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सर्वकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 800

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७२३
( २५ ) सीता ने राम को नहीं रावण को चाहा २६७–२८५
( २६ ) सीता ने विवश होकर राम को वरा २७१–२७२
( २७ ) सीता को एक पुरुष से बँधना पसन्द नहीं था २७२–२७८
( २८ ) सीता की माँ निर्धन राम को पुत्री देने से दुःखी २८२
( २९ ) सीता किसी की सगी न थी १४२
( ३० ) ऋषि लोग गोमांस खाते थे १४२
( ३१ ) ब्रह्म-भोज में ब्राह्मण मनुष्य-शव खाते थे १३६
अशोकवासिनी द्वितीय खण्ड में
( १ ) भरत की माँ ऋषि से सहवास करने वन में गयी १५
( २ ) सीता निषादराज के साथ जाने को तय्यार थी ३१
( ३ ) सीता हिस्टीरिया से पीड़ित थी ४२
( ४ ) सीता का स्वर्णप्रेम ४६ — ५३
( ५ ) राम नपुंसक थे ५६
( ६ ) सीता लङ्का जाने को उत्सुक थी ५६ — ५७
( ७ ) लक्ष्मण सीता पर आसक्त थे ५६ — ५७
( ८ ) राम रिश्वत के द्वार खोल गये ९८
( ९ ) हनुमान् बलात्कार से उत्पन्न १३६
( १० ) हनुमान् ठेट बन्दर
( ११ ) लंका में अनेक राक्षसियों से रमण किया अनेक जारज पुत्र
उत्पन्न किये ।
( १२ ) सीता का रावणप्रेम व रामवियोग का नाटक । हर नर नारी
दुराचारिणी ।
उक्त कथन — “मुखमस्तीति वक्तव्यं दशहस्ता हरीतकी ।” न्याय के अनुसार निष्प्रमाण प्रलाप ही कहा
जायगा । राम सीता कब हुए और क्या प्रमाण हैं । इस विषय में प्रत्यक्ष और अनुमान की प्रवृत्ति नहीं होती, क्योंकि
प्रत्यक्ष से विद्यमान का ही बोध होता है और अनुमान भी लिङ्गलिङ्गिभाव, गम्यगमक, व्याप्यव्यापक सम्बन्धग्रह से
ही होता है । यद्यपि आध्यात्मिक एवं आधिदैविक रूप से राम और राम की लीलाएँ आज भी विद्यमान हैं । पर
बहिर्मुखों के लिए उनका अनुभव असम्भव ही है । ऐतिहासिकरूप से राम आधुनिक इतिहास के अविषय ही हैं । वेद,
उपनिषद्, रामायण, महाभारत तथा पुराणों, तन्त्रों और आगमों से ही राम, सीता, लक्ष्मण, रावण एवं उनके चरित्रों
का बोध हो सकता है । इन सद्ग्रन्थों से सीता, राम, लक्ष्मण का अत्यन्त पवित्र श्रौतस्मार्त धर्मों के अनुसार ही चरित्र
है । वनमानव काव्याभास के द्वारा वर्णित दोष वेदादिप्रमाणों से सिद्ध नहीं हैं। निराधार एवं निष्प्रमाण ही कुछ
कहना है तो कोई भी वनमानव एवं उसके लेखक को ही महापातकी, दुराचारी, वर्णसङ्कर, प्रतिलोम अन्त्यावसायी,
षण्ढ, अभक्ष्यभक्षी, अपेयपायी आदि कुछ भी कह सकता है। वाल्मीकिरामायण, रघुवंश आदि काव्यों के द्वारा
तो श्रीराम मर्यादापुरुषोत्तम, महान् योद्धा, पराक्रमी, परब्रह्म परमेश्वर विष्णु के अवतार हैं, लक्ष्मी अनन्त ब्रह्माण्डों
की जननी ऐश्वर्य-माधुर्य की अधिष्ठात्री सीता हैं । शेष कारण ब्रह्म अनन्त शेष हैं । पतिपरायणा सीता को विरोहिणी
लिखना लेखक की मूर्खता ही है । जल तथा तरङ्ग, चन्द्र-चन्द्रिका, भानु और प्रभा, अमृत और मधुरिमा के समान