । तथा च घटशब्द
का घटत्व अर्थ है, घटत्व का अर्थ है घटका भाव । अन्वय और व्यतिरेक से घटरूप में परिणत मृत्तिका ही घट का भाव
है । वही घटत्व है । मृत्तिकाभाव अपने कारण जल में ही पर्यवसित होता है । अतः सभी शब्दों के जातिवाचक
होने से तत्तद्रूप में परिणत ब्रह्म ही सब शब्दों का अर्थ है । इस प्रकार सभी शब्दों का आपात दृष्टि से तत्तत्प्रसिद्ध
अर्थ होने पर भी सब शब्दों का अन्तिम अर्थ ब्रह्म ही है ।
वेदवेदान्तवेद्य ब्रह्म ही वेदों का ब्रह्म है । वही रामायण का राम है, वही भागवत का कृष्ण, विष्णु-
पुराण का विष्णु एवं शिवपुराण का शिव है । वही शाक्त, सौर, गाणपत्य आदि आगमों का शक्ति, सूर्य और महा-
गणपति भी है । राम, विष्णु और कृष्ण एक ही वस्तु के भिन्न भिन्न नाममात्र हैं । एक-एक ब्रह्माण्ड के भी उत्पादक,
पालक और संहारक भी ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र होते हैं और अनन्तानन्त ब्रह्माण्डों के भी उत्पादक, पालक और संहारक
भी ब्रह्मा, विष्णु तथा रुद्र कहे जाते हैं । एक एक ब्रह्माण्ड के उत्पादक, पालक और संहारक कार्य ब्रह्म होते हैं ।
अनन्तानन्त ब्रह्माण्डों के उत्पादक, पालक एवं संहारक कारण ब्रह्म हैं ।
“यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति तद् ब्रह्म ॥”
(तै० उ० ३।१)
रामायण के राम, भागवत के कृष्ण, विष्णुपुराण के विष्णु एवं शिवपुराण के शिव कारणब्रह्म ही हैं । जो
शम्भु, विरञ्चि और विष्णु राम के अंश से उद्भूत होते हैं वे कार्यब्रह्म हैं, कारणब्रह्म नहीं । कृष्ण के भी एक एक
रोम में अगणित ब्रह्माण्डों का वर्णन है—
“क्वाहं तमोमहदहंखचराग्निवार्भूसंवेष्टिताण्डघटसप्तवितस्तिकायः ।
क्वेदृग्विधाऽविगणिताण्डपराणुचर्यावाताध्वरोमविवरस्य च ते महित्वम् ॥”(भाग० १०।१४।११)