रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
७१६ रामायणमीमांसा विंश
आदि में भी उनका महत्त्व प्रख्यात है। धर्मराज युधिष्ठिर मार्कण्डेय से रामकथा का श्रवण करते थे। सनकादि भी
राम के भक्त थे। यह उपनिषदों से भली भाँति विदित है। इन सब साहित्यों को अप्रमाण कहने से ही बुल्के की
निराधार कल्पना को अवकाश मिल सकता था। परन्तु भारतीय जनता सदा ही वेदों, रामायण तथा पुराणों का
आदर करती है और प्रामाण्य मानती है। प्रमाणपद्धतिपराङ्मुख पाश्चात्य एवं उनके अनुयायी कुछ भारतीय ही
ऐसी दुष्कल्पनाओं में विश्वास रखते हैं। अतएव बुल्के का यह कथन भी असत्य है कि "अवतारवाद के कारण कथावस्तु
में अलौकिकता अवश्य धीरे-धीरे बढ़ने लगी, फिर भी रामकथा का मुख्य दृष्टिकोण धार्मिक न होकर शताब्दियों तक
साहित्यिक ही रहा, यह संस्कृत-ललितसाहित्य के स्वर्णकाल में महाकाव्यों तथा नाटकों से स्पष्ट है। राम-भक्ति के
आविर्भाव के पूर्व रामकथा का यह साहित्यिक रूप विदेशों में फैल गया और उसपर बाद में रामभक्ति का प्रभाव नहीं
पड़ा। इसी लिए सभी विदेशी रामकथा-साहित्य में रामभक्ति का अभाव है।" क्योंकि कहा जा चुका है कि राम के
मर्यादापुरुषोत्तम और परब्रह्म दोनों रूप भारतीय साहित्य में साथ-साथ रहे हैं। श्रीमद्भागवत आदि में जहाँ राम का
परब्रह्मरूप सुस्पष्ट है वहाँ भी उनके मर्त्यावतार का उद्देश्य मर्त्यशिक्षण ही रहा है—
"मर्त्यावतारस्त्विह मर्त्यशिक्षणं रक्षोवधायैव न केवलं विभोः ।"
तुलसीदास ने भी कहा है—
“राम देखि सुनि चरित तुम्हारे ।
जड़ मोहहिं बुध होहिं सुखारे ॥" (रा० मा० २।१२५।४ )
सेरीराम, रामकियेन आदि में राम को विष्णु का अवतार माना ही गया है। अतः बुल्के का यह कहना
सफेद झूठ ही है कि विदेशी रामकथाओं में रामभक्ति का अभाव है। सुतरां विष्णुभक्ति, रामभक्ति एक ही ठहरती
है। लक्ष्मण, हनुमान्, जाम्बवान् आदि भी राम की भक्ति करते ही थे । बुल्के की ऐसी सैकड़ों दुष्कल्पनाओं का एक
ही उत्तर है कि वेद, उपनिषद्, रामायण, महाभारत तथा पुराणों के सम्बन्ध में बुल्के का कालनिर्धारण अत्यन्त
अशुद्ध है। उनका काल अनादि तथा लाखों वर्ष प्राचीन है। तभी से रामभक्ति और राम का महत्त्व आज से सहस्रों
गुणा अधिक माना जाता रहा है। आस्तिक जनता रामायणकथा, राममन्त्र तथा रामनाम को जीवन-सर्वस्व मानती
रही है। शतकोटिप्रविस्तर रामायण का सार जान कर महेश्वर रामनाम का ही जप करते रहे हैं।
"रामायण सतकोटि महँ, लिय महेस जिय जानि ।" (तुलसी)
याज्ञिकपद्धतियों में अनादिकाल से यज्ञ, याग आदि के अन्त में भगवान् का द्वादश बार नामस्मरण का
सम्प्रदाय रहा है।
“यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या तपोयज्ञक्रियादिषु ।
न्यूनं सम्पूर्णतां याति सद्यो वन्दे तमच्युतम् ॥”
राम अनन्तकोटि ब्रह्माण्डों के नायक परमात्मा हैं। वैदिकधर्म ही उनका धर्म है। उन्होंने अवतार लेकर
कोई नया धर्म नहीं चलाया। अतः जो भी श्रौत या स्मार्त धर्मकर्म का अनुष्ठान करते हैं उसे ही परमात्मा के अर्पण
करते हैं। परमात्मा निर्गुण और सगुण दोनों ही हैं। अतः "स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ।"
के अनुसार आस्तिक स्वानुष्ठित धर्मकर्म को नारायणार्पणमस्तु, रामार्पणमस्तु, श्रीकृष्णार्पणमस्तु, शिवार्पणमस्तु
कहकर समर्पण करते रहे। मन्त्र, नामजप, ध्यान आदि भी राम, कृष्ण, शिव, विष्णु आदि के अनादिकाल से चलते
ही रहे हैं। इसी तरह राम की शृङ्गारिक कथा की बात है। अनेक प्रकार की भक्तियों में मधुरभक्ति भी अन्यतम
है। पाञ्चरात्र आदि आगमों में उसका प्रमुख स्थान है। विष्णु, शिव, राम, कृष्ण सभी की भक्तियों में न्यूनाधिकरूप
में शृङ्गारिक भक्ति का उल्लेख है। वेदों में भी उसका उल्लेख है ही।
अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ७१७
विकासवाद जैसे मिथ्या अपसिद्धान्त में ही ऐसा माना जाता है कि "भारतीय भक्तिमार्ग का आविर्भाव
वैदिक साहित्य में ही हो चुका था। वह शताब्दियों के पश्चात् भागवतधर्म में पल्लवित हो सका। भागवतों के इष्टदेव
वासुदेव कृष्ण विष्णु के अवतार माने जाने लगे। जिसके फलस्वरूप भक्तिभावना उन्हीं विष्णु वासुदेव कृष्ण में केन्द्रित
होकर उत्तरोत्तर विकसित होने लगी। बाद में राम भी विष्णु के अवतार माने जाने लगे। किन्तु अवतार के रूप में
स्वीकृत हो जाने पर भी शताब्दियों बाद रामभक्ति का आविर्भाव हुआ," पर यह सब भी अनर्गल प्रलाप ही है।
विकास नहीं भागवतधर्म वैदिक भक्तिमार्ग की व्याख्या है। वेदों में विष्णु की ही भक्ति नहीं है, शिव और शक्ति की
भी भक्ति का वर्णन है। फलतः रामायण, महाभारत तथा पुराणों एवं शैव और वैष्णव आगमों में उसकी व्याख्याएँ
हुई हैं। रामायण में प्रधानतया रामभक्ति, महाभारत में प्रधानतया कृष्ण तथा शिव की भक्ति का वर्णन है। पुराणों
में विष्णु, शिव, शक्ति, राम और कृष्ण की भक्ति का उपबृंहण है। पुरुषसूक्त, रुद्रसूक्त, रुद्राध्याय तथा नारायण,
महानारायण, रामतापनीय, रामरहस्य, गोपालतापनीय, त्रिपुरतापनीय आदि उपनिषदों में विविध भक्तियों का
उल्लेख है। शङ्कर, रामानुज आदि शास्त्रप्रामाण्यवादी थे। मनमानी कल्पना नहीं करते थे। उन्हीं वेदादि शास्त्रों के
अनुसार ही उन्होंने राम आदि की भक्ति का वर्णन किया था। कृष्ण एवं राम को विष्णु का अवतार मनमानी नहीं माना
जाने लगा, किन्तु पूर्वोक्त शास्त्रों के अनुसार ही। ईसाइयों में जैसे ईसा को ईश्वर का पुत्र तथा कुमारीपुत्र माना जाने
लगा बुल्के ने वैसी ही इधर भी कल्पना करने की भूल की है। अध्यात्मरामायण भी मनमानी कल्पना नहीं है, किन्तु
पूर्वोक्त प्रमाणों पर ही वह आदृत है। वह भी ब्रह्माण्डपुराण का खिलभाग माना जाता है। युधिष्ठिर भी बड़े प्रभाव-
शाली राजा थे। श्रीकृष्ण भी उनका महान् आदर करते थे तो भी उन्हें ईश्वर का अवतार नहीं माना गया, किन्तु
महाभारत में तथा विष्णुपुराण में राम का महत्त्वपूर्ण सम्मान है। अतएव 'रामायण की आधिकारिक कथावस्तु
सीताहरण, रावणवध को एक नया रूप दिया गया' इत्यादि कल्पना भी असत्य है। सदा सर्वदा ही वेदों, रामायणों,
महाभारत तथा पुराणों की आध्यात्मिक, आधिदैविक आधिभौतिक व्याख्याएँ होती रही हैं।
बुल्के कहते हैं- "वाल्मीकिरामायण, हरिवंश, विष्णुपुराण, वायुपुराण आदि के अनुसार चारों भाई
विष्णु के एक-एक चतुर्थांश से समन्वित थे। भक्तिभाव के पल्लवित होने के पश्चात् राम परब्रह्म के पूर्णावतार माने
जाने लगे एवं लक्ष्मण, भरत तथा शत्रुघ्न क्रमशः शेष, शङ्ख तथा सुदर्शन के अवतार। प्राचीन पुराणों में सीता तथा
लक्ष्मी की अभिन्नता का निर्देश नहीं मिलता। आगे चलकर लक्ष्मी सीता के रूप में अवतरित मानी गयी हैं। किन्तु
रामभक्ति के प्रादुर्भाव के पश्चात् सीता परम शक्ति अथवा मूलप्रकृति स्वीकृत होने लगी।" परन्तु बुल्के की दृष्टि में
प्राचीन पुराण भी कल्पना ही हैं, प्रमाण नहीं। सभी ईसा के पश्चात् बने हैं। अतः यदि उनमें सीता एवं राम को
परब्रह्म या मूलप्रकृति माना भी गया होता तो भी ईसाइयत के प्रचारक बुल्के उसे कभी न मानते। हमारे यहाँ
वाल्मीकिरामायण, हरिवंश, विष्णुपुराण, वायुपुराण, पद्मपुराण, स्कन्दपुराण आदि सभी पुराण व्यास द्वारा प्रादुर्भूत
होते हैं, अतः वे सभी प्राचीन हैं। सभी का प्रामाण्य है। सभी का समन्वय करके ही किसी निष्कर्ष पर पहुँचा जा
