रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
४५८ रामायणमीमांसा चतुर्दश
रहेगा। 'अथ राजः' यहीं से रामायण का आरम्भ है, यह कहना भी असङ्गत ही है। जब किसी सामान्य लेख का
भी कोई उपोद्घात या भूमिका होती है तब बिना उपोद्घात के वाल्मीकिरामायण का आरम्भ मान लेना कैसे सङ्गत
होगा ? पूर्वोक्त पंक्तियों में न तो शब्दतः और नहीं अर्थतः पुनरुक्ति है। शुक्लयजुः के ४० वें अध्याय में "अनेजदेकं
मनसो जवीयो" (ईशा० उ० ३) "तदेजति तन्नैजति" (ईशा० उ० ५) इत्यादि समान शब्द और समान अर्थ
का आवर्तन होने पर भी किसी को प्रक्षिप्त नहीं माना जाता है। गीता में दूसरे अध्याय के स्थितप्रज्ञ-लक्षणों तथा
१२ वें अध्याय के भक्त-लक्षणों और १४ वें के गुणातीत-लक्षणों में बहुत कुछ समानता है। क्या उन्हें भी प्रक्षेप माना
जाय ? ११ वे अध्याय के अन्त में 'मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः' (गी० ११।५४) जो कुछ कहा गया है वही १२ वें
अध्याय में कहा गया है। विशेषतः भारतीय दृष्टिकोण से सिद्धों के जो स्वाभाविक लक्षण होते हैं वे ही साधकों के
लिए साधन होते हैं। 'अमानित्वम्, अदम्भित्वम्' (गी० १२।७) आदि सिद्ध ज्ञानी के स्वाभाविक गुणों का इसलिए
विस्तृत वर्णन किया जाता है कि वे सब धार्मिक तथा राजनीतिक साधकों के लिए परम अनुकरणीय एवं अनुष्ठेय हैं।
विशेषतः उत्तरमीमांसा के अनुसार ईश्वर के गुणों का वर्णन उपासनार्थ अपेक्षित होता है जैसे सर्वगन्धत्व, सर्वरसत्व,
भामनीत्व, वामनीत्व आदि गुणों से विशिष्ट परमेश्वर की उपासना करने से उपासकों को वे ही सब गुण फल के
रूप में मिलते हैं। उसी तरह उपर्युक्त गुणों से विशिष्ट राम की उपासना करने से वे सब गुण उपासकों को फलरूप
में मिलते हैं। अतः गुणों का वर्णन निरर्थक नहीं है। पर राम के द्वेषी बुल्के को रामोपासना से क्या लेना देना
है। आवृत्ति तो है ही नहीं, साथ ही प्रशंसा भी नहीं है, क्योंकि अविद्यमान गुणों का वर्णन ही प्रशंसा है। भगवान् के
तो विद्यमान गुणों का भी पूरा वर्णन सम्भव नहीं है, फिर अविद्यमान गुणों के वर्णन का तो प्रसङ्ग ही कहाँ है ?
सर्वथापि अयोध्याकाण्ड के प्रथम सर्ग को प्रक्षिप्त कहना अत्यन्त निराधार एवं दुरभिसन्धिपूर्ण है। वस्तुतः इस सर्ग को
प्रक्षिप्त कहने का बुल्के का उद्देश्य यह है कि इससे उनके अभिमत के विरुद्ध राम विष्णु के अवतार सिद्ध होते हैं। उसमें
स्पष्ट कहा गया है दृप्त रावण के वध के लिए देवताओं की प्रार्थना से विष्णु राम के रूप में अवतीर्ण हुए हैं। बुल्के
अयोध्द्यादि पाँच ही काण्डों को प्रमाण मानते हैं। उनमें भी अवतारवाद सिद्ध होने से बुल्के का पक्ष निर्बल होता है।
इसी लिए वे उसे प्रक्षिप्त कहने का वृथा साहस करते हैं। परन्तु उनके तर्क निःसार हैं। यदि उनके मन्तव्यानुसार
बालकाण्ड वाल्मीकिरामायण का है नहीं तो उसकी आवृत्ति कैसे कही जा सकती है ? डा० याकोबी का यह कथन
भी निराधार है कि आदिरामायण में राम के प्रस्थान के अनन्तर उनकी चित्रकूट तक की यात्रा का वर्णन किया
गया था, क्योंकि जिसका वनप्रस्थान से लेकर युद्धकाण्ड तक विस्तृत चरित्रवर्णन है उसके जन्म और जन्मस्थान तथा
उसके गुण और स्वभाव का वर्णन न हो तो उस ग्रन्थ की बड़ी न्यूनता ही समझी जायगी। जिस सीता के वनगमन
एवं हरण का वर्णन है, जिसके लिए समुद्र में सेतुबन्धन हुआ वह कौन थी, कहाँ की थी, उसका विवाह कब कैसे
हुआ था ? इसका वर्णन न होना भी एक चरित्रचित्रण की त्रुटि ही मानी जायेगी। सर्ग ४१-४९ को प्रक्षिप्त कहना
भी वैसा ही है। इसी तरह उनका यह कथन भी असङ्गत ही है कि प्रतीत होता है कि अन्ध मुनि के पुत्र के वध-
