रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 809, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ें७३२ रामायणमीमांसा एकविंश
शृङ्गाररस का अनिवार्य अङ्ग है। उसकी विशेष जानकारी "ऋग्वेद" के उर्वशी-पुरूरवा-संवाद से प्राप्त करनी
चाहिये। जिस ताड़न को उर्वशी ने शर्त के रूप में रखा था।
ताड़न शब्द का प्रयोग केवल मारना, पीटना ही नहीं है, अनुशासन और डांटना भी ताड़न है। प्रकृत में
भी भिन्न भिन्न पात्रों में ताड़न एक जैसा नहीं कहा जा सकता है। ढोल के ताड़न का अर्थ हाथ से या हथोड़ी से स्वर
मिलाना या कपड़ा लपेटे हुए छोटे काष्ठ के डण्डे से बजाना। गँवार का भी अर्थ अज्ञ होता है। शूद्र का भी अर्थ
अशिक्षित शूद्र है। उसके ताड़न का अर्थ है। उसे शिक्षित करना। वैसे तुलसीदासजी ने निषाद, चित्रकूट के कोल,
भिल्ल, किरातों का भी गुण-गान किया है, जो कि शूद्र से भी निकृष्ट कोटि के माने जाते थे। जिनकी छाया के स्पर्श
से भी जल-प्रोक्षण किया जाता है—
"जासु छाँह छुइ लेइय सींचा।" (रा० मा० २।१९२।२)
घोड़ा, बैल आदि पशु यदि ठीक नहीं चलते हैं तो उनका छोटे हल्के डण्डे या चाबुक आदि से भी ताड़न
किया जाता है या शिक्षण के लिए भी कुछ ताड़न करना पड़ता है। अतः पाँचों के लिए एक प्रकार का ताड़न नहीं
हो सकता।
उक्त सन्दर्भ में यह भी नहीं भूलना चाहिये कि श्रोतुलसीदासजी ने मानस में नारी-जाति के बहुत अधिक
सम्मान का वर्णन किया है—
“जो केवल पितु आयसु ताता।
तौ जनि जाहु जानि बड़ि माता।।” (रा० मा० २।५५।१)
अर्थात् यदि केवल पिता की आज्ञा है वन जाने की, तो माता को बड़ी मान कर तुम मुझ माता के आज्ञा-
नुसार वन मत जाओ। यह मनुजी की उस उक्ति के अनुसार कहा गया है जिसमें उन्होंने पिता से सहस्रगुना माता का
सम्मान करना कहा है—
“सहस्रं तु पितृन् माता गौरवेणातिरिच्यते।” (मनु० २।१४५)
भगवती सुनयना, सुमित्रा, अनसूया, सीताजी आदि नारियों के सम्बन्ध में उन्होंने बहुत कुछ कहा ही है।
अरण्यकाण्ड में श्रीराम-नारद-संवाद में जो स्त्री-दोष का वर्णन है, वह शुद्ध वैराग्य के लिए ही और वह पुरुषों का भी
उपलक्षण है। जैसे पुरुषों को परस्त्रियों से रागनिवृत्ति के लिए दुष्ट स्त्रियों का दोषानुसन्धान करके सावधान रहना
चाहिये, उसी प्रकार स्त्रियों को दुष्ट पुरुषों का दोष जानकर सावधान हो स्वधर्म-निष्ठ होना चाहिये। इसी प्रकार
मानस के प्रत्येक प्रसङ्ग को देश, काल, पात्र और परिस्थिति के सन्दर्भ में देखते हुए विचार करना चाहिये; तभी
निर्णय में सुगमता सिद्ध होगी।
महाभारत केवल इतिवृत्त ही नहीं ज्ञानमय प्रदीप है
कहा जाता है कि "इतिहास यथार्थ घटना का वर्णन करता है, पर इससे व्यासजी को सन्तोष नहीं हुआ।
इतिहास से राग-द्वेष ही बढ़ता है। एक-एक समाज या राष्ट्र इतिहास के कारण दुश्मन बन जाते हैं। उस राग-द्वेष
की आँधी में पड़ी हुई नाव से किसी लक्ष्य पर नहीं पहुँचा जा सकता। अतः नारदजी के उपदेश से व्यासजी ने भावा-
त्मक भक्ति का आश्रयण किया और सन्तुष्ट हुए। अतः जैसे शवच्छेदन के निष्कर्ष लेखरूप में उपयुक्त हो सकते हैं,
पर उनका प्रदर्शन वीभत्स ही दृश्य उपस्थित करता है, उसी तरह इतिहास का निष्कर्ष लाभदायक हो सकता है,
परन्तु स्वयं में वह बीभत्स ही होगा।"