सकता है। पुराणों में विष्णु को परब्रह्मरूप ही माना गया है, अतः विष्णु का अवतार होने पर राम सुतरां परब्रह्मरूप
ठहरते हैं। भरत आदि चतुर्थांश हैं, इसकी व्याख्या भी पीछे हो चुकी है। माण्डूक्योपनिषद् में विराट्, हिरण्यगर्भ,
अव्याकृत, तुरीय भी चतुर्थांश हैं फिर भी विराट् आदि की अपेक्षा तुरीय की विशेषता है ही। वेदों तथा पुराणों का
समन्वित अर्थ यही है कि राम परमार्थतः परब्रह्म हैं, सीता ऐश्वर्य और माधुर्य की अधिष्ठात्री महाशक्ति उनसे अभिन्न
ही हैं। बुल्के आदि ने वेदों तथा रामायण आदि के सिद्धान्तों से सर्वथा अपरिचित तथा ईसाइयत प्रचार की भावना
से प्रेरित होकर रामकथा के नाम पर अर्थ का अनर्थ करके पाप किया है। नास्तिकप्राय लोगों ने वस्तुस्थिति के विरुद्ध
मनमानी सीता को लक्ष्मी और राम को विष्णु नहीं माना, किन्तु आस्तिकों ने वेदादि प्रमाणों के आधार पर वस्तु-
स्थिति को समझकर ही वैसा स्वीकार किया है।
छायामात्र सीता के हरण तथा मायासीता के त्याग का भी समाधान किया जा चुका है ।
“प्रमाणवन्त्यदृष्टानि कल्प्यानि सुबहून्यपि" के अनुसार रावण के दोनों रूप स्पष्ट हैं। रावण का
बाह्य रूप यही है कि उसने कामबुद्धि से सीता का हरण किया था, परन्तु आन्तर रूप यह भी है कि मुक्ति की
कामना से उसने राम से वैरभाव अपनाया था । “क्रोधोऽपि देवस्य वरेण तुल्यः ।” ( वा० रा० दा० पाठ प्रक्षेप
२।२२ ) अर्थात् देव का भगवान् विष्णु का क्रोध भी वर के तुल्य ही मुक्ति प्रदान करता है । जिन तुलसीदास का
गुणगान करते हुए बुल्के भारतीय जनता के विश्वास के भाजन बनना चाहते हैं । उन्होंने भी रावण की ऐसी ही
आन्तररूप भावना व्यक्त की थी—
“जो जगदीश लीन्ह अवतारा, सुररञ्जन भञ्जन महिभारा ।
तौ मैं जाई वैर हठि करिहौं, प्रभु शर ते भवसागर तरिहौं ।।”
बुल्के की तृतीय सोपान की कल्पना भी पिष्टपेषणमात्र है । राम विष्णु हैं, इतने से भक्तवत्सल हैं ही,
अतः न केवल भक्तवत्सल राम का ही अपितु विष्णु का चरित्रवर्णन गुणकीर्तन ही है ।
अन्त में बुल्के समस्त भारतीयों एवं भारतीय धर्म एवं संस्कृति को अज्ञानपूर्ण, मूर्खतापूर्ण और भावुकतापूर्ण
सिद्ध करने की दुरभिसन्धि से कहते हैं कि इस प्रकार रामकथा अनेकरूप धारण करते हुए शनैः शनैः सम्पूर्ण भारतीय
संस्कृति में व्याप्त हो गयी । अर्थात् बुल्के की दृष्टि में वस्तुस्थिति के विपरीत भावुकतावशात् मिथ्याकल्पक मानव
राम को विष्णु का अंश तथा विष्णु को परब्रह्म और भक्तवत्सल राम मानने लगे । सीता को लक्ष्मी से अभिन्न और
फिर मूलप्रकृति मानने लगे । पर ये सब भारतीयों के प्रामाणिक वेद, रामायण आदि प्रमाणों को झुठलाने की ही
कुटिल कुचेष्टा है ।
वे कपटपूर्ण शब्दों में यह भी कहते जाते हैं—“उसकी ( रामकथा की ) अद्वितीय लोकप्रियता निरन्तर
अक्षुण्ण ही नहीं वरन् शताब्दियों तक बढ़ती रही, क्योंकि मानवहृदय को आकर्षित करने की जो शक्ति रामकथा में
विद्यमान है वह अन्यत्र दुर्लभ ही है", परन्तु ऐसा क्यों ? उसका उत्तर उनके पास नहीं है । परन्तु भारतीय
दृष्टिकोण से उत्तर स्पष्ट है कि राम और कृष्ण की कथा केवल वाग्विलास या कण्ठशोषणमात्र नहीं है वह अनुपम शांति,
भक्ति तथा मुक्ति देनेवाली है । इसी कारण उसकी लोकप्रियता है । श्रीभागवत में स्पष्ट उल्लेख है; शुकदेवजी कहते हैं—
मैंने बड़े-बड़े यशस्वी महापुरुषों की कथा वैराग्य और विज्ञान की विवक्षा से ही कही है । उसमें परमार्थ नहीं है; किन्तु
कृष्ण में अमल भक्ति चाहनेवालों को चाहिये कि जो उत्तम श्लोक भगवान् का अमङ्गलघ्न गुणानुवाद नित्य ही सन्तों
में संगीयमान होता है, उसे ही सुनें—
“कथा इमास्ते कथिता महीयसां विताय लोकेषु यशः परेयुषाम् ।
वैराग्यविज्ञानविवक्षया विभो वचोविभूतिर्न तु पारमार्थ्यम् ।।
यस्तूत्तमश्लोकगुणानुवादः संगीयतेऽभीक्ष्णममङ्गलघ्नः ।
तमेव नित्यं शृणुयादभीक्ष्णं कृष्णेऽमलां भक्तिमभीप्समानः ।।”(भाग० १२।३।१४,१५)
भारतीय साहित्य में वर्णित रामकथा का आदर्श ठीक यही है कि रामचरित स्वच्छ मनोवृत्ति प्रदान
करता है ।
जैमिनीयाश्वमेध ( ३६।४४ ) “सर्वे धर्माः समुद्दिष्टाः वर्णाश्रमविभागतः ।”
बृहद्धर्मपुराण ( २६।९ ), मम्मट का भी यह कहना ठीक ही है कि रामादि के समान ही वर्तना चाहिए
रावणादि के समान नहीं— “रामादिवद् वर्तितव्यं न रावणादिवत्” ( काव्य प्रकाश १।२) । पद्मपुराण ( पाताल-
खण्ड अ० ३६ ) के अनुसार रामचरित में पातिव्रत्य, भ्रातृस्नेह, गुरुभक्ति, स्वामिसेवा आदि का आदर्श प्रस्तुत है ।
अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ७१९
"यस्मिन् धर्मविधिः साक्षात् पातिव्रत्यं तु यत्स्थितम् ।
भ्रातृस्नेहो महान् यत्र गुरुभक्तिस्तथैव च ॥
स्वामिसेवकयोर्यत्र नीतिमूर्तिमती किल ।
अधर्मकरशास्तित्वं यत्र साक्षाद् रघूद्वहात् ॥” (वा० रा० ११८, १२८)
क्या ही अच्छा होता यदि बुल्के अकुटिलभाव से राम के इसी आदर्श का प्रतिपादन करते । वाल्मीकि-
रामायण में भी राम को विग्रहवान् धर्म ही कहा गया है- "रामो विग्रहवान् धर्मः” । श्रीभागवत आदि में मनुष्यों
को धर्मशिक्षण देकर लोकसंग्रह करना ही राम के अवतार का मुख्य प्रयोजन कहा गया है । गीता के कृष्ण भी पूर्ण
ब्रह्म होते हुए भी लोकसंग्रहदृष्टि से वर्णाश्रमनानुसार कर्म करते हैं-
“यदि ह्याहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः ।” ( गीता० ३।२३ )
“उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् ।” ( गीता० ३।२४ )
सीता का पातिव्रत्य, राम का आज्ञापालन, लक्ष्मण का भ्रातृप्रेम, दशरथ की सत्यसन्धता, कौशल्या का
वात्सल्य आदि आदर्श लोकशिक्षा के लिए महत्त्वपूर्ण हैं । अतः रामकथा में कथावस्तु भगवद्गुणवर्णन भक्ति-मुक्तिप्रद
होने के साथ-साथ आदर्श जीवन का एक महान् मार्गप्रदर्शन भी है । बुल्के रामकथा को विकास, कल्पना, परिवर्तन
और परिवर्धन मानते हैं । और कहते हैं उसे भारतीय प्रतिभा शताब्दियों से परिष्कृत करती चली आ रही है ।
परन्तु भारतीय प्रतिभा सदा तथ्य तत्त्व की पक्षपातिनी रही है । मिथ्या कल्पना की नहीं 'तत्त्वपक्षपातो हि धियां
स्वभावः ।' तत्त्वपक्षपात बुद्धियों का स्वभाव होता है । बुल्के कहते हैं कि "कैकेयी की कुटिलता वाल्मीकिरामायण
में स्पष्ट वर्णित है । आगे चलकर उसे निर्दोष ठहराने के लिए अनेकों उपायों का सहारा लिया गया है ।”
पर यह भी गलत है, क्योंकि इन बातों का समुचित समाधान रामचरितमानस में भी है और अध्यात्म-
रामायण में भी । सबसे मुख्य बात तो यह है कि रावणत्रस्त देवताओं की प्रार्थना पर ही परब्रह्म विष्णु मनुष्यरूप में
अवतीर्ण हुए थे । उनकी सहायता के लिए देवता वानर और भालू रूप में अवतीर्ण हुए थे । परन्तु यदि कैकेयी
वनवास का आग्रह न करती, सीताराम का वनवास न होता एवं सीता-हरण न होता तो रावणवध आदि कार्य कैसे
होते ? और रामायण का आविर्भाव भी कैसे होता ?
तुलसीदासजी ने कहा है-
“दोस देहिं जननिहिं जड़ तेई । जिन गुरु साधुसभा नहिँ सेई ॥” (रा० मा० २।२६१।४)
वालिवध को न्यायसङ्गत स्वयं वाली ने ही स्वीकार किया था। पर बुल्के उन अंशों को प्रक्षिप्त मान लेते
हैं। जो अपने हठ को सिद्ध करने के लिए आर्ष प्रमाण को झुठलाना चाहता है और जिसने समाधान न मानने की
प्रतिज्ञा कर रखी हो उसे कौन समझा सकता है ?