प्रसङ्ग रामायण के पूर्व प्रचलित थे; बहुत संभव है सर्ग ६३ और ६४ की भी अधिकांश सामग्री प्रक्षिप्त हो । सर्ग
६६-९६ में भी पुनरावृत्तियाँ पायी जाती हैं। वाल्मीकिकृत रामायण में प्रसङ्ग इतना विस्तृत नहीं था। वस्तुतः
वस्तुस्थिति अनुमान पर निर्भर नहीं होती। अनुमान लोग अपने-अपने संस्कारों के अनुसार कर लेते हैं। कई लोग
यह भी अनुमान कर सकते हैं कि बाइबिल का इतना विस्तृत रूप प्रारम्भ में नहीं रहा होगा। बहुत कुछ
विशेषतः चमत्कार की बातें मत-प्रचारक ईसाइयों ने जोड़ ली होंगी ? पुनरावृत्तियों की भ्रान्ति भी वैसे
ही है। ऋक्संहिता, अथर्वसंहिता तथा यजुःसंहिता में पुरुषसूक्त हैं। सबमें बहुत कुछ समानता ही है, फिर भी शाखा-
भेद से सभी प्रामाणिक पाठ माने जाते हैं। कभी प्रसङ्गानुसार भी वही बात दुबारा कहनी आवश्यक हो जाती है।
१०० वें सर्ग के प्रक्षिप्त होने का कारण यह कहा गया है कि उसमें राम भरत से उनके राज्य के विषय में बहुत से
अध्याय अयोध्याकाण्ड ४५९
प्रश्न पूछते हैं । मानो भरत दीर्घकाल तक शासन कर चुके हों । १०१ वें सर्ग के प्रारम्भिक श्लोक में कहा गया है
'प्रष्टुं समुपचक्रमे' । वास्तव में १०० वें सर्ग की सामग्री महाभारत के सभापर्व अध्याय ५ से उद्धृत की गयी है, पर
यह सब असङ्गत है । इन प्रश्नों के लिए यह आवश्यक नहीं है कि अधिक काल तक शासन करनेवाले से ये प्रश्न
होने चाहिए । एक उत्तमाभिजनसम्पन्न धार्मिक राज्य के शासक से आरम्भ में ही पूछना उचित है, जिससे कि वह
सावधान होकर उन नीतियों तथा आचारों को ध्यान में रखकर सदा व्यवहार करे । इसी लिए किसी भी भारतीय
विद्वान् टीकाकार ने इन श्लोकों के प्रक्षिप्त होने का सन्देह नहीं किया । दण्डवत् प्रणाम करते हुए भरत को जटिल
और चीरवसनधारी देखकर राम को ऐसा लगा जैसे दुर्दर्श भास्कर ही युगान्त में गिर पड़े हों । राम ने किसी तरह
विवर्णवदन तथा कृशगात्र भ्राता भरत को पहचान कर हाथ से उठाया और मूर्धा का आघ्राण कर आलिङ्गन किया
एवं अङ्क में बैठा कर सादर पूछा; तात, तुम्हारे पिता कहाँ हैं जो तुम वन में आये हो । उनके रहते उनकी सेवा
छोड़कर तुम्हें वन में नहीं आना चाहिये । बहुत दिनों पर दूर से आये हुए तुम्हें देख रहा हूँ । वैवर्ण्य एवं कृशता
से पहचानने में कठिनाई हो गयी है । पिताजी क्या जीवित हैं ? सौम्य, कहीं ऐसा तो नहीं कि बालक होने के कारण
तुम्हारा राज्य नष्ट हो गया हो ? सत्यसंगर, राजसूय, अश्वमेध आदि यज्ञों के अनुष्ठाता धर्मनिष्ठ राजा जीवित तो हैं ?
तात, क्या धर्मनिष्ठ महाद्युति विद्वान् ब्राह्मण इक्ष्वाकुओं के पुरोहित वसिष्ठ का तुम यथावत् पूजन करते हो ? तात, क्या
कौशल्या, सुमित्रा तथा प्रजावती सुखिनी आर्या कैकेयी देवी प्रसन्न तो है ? क्या तुमने विनयसम्पन्न, बहुश्रुत, अनिन्दक,
महाकुलप्रसूत, सकल हित के निर्वाहक पुरोहित को सत्कृत तो किया है ? क्या तुम्हारे आहवनीय आदि अग्नियों के
सम्बन्ध में सावधान मतिमान् विधिज्ञ अध्वर्युगण अवसर के अनुसार अतीत-अनागत होम के अधिकरण अग्नि का ध्यान
तो रखते हैं और तुम देवताओं, पितरों, भृत्यों, गुरुओं तथा पितृतुल्य वृद्ध वैदिक ब्राह्मणों का बहुमान तो करते हो ?
क्या अस्त्र-शस्त्रविद्यासम्पन्न, अर्थशास्त्र-निष्णात तथा धनुर्वेद के आचार्य सुधन्वा का तुम सम्मान तो करते हो ? तात,
क्या तुमने अपने समान शूर तथा श्रुतसम्पन्न, जितेन्द्रिय, कुलीन, इङ्गितज्ञ लोगों को मन्त्री बनाया है ? क्योंकि
शास्त्रकोविद श्रेष्ठ मन्त्री अमात्यों द्वारा सुसंवृत मन्त्र ही राजाओं के विजय का मूल होता हैं । तुम निद्रा के पराधीन
तो नहीं होते हो ? ठीक समय पर जाग तो जाते हो ? और अपररात्र में जाग कर अर्थ-प्राप्ति का उपाय सोचते हो ?
