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सर्वकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 808, कुल 1049 में से

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पृष्ठ 808

के कच्चे रहने का प्रश्न ही नहीं उठता है। प्रकृत पंक्ति का स्पष्ट अर्थ यही था कि गँवार समुद्र से भगवान् राम ने
नम्रतापूर्वक लङ्का जाने का मार्ग माँगा था, पर समुद्र पर उसका कोई असर नहीं पड़ा। जब राम ने धनुष उठाकर
शर-सन्धान किया, तब वह विनम्र होकर सामने आया और काम की बात करने लगा। अतः ऐसे स्थलों पर विनम्रता
व्यर्थ होती है। वहाँ शर-सन्धान ही लाभदायक होता है। उस प्रसङ्ग में समुद्र ने ही गँवार आदि की बात कही,
परन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि सभी गँवारों, ढोलों, पशुओं तथा नारियों को ताड़ना देते रहना चाहिये। ढोल को
निरर्थक कौन ताड़ता है—जहाँ दूसरे वाद्यों से स्वर मिलाना होता है वहीं हथौड़ी से ठोंक-ठोंक कर ढोल, तबला
या मृदङ्ग का स्वर मिलाया जाता है। निरर्थक कोई भी ढोल को नहीं ठोंकता है। पशु का भी कोई सदा ताड़न
नहीं करता है, किन्तु जब बैल को हल में या गाड़ी में चलाना होता है तब शिक्षा के लिये उसकी ताड़ना भी अपेक्षित
होती है। इतना ही क्यों ? भारतीय परम्परा में तो उपाध्याय (अध्यापक) अपने छात्रों को भी चपेटिका प्रदान
करता है। वह भी उसके हित के ही लिए, अहित के लिए नहीं। उसका प्रमाद तथा असावधानी मिटाने के लिए।
इसी तरह कभी नारी की भी ताड़ना अपेक्षित होती है। बृहदारण्यक उपनिषद् में उल्लेख है कि स्त्री को भूषण-वसन
देकर प्रसन्न कर के काम लेना चाहिये। यदि कभी उससे अनुकूल न हो तो उसे ताड़न कर के भी अनुकूल
बनाना चाहिये—
“सा चेदस्मै न दद्यात् काममेनामवक्रीणीयात् सा चेदस्मै नैव दद्यात् काममेनां यष्ट्या वा
पाणिना वोपहत्यातिक्रामेदिन्द्रियेण ते यशसा यश आदद इत्ययशा एव भवति ।” (बृ० उ० ६।४।७)
अतः पति परिस्थिति विशेष में ताड़न कर सकता है, वैसा ताड़न स्त्री को अभीष्ट होता है। वह उसे बुरा
नहीं मानती। किसी ने तो यह भी कहा है कि जो पति कभी ताड़न नहीं करता, स्त्री उससे सन्तुष्ट नहीं होती है।
ताड़न और प्यार दोनों अपेक्षित हैं :
“कबहुँ न हँसि कर कर गह्यो कबहुँ न रिसि कर केस।
का कन्ता के घर रहे का भयो गये विदेस ॥”
जो पति कभी प्यार नहीं करता और कभी क्रोध नहीं करता, वह स्त्री की दृष्टि में उपयुक्त पति होने का
अधिकारी ही नहीं है। शास्त्रों की दृष्टि से बालकों का ताड़न विदित है—
“लालयेत् पञ्च वर्षाणि दश वर्षाणि ताडयेत्।
प्राप्ते तु षोडशे वर्षे पुत्रं मित्रवदाचरेत् ॥”
प्रथम पाँच वर्ष तक बालक का लालन करना चाहिये और दस वर्ष तक ताड़न करके उसे शिक्षित करना
चाहिये। सोलहवें वर्ष से पुत्र के साथ मित्र का सा व्यवहार करना चाहिये। इसी प्रकार शास्त्रानुसार स्त्रियों का
विवाह ही उपनयन है—
“वैवाहिको विधिः स्त्रीणामौपनायनिकः स्मृतः।
पतिसेवा गुरौ वासः गृहार्थोऽग्निपरिक्रिया ॥” (मनु० २।६७)
पति-कुलवास ही उनका गुरुकुलवास है। पतिसेवा ही गुरुशुश्रूषा है। शास्त्रानुसार रजोदर्शन के प्रथम ही
उपनयनकाल में ही यह सब होना चाहिये। वह बाल्यावस्था ही होती है। उनका शिक्षण पति के द्वारा ही होता है।
अतः जैसे माता-पिता तथा गुरु बालक का, सुशिक्षा के लिए ही, ताड़न करते हैं। उसी तरह पति भी सुशिक्षा के लिए
स्त्री का ताड़न करता है। जैसे कोई बालकों का भी निरर्थक ताड़न नहीं करता, उसी तरह स्त्री का भी ताड़न
निरर्थक नहीं। किन्तु शिक्षा की दृष्टि से आवश्यक होने पर ही उनका ताड़न विहित है। इसके अतिरिक्त एक ताड़न