तुलसीदास के अनुसार राम कहते हैं-
“अनुजवधू भगिनी सुतनारी, सुन सठ ये कन्यासम चारी ।
इन्हहि कुदृष्टि विलोकै जोई, ताहि बधे कछु पाप न होई ॥
मूढ़ तोहि अतिसय अभिमाना, नारिसिखावन करसि न काना ।
मम भुजबल आश्रित तेहि जानी, मारा चाहसि अधम अभिमानी ॥” (रा० मा० ४।८।४)
७२० रामायणमीमांसा विश
अन्त में वाली कहता है—
"सुनहु राम स्वामी सन, चल न चातुरी मोरि ।
प्रभु अजहुँ मैं पातकी, अन्तकाल गति तोरि ॥” ( रा० मा० ४।९ )
वाल्मीकिरामायण में भी राम ने कहा—
“भ्रातुर्वर्तसि भार्यायां त्यक्त्वा धर्मं सनातनम् ।
अस्य त्वं धरमानस्य सुग्रीवस्य महात्मनः ॥
रुमायां वर्तसे कामात् स्नुषायां पापकर्मकृत् ।” (वा० रा० ४।१८।१८,१९)
“राजभिर्धृतदण्डाश्च कृत्वा पापानि मानवाः ।
निर्मलाः स्वर्गमायान्ति सन्तः सुकृतिनो यथा ॥
शासनाद् वापि मोक्षाद् वा स्तेनः पापात्प्रमुच्यते ।
राजा त्वशासन् पापस्य तदवाप्नोति किल्बिषम् ॥” (वा० रा० ४।१८।३१,३२)
अपराधी को दण्ड देना आवश्यक है । अपराधी से युद्ध करने का कोई प्रसङ्ग नहीं होता । निगृहीत
अशस्त्र अपराधी को आज भी प्राणदण्ड दिया ही जाता है । मृगयाधर्म में भी सावधान, असावधान, युद्ध करता हुआ
या न करता हुआ भी मृग मारा जा सकता है । उसमें कोई दोष नहीं है ।
“अयुद्धयन् प्रतियुद्ध्यन् वा यस्माच्छाखामृगो ह्यसि । ( वा० रा० ४।१८।४१ )
एतावता अदृष्ट होकर मारना भी पाप नहीं, क्योंकि दण्डार्थ वध में दर्शन अपेक्षित नहीं है । वाली सन्ध्यो-
पासनादि करता था और शास्त्रज्ञ था, इस दृष्टि से पूर्वोक्त समाधान है । यदि केवल शाखामृगमात्र है तो भी प्रच्छन्नवध
में कोई दोष नहीं है, क्योंकि तृणच्छन्न श्वभ्रादि के निर्माण द्वारा विश्वस्त स्वपालित मृगों से युद्धादि करते हुए भी
मृगों को राजर्षि लोग क्षत्रिय-स्वभावात् मृगया में मारते हैं । इन कार्यों में कोई बड़ा दोष नहीं होता । किन्तु
प्राणायामादि से अपनेय स्वल्प ही दोष होता है। तुमने सुग्रीव के जीते हुए उसकी भार्या रुमा को सनातन
धर्म छोड़कर भार्या बना लिया है । राजा का कर्तव्य है, तुम्हें दण्ड दे, दण्ड से शुद्ध होकर अपराधी स्वर्ग का भागी
होता है । राजा दण्ड दे या छोड़ दे अपराधी शुद्ध हो जाता है । परन्तु दण्ड न देनेवाला राजा उस पाप का भागी
होता है ।
राम का वचन सुनकर भगवान् में मिथ्या दोषारोपण से वाली व्यथित हुआ और धर्म का तत्त्व जानकर
उसने राम के प्रति दोष का अनुसन्धान नहीं किया—
“एवमुक्तस्तु रामेण वाली प्रव्यथितो भृशम् ।
न दोषं राघवे दध्यौ धर्मेऽधिगतनिश्चयः ।।” ( वा० रा० ४।१८।४५ )
इस तरह वाली स्वयं राम को निर्दोष समझकर उनके प्रति किये गये दोषारोपण के कारण अत्यन्त
प्रव्यथित होता है और राम में दोष का ध्यान ( चिन्तन ) भी नहीं करता । फिर भी बुल्के, भदन्त कौसल्यायन आदि
हठात् राम को दोषी मानते हैं और इन समाधानों तथा वाली के सन्तुष्टि आदि के बोधक वचनों को क्षेपक कहने का
दुःसाहस करते हैं, जिसे सुस्त गवाह चुस्त वाग्मी कहावत ही कहा जा सकता है ।
परन्तु यह सर्ग परम्परा प्राप्त है और टीकाकारों द्वारा व्याख्यात है, अतः इसे प्रक्षेप कहना सर्वथा
असङ्गत है । नाटकों में रोचकता तथा रसाभिव्यक्ति के लिए ही राम से वाली का द्वन्द्वयुद्ध वर्णित है ।
अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ७२१
बुल्के कहते हैं "रामभक्ति के प्रादुर्भाव से रामकथा का समस्त वातावरण बदल दिया गया । तथा विभिन्न
पात्रों की उग्रता तथा कुटिलता रामभक्ति में लीन कर दी गयी । दुष्ट राक्षस रावण भी पतितपावन राम के प्रभाव से
पवित्र हो जाता है । इस प्रकार भारत की समस्त आदर्श भावनाएँ रामकथा में मर्यादापुरुषोत्तम राम तथा पतिव्रता
सीता के चरित्रचित्रण में केन्द्रीभूत हो गयीं । फलस्वरूप रामकथा भारतीय संस्कृति के आदर्शवाद का उज्ज्वलतम
प्रतीक बन गयी ।"
इस सम्बन्ध में इतना ही कहना है कि रामभक्ति का यह चमत्कार स्वाभाविक है, परन्तु वह रामभक्ति
वेदादि शास्त्रों से वर्णित अनादि एवं नित्य ही है । वह विकास का परिणाम नहीं है । रामकथा का वातावरण सदा
से ही व्यावहारिक आदर्श मर्यादामय और पारमार्थिक भक्ति-भावनामय रहा है । भक्ति के प्रभाव से कुटिलता एवं उग्रता
नष्ट होकर सरलता एवं नम्रता के रूप में परिणत होती ही है ।
"पायी न केहि गति पतितपावन राम भजि सुनु सठ मना ।" ( रा० मा० ७।१२९ के बाद छन्द )
रामकथा अनादिकाल से ही मर्यादापुरुषोत्तम, भक्तवत्सल, पतितपावन राम तथा अनन्तब्रह्माण्डों की
ऐश्वर्य और माधुर्य की अधिष्ठात्री, पतिव्रता सीता के चरित्रचित्रण में ही पर्यवसित है ।
अतएव सदा से ही रामकथा भारतीय आदर्श का उज्ज्वलतम प्रतीक है और रहेगी ।
एकविंश अध्याय
रामचरितसम्बन्धी लेख
मर्यादापुरुषोत्तम राम तथा जगज्जननी जानकी के प्रति वनमानव द्वारा प्रयुक्त अत्यन्त
अशोभन अभद्र शब्दों का उत्तर
इसी प्रकार गणेशचन्द्र जोशी मन्वन्तर ने वनमानव महाकाव्य लिखकर जनकजा एवं अशोकवासिनी दो
भागों में प्रकाशित किया है, जिसे राजस्थान सरकार ने उच्च माध्यमिक विद्यालयों में पाठ्यपुस्तकों में सम्मिलित
किया है। जनकजाखण्ड के आपत्तिजनक अंश निम्नोक्त हैं। सम्पूर्ण पुस्तक कई प्रयत्न करने पर भी प्राप्त नहीं हुई।
पृष्ठ
( १ ) सीता विद्रोहिणी थी न कि पतिपरायणा ५
( २ ) सीता राम के साथ विवाह से असन्तुष्ट थी १८२—१८४
( ३ ) राम प्रपंचक थे १६३
( ४ ) बाल्मीकि और तुलसी खुशामदी थे १६६
( ५ ) राम दासता के समर्थक थे १६८
( ६ ) राम को आदर्श कहकर भक्त कवियों ने पाषण्ड का बाजार जोड़ा है १७१
( ७ ) राम दशरथ के नहीं वरन् वसिष्ठ के वीर्य से उत्पन्न थे १७४
( ८ ) राम छली थे १७७
( ९ ) लक्ष्मण सीता के अनुगामी और द्विवर थे १७८
( १० ) सीता स्वयं रावण के साथ गयी २०७—२०८
( ११ ) सीता रावण के ही योग्य थी १८८
( १२ ) सीता रावण को चाहती थी १९२—२०१
( १३ ) सीता लक्ष्मण की प्रेमिका थी १९२
( १४ ) सीता वन से लौटने को तैयार न थी १९७
( १५ ) राम का वनगमन नाटकमात्र था १९५—१९६
( १६ ) सीता लङ्का में रहने को लालायित थी १९९
( १७ ) लक्ष्मण सीता पर आसक्त थे २०१
( १८ ) राम स्तेनवृत्ति के थे २०७—२०८
( १९ ) सीता जनक की नहीं किसी अन्य की जायी थी
( २० ) लक्ष्मण व रावण में सीता के प्रति प्रेम की प्रतियोगिता थी २१५
( २१ ) सीता के तीन प्रेमी राम, रावण और लक्ष्मण २१६
( २२ ) लव लङ्का का वंशज था २२०
( २३ ) सीता की तुलना गधी से २२२
( २४ ) सीता रावण एवं लङ्का पर मुग्ध थी २६२—२६३
अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७२३
( २५ ) सीता ने राम को नहीं रावण को चाहा २६७–२८५
( २६ ) सीता ने विवश होकर राम को वरा २७१–२७२
( २७ ) सीता को एक पुरुष से बँधना पसन्द नहीं था २७२–२७८
( २८ ) सीता की माँ निर्धन राम को पुत्री देने से दुःखी २८२
( २९ ) सीता किसी की सगी न थी १४२
( ३० ) ऋषि लोग गोमांस खाते थे १४२
( ३१ ) ब्रह्म-भोज में ब्राह्मण मनुष्य-शव खाते थे १३६
अशोकवासिनी द्वितीय खण्ड में
( १ ) भरत की माँ ऋषि से सहवास करने वन में गयी १५
( २ ) सीता निषादराज के साथ जाने को तय्यार थी ३१
( ३ ) सीता हिस्टीरिया से पीड़ित थी ४२
( ४ ) सीता का स्वर्णप्रेम ४६ — ५३
( ५ ) राम नपुंसक थे ५६
( ६ ) सीता लङ्का जाने को उत्सुक थी ५६ — ५७
( ७ ) लक्ष्मण सीता पर आसक्त थे ५६ — ५७
( ८ ) राम रिश्वत के द्वार खोल गये ९८
( ९ ) हनुमान् बलात्कार से उत्पन्न १३६
( १० ) हनुमान् ठेट बन्दर
( ११ ) लंका में अनेक राक्षसियों से रमण किया अनेक जारज पुत्र
उत्पन्न किये ।
( १२ ) सीता का रावणप्रेम व रामवियोग का नाटक । हर नर नारी
दुराचारिणी ।
उक्त कथन — “मुखमस्तीति वक्तव्यं दशहस्ता हरीतकी ।” न्याय के अनुसार निष्प्रमाण प्रलाप ही कहा
जायगा । राम सीता कब हुए और क्या प्रमाण हैं । इस विषय में प्रत्यक्ष और अनुमान की प्रवृत्ति नहीं होती, क्योंकि
प्रत्यक्ष से विद्यमान का ही बोध होता है और अनुमान भी लिङ्गलिङ्गिभाव, गम्यगमक, व्याप्यव्यापक सम्बन्धग्रह से
ही होता है । यद्यपि आध्यात्मिक एवं आधिदैविक रूप से राम और राम की लीलाएँ आज भी विद्यमान हैं । पर
बहिर्मुखों के लिए उनका अनुभव असम्भव ही है । ऐतिहासिकरूप से राम आधुनिक इतिहास के अविषय ही हैं । वेद,
उपनिषद्, रामायण, महाभारत तथा पुराणों, तन्त्रों और आगमों से ही राम, सीता, लक्ष्मण, रावण एवं उनके चरित्रों
का बोध हो सकता है । इन सद्ग्रन्थों से सीता, राम, लक्ष्मण का अत्यन्त पवित्र श्रौतस्मार्त धर्मों के अनुसार ही चरित्र
है । वनमानव काव्याभास के द्वारा वर्णित दोष वेदादिप्रमाणों से सिद्ध नहीं हैं। निराधार एवं निष्प्रमाण ही कुछ
कहना है तो कोई भी वनमानव एवं उसके लेखक को ही महापातकी, दुराचारी, वर्णसङ्कर, प्रतिलोम अन्त्यावसायी,
षण्ढ, अभक्ष्यभक्षी, अपेयपायी आदि कुछ भी कह सकता है। वाल्मीकिरामायण, रघुवंश आदि काव्यों के द्वारा