अकेले तो मन्त्रणा नहीं करते और बहुतों के साथ तो मन्त्रणा नहीं करते ? तुम्हारा मन्त्रित मन्त्र कहीं राष्ट्र में तो
नहीं फैल जाता ? इस तरह किसी राजा या राजपुत्र के लिए जो आवश्यक कर्तव्य हैं उन्हीं विषयों के सम्बन्ध में
राम ने भरत से प्रश्न कर उसी व्याज से उन्हें प्रासङ्गिक कर्तव्य तत्त्व का उपदेश किया हैं ।
इस प्रकार प्रश्न करने के अनन्तर भी अपने को राजा न समझ कर भरत ने जब कुछ उत्तर नहीं दिया
तब राम ने पुनः उनके आगमन का प्रयोजन पूछा । महाभारत सभापर्व अध्याय ५ के श्लोक १७ वें से ११० तक
नारद के धर्मसम्बन्धित प्रश्नव्याज से उपदेश हैं, १११ वें श्लोक से युधिष्ठिर का प्रश्न है । उसके बाद पुनः नारद के
उपदेशात्मक प्रश्न हैं । वाल्मीकिरामायण में प्रथम प्रश्न ही हैं, अन्त में कुछ प्रश्नव्याज से उपदेश भी हैं ।
प्रायः यह माना जाता है कि पूर्ववर्ती लेख अधिक सुन्दर और स्पष्ट होता है, क्योंकि वह पूर्ववर्ती की
सहायता लेकर अधिक परिष्कृत होता है । इस दृष्टि से भी वाल्मीकिरामायण का प्रश्न ही प्राचीन प्रतीत होता है ।
वाल्मीकिरामायण में ६५ श्लोक हैं, महाभारत में १२८ श्लोक हैं । महाभारत के श्लोक वाल्मीकिरामायण के
छायामात्र हैं ।
यदि १०० वें सर्ग को प्रक्षिप्त कहा जाय तो यह भी मानना पड़ेगा कि राम भरत की दशा को बिना
देखे, बिना पूछे और दशरथ का हाल बिना पूछे ही भरत से बातें करने लगे । परन्तु यह सर्वथा अस्वाभाविक ही
४६० रामायणमीमांसा चतुर्दश
है। 'प्रष्टुं समुपचक्रमे' की संगति पूर्व में बतलायी जा चुकी है। १०० वें सर्ग के बिना १०१ वाँ सर्ग सर्वथा अपूर्ण
और असङ्गत ही ठहरता है। महाभारत सभापर्व वाल्मीकिरामायण के बाद का ग्रन्थ है, अतः वाल्मीकिरामायण से
ही वहाँ कुछ श्लोकों का उद्धृत होना अधिक सङ्गत है।
इसी प्रकार कहा जाता है कि जाबालि का वृत्तान्त प्रक्षिप्त है।
राम के अयोध्या न लौटने का दृढ़ सङ्कल्प
"प्रवेक्ष्ये दण्डकारण्यमहमप्यविलम्बयन् ।
आभ्यां तु सहितो वीर वैदेह्या लक्ष्मणेन च ।।" (वा० रा० २।१०७।१६)
अर्थात् मैं शीघ्र ही सीता और लक्ष्मण के साथ दण्डकारण्य में प्रवेश करनेवाला हूँ। के पश्चात् भरत के
प्रत्युपवेशन का प्रसङ्ग आना चाहिये—
“एवमुक्तेन रामेण भरतः प्रत्यनन्तरम् ।
उवाच विपुलोरस्कः सूतं परमदुर्मनाः ॥
इह तु स्थण्डिले शीघ्रं कुशानास्तर सारथे ।
आर्यं प्रत्युपवेक्ष्यामि यावन्मे सम्प्रसीदति ।।" (वा० रा० २।१११।१२,१३)
पिता ने जो मुझे वनवास की आज्ञा दी है वह मिथ्या नहीं हो सकती, राम के ऐसा कहने पर विशाल
वक्षस्थलवाले भरत ने बहुत दुःखी होकर सूत को आज्ञा दी कि सारथे, स्थण्डिल पर कुश बिछा दो। जब तक आर्य
(राम) प्रसन्न नहीं होते तब तक मैं उनके प्रति प्रायोपवेशनव्रत करूँगा। प्रचलित पाठ के अनुसार राम के सङ्कल्प
के पश्चात् जाबालि लोकायत दर्शन का प्रतिपादन करने लगते हैं (सर्ग १०८)। राम जाबालि को उत्तर देकर अपना
संकल्प पुनः प्रकट करते हैं (सर्ग १०९।१–२९)। इसके अनन्तर राम के प्रत्युत्तर का सार उपजाति छन्दों में
दोहराया जाता है (सर्ग १०९।३०-३९)।
इस अंश में जो दाक्षिणात्य पाठ में मिलता है कि राम बुद्ध को चोर और नास्तिक कहते हैं वह सर्ग १०९
पश्चिमोत्तरीय पाठ में नहीं मिलता है। इसके अनन्तर वसिष्ठ रामवंशावली सुनाकर राज्यभार स्वीकार करने के लिए
राम से अनुरोध करते हैं (सर्ग ११०), परन्तु उपर्युक्त तर्क निःसार ही है। संसार की सभी घटनाएँ पुरुषविशेषों
के अटकलों के आधार पर नहीं घटती हैं। पुरुषों के अनुमानों के विपरीत भी घटनाएँ घटती ही हैं। चित्रकूट के
घटनास्थलपर राम और भरत केवल दो ही होते तब कदाचित् यह कहा भी जा सकता था, परन्तु जब वहाँ पर
वसिष्ठ तथा जाबालि जैसे विद्वान् भी बैठे ही थे तो वे सर्वथा मौन कैसे रहते ? राम के वनगेमन से न लौटने की बात
सुनकर भरत के कुछ कहने से पहले ही जाबालि का प्रतिज्ञा के विरुद्ध कुछ कहना असङ्गत नहीं है। सबका एक ही
उद्देश्य था कि राम को अयोध्या लौटा ले जाना, अतः जाबालि ने लोकायत तथा बौद्ध मत लेकर वेदादि शास्त्रों एवं
तदुक्त सदाचारपरम्पराओं को खण्डित कर राम को पिता की आज्ञा की परवाह न करने की सलाह देते हुए लौटने
का अनुरोध किया। वैदिक सदाचार का प्रतिपादन कर राम ने जाबालिमत के खण्डन-प्रसङ्ग में बुद्धमतानुयायियों को