तो श्रीराम मर्यादापुरुषोत्तम, महान् योद्धा, पराक्रमी, परब्रह्म परमेश्वर विष्णु के अवतार हैं, लक्ष्मी अनन्त ब्रह्माण्डों
की जननी ऐश्वर्य-माधुर्य की अधिष्ठात्री सीता हैं । शेष कारण ब्रह्म अनन्त शेष हैं । पतिपरायणा सीता को विरोहिणी
लिखना लेखक की मूर्खता ही है । जल तथा तरङ्ग, चन्द्र-चन्द्रिका, भानु और प्रभा, अमृत और मधुरिमा के समान
सीता और राम दोनों अभिन्न थे । उनमें असन्तोष का प्रश्न ही कहाँ ? राम प्रपञ्च के निर्माता होते हुए भी
अधिष्ठानरूप से प्रपञ्चातीत ही थे। वाल्मीकि और तुलसी ही क्यों सभी ब्रह्मविद्वरिष्ठ ऋषि, मुनि आदि आस्तिक राम
के प्रशंसक थे और हैं। श्रीराम 'दासोऽहं' के 'द' का अपहरण करके अधिकारियों में सोऽहं की भावना जगाते हैं।
राम को आदर्श मानकर उनका अनुसरण करने से ही पाखण्ड का अन्त हो सकता है। राम सम्पूर्ण विश्व के माता,
पिता एवं गुरु होते हुए भी अवतारवाद के सिद्धान्तानुसार दशरथनन्दन, कौशल्यानन्दवर्धन तथा वसिष्ठ के प्रिय शिष्य
थे। राम छली नहीं, कूटमयी माया के पति और छल-छद्म के भेदक थे। लक्ष्मण सीता के अनुगत देवर 'रामं
दशरथं विद्धि मां विद्धि जनकात्मजाम् ।' के अनुसार राम को पिता एवं सीता को माता मानते थे। सीता रावण के
विनाश के लिए रावण के साथ गयी भी हो तो भी कोई बाधा नहीं है। जगज्जननी विश्वकल्याणकारिणी सीता रावण
का भी हित चाहती थी। तभी उन्होंने रावण के प्रति राम के अनन्त प्रभाव एवं तेज का वर्णन किया था। सीता
लक्ष्मण की माता के तुल्य हितकारिणी थी। सीता सर्वकारण शक्ति होने से वन में, रण में सर्वत्र ही हैं और होंगी।
सर्वव्यापी राम का वनगमन नाटक ही तो है। सीता सर्वत्र ही हैं। फिर लङ्का में ही क्यों ? सर्वहितैषिणी हैं फिर
लक्ष्मण की भी हितैषिणी होना युक्त ही है। राम का नाम दुर्वृत्तियों का विनाशक तथा सद्वृत्तियों का विधायक है।
सीता सर्वकारण शक्ति अयोनिजा ही हैं। जगज्जननी सीता में सबकी स्वाभाविकी भक्ति युक्त है। भक्ति में उत्कर्ष
सब को ही अभीष्ट है। सीता के निन्दक को गर्दभियों में भी स्थान दुष्प्राप्य है। रावण तथा लङ्का दोनों सीता-द्रोह
के कारण नष्ट हो गये। लङ्का-निवास के कारण सीता की निन्दा करनेवाला अभिशप्त रजक ही था। सीता रामचन्द्र
की चन्द्रिका ही हैं। सीता परम पुरुष राम की अनन्या हैं। सीता और राम के अखण्ड दिव्य दाम्पत्य से विश्वमङ्गल
हुआ। सीता असङ्ग चिद्रूपिणी होने पर भी सर्वाभ्युदयरूपिणी भी थी। ऋषियों एवं ब्राह्मणों पर अभक्ष्य भक्षण का
दोषारोपण करनेवाला विड्वराह ही हो सकता है। भरत की माता कैकेयी के कारण ही रामायण बन सकती थी।
कोल, भिल्ल, निषाद आदि सबके कल्याणार्थ ही सीता और राम का वनवास था। सीता और राम का ध्यान करने
से सब रोगों की निवृत्ति तथा स्वर्णिम भगवत्प्रेम प्राप्त होता है। रामचरित सुनकर कापुरुषों में भी शौर्य जाग्रत् होता
है। सर्वव्यापी, सर्वद्रष्टा राम के दर्शनमात्र से सब दोष दूर होते हैं। हनुमान् केसरी के क्षेत्र अञ्जना के गर्भ से उत्पन्न
वातात्मज थे। हर नारी को दुराचारिणी कहनेवाला स्वयं को ही जारज सिद्ध करता है। वनमानव का लेखक श्रुति,
स्मृति और पुराण के प्रमाण बिना सीता के विरुद्ध अनर्गल प्रलाप करनेवाला कुदानव ही है। उसने कलुषित मनो-
वृत्तियों के कारण राम के उपासकों, पूजकों, तथा भक्तों को ठेस पहुँचायी है।
रामचरित्र के सम्बन्ध में वर्तमान इतिहास का चञ्चु-प्रवेश नहीं हो सकता
इस देश में रामायण की घटनाओं की प्रामाणिकता के विषय में निरर्थक विवाद उपस्थित कर अपने को
अधिक लोकप्रिय बनाने का प्रयास चल रहा है। कुछ दिन पहले भारतीय संस्कृति के मूल मन्त्र मर्यादापुरुषोत्तम
भगवान् श्रीराम की लीला के बदले रावणलीला मनाने का अभियान भी चला था। भारतीय बौद्धिक वर्ग ही ने इस
प्रश्न का बौद्धिक स्तर पर उत्तर दिया और वह अभियान बन्द करना पड़ा। अब पुनः डाक्टर सांकलिया एवं उनके
जैसे कुछ नवीन पुरातत्त्वविदों ने रामायण की कतिपय घटनाओं तथा विशिष्ट स्थानों की प्रामाणिकता तथा उनके
सम्बन्ध में नये सूत्रों के अन्वेषण के बाद विवाद उठाया है।
डाक्टर सांकलिया ने वाल्मीकीय रामायण को पूर्ण प्रामाणिक ग्रन्थ माना है। वे उसे महाकाव्य मानते
हैं। परन्तु उसमें वर्णित सेतुबन्धन, हनुमान् द्वारा समुद्र पार गमन, अंगूठी का प्रसङ्ग, लङ्का की स्थिति तथा कुछ
ऐसी ही घटनाओं को वे अप्रामाणिक तथा काल्पनिक मानते हैं। इस सम्बन्ध में उनके तर्क अत्यन्त आधारहीन तथा
परस्परविरोधी ज्ञात होते हैं।
अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७२५
यह नियम है कि जिन वस्तुओं का भाव जिस प्रमाण से सिद्ध होता है उनका अभाव भी उसी प्रमाण से
विदित होता है। जिस प्रकार भूतल में घट का भाव आलोकादि सहकारी सहकृत मन-संयुक्त निर्दोष नेत्र से ही विदित
होता है, उसी प्रकार घटाभाव भी उसी प्रमाण से विदित होता है। यह स्पष्ट है कि जिसके भाव का ज्ञान कर्णेन्द्रिय
से होता है, उसके अभाव का ज्ञान नेत्रेन्द्रिय से नहीं हो सकता। शब्द का ज्ञान कर्णेन्द्रिय से होता है, शब्दाभाव के
ज्ञान के लिए भी कर्णेन्द्रिय की ही आवश्यकता होती है किसी अन्य प्रमाण की नहीं।
प्रकृत में राम, सीता, लक्ष्मण, अयोध्या, लङ्का आदि का ज्ञान आधुनिक प्रत्यक्ष, अनुमान तथा आधुनिक
इतिहास से नहीं हो सकता। रामायण एवं पुराणों के अनुसार राम का प्रादुर्भाव करोड़ों वर्ष पूर्व चौबीसवें त्रेता में
हुआ है। आधुनिक ऐतिहासिक युग एवं प्रागैतिहासिक काल की सम्पूर्ण अवधि विद्वानों ने छह हजार वर्ष के भीतर
ही मानी है। ऐसी स्थिति में राम के चरित्रों के सम्बन्ध में वर्तमान इतिहास का चक्षु-प्रवेश हो ही नहीं सकता।
उस सम्बन्ध में सम्पूर्ण जानकारी अब वाल्मीकीय रामायण से ही प्राप्त हो सकती है।
वाल्मीकिरामायण का अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि रामायण का निर्माण कुछ संवाददाताओं या
टेलीप्रिन्टरों से भेजे गये समाचारों के आधार पर नहीं हुआ। उसका निर्माण महर्षि वाल्मीकि ने समाधिजनित
ऋतम्भरा प्रज्ञा के द्वारा अतीत, अनागत, वर्तमान, स्थूल, सूक्ष्म, सन्निकृष्ट तथा विप्रकृष्ट सभी वस्तुओं का साक्षात्कार
कर के राम, लक्ष्मण, सीता आदि के हसित, भाषित, इङ्गित, चेष्टित आदि सभी व्यापारों का पूर्णरूप से साक्षात्कार
किया। महर्षि वाल्मीकि अलौकिक मुनि थे। वे लौकिक गति और दिव्य गति द्वारा भी सब जगह आ जाकर सब
वस्तुओं का ज्ञान प्राप्त कर सकते थे। अतः सेतुबन्धन और समुद्र आदि के सम्बन्ध में रामायण के वर्णन की उपेक्षा
नहीं की जा सकती। इनके विषय में वाल्मीकिरामायण ही सबसे बड़ा प्रमाण माना जायेगा।
सेतुबन्धन कल्पना नहीं
रामायण में वर्णित रामेश्वर की स्थापना वर्तमान इतिहास से भी प्रमाणित होती है। सहस्राब्दियों से
भारत के कोने-कोने से लोग रामेश्वर का दर्शन करने जाते हैं। गङ्गोत्री से जल लेकर अतिप्राचीन काल से धर्मप्राण
जनता वहाँ चढ़ाने जाती है। धर्मशास्त्र की मान्यता के अनुसार सेतुबन्ध रामेश्वर के दर्शन से ब्रह्महत्याओं के पाप
दूर होते हैं। पुराणों में इन बातों का विशद वर्णन है। कूर्मपुराण पूर्वभाग के इक्कीसवें अध्याय में आये इन श्लोकों से
रामेश्वर की महत्ता तथा प्राचीनता स्पष्ट होती है—
“यत्त्वया स्थापितं लिङ्गं द्रक्ष्यन्तीह द्विजातयः।
महापातकसंयुक्तास्तेषां पापं विनश्यतु ॥ ४९ ॥
अन्यानि चैव पापानि स्नातस्यात्र महोदधौ ।
दर्शनादेव लिङ्गस्य नाशं यान्ति न संशयः ॥ ५० ॥
यावत्स्थास्यन्ति गिरयो यावदेषा च मेदिनी।
यावत्सेतुश्च तावच्च स्थास्याम्यत्र तिरोहितः ॥ ५१ ॥
इसी प्रकार के अन्य वचन स्कन्दपुराण तथा अन्यान्य पुराणों में भी मिलते हैं। इन वचनों तथा मान्य
ग्रन्थों के प्रमाणों के अतिरिक्त रामेश्वर नाम ही रामेश्वर की मूर्ति और मन्दिर का भगवान् राम के साथ असाधारण
सम्बन्ध स्थापित करता है, अतः सेतुबन्ध रामेश्वर की घटना वाल्मीकिरामायण द्वारा वर्णित रामेश्वर से भिन्न वस्तु
नहीं हो सकती।
सेतुनिर्माण की घटना मात्र कल्पना नहीं है। वाल्मीकिरामायण में सेतुनिर्माण की प्रक्रिया का विस्तार से
वर्णन किया गया है। उसका प्रारम्भ, समाप्ति और नाप-जोख सबपर इस रामायण में प्रकाश डाला गया है। वाल्मी-
७२६ रामायणमीमांसा एकविंश
किरामायण के युद्धकाण्ड के २२ वें सर्ग के ५० से ७२ वें श्लोक तक प्रतिदिन कितना निर्माण हुआ, कितने दिनों में
सेतु बनकर तैयार हुआ इसका ब्योरेवार वर्णन किया गया है। पूर्ण सेतु का निर्माण पाँच दिनों में हुआ था। प्रथम
दिन १४ योजन, दूसरे दिन २०, तीसरे दिन २१, चौथे दिन २२ एवं पांचवे दिन २३ योजन के अनुपात से पांच
दिनों में पूर्ण सेतु बन कर तैयार हुआ था। उसकी लम्बाई १०० योजन तथा चौड़ाई १० योजन थी। आधुनिक युग
में विभिन्न देशों में निर्मित अत्यन्त विशाल सेतुओं की उपस्थिति उक्त सेतुबन्धन की घटना को वास्तविक मानने को
बाध्य करती है।
समुद्र-वर्णन तथा दक्षिण भारत की स्थिति
वाल्मीकिरामायण में समुद्र, समुद्र की लहरें, जलजन्तुओं, रत्नों, तटीय वस्तुओं, चन्द्रमा के कारण आने-
वाले समुद्री ज्वारभाटों तथा समुद्र से सम्बद्ध अन्यान्य वस्तुओं का जितना सजीव वर्णन किया गया है, उसका जीवन्त
वर्णन किसी भी ऐसे व्यक्ति के द्वारा सम्भव नहीं है जिसने कभी समुद्र देखा ही न हो। उदाहरण के लिए सुन्दरकाण्ड
के प्रथम सर्ग में हनुमान्जी द्वारा समुद्र-गमन के समय का वर्णन प्रस्तुत है—
“यं यं देशं समुद्रस्य जगाम स महाकपिः।
स तु तस्याङ्गवेगेन सोन्माद इव लक्ष्यते॥६६॥
सागरस्योर्मिजालानाभुरसा शैलवर्ष्मणा।
अभिनंस्तु महावेगः पुप्लुवे स महाकपिः॥६७॥
मेरुमन्दरसंकाशानुद्वमन् (?) स महार्णवे।
अत्यक्रामन्महावेगस्तरङ्गान् गणयन्निव ॥ ७० ॥
तिमिन्नक्रझषाः कूर्मा दृश्यन्ते विवृतास्तदा।
वस्त्रापकर्षणेनेव शरीराणि शरीरिणाम् ॥७२॥
वाल्मीकिरामायण जैसे प्रामाणिक ग्रन्थ में वर्णित वस्तु के विषय में 'अमुक वस्तु अमुक स्थान पर ही रही
होगी' की कल्पना निःसार है। उस रामायण में वर्णित वस्तुओं, घटनाओं एवं स्थानों के विषय में तो निश्चितता है,
परन्तु आधुनिक लोगों द्वारा तथाकथित अन्वेषणों के विषय में तो अनिश्चय की स्थिति बनी ही हुई है। ऐसी स्थिति
में निश्चित प्रमाण को छोड़कर अप्रामाणिक की ओर दौड़ना अन्धकारयुक्त मकान में वस्तुओं को खोजने के लिए प्रयास
करने के समान है। महर्षि वाल्मीकि ने भगवान् राम के समुद्र तक पहुँचने के विभिन्न मार्गों का विशद वर्णन किया
है। आज भी उन्हीं मार्गों से दक्षिण भारत की तीर्थयात्रा होती है। किष्किन्धा में वाली को मारकर राम ने चौमासा
किया था। वह किष्किन्धा दक्षिण भारत में आज भी किष्किन्धा नाम से ही प्रसिद्ध है। वाल्मीकिरामायण में वर्णित
किष्किन्धा की स्थिति को छोड़कर बिना किसी प्रमाण के बेलारी या अन्य किसी स्थान पर उस स्थान की कल्पना
करना वास्तविकता को अस्वीकार करना है। नासिक, पञ्चवटी आदि स्थानों के विषय में भी शङ्काएँ उठायी गयी हैं।
यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि नासिक का सम्बन्ध रामायण की महत्त्वपूर्ण घटना शूर्पणखा के नासिका-छेदन
से है। पञ्चवटी भी वहीं है। रामायण से भी दोनों स्थानों का पास पास होना प्रमाणित होता है। आधुनिक काल
में भी पञ्चवटी और नासिक एक ही स्थान पर हैं। इन स्थानों का वाल्मीकिरामायण के वर्णन से साहचर्य सम्बन्ध
प्रतीत होता है। महाकवि ने रामायण में लगभग दो सौ साठ स्थानों का वर्णन किया है। इनमें से अधिकांश स्थान
आज भी दक्षिण भारत में ही हैं। गोदावरी, कृष्णा, वरदा आदि नदियां, आन्ध्र, चोल, पाण्ड्य, केरल आदि स्थान
दक्षिण भारत में ज्यों के त्यों विद्यमान हैं।
अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७२७
समुद्रसम्बन्धी पर्वतों का वर्णन भी स्वाभाविक ढंग से हुआ है। वे पर्वत आज भी विभिन्न नामों से
विभिन्न रूपों में अवस्थित हैं। वाल्मीकिरामायण में लङ्का जाते समय हनुमान् का महेन्द्र पर्वत किष्किन्धाकाण्ड (सर्ग-
६७ श्लोक ३९) तथा लौटते समय अरिष्ट पर्वत (सुन्दरकाण्ड सर्ग ५६ श्लोक २६) पर चढ़ना बताया गया है।
इसी तरह सुबेल, सह्य, मलय इत्यादि पर्वतों का भी वर्णन किया गया है। इन सब वाल्मीकिरामायण
में वर्णित एवं आधुनिक जगत् में प्रसिद्ध वस्तुओं एवं स्थानों में वाल्मीकिरामायण में वर्णित अर्थ ही प्रमाणित होता
है। अतः यह कहना तथ्यों से विपरीत है कि महर्षि वाल्मीकि को दक्षिण भारत की भौगोलिक स्थिति एवं उसके रीति-
रिवाजों के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। जहाँ तक दक्षिण में शव गाड़ने की प्रथा का प्रश्न है, आधुनिक इतिहास
के आधार पर उसे प्रामाणिक नहीं माना जा सकता। आधुनिक इतिहास मात्र ६ हजार वर्ष पुराना है, जब कि
वाल्मीकिरामायण में वर्णित वाली के शव-दाह की घटना करोड़ों वर्ष पुरानी घटित घटना है। रामायण की संस्कृति
सर्वथा वैदिक संस्कृति है। राम, रावण, वाली इत्यादि वैदिक संस्कृति के व्यक्ति थे। हनुमान्जी भारतीय संस्कृति के
अध्येता थे। वैदिक संस्कृति में 'भस्मान्तं शरीरम्' इत्यादि वेदमन्त्र के अनुसार प्राधान्येन शवदाह का ही समर्थन किया
गया है। अतः वाली एवं रावण के शव-दाह का आदेश देना वैदिक संस्कृति के अनुसार सर्वथा उपयुक्त था। शव को
गाड़ने की कल्पना कथञ्चित् हो तो वह मध्यकाल की बात हो सकती है। इसको दक्षिण भारत का शाश्वतिक धर्म
नहीं माना जा सकता।
उत्तर भारत में भी साधु-सन्यासी, सन्त, महात्मा इत्यादि को जलाया नहीं जाता, उनकी समाधि बनती
है। छोटे एवं असंस्कृत बालकों के शव के साथ भी यही होता है। कहीं कहीं प्लेग इत्यादि की बीमारी में मरे वयस्क
पुरुषों के शव को भी गाड़ा ही जाता है, उन्हें जलाया नहीं जाता है। हमारे यहाँ शवों के सम्बन्ध में सर्वत्र दहन,
खनन एवं प्लावन की परम्परा है। अतः इनमें से किसी मुस्लिमबहुल प्रदेश में कब्रों को देखकर यह निर्विवाद निष्कर्ष
नहीं निकाला जा सकता कि यहाँ केवल कब्र ही बनती रही हैं, उसी प्रकार किसी स्थान विशेष पर शव गाड़ने की
प्रक्रिया को लेकर यह नहीं कहा जा सकता कि वहाँ पर सदा शव गाड़े ही जाते रहे हैं। यह बात तात्कालिक ऐतिहा-
सिक हो सकती है पर शाश्वतिक ऐतिहासिक नहीं है।
जहाँ तक वाल्मीकिरामायण वर्णित स्थानों का प्रश्न है वह अत्यन्त ही महत्त्वपूर्ण है। वानरराज सुग्रीव
ने बन्दरों द्वारा सीता के अन्वेषण के लिए जिन स्थानों का वर्णन किया है वे अत्यन्त सजीव हैं तथा किसी भी अन्वेषण
करनेवाले के लिए महत्त्वपूर्ण सामग्री सिद्ध हो सकते हैं। प्रारम्भ में जो-जो घटनाएँ जिन-जिन स्थानों पर घटित हुई
थीं, लङ्का-विजय के पश्चात् लौटते समय भगवान् राम ने भगवती सीता से उन सभी स्थानों तथा घटनाओं का
वर्णन किया है—
“अत्र पूर्वं महादेवः प्रसादमकरोद् विभुः।
एतन्तु दृश्यते तीर्थं सागरस्य महात्मनः॥ २०॥
सेतुबन्ध इति ख्यातं त्रैलोक्येन च पूजितम्।
एतत्पवित्रं परमं महापातकनाशनम् ॥ २१ ॥”
“एष सेतुर्मया बद्धः सागरे लवणाणर्वे ॥ १६ ॥”
"कैलासशिखराकारे त्रिकूटशिखरे स्थितम्।
लङ्कामीक्षस्व वैदेहि निर्मितां विश्वकर्मणा ॥ ३ ॥”
“यत्र त्वं राक्षसेन्द्रेण रावणेन हृता बलात्।
एषा गोदावरी रम्या प्रसन्नसलिला शुभा ॥४५॥” (वा० रा० ६। सर्ग १२३)
इसी तरह हिरण्यनाम पर्वत १८, किष्किन्धा २२, ऋष्यमूक ३८, पम्पा ४०, पर्णशाला आश्रम ४२-४४,
शबरीमिलन स्थल ४१, अगस्त्य एवं शरभङ्ग मुनियों के आश्रम ४६, चित्रकूट ४९, भरद्वाज आश्रम ५१, शृंगवेरपुर
५२ इत्यादि स्थानों का वर्णन भगवान् राम ने किया है। इस प्रकार स्पष्ट है कि वाल्मीकिरामायण वर्णित स्थान पूर्ण
प्रामाणिक हैं। अभी भी उन स्थानों की उपस्थिति तथा तीर्थ की दृष्टि से उनके महत्त्व पर किसी भी मान्य विद्वान्
ने अपना मतभेद नहीं व्यक्त किया है। डाक्टर सांकलिया ने वाल्मीकिरामायण को पूर्ण प्रामाणिक ग्रन्थ माना है।
फिर उसी ग्रन्थ के किसी अंश को क्यों अप्रामाणिक माना जाय यह तर्क की दृष्टि से समझ में नहीं आता। ऐसा करना
किसी मुर्गी के आधे अङ्ग को पकाकर खा जाने तथा आधे अंग को अण्डा देने के लिए रख छोड़ने की घटना के
समान है।
लंका की स्थिति
ऊपर यह स्पष्ट किया जा चुका है कि रामायण में वर्णित स्थानों के लिए वाल्मीकिरामायण ही सबसे
बड़ा प्रामाणिक ग्रन्थ है। इस रामायण के अनुसार लङ्का समुद्र तट से सौ योजन दूर थी। इन लोगों द्वारा अभी तो
पूर्वी मध्यप्रदेश, दक्षिणी बिहार, पश्चिमी बंगाल एवं छोटा नागपुर के आस-पास लङ्का की स्थिति का निर्धारण करना
है। उसके लिए अभी कोई प्रमाण भी नहीं है। आज भी लङ्का नाम से ही जब प्रसिद्ध द्वीप है तब फिर 'लवका' को
'लङ्का' कहा होगा, यह कहने की आवश्यकता ही क्या है? यह नहीं कहा जा सकता कि लङ्का नाम की कोई
चीज नहीं थी। वर्तमान श्रीलङ्का भी हमारे मत में रावण की लङ्का नहीं है। इस लङ्का का दूसरा नाम
सिलोन भी है। सिंहल के ग्रन्थों में इस सिंहलद्वीप को रावण की लङ्का से विभिन्न बतलाया गया है।
भारतीय पौराणिक भूगोल के अनुसार आज की श्रीलङ्का महाभारत का सिंहलद्वीप ही है। वास्तविकता
यह है कि वाल्मीकिरामायण में वर्णित रावण की लङ्का सर्वसाधारण के लिए आज लुप्त हो गयी है।
वहाँ दीर्घजीवी लोग रहते हैं। वे सामान्य व्यक्तियों द्वारा नहीं देखे जा सकते। आधुनिक भूगोलवेत्ता भी
यह मानते हैं कि सहस्राब्दियों में भूगोल में पर्याप्त परिवर्तन हो जाया करता है। यह मान्यता बहुसम्मत
है कि जहाँ आज हिमालय है वहाँ पहले समुद्र था। स्वयं डाक्टर सांकलिया ने यह माना है कि कुछ टीले
ऐसे रहे होंगे जो इस समय आस्ट्रेलिया की ओर बढ़ गये होंगे। अतः रावण की लङ्का आध्यात्मिक एवं
भौगोलिक दोनों कारणों से ही लुप्त हो गयी है। लङ्का को मध्य प्रदेश अथवा इधर-उधर खोजना एक