नास्तिक और चोरवत् दण्डनीय कहा। वेदप्रामाण्य का अपहर्ता होने के कारण यहाँ नास्तिक को चोरवत् दण्डनीय
कहा गया। प्रजाहित के लिए जैसे चोर दण्ड्य है वैसे ही नास्तिक भी दण्ड्य है। संक्षेप में जाबालि ने कहा—राघव,
प्राकृत मनुष्यों की जैसी तुम्हारी प्राकृत बुद्धि नहीं होनी चाहिये। संसार में कौन किसका बन्धु है ? जन्तु अकेला ही
उत्पन्न होता है और अकेला ही मरता है। माता-पिता आदि बुद्धि में जो आसक्त होता है वह उन्मत्त ही है। जैसे
कोई मनुष्य एक ग्राम छोड़कर दूसरे ग्राम में जाता हुआ मार्ग में कहीं आवास करता है। दूसरे दिन आवास छोड़कर
अध्याय अयोध्याकाण्ड ४६१
अन्यत्र चला जाता है। इसी तरह मनुष्यों के पिता, माता, गृह, वन आदि हैं। कहीं भी आसक्ति उचित नहीं । अपना
राज्य छोड़कर बहुकण्टकाकीर्ण पथ में जाना उचित नहीं । अयोध्यानगरी एकवेणीधरा प्रोषितभर्तृका पत्नी के समान
तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही है । दशरथ अन्य थे, तुम अन्य हो । क्षणभङ्गवाद के अनुसार कोई स्थिर नहीं है। शोणित
और बीज ही माता-पिता हैं, माता-पिता और कोई नहीं । जहाँ जाना था राजा गये । यह सभी भूतों की गति है । निरर्थक
तुम क्यों राज्य से वञ्चित होते हो ? मैं तो धर्मपरायणों के लिए सोचता हूँ । जो इस लोक में दुःख पाकर विनाश को
प्राप्त होते हैं । पितृदैवत्य श्राद्ध आदि का प्रपञ्च केवल अन्न का उपद्रवमात्र ( अपव्यय ) है । भला जो मर गया वह
परलोक में भी क्या भोगेगा ? यदि यहाँ अन्य के भोजन से अन्य की तृप्ति होती तब तो परलोकगत पितरों का श्राद्ध
आदि मिलने की कल्पना हो भी सकती थी, और यदि ऐसा ही है तब घर में किसी को भोजन करा देने से प्रवासी
बन्धुओं को भी भोजन मिल जाना चाहिये । फिर तो किसी प्रवासी को घर से भोजनादि सामग्री ढोने का प्रयास क्यों
करना चाहिये ? दान, यज्ञ, तप आदि की महिमा का वर्णन करनेवाले ग्रन्थ स्वार्थियों ने ही गढ़ रखे हैं, अतः परोक्ष
परलोकबुद्धि का त्याग कर प्रत्यक्ष का आश्रयण करो ।
जाबालि का वचन सुनकर जाबालि द्वारा उक्त अर्थ के विपरीत प्रतिपत्तियुक्त बुद्धि एवं वेदोक्ति रूप सूक्ति
का आलम्बन कर सत्यपराक्रम राम बोले- आपने मेरे प्रिय लाभ के लिए जो कुछ कहा है वह परमार्थतः अकार्य है
जो कार्यसदृश प्रतीत होता है, वह पथ्याभास अपथ्य ही है । निर्मर्याद पापाचारसमन्वित प्राणी कहीं भी सम्मान पाने
योग्य नहीं है, क्योंकि वह साधुसम्मत चरित्र प्रतिपादक वेदादि शास्त्रों से विपरीत है, 'लोकायतादि' शास्त्रप्रसक्त है ।
वस्तुतः कुलीन अकुलीन पुरुषमानी वीर की पवित्रता या अपवित्रता का स्पष्ट प्रतिपादन वेदसम्मत आचार ही करता
है । वेदसम्मत आचारवाला ही कुलीन एवं शुचि है, तद्भिन्न अशुचि आदि ही हैं। आपके सम्मत पथ का आलम्बन
करने से सर्वथा अनर्थ ही सम्भावित है । वैसा करने पर मैं अनार्य के तुल्य आर्य, शौचहीन होकर शुचि, अलक्षण
होने पर भी लक्षणवान् तथा दुःशील होकर भी शीलवान् सा बनकर धर्मवेष से अधर्म का आचरण कर लोकसंकरकारक
मार्ग का अनुसरण कर श्रुतिविधिविवजित क्रिया का आलम्बन कर अशुभ गति को ही प्राप्त होऊँगा । उस स्थिति में
भला कौन समझदार कार्याकार्यविचक्षण पुरुष लोकदूषण और दुर्वृत्त व्यक्ति का सम्मान करेगा । यदि मैं तुम्हारे
उपदेश का आदर करूँ, सत्य परिपालनरूप पिता की आज्ञा का उल्लङ्घन करूँ तो हीनप्रतिज्ञवृत्ति से कैसे स्वर्ग पा
सकूँगा और किसके वृत्त का अनुसरण करूँगा ? शास्त्रों में तो पितादि परम्परा का अनुसरण करना कहा है—
“येनास्य पितरो याता येन याताः पितामहाः ।
तेन यायात् .................................................. ॥” ( मनु० ४।१७८ )
जिस रास्ते से पिता, पितामह आदि चले हैं उसी रास्ते से चलना उचित है। सामान्य तथा सर्वसाधारण
लोक कामवृत्त ही होता है। जैसे आचारवाले राजा होते हैं वैसी ही प्रजा होती है। अनृशंस ( सब प्राणियों
पर दयाप्रधान ) अनादिशास्त्रसिद्ध सत्य ही सनातन राजवृत्त है । इसी लिए राज्य भी सत्यात्मक होता है। सत्य ही
में लोक प्रतिष्ठित है। ऋषियों एवं देवों ने भी सत्यलोकान्त सब लोकों की प्राप्ति का हेतु सत्य ही माना है। सत्यवादी
ही अक्षय उत्कृष्ट लोक प्राप्त करता है । सर्पवत् अनृतवादी से सभी उद्विग्न होते हैं। सत्य ही सबका मूल है, सत्य