व्यर्थ का प्रयास है। वाल्मीकिरामायण की कतिपय घटनाओं को अप्रामाणिक मानने के लिए कुछ भी
ठोस तर्क प्रस्तुत नहीं किये गये हैं।
जहाँ तक रावण की जाति एवं संस्कृति का सम्बन्ध है, वाल्मीकिरामायण के अनुसार वह वैदिक संस्कृति
में दीक्षित कर्मनिष्ठ ब्राह्मण था। वह परम तपस्वी पुलस्त्य का पौत्र तथा विश्रवा मुनि का पुत्र था। आज भी भारत
में पुलस्त्य गोत्र प्रचलित है। इन प्रमाणों के रहते हुए भी उसे दूसरी जाति का व्यक्ति मानने की निराधार कल्पना
करना सर्वथा अनुचित है।
यह सही है कि वाल्मीकिरामायण की कथाएँ युगों से गायी जाती रही हैं। ऐसी स्थिति में यदि उन
कथाओं में प्रमाणविरुद्ध अंश आ जाय तो उसमें कुछ कल्पना का अंश आ सकता है। पर इन कथाओं में ऐसी कोई
प्रमाणविरुद्ध बातें नहीं पायी गयी हैं। इसके विपरीत युगों से प्रचलित इन कथाओं में आश्चर्यजनक रूप से एकरूपता
बनी हुई है। यह तथ्य वाल्मीकिरामायण की प्रामाणिकता के लिए सबसे बड़ा आधार है।
हमारे यहाँ वेदों की आचार्य-परम्परा मानी जाती है। गुरु-शिष्य-सम्प्रदाय-परम्परा से जैसे वेदों की रक्षा
होती रही है, वैसे ही गुरु-शिष्यों की परम्परा से ही रामायण तथा पुराणों की भी रक्षा होती रही है। इसलिए
रामचरितसम्बन्धी लेख ७२९
रामायण में यदि कोई नयी चीज प्रविष्ट हुई तो उसे रामायण का प्रसिद्ध अंश न मानकर क्षेपक की संज्ञा दे दी गयी।
वाल्मीकिरामायण के टीकाकारों ने तत्तत् क्षेपकों को न मानने का हेतु यही आधार बताया कि 'यहाँ सम्प्रदाय-प्राप्त
व्याख्या नहीं है, अतः क्षेपक प्रमाण नहीं माने जा सकते। इसी सम्प्रदाय विशेष के कारण ही वाल्मीकिरामायण
के मौलिक रूप की रक्षा होती रही है। अतः यह कहना ठीक नहीं है कि "वाल्मीकिरामायण की कथाओं में
कालान्तर में व्यापक काटछांट की गयी।" रामायण में महाभारत की चर्चा नहीं है। इधर काव्यों में तथा
कालिदास अश्वघोष प्रभृति कवियों ने भी रामायण की चर्चा की है। बौद्ध जातकों तथा जैन पउमचरियं में
रामायण का वर्णन है। इनके आधार पर ही रामकथाओं के भिन्न रूप बने भी हैं। अनेक विदेशी विद्वानों ने भी
रामकथा के सम्बन्ध में वाल्मीकिरामायण को ही सर्वाधिक प्राचीन एवं प्रामाणिक ग्रन्थ माना है। भारतीय
संस्कृति का सन्देशवाहक यह महान् ग्रन्थ रामकथासागर में युगों से भारतीयों को गोता लगवाकर आज भी प्रत्येक
भारतीय को उसमें गोता लगवाकर उनके जीवन को मानवता के उदात्त आदर्शों के अनुसार जीने की पवित्र प्रेरणा दे
रहा है। ऐसे प्रामाणिक ग्रंथ को छोड़कर निराधार कल्पना के सहारे नयी खोजों का दावा करना बौद्धिकस्तर से नीचे
उतरने की बात है।
आधुनिक लोग वाल्मीकिरामायण के अयोध्या, अरण्य, किष्किन्धा, सुन्दर एवं लङ्का इन पाँच ही काण्डों
को प्रामाणिक मानते हैं, जो सर्वथा अनुचित है। वैसे तो वाल्मीकिरामायण में प्रारम्भ से लेकर अन्त तक सर्वत्र ही
राम को विष्णु का अवतार माना गया है। अतः राम को गुप्तकाल में विष्णु का अवतार कहा गया, यह बात पूर्णतया
गलत है।
उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि वाल्मीकिरामायण की सभी घटनाएँ पूर्ण प्रामाणिक हैं। भारतीय संस्कृति,
परम्परा तथा धार्मिक एवं आध्यात्मिक मूल्यों के मूल रहस्य इसी ग्रन्थ में सुरक्षित हैं। मर्यादापुरुषोत्तम भगवान्
श्रीराम को आधुनिक इतिहास की सीमा में नहीं बाँधा जा सकता। किसी मान्य ग्रन्थ के कुछ अंशों को प्रामाणिक तथा
कुछ को अपनी आधारहीन बातों को सिद्ध न कर सकने की दशा में अप्रामाणिक मानने की दुराग्रही दृष्टि का परित्याग
करना इस समय अत्यावश्यक है। सभी लोगों को धार्मिक तथा आध्यात्मिक ग्रन्थों की बातों को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत
करने के प्रयास से अपने को दूर रखने का प्रयास करना चाहिये।
धार्मिक ग्रन्थों के विषय में ऐसी बातों से तनाव एवं विवाद का वातावरण पैदा हो जाता है। हमें ऐसा
कोई भी कार्य नहीं करना है जिससे इस समय देश में कोई दूसरी समस्या उपस्थित हो। रामायण की घटनाओं के
विषय में धर्माचार्यों का निर्णय ही एकमात्र दिशानिर्देशक होना चाहिये। इस सम्बन्ध में हम सदैव आवश्यक विचार-
विनिमय के लिए तत्पर हैं।
निगमागमसार मानस का प्रत्येक पद पापराशिनाशी एवं अकाट्य
गोस्वामी तुलसीदासजी ने अपने रामचरितमानस में वेद, उपनिषद्, वाल्मीकिरामायण, महाभारत,
पुराणों तथा आगमों, तन्त्रों एवं संहिताओं, धर्मशास्त्रों के अनुसार उत्कृष्ट कोटि के विचारों से परिपूर्ण श्रीराम के
चरित्र को उपस्थापित किया है और बड़ी निर्भीकता से शास्त्रीय सिद्धान्त प्रस्तुत किये हैं।
जीव यद्यपि सर्वेश्वर सर्वशक्तिमान् प्रभु का निर्मल निष्कलङ्क पवित्र अंश ही है—
"ईस्वर अंस जीव अविनासी। चेतन अमल सहज सुखरासी ।।" (रा० मा० ७।११६।१)
तथापि मायापराधीन होने के कारण और अविद्या, काम-कर्मों से उसकी ज्ञान-विज्ञान की परिधि
बहुत सीमित हो जाती है। सच्छास्त्रों एवं सद्गुरुओं की कृपा से ही धर्म-ब्रह्म का प्रबोध होता है। अतः सभी
९२
७२० रामायणमीमांसा एकविंश
आस्तिक सम्प्रदायों ने वेदादि-शास्त्रों के प्रामाण्य का सर्वोत्कृष्ट महत्त्व माना है। वेदादि-शास्त्रों का ही परमसार
श्रीरामचरितमानस है। शास्त्रों का अमुक अंश ही आदरणीय है, अमुक नहीं, यह आस्तिकता नहीं है। वेदादि-
शास्त्रों के महातात्पर्य का विषय 'परब्रह्म' रामचरितमानस के 'राम' हैं। उनका परम-पवित्र चरित्र ही रामचरित-
मानस का वर्णनीय विषय है। राम के सम्बन्ध से ही रावण का भी चरित्र वर्णनीय कोटि में आता है; तभी तो-
“चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम् ।
एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम् ॥”
के अनुसार शतकोटिप्रविस्तर रामायण का एक-एक अक्षर महापातकों को नष्ट करने की सामर्थ्य रखता
है। फलतः रावण के चरित्र का वर्णन भी रामचरित्र का अङ्ग होने के नाते ही पापनाशन में सक्षम है, अतएव
अनुष्ठान में सबका पाठ होता है। श्रीवाल्मीकिरामायण के सभी श्लोक संपुटितरूप से अनुष्ठान में पठनीय होते हैं।
वेदों का प्रत्येक अक्षर सार्थक एवं सप्रयोजन है; यह उत्कृष्ट मीमांसापद्धति से सिद्ध है। ठीक वैसे ही रामचरितमानस
का प्रत्येक अक्षर सार्थक एवं सप्रयोजन है। उसके किसी एक वाक्य को भी निरर्थक या गौण नहीं मानना चाहिये।
वेदादि-शास्त्रों को भगवान् का वाङ्मय विग्रह माना जाता है। महाभारत तथा श्रीभागवत के सम्बन्ध में भी
ऋषियों की वैसी ही धारणा है। भगवान् के वाङ्मय शरीर वेद, रामायण, भारत, भागवत में कोई नयी वस्तु
डाल देना, वैसा ही अनिष्ट होगा, जैसे भगवान् के उपास्य विग्रह में कांटा चुभाना । उसमें से कुछ अंशों को प्रक्षिप्त
कहकर निकाल देना भी वैसा ही अनिष्ट होगा, जैसे भगवान् के विग्रह से किसी अङ्गोपाङ्ग को पृथक् कर देना ।
ठीक उसी तरह रामचरितमानस भी भगवान् श्रीराम का विग्रह है, अतः उसमें नये अंश का सन्निवेश एवं विद्यमान
अंशों का बहिष्कारण भी पूर्वोक्त नीति से अनुचित होगा। रामचरितमानस का नियमित अनुष्ठान होता है। वह आज
का पवित्र धर्म-ग्रन्थ है। अतः उसके किसी अंश को उपेक्षणीय या अपरिपक्व विचार की परिणति नहीं कहा जा
सकता है।
श्रद्धा और अन्धविश्वास में यही अन्तर होता है कि वेदादि-शास्त्रों एवं तदनुसारी गुरुओं के वचन में
विश्वास श्रद्धा है। अप्रामाणिक वस्तुओं में विश्वास अन्ध श्रद्धा है। यह ठीक है कि किसी एक प्रसङ्ग या कुछ
पंक्तियों के आधार पर ही मानस का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता, किन्तु सम्पूर्ण मानस के उपक्रम, उपसंहार
की एकरूपता, अभ्यास, फल, अपूर्वता, अर्थवाद और उपपत्ति का विचारकर उसका निष्कर्ष निकाला जा सकता है,
तो भी उन कुछ पंक्तियों का भी समन्वय करना पड़ेगा। उन्हें उपेक्षणीय नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वह भी
मानस का अङ्ग ही है। उसका भी अनुष्ठान होता है। पर यदि ऐसा न हो सका तो अवश्य ही उन कुछ अंशों एवं
पंक्तियों का दुरुपयोग होगा । मानस वेद, रामायण, महाभारत, पुराण तथा धर्मशास्त्रों के समन्वयात्मक अध्ययन
का ही परिणाम नहीं, किन्तु सम्प्रदायपरम्पराप्राप्त सुनिश्चित परिपक्व सिद्धान्त में परिनिष्ठित, प्रामाणिक अधिकृत
साक्षात् भगवान् शङ्कर और हनुमान्जी महाराज का प्रसादस्वरूप है-
“सपनेहु साचेहु मोहि पर जो हर गौरि पसाउ ।
तौ फुर होउ जो कहउँ सब भाषाभनिति प्रभाउ ॥” ( रा० मा० १।१५)
अतः उसके आधार पर द्वैत, अद्वैत, विशिष्टाद्वैत आदि सिद्धान्तों का विश्लेषण भी अनुचित नहीं, किं
बहुना धर्मनीति, राजनीति तथा व्यवहारों के औचित्य अनौचित्य का विश्लेषण भी अनुचित नहीं।
“ढोल गँवार सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी ॥” ( रा० मा० ५।५८।३ )
वस्तुतः उक्त पंक्ति भी निरर्थक नहीं, वह भी तुलसी-साहित्य की उपेक्षणीय वस्तु नहीं है। वह बटलोई
के किसी कोने के कच्चे चावल के एक कण के समान नहीं है। यदि बटलोई के सब चावल पके हैं, तो एक चावल
के कच्चे रहने का प्रश्न ही नहीं उठता है। प्रकृत पंक्ति का स्पष्ट अर्थ यही था कि गँवार समुद्र से भगवान् राम ने
नम्रतापूर्वक लङ्का जाने का मार्ग माँगा था, पर समुद्र पर उसका कोई असर नहीं पड़ा। जब राम ने धनुष उठाकर
शर-सन्धान किया, तब वह विनम्र होकर सामने आया और काम की बात करने लगा। अतः ऐसे स्थलों पर विनम्रता
व्यर्थ होती है। वहाँ शर-सन्धान ही लाभदायक होता है। उस प्रसङ्ग में समुद्र ने ही गँवार आदि की बात कही,
परन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि सभी गँवारों, ढोलों, पशुओं तथा नारियों को ताड़ना देते रहना चाहिये। ढोल को
निरर्थक कौन ताड़ता है—जहाँ दूसरे वाद्यों से स्वर मिलाना होता है वहीं हथौड़ी से ठोंक-ठोंक कर ढोल, तबला
या मृदङ्ग का स्वर मिलाया जाता है। निरर्थक कोई भी ढोल को नहीं ठोंकता है। पशु का भी कोई सदा ताड़न
नहीं करता है, किन्तु जब बैल को हल में या गाड़ी में चलाना होता है तब शिक्षा के लिये उसकी ताड़ना भी अपेक्षित
होती है। इतना ही क्यों ? भारतीय परम्परा में तो उपाध्याय (अध्यापक) अपने छात्रों को भी चपेटिका प्रदान
करता है। वह भी उसके हित के ही लिए, अहित के लिए नहीं। उसका प्रमाद तथा असावधानी मिटाने के लिए।
इसी तरह कभी नारी की भी ताड़ना अपेक्षित होती है। बृहदारण्यक उपनिषद् में उल्लेख है कि स्त्री को भूषण-वसन
देकर प्रसन्न कर के काम लेना चाहिये। यदि कभी उससे अनुकूल न हो तो उसे ताड़न कर के भी अनुकूल
बनाना चाहिये—
“सा चेदस्मै न दद्यात् काममेनामवक्रीणीयात् सा चेदस्मै नैव दद्यात् काममेनां यष्ट्या वा
पाणिना वोपहत्यातिक्रामेदिन्द्रियेण ते यशसा यश आदद इत्ययशा एव भवति ।” (बृ० उ० ६।४।७)
अतः पति परिस्थिति विशेष में ताड़न कर सकता है, वैसा ताड़न स्त्री को अभीष्ट होता है। वह उसे बुरा
नहीं मानती। किसी ने तो यह भी कहा है कि जो पति कभी ताड़न नहीं करता, स्त्री उससे सन्तुष्ट नहीं होती है।
ताड़न और प्यार दोनों अपेक्षित हैं :
“कबहुँ न हँसि कर कर गह्यो कबहुँ न रिसि कर केस।
का कन्ता के घर रहे का भयो गये विदेस ॥”
जो पति कभी प्यार नहीं करता और कभी क्रोध नहीं करता, वह स्त्री की दृष्टि में उपयुक्त पति होने का
अधिकारी ही नहीं है। शास्त्रों की दृष्टि से बालकों का ताड़न विदित है—
“लालयेत् पञ्च वर्षाणि दश वर्षाणि ताडयेत्।
प्राप्ते तु षोडशे वर्षे पुत्रं मित्रवदाचरेत् ॥”
प्रथम पाँच वर्ष तक बालक का लालन करना चाहिये और दस वर्ष तक ताड़न करके उसे शिक्षित करना
चाहिये। सोलहवें वर्ष से पुत्र के साथ मित्र का सा व्यवहार करना चाहिये। इसी प्रकार शास्त्रानुसार स्त्रियों का
विवाह ही उपनयन है—
“वैवाहिको विधिः स्त्रीणामौपनायनिकः स्मृतः।
पतिसेवा गुरौ वासः गृहार्थोऽग्निपरिक्रिया ॥” (मनु० २।६७)
पति-कुलवास ही उनका गुरुकुलवास है। पतिसेवा ही गुरुशुश्रूषा है। शास्त्रानुसार रजोदर्शन के प्रथम ही
उपनयनकाल में ही यह सब होना चाहिये। वह बाल्यावस्था ही होती है। उनका शिक्षण पति के द्वारा ही होता है।
अतः जैसे माता-पिता तथा गुरु बालक का, सुशिक्षा के लिए ही, ताड़न करते हैं। उसी तरह पति भी सुशिक्षा के लिए
स्त्री का ताड़न करता है। जैसे कोई बालकों का भी निरर्थक ताड़न नहीं करता, उसी तरह स्त्री का भी ताड़न
निरर्थक नहीं। किन्तु शिक्षा की दृष्टि से आवश्यक होने पर ही उनका ताड़न विहित है। इसके अतिरिक्त एक ताड़न
७३२ रामायणमीमांसा एकविंश
शृङ्गाररस का अनिवार्य अङ्ग है। उसकी विशेष जानकारी "ऋग्वेद" के उर्वशी-पुरूरवा-संवाद से प्राप्त करनी
चाहिये। जिस ताड़न को उर्वशी ने शर्त के रूप में रखा था।
ताड़न शब्द का प्रयोग केवल मारना, पीटना ही नहीं है, अनुशासन और डांटना भी ताड़न है। प्रकृत में
भी भिन्न भिन्न पात्रों में ताड़न एक जैसा नहीं कहा जा सकता है। ढोल के ताड़न का अर्थ हाथ से या हथोड़ी से स्वर
मिलाना या कपड़ा लपेटे हुए छोटे काष्ठ के डण्डे से बजाना। गँवार का भी अर्थ अज्ञ होता है। शूद्र का भी अर्थ
अशिक्षित शूद्र है। उसके ताड़न का अर्थ है। उसे शिक्षित करना। वैसे तुलसीदासजी ने निषाद, चित्रकूट के कोल,
भिल्ल, किरातों का भी गुण-गान किया है, जो कि शूद्र से भी निकृष्ट कोटि के माने जाते थे। जिनकी छाया के स्पर्श
से भी जल-प्रोक्षण किया जाता है—
"जासु छाँह छुइ लेइय सींचा।" (रा० मा० २।१९२।२)
घोड़ा, बैल आदि पशु यदि ठीक नहीं चलते हैं तो उनका छोटे हल्के डण्डे या चाबुक आदि से भी ताड़न
किया जाता है या शिक्षण के लिए भी कुछ ताड़न करना पड़ता है। अतः पाँचों के लिए एक प्रकार का ताड़न नहीं
हो सकता।
उक्त सन्दर्भ में यह भी नहीं भूलना चाहिये कि श्रोतुलसीदासजी ने मानस में नारी-जाति के बहुत अधिक
सम्मान का वर्णन किया है—
“जो केवल पितु आयसु ताता।
तौ जनि जाहु जानि बड़ि माता।।” (रा० मा० २।५५।१)
अर्थात् यदि केवल पिता की आज्ञा है वन जाने की, तो माता को बड़ी मान कर तुम मुझ माता के आज्ञा-
नुसार वन मत जाओ। यह मनुजी की उस उक्ति के अनुसार कहा गया है जिसमें उन्होंने पिता से सहस्रगुना माता का
सम्मान करना कहा है—
“सहस्रं तु पितृन् माता गौरवेणातिरिच्यते।” (मनु० २।१४५)
भगवती सुनयना, सुमित्रा, अनसूया, सीताजी आदि नारियों के सम्बन्ध में उन्होंने बहुत कुछ कहा ही है।
अरण्यकाण्ड में श्रीराम-नारद-संवाद में जो स्त्री-दोष का वर्णन है, वह शुद्ध वैराग्य के लिए ही और वह पुरुषों का भी
उपलक्षण है। जैसे पुरुषों को परस्त्रियों से रागनिवृत्ति के लिए दुष्ट स्त्रियों का दोषानुसन्धान करके सावधान रहना
चाहिये, उसी प्रकार स्त्रियों को दुष्ट पुरुषों का दोष जानकर सावधान हो स्वधर्म-निष्ठ होना चाहिये। इसी प्रकार
मानस के प्रत्येक प्रसङ्ग को देश, काल, पात्र और परिस्थिति के सन्दर्भ में देखते हुए विचार करना चाहिये; तभी
निर्णय में सुगमता सिद्ध होगी।
महाभारत केवल इतिवृत्त ही नहीं ज्ञानमय प्रदीप है
कहा जाता है कि "इतिहास यथार्थ घटना का वर्णन करता है, पर इससे व्यासजी को सन्तोष नहीं हुआ।
इतिहास से राग-द्वेष ही बढ़ता है। एक-एक समाज या राष्ट्र इतिहास के कारण दुश्मन बन जाते हैं। उस राग-द्वेष
की आँधी में पड़ी हुई नाव से किसी लक्ष्य पर नहीं पहुँचा जा सकता। अतः नारदजी के उपदेश से व्यासजी ने भावा-
त्मक भक्ति का आश्रयण किया और सन्तुष्ट हुए। अतः जैसे शवच्छेदन के निष्कर्ष लेखरूप में उपयुक्त हो सकते हैं,
पर उनका प्रदर्शन वीभत्स ही दृश्य उपस्थित करता है, उसी तरह इतिहास का निष्कर्ष लाभदायक हो सकता है,
परन्तु स्वयं में वह बीभत्स ही होगा।"
अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७३३
कहना न होगा कि उक्त विचार भ्रामक एवं भ्रमपूर्ण हैं। वस्तुतः महाभारत कोरा इतिहास नहीं है, किन्तु
महाभारत के ब्याज से भगवान् व्यास ने वेदार्थ प्रदर्शित किया है—
"भारतव्यपदेशेन ह्याम्नायार्थश्च दर्शितः ।" (भाग० पृ० १।४।३०)
वस्तुतः रामायण, महाभारत एवं अष्टादश पुराण वेदों के आर्ष भाष्य ही हैं। इतिहास पुरानी घटनाओं
का दोहराना मात्र नहीं है, क्योंकि वैसा करना गड़े मुर्दों को उखाड़ने के अतिरिक्त और कुछ न होगा, किन्तु उन्हीं
घटनाओं एवं व्यक्तियों का उल्लेख इतिहास कहा जा सकता है जिनके स्मरण से समाज को धार्मिक, आध्यात्मिक,
सामाजिक तथा राजनीतिक क्षेत्र में कुछ सबक सीखने को मिलता हो। इसी लिए तो हरएक घटना ऐतिहासिक घटना
नहीं होती और न हरएक व्यक्ति ऐतिहासिक व्यक्ति होता है। वैसा होना सम्भव भी नहीं है। नगरपालिका में नगर
में उत्पन्न होनेवाले और मरनेवाले मनुष्यों का उल्लेख होता है, परन्तु नगर में कितने मच्छर उत्पन्न हुए या मरे
इसका लेखा-जोखा नहीं होता। क्योंकि वैसा करना संभव नहीं है और सार्थक भी नहीं। ठीक इसी तरह सभी
मनुष्यों एवं घटनाओं का इतिहास में उल्लेख नहीं होता है, क्योंकि वैसा सम्भव नहीं और न उससे लाभ ही संभव
हैं। यदि संसार भर के एक-एक साल का इतिहास एक ही पन्ने में रखा जाय तो भी आधुनिक ऐतिहासिकों की
दृष्टि में सारी दुनियां ६-७ हजार वर्षों की है, परन्तु भारतीय शास्त्रों के अनुसार कुछ कम दो अरब वर्षों की सृष्टि है।
सुतरां दो अरब पन्नों का संक्षिप्त इतिहास होगा। फिर उसे कितने दिनों में कौन पढ़ेगा, कब निष्कर्ष निकालेगा और
कब उससे सबक सीखेगा ? ऐसी स्थिति में भारतीय दृष्टिकोण के अनुसार महत्वपूर्ण व्यक्तियों के प्रसङ्ग से धर्म, अर्थ,
काम और मोक्ष का प्रतिपादन करना ही इतिहास है। अतएव महाभारत में विस्तृत रूप से धर्म, अर्थ, नीति, काम,
मोक्ष आदि का वर्णन है। गीता भी उसी का महत्वपूर्ण अंश है। फिर भी नारदजी का अभिप्राय यह था कि भगवान्
के गुणों का वर्णन करने में ही अधिक शक्ति लगानी उचित है। इसी अभिप्राय से शुकदेवजी ने भी कहा कि मैंने जो
बड़े-बड़े यशस्वी राजाओं का वर्णन किया है वह विज्ञान-वैराग्य के लिए ही है। उनके वर्णन में कुछ तात्पर्य नहीं है,
परन्तु जो उत्तमश्लोक भगवान् के गुणों का वर्णन है उसी का श्रवण करना उचित है वही अमूल्य धन है और
उसी से भगवान् में भक्ति हो सकती है। इतिहास सबक सिखानेवाली वस्तु है। पूर्वजों के महत्त्वपूर्ण वृत्तान्तों से शुभ
कर्मों के लिए प्रोत्साहन मिलता है और विविध विषयों की शिक्षा मिलती है :
"कथा इमास्ते कथिता महीयसां विताय लोकेषु यशः परेयुषाम् ।
विज्ञान-वैराग्य-विवक्षया विभो वचोविभूतीर्न तु पारमार्थ्यम् ॥
यस्तूत्तमश्लोकगुणानुवादः संगीयतेऽभीक्ष्णममङ्गलघ्नः ।
तमेव नित्यं शृणुयादभीक्ष्णं कृष्णेऽमलां भक्तिमभीप्समानः ॥" (भाग० १२।३।१४,१५)
यह आप मानते हैं कि भगवान् व्यास सच्चे इतिहासकार एवं अपने विषय में तथा अपने पात्रों के सम्बन्ध
में निष्पक्ष सत्य वर्णन करने में सर्वाग्रणी हैं। यह भी मानते हैं कि यह एकदम सही हैं—
"यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न कुत्रचित् ॥"
कहा जाता है—"इतनी उत्कृष्ट रचना के बाद भी व्यास का असन्तोष एक प्रश्नचिह्न बनकर सामने
आ जाता है। वह असन्तोष जिसका अनुभव प्रत्येक यथार्थवादी इतिहासकार कर सकता है। प्रश्न यह है कि इतिहास
व्यक्ति और समाज को क्या देता है ? स्वयं इतिहासकार की उपलब्धि क्या है ? जो लोग यथार्थ का उद्देश्य केवल
यथार्थ ही मानते हैं, वे केवल इस गर्वमात्र से सन्तुष्ट हो सकते हैं, या उसका तात्त्विक समर्थन कर सकते हैं कि
उन्होंने सत्य को बिना किसी आवरण के उपस्थित किया है। किन्तु यह तो बौद्धिक विवाद में विजयी बनने का एक
कौशल है। विश्व के इतिहास में बड़ा से बड़ा यथार्थवादी भी जीवन को सर्वथा नग्नरूप में नहीं जी सकता है। उसे यह
७३४ रामायणमीमांसा एकविंश
सत्य ज्ञात होता है कि सर्वथा यथार्थ में जीना असम्भव है। इसी लिए वे स्वयं तो आवरण में ही जीते हैं। वस्त्र,
भोजन, भाषण इन सबको परिवर्तन के आवरण से आवृत्त करके ही व्यक्ति जीवन को जीने योग्य बनाता है। यथार्थ-
वाद के प्रति उसका आग्रह केवल बौद्धिक गोष्ठियों में विवाद के लिए ही दिखायी देता है। वह एक चतुर व्यापारी
की भाँति यथार्थवाद को दूसरों के हाथ में बेचकर स्वयं के लिए सुख-सुविधा की सामग्री एकत्र करता है।"
यदि उक्त वक्ता को इतिहास और उसके यथार्थवाद का यही स्वरूप इष्ट है, तो स्पष्ट है कि उसने दोनों बातों
को नहीं समझा और उसका यह कहना गलत है कि कृष्णद्वैपायन व्यास को सच्चे इतिहासकार के रूप में ही देखना
चाहिये, क्योंकि इतिहासकार होने के साथ-साथ वे महान् दार्शनिक और महान् योगी भी थे। उन्होंने "गीता" जैसी
वस्तु भी संसार को प्रदान की है, जिससे सारा संसार उपकृत है। उत्कृष्ट कोटि का नीतिशास्त्र और अर्थशास्त्र एवं
धर्मशास्त्र प्रदान किया हैं। मोक्षधर्म द्वारा उत्कृष्ट ज्ञान-विज्ञान का भी वर्णन किया हैं। ब्रह्मसूत्र जैसे वेदान्तदर्शन
द्वारा उन्होंने औपनिषद ब्रह्म के अपरोक्ष स्वरूपसाक्षात्कार का प्रकार और विधान भी बताया है। वे स्वयं साधक ही
नहीं सिद्ध भी थे। फिर उनकी तुलना, उन इतिहासकारों से कैसे की जा सकती है, जो "चतुर व्यापारी की भाँति
यथार्थवाद को दूसरों के हाथ बेचकर स्वयं के लिए सुख-सुविधाओं की सामग्री एकत्र करते हैं।" महाभारत एवं
अन्य पुराणों की दृष्टि से ही नहीं, श्रीमद्भागवत की दृष्टि से भी महर्षि व्यास ऋतम्भरा प्रज्ञासम्पन्न महान् योगी थे ।
देवर्षि नारद से उन्होंने स्वयं कहा था—
“परावरे ब्रह्मणि धर्मतो व्रतैः स्नातस्य मे न्यूनमलं विचक्ष्व ।” ( भाग० १।५।९ )
धर्मानुष्ठानों एवं व्रतों के द्वारा परावर ब्रह्म में मैंने अवगाहन किया है, फिर भी मुझे सन्तोष नहीं है।
मेरी इस न्यूनता का जो कारण हो, वह आप कहिये। इसपर नारदजी ने यही कहा कि आपके असन्तोष का
कारण यह है कि आपने धर्म आदि अर्थों का जितने विस्तार से वर्णन किया है, वैसा भगवान् की महिमा का वर्णन
नहीं किया—
“यथा धर्मादयश्चार्था मुनिवर्यानुकीर्तिताः ।
न तथा वासुदेवस्य महिमा ह्यनुवर्णितः ॥” ( भाग० १।५।९ )
इसी कारण नारदजी ने विस्तृत वर्णन किया है— चाहे कितने ही चित्र-पद वाक्य क्यों न हों अगर
उनमें श्रीहरि के यश का वर्णन नहीं है तो वे वायसतीर्थमात्र हैं, और जिन काव्यों में भगवान् के यशोङ्कित नामों
का वर्णन हो, वे भले असम्बद्ध हों तो भी सज्जन उनका सादर श्रवण, वर्णन और गान करते हैं। भगवत्प्रेमवर्जित
नैष्कर्म्य ब्रह्मात्मसाक्षात्कारात्मक ज्ञान भी शोभित नहीं होता । फिर भला भगवत्प्रेम के बिना कर्म का क्या महत्त्व हो
सकता है ? श्रीनारदजी स्वयं भगवान् व्यास को सामान्य इतिहासकार न मानते हुए कहते हैं—
“अथो महाभाग भवानमोघदृक् शुचिश्रवाः सत्यरतो धृतव्रतः ।
उरुक्रमस्याखिलबन्धमुक्तये समाधिनानुस्मर तद्विचेष्टितम् ॥” (भाग० १।५।१३)
अर्थात् हे महाभाग व्यासजी ! आपकी दृष्टि अमोघ है, आपकी कीर्ति पवित्र है। आप सत्यरत एवं धृतव्रत
हैं। आप सम्पूर्ण जीवों की बन्ध से मुक्ति के लिए समाधि द्वारा भगवान् की दिव्य लीलाओं का स्मरण करें और
उनका वर्णन करें ।
क्या अन्य इतिहासकार भी व्यास के समान सत्यरत, धृतव्रत एवं अमोघदृक् हैं ? अन्त में व्यासजी ने
भक्तियोग में समाहित हो निर्मल अन्तःकरण से साक्षात् परम पुरुष और माया, जीव तथा भक्ति का प्रत्यक्ष अनुभव
किया और श्रीभागवतसंहिता की रचना की ।
अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७१५
"तस्मिन् स्व आश्रमे व्यासो बदरीखण्डमण्डिते ।
आसीनोऽप उपस्पृश्य प्रणिदध्यौ मनः स्वयम् ॥
भक्तियोगेन मनसि सम्यक्प्रणिहितेऽमले ।
अपश्यत् पुरुषं पूर्वं मायां च तदपाश्रयाम् !!" ( भाग० १।७।३,४ )
इस दृष्टि से भगवान् व्यास की तुलना सामान्य इतिहासकारों से करना अन्याय ही है । भारतीय दृष्टिकोण
से तो व्यास भगवान् चौबीस अवतारों में एक हैं ।
यह भी कहना गलत है कि "व्यास स्वयं को सत्यनिष्ठ मानकर ही ऐसे इतिहास का सृजन करते हैं ।
किन्तु वह सत्यनिष्ठा उन्हें सन्तुष्ट नहीं कर पाती ।" क्योंकि ऐसे वचनों का अभिप्राय आप जैसे लोग समझ नहीं पाते ।
सत्य एक महान् धर्म है । शास्त्रों ने कहा है कि तराजू पर एक तरफ एक सत्य रखो और दूसरी तरफ हजारों अश्वमेध
रखो, पर हजार अश्वमेधों से एक सत्य ही उत्कृष्ट होगा । प्रकृत में तो भगवद्गुणवर्णन और श्रवण के बिना, भगवद्-
भक्ति के बिना केवल अन्य साधन धर्मों से उतनी सफलता नहीं मिलती, जितनी भक्तियुक्त कर्मों से मिलती है । इसको
यों समझना चाहिये कि—
"राम नाम एक अङ्क है, सब साधन हैं सून ।
अङ्क गये कछु हाथ नहिं, अङ्क रहे दस गून ॥"
रामनाम अङ्क के तुल्य है और साधन शून्य के समान हैं, फिर भी शून्य व्यर्थ नहीं । हाँ, अङ्क के न
रहने पर शून्य का कोई महत्त्व नहीं है । परन्तु अङ्क के रहने पर उनका अत्यन्त महत्त्व है । एक अङ्क के सामने
एक शून्य बना देने पर वही एक १० हो जाता है । दो शून्य हों तो वही एक १०० हो जाता है । यह बात ठीक है
कि अङ्क न रहने पर लाखों शून्य बेकार होते हैं । परन्तु यदि किसी को १० अरब रुपया मिलने का सरकारी
आर्डर हुआ हो और उसमें से शून्य सब हटा दिये जायें, तो १० अरब रुपयों के बदले एक ही रुपया मिलेगा । इस
दृष्टि से सत्य आदि का परमोत्कृष्ट महत्त्व है । भगवच्चरित्र के वर्णन, श्रवण और कथन करने की दृष्टि से ही व्यासजी
का वह असन्तोष कहा गया है । साथ ही दूसरी तरफ देखें, यदि कोई भगवद्गुण वर्णन और श्रवण करता हो और
वह असत्यनिष्ठ हो तो कोई समझदार उसे भक्त कहेगा क्या ? लोक-परलोक सब जगह सत्य से ही सब फल मिलते
हैं । भगवच्चरित्र भी सत्य होने से ही आदरणीय है । यदि कोई झूठी कथा का वर्णन करे, तो वह असत्य में ही
पर्यवसित होगी । इसी लिए महर्षि वाल्मीकि ने समाधि के द्वारा सत्य अबाधित चरित्रों का प्रत्यक्ष कर के वर्णन किया
है । आज भी यदि जनता को विदित हो कि वक्ताजी बिना प्रमाण की सब काल्पनिक कथाएँ कहते हैं तो उसपर किसी
भी समझदार की श्रद्धा नहीं होगी । भगवत्कथा के सम्बन्ध में भी सत्यता अपेक्षित है । अन्यथा उपन्यास और गल्प
के तुल्य भगवत्कथा भी एक विनोद की वस्तु बन जायगी ।
यह कहना भी गलत है कि "केवल व्यक्तियों के राग, द्वेष, संघर्ष, गुण, अवगुण की व्याख्या ही तो
इतिहास है" क्योंकि भारतीय दृष्टिकोण से इतिहास में किन्हीं विशेष व्यक्तियों के जीवन की घटनाओं के प्रसङ्ग से
धर्म, उपासना और तत्त्वज्ञान का ही प्रतिपादन होता है । शुक्र के अनुसार राजचरित्र के वर्णन प्रसङ्ग से प्राग्वृत्त का
कथन इतिहास है—
"प्राग्वृत्तकथनं चैकराज्यवृत्तमिशादितः ।
यस्मिन् स इतिहासः स्यात् पुरावृत्तः स एव हि ॥" ( शुक्रनीति ४।२९३ )
काव्यमीमांसा के अनुसार धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के उपदेशों से समन्वित कथायुक्त पूर्ववृत्त का वर्णन
इतिहास है—