ही ईश्वर है, धर्म भी सत्य ही में प्रतिष्ठित है । सत्य से पर कुछ भी नहीं। दत्त, इष्ट, हुत, तप तथा जगत् का
उत्पादक सर्वाधिष्ठान ब्रह्म भी अत्यन्त अबाध्यरूप सत्य ही है। एतावता चेतन से अनधिष्ठित परमाणु, प्रकृति आदि
ही जगत् के उपादान कारण हैं, यह मत खण्डित हो जाता है, क्योंकि वे परिणामी तथा मिथ्या होने से चेतन जीव
आदि के अधिष्ठान नहीं हो सकते । साथ ही व्रत, यज्ञ, दान, तप आदि धर्म का प्रतिपादन करनेवाले वेद भी सत्य
ईश्वर से श्वास-प्रश्वासवत् आविर्भूत होते हैं । अतः वक्तृगत भ्रम, प्रमाद आदि दोषों की शङ्का से रहित होने एवं
उनके द्वारा प्रतिपादित दान आदि के फल का संवाद देखने से अप्रामाण्यशङ्काशून्य होने के कारण वेद स्वतःप्रमाण हैं,
अतः सत्य ही ईश्वररूप है, इसलिए सत्यपालन में तत्पर होना ही युक्त है ।
“दत्तमिष्टं हुतं चैव तप्तानि च तपांसि च ।
वेदाः सत्यप्रतिष्ठानास्तस्मात् सत्यपरो भवेत् ॥” ( वा० रा० २।१०७।१४ )
अतः मैं पिता की आज्ञा का क्यों न पालन करूँ । पिता सत्यप्रतिज्ञ तथा समयी ( सदाचारवान् ) थे,
अतः सत्य के कारण ही उन्होंने सत्यपालन द्वारा मुझे सत्यनिष्ठ बनाया है । लोभ से या मोह से किसी तरह मैं सत्य-
सन्ध पिता के सेतु का अतिक्रमण न करूँगा । असत्यसन्ध अस्थिरचेता चपल मनुष्य के हव्य्, कव्य आदि को देवता
और पितर ग्रहण नहीं करते, यह धर्म सभी प्राणियों के हितार्थ ध्रुव है । सत्पुरुषों ने उसका आचरण और अभिनन्दन
किया है । पिता की आज्ञा का पालन आदि छोड़कर राज्य-पालन आदि धर्माभास अधर्म ही हैं। यह नृशंस एवं पाप
कर्म क्षुद्र लोगों द्वारा ही सेवित है । प्राणी मन से निश्चय कर जिह्वा से अनृत भाषण करके शरीर से पाप करता है ।
भूमि, कीर्ति, यश तथा लक्ष्मी सभी सत्यनिष्ठ पुरुष का अनुवर्तन करते हैं, अतः सत्य का आश्रयण ही ठीक है। आपने
जिन युक्त्याभासों से मुझसे राज्य करने के लिए कहा है वे अनार्य—अश्रेष्ठ ही हैं। मैंने पिता के सामने वनवास
की प्रतिज्ञा की है, कैकेयी भी उससे प्रसन्न हुई थीं, अतः उसके विपरीत भरत की बातें कैसे मैं मानूं ? पवित्रतापूर्वक
वनवास करते हुए नियत भोजन करते हुए पुण्य मूल, पुष्प और फलों से पितरों तथा देवताओं का तर्पण करते हुए
उसी से पञ्चेन्द्रियवर्ग को पुष्ट कर पितृवचन पालनरूप लोक ( यात्रा ) व्यवहार को निष्कपट तथा श्रद्धा के साथ
कार्याकार्यविचक्षण होकर चलाऊँगा । इस कर्मभूमि को प्राप्त करके जो शुभ कर्म है वही कर्तव्य है । अग्नि, वायु और
सोम सभी कर्म के ही प्रभाव से उच्च फल के भागी हुए हैं। सौ अश्वमेध करके ही शतक्रतु इन्द्र त्रिदिवाधिपति हुए
हैं। उग्र तप करके ही महर्षि लोग द्युलोकभागी हुए हैं ।
पुनश्च उग्रेतेजा राम उक्त नास्तिक्यपूर्ण 'यदि भुक्तमिहान्येन' इत्यादि शुष्क तर्क युक्त वाक्य की विगर्हणा
करते हुए बोले, सत्य एवं धर्मयुक्त पराक्रम, भूतानुकम्पा, प्रियवादिता, द्विजाति, देवता तथा अतिथि के पूजन को
सन्त लोग त्रिदिव-प्राप्ति का साधन कहते हैं । इस तरह सत्पुरुष फलवान् निश्चित कर्मों को जानकर श्रुति के
अनुकूल तर्कों से निर्णय करके सावधान होकर लोकप्राप्ति की आकाङ्क्षा करते हैं । अन्य की भुक्ति से अन्य की तृप्ति
आदि तो युक्ति और प्रमाण से हीन ही है। मैं पिता के उस कर्म की निन्दा करता हूँ जिसमें उन्होंने वेदविमुख तथा
अवैदिक दुर्मार्ग में प्रतिष्ठित बुद्धिवाले चार्वाकानुसारिणी बुद्धि से धर्मपथ से अपेत नास्तिकमत का अनुसरण करनेवाले
आपको आर्त्विज्य प्रदान किया है। जैसे चोर दण्ड्य होता है वैसे ही बुद्धादि नास्तिक मतानुसारी भी दण्ड्य हैं,
क्योंकि वह वेद-प्रामाण्य का हरण करता है । नास्तिक को चोर सदृश ही दण्ड्य समझना चाहिये, जहाँ दण्ड देना
सम्भव न हो वहाँ ब्राह्मण को नास्तिक के अभिमुख संभाषणदि नहीं करना चाहिये । वेदोक्त धर्म में शिष्टाचार
दिखलाते हुए राम फिर कहते हैं, आपसे पूर्व और पूर्वत्तर ब्राह्मणों ने बहुत से शुभ कर्म किये हैं । लोक और परलोक
की कामना छोड़कर भी कर्तव्य बुद्धि से वे कल्याणमय अहिंसा, तप, भिक्षादि कर्म करते रहे हैं । वेदप्रामाण्य से ही
तेजस्वी लोग दानगुणप्रधान, अहिंसक, वीतमल, प्रधान मुनि लोकपूज्य हुए हैं। जाबालि ने भी अन्त में कहा,
मैं नास्तिक नहीं हूँ । आर्य ! आपको अयोध्या लौटाने के लिए ही मैंने नास्तिक-वाक् का प्रयोग किया था ।
इस तरह इस संवादमयी घटना को अकस्मात् प्रक्षिप्त कहना साहसमात्र है । केवल पश्चिमोत्तर पाठ में यह
नहीं है, एतावता भी इसे प्रक्षिप्त नहीं कहा जा सकता । ऐसे कई अंश हैं जो पश्चिमोत्तरीय पाठ में होने
पर भी पाश्चात्यों को मान्य नहीं हैं जैसे अवतारवाद सभी पाठों में स्पष्टरूप से है, फिर भी बुल्के आदि उसे
नहीं मानते ।
अध्याय अयोध्याकाण्ड ४६३
कुछ लोग यह शङ्का करते हैं कि बुद्ध तो राम से अर्वाचीन थे, फिर राम बुद्ध की चर्चा कैसे कर सकते
थे ? परन्तु यह शङ्का भी निर्मूल है, क्योंकि "असद्वा इदमग्र आसीत्" ( तै० उ० २।७ ) इत्यादि श्रुतियों में ही
शून्यवाद आदि बौद्धवाद अनादिकाल से ही पूर्वपक्ष के रूप में प्रचलित है। बौद्धों के अनुसार भी लङ्कावतारसूत्र में
अमिताभ आदि अनेक नामवाले बुद्ध गौतम बुद्ध से पहले भी हो चुके हैं। लङ्कावतारसूत्र में बुद्ध को लङ्कापति रावण
का उपदेष्टा गुरु कहा गया है, अतः बुद्धमतानुयायी बुद्ध का निराकरण करना अत्यन्त सम्भव है।
इसी तरह याकोबी का राम के अत्रि के आश्रम में जाने के वृत्तान्त को ( वाल्मीकिरामायण २।११७।५
से काण्ड के अन्त तक को ) प्रक्षिप्त मानना भी निराधार है। प्रामाणिक रामायण में बालकाण्ड की घटनाओं का
निर्देश नहीं मिलता, लेकिन सीता-अनसूया-संवाद के अन्तर्गत लक्ष्मण और उर्मिला के विवाह का उल्लेख किया
गया है। अरण्यकाण्ड में लक्ष्मण को अविवाहित कहा गया है, इस अंश में अयोनि
४६४ रामायणमीमांसा चतुर्दश
आमिष न खाकर कन्द, मूल, फलों और अग्निपक्व मांस आदि से ही जीवन चलाते हुए वन में निवास करूंगा ।
"ऐणेयं मांसमाहृत्य शालां यक्ष्यामहे वयम् ।” ( वा० रा० २।५६।२२ ) के अनुसार ऐणेय मांस से ही वास्तुशान्ति
आदि कार्य भी राम ने किया था । अतएव श्राद्धादि धर्म में भी शुद्ध मांस का प्रयोग होता है ।
इस दृष्टि से “इदं मेध्यमिदं स्वादु निष्टप्तमिदमग्निना ।” ( वा० रा० २।९६।२ ) इन वचनों के साथ
समन्वय हो जाता है ( तिलक ) । २।४२।१०२ की टीका में तिलककार कहते हैं- 'मांसस्य वन्याहारान्तर्गतत्वान्न
दोषः, मृगयाधर्मकत्वाच्च न मृगहनने दोषः ।' अर्थात् शुद्ध मांस वन्य आहार के अन्तर्गत होने से शुद्ध मृगमांस खाना
दोष नहीं है । इसके अतिरिक्त मृगयाधर्म से मृग मारना भी दोष नहीं है । यदि मृगया भी अप्रामाणिक कही जाय तब
तो मारीचवध आदि सभी कथाओं को प्रक्षेप ही कहना पड़ेगा ( तिलक ) ।
बुल्के कहते हैं कि “महाभारत के रामोपाख्यान में गुह का उल्लेख नहीं है । किन्तु वाल्मीकिरामायण के
अनुसार राम चित्रकूट की यात्रा में अपने सखा गुह के यहाँ रात बिताते हैं । गुह लक्ष्मण तथा सुमन्त्र के साथ सोते
हुए राम और सीता की रक्षा करता है । अगले दिन नौका मँगाकर राम, सीता और लक्ष्मण को गङ्गा पार पहुँचाता
है ।” पर रामोपाख्यान में तो वाल्मीकिरामायण की ही संक्षिप्त कथा वर्णित है । केवट की कथा भी मूल से अविरुद्ध है,
अतः शतकोटिप्रविस्तर रामायण का ही अंश समझना चाहिये । अध्यात्मरामायण के अनुसार चित्रकूट-यात्रा प्रसङ्ग में
ही उसका वर्णन सङ्गत है । राम के चरित्र अनन्त हैं, अतः तापस-वन्दना तथा ग्राम-वधूटियों की कथा भी
प्रामाणिक है ।
अन्धमुनि-पुत्र के वध की कथा अन्य पुराणों और रामायण के अनुसार तो है ही, परन्तु वाल्मीकिरामायण
के अनुसार भी उसे विकास या प्रक्षेप कहना साहस है । तिलक आदि टीकाकारों को वह पाठ सम्मत भी है । ( वा०-
रा० २।६३।४०, ४१ ) में स्पष्ट कहा गया है कि ब्रह्महत्या का भय हृदय से निकाल दो । मैं ब्राह्मण नहीं हूँ, वैश्य से
शूद्रा में उत्पन्न हूँ-
“ब्रह्महत्याकृतं पापं हृदयादपनीयताम् ।
न द्विजातिरनं राजन् मा भूत्ते मनसो व्यथा ॥
शूद्रायामस्मि वैश्येन जातो नरवराधिप ।”
उसकी विभिन्न कथाओं का यथासम्भव समन्वय किया जा सकता है । अन्धमुनि और उसका पुत्र तपोनिष्ठ
था, इसी दृष्टि से क्वचित् उसके ब्राह्मणत्व का व्यवहार हुआ है । "ब्रह्महत्या स्पृशेन्न त्वां वैश्योऽहं तपसि स्थितः ।"
( वा० रा० २।७।२७ ) के अनुसार वह वैश्य था, अतः ब्रह्महत्या का स्पर्श नहीं हुआ । नामभेद की प्रसिद्धि देशभेद
से भिन्न भी हो सकती है ।
सेरीराम और श्याम की कथाओं का समन्वय करने से यही प्रतीत होता है कि हानिकारक हाथियों के ही
मारने का अनुरोध दशरथ से विभिन्न सूत्रों द्वारा किया गया था । उसी प्रसङ्ग में हाथी के भ्रम से दशरथ ने अन्ध-
मुनि-पुत्र को मारा था । अन्धमुनि के अन्ध होने और पुत्रदुःख-प्राप्ति के विभिन्न कारण भी हो ही सकते हैं, अतः वैसे
वर्णन भी अप्रामाणिक नहीं ।
कई कथाओं में कल्पभेद से भेद हुआ है । उसके अनुसार भी रामायणों का समन्वय संभव है । रामचरित-
मानस के अनुसार जनक के चित्रकूटगमन की कथा स्वाभाविक ही लगती है । इतनी बड़ी घटना का पता न लगना भी
संभव नहीं और पता लगने पर तटस्थ या उदासीन रहना भी सम्भव नहीं था, अतः शिव-भुशुण्डि-परम्परा में जनक
की कथा का होना स्वाभाविक है ।
अध्याय अयोध्याकाण्ड ४६५
सीताहरण का समाचार सुनकर राम और लक्ष्मण की माताओं के मर जाने की सेरीराम की बात
वाल्मीकिरामायण के विरुद्ध होने के कारण श्रद्धेय नहीं है। दशरथ के लिए राम के द्वारा इङ्गुदी की खली का
पिण्डदान-वर्णन अन्यत्र किञ्चित् भिन्न हो सकता है। ब्रह्मपुराण (अध्याय १२३) के अनुसार दशरथ अपने पुत्रों को
दर्शन देकर ब्रह्महत्या के कारण अपनी नरकयातना का वर्णन करते हैं और उनसे गौतमी-तट पर पिण्डप्रदान करने
का अनुरोध करते हैं। अनन्तर राम के पिण्डदान द्वारा दशरथ नरक से मुक्ति पाते हैं तथा स्कन्दपुराण (प्रभासक्षेत्र-
माहात्म्य अ० १११) के अनुसार दशरथ राम को स्वप्न में दिखाई देते हैं। राम ब्राह्मणों से परामर्श कर पिण्ड-
दानादि धार्मिक क्रिया करते हैं। पद्मपुराण (सृष्टिखण्ड अ० २८।४८-९०) के अनुसार वनवास के समय इसी
स्वप्नदर्शनाध्याय के फलस्वरूप श्राद्ध के आयोजन का वर्णन मिलता है। गरुड़पुराण (अध्याय १४३) के
अनुसार राम अयोध्या लौटने पर पितृकर्म के लिए गयाशिर (गया) जाते हैं। प्रतिमानाटक में भी इसका
उल्लेख है। शिवपुराण (ज्ञानखण्ड अध्याय ३०) के अनुसार राम और लक्ष्मण श्राद्धसामग्री लेने गये थे आने में
विलम्ब होने पर सीता श्राद्ध-काल की किञ्चित् अवधि शेष जानकर स्वयं श्राद्ध करती है। दशरथ प्रकट होकर कहते
हैं मैं दशरथ हूँ। तुम्हारे सफल श्राद्ध से मैं तृप्त हुआ हूँ। बाद में राम के अर्पण करने पर दशरथ उनसे कहते
हैं कि पुत्र, अब क्यों प्रदान कर रहे हो, सीता के द्वारा मैं तृप्त हो गया हूँ-
“किमर्थं हूयते पुत्र त्वनया तर्पिता वयम् ।”
आनन्दरामायण में भी सीता फल्गुस्नान करने जाती हैं। माहेश्वरी-पूजा के लिए १०२ बालू के पिण्ड
तैयार करती हैं। वहाँ धरती से दशरथ का हाथ प्रकट होता है और सीता एक-एक कर १०२ पिण्ड दशरथ के
हाथ पर रख देती हैं। सीता भयभीत होकर यह वृत्तान्त छिपाकर रखती हैं। बाद में जब राम पिण्ड चढ़ाने आते
हैं तब दशरथ का हाथ नहीं प्रकट होता है, जिससे सबको आश्चर्य होता है। सीता अपना रहस्य प्रकट करती हैं कि
दशरथ मुझसे पिण्ड-ग्रहण कर चुके हैं। राम साक्षी चाहते हैं। सीता आम वृक्ष, फल्गु नदी, ब्राह्मण, बिडाल, गौ
और अश्वत्थ को साक्ष्य देने को कहती हैं। सब अस्वीकार कर सीता से शम होते हैं। अन्त में स्मरण कर सीता
का समर्थन करते हैं। दशरथ स्वयं विमान द्वारा आते हैं और कहते हैं कि राम, मैथिली के पिण्डदान से दुस्तर नरक
से मैं तर गया और मेरी पूर्ण तृप्ति हुई।
सारलादास के अनुसार वनवास के समय राम अनेक तीर्थयात्राएँ करते हैं। किसी दिन राम गया पहुँचे।
पितृ-कर्म के लिए गैंडा आवश्यक समझकर लक्ष्मण के साथ राम उसकी खोज में शिकार के लिए गये। सीता ब्रह्मा
के पुत्र फल्गु नदी के संरक्षण में रामगया में ही रह गयीं। राम को समय पर न आते देख सीता ने पूर्वजों को सात
बालू के पिण्ड समर्पित किये। दशरथ का हाथ प्रकट हुआ जिससे सीता को मालूम हुआ कि दशरथ का देहान्त हो
चुका। सीता ने फल्गु से निवेदन किया कि वह इस घटना को राम से छिपा रखे। फल्गु ने सीता से अनुचित प्रस्ताव
किया, उसके ठुकराये जाने पर ब्राह्मणों से कह दिया कि सीता ने पिण्डदान किया है। ब्राह्मण दक्षिणा के लिए
अनुरोध करने लगे तथा राम के प्रत्यागमन तक प्रतीक्षा करना उन्होंने अस्वीकार कर दिया। इसपर सीता ने अपने
कपड़े दे दिये और पद्मपत्रों से अपना अङ्ग ढक लिया। वापस आकर सब वृत्तान्त जानकर राम ने फल्गु तथा ब्राह्मणों
को शाप दिया।
कृत्तिवासरामायण के अनुसार दशरथ की मृत्यु के पश्चात् उनका श्राद्ध उचित रीति से करने के लिए
राम और लक्ष्मण अंगूठी बेचने जाते हैं। इतने में सीता फल्गु के किनारे खेलती हैं। दशरथ देखकर कहते हैं, भूख
की पीड़ा असह्य हो उठी है। रेत का पिण्ड देकर भूख शान्त कर दो। बाद में ब्राह्मण, तुलसी और फल्गु सीता के
पक्ष में साक्ष्य नहीं देते हैं। उनको सीता शाप देती हैं। वट वृक्ष सीता का समर्थन करता है तथा राम और सीता
दोनों से आशीर्वाद प्राप्त करता है।
५९
४६६ रामायणमीमांसा चतुर्दश
दुर्गावरकृत असमिया गीतिरामायण में भी इस प्रसङ्ग का वर्णन है। उसमें सीता चन्द्रमा, वायु, पृथिवी,
फल्गु तथा ब्राह्मणों को शाप देती हैं। बालरामदासरामायण के अनुसार राम स्वयं फल्गु को अन्तःसलिला बन जाने
का शाप देते हैं। प्रार्थना करने पर वर्षा ऋतु में प्रकट होने का अनुग्रह करते हैं। वस्तुतः वाल्मीकिरामायण में
वर्णित श्राद्ध का ही भिन्न-भिन्न पुराणों एवं रामायणों में पल्लवन किया गया है। दशरथजी के नरकयातना भोगने और
क्षुधातुर होने आदि का वर्णन गुणवादी अर्थवाद ही समझना चाहिए । उसका तात्पर्य गौतमी नदी पर श्राद्ध एवं
गयाश्राद्ध तथा फल्गुश्राद्ध के माहात्म्य-वर्णन में है। "नहि निन्दा निन्द्यं निन्दितुं प्रवर्तते अपितु विधेयं स्तोतुम्"
निन्दा का तात्पर्य निन्द्य की निन्दा में न होकर विधित्सित अर्थ की स्तुति में ही होता है। श्रीराम का नाम स्मरण
करने से भी प्राणियों की मुक्ति हो जाती है फिर राम के परमानुरागी दशरथ के लिए नरक-यातना की कल्पना भी
कैसे की जा सकती है। रामचरितमानस में कहा गया है—
"राम राम कहि राम कहि राम राम कहि राम ।
तनु परिहरि रघुबर बिरह राउ गयऊ सुरधाम ॥" ( रा० मा० २।१५५ )
"जिअन मरन फलु दशरथ पावा । अण्ड अनेक अमल जसु छावा ॥
जिअत रामविधुवदन निहारा। रामविरह करि मरन सँवारा ॥"
( रा० मा० १।१५४।१ )
ऐसे ही देवी-भागवत में परीक्षित् के अन्तरिक्ष-मरण के कारण दुर्गति का वर्णन भी निन्दार्थवाद ही है ।
प्रमाणान्तर विरुद्ध अर्थवाद का स्वार्थ ग्राह्य न होकर केवल स्तुति में ही उसका तात्पर्य होता है। उदाहरणार्थ
शुक्लयजुःसंहिता के ४० वें अध्याय में विद्या और अविद्या ( कर्म और उपासना ) दोनों की ही निन्दा की गयी है ।
"अन्धन्तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते ततो भूय इव तमो य उ विद्यायां रताः।" ( ईशा० उ० ७ ) वे
लोग अन्धन्तम में प्रवेश करते हैं जो कर्म में लगे हैं और उससे भी अधिक घोर तम में वे प्रवेश करते हैं जो कि
उपासना में लगे हैं। परन्तु ये दोनों ही बातें "कर्मणा पितृलोकः विद्यया देवलोकः ।" इन श्रुति-वचनों से विरुद्ध हैं;
क्योंकि इनमें कर्म से पितृलोक और विद्या से देवलोक की प्राप्ति कही गयी है। अतः ऊपर के वचनों का तात्पर्य विद्या
और अविद्या दोनों के समुच्चयानुष्ठान में ही है, किसी की निन्दा में नहीं। ठीक इसी तरह रामनाम का स्मरण
राम-भक्ति परम मोक्ष का कारण है, यह श्रुति, स्मृति और पुराणों से सिद्ध है। ऐसी स्थिति में परम राम-भक्त
दशरथ की नरक-प्राप्ति सर्वथा विरुद्ध ही है। अतः वैसे वचनों का तात्पर्य गौतमी तथा गया आदि क्षेत्रों एवं वहाँ के
श्राद्धादि कर्मों के माहात्म्य-वर्णन में ही है अर्थात् दशरथ जैसे परम सम्मान्य पुरुषों की सद्गति यहीं हुई थी ।
पादुकाओं का वृत्तान्त
इसे ( पादुकाओं के वृत्तान्त को ) भी बुल्के बाद में जोड़ा हुआ समझते हैं। वे कहते हैं कि "दाक्षिणात्य
पाठ ( वा० रा० १।११२।२१ ) के अनुसार भरत राम की हेमविभूषित पादुकाएँ ले जाने की प्रार्थना करते हैं—
"अधिरोहार्य पादाभ्यां पादुके हेमभूषिते ।
एते हि सर्वलोकस्य योगक्षेमं विधास्यतः ॥" ( वा० रा० २।११२।२१ )
पर गौड़ीय पाठ के अनुसार भरत के प्रस्थान के समय शरभङ्ग राम को कुशपादुकाओं का एक जोड़ा भेजते
हैं। वसिष्ठ के अनुरोध से राम उन्हें प्रदान करते हैं। माधवकन्दली और बलरामदासरामायण में भी कुशपादुकाओं
की ही चर्चा है। पश्चिमोत्तरीय पाठ में वसिष्ठ के कहने पर राम अपनी पादुकाएँ भरत को देते हैं।
दशरथजातक के अनुसार भी अमात्य लोग राम की पादुकाओं के सामने राजकार्य करते हैं। अन्याय होते
ही पादुकाएँ एक दूसरे पर आघात करती हैं एवं ठीक निर्णय होने पर शान्त हो जाती हैं।
अध्याय अयोध्याकाण्ड ४६७
पादुकाओं के स्वरूप में कुछ मतभेद होने पर भी पादुकाओं में कोई मतभेद नहीं है। अतः पादुकावृत्तान्त
को ही प्रक्षेप कहना साहसमात्र है और मतभेद से नाजायज फायदा उठाने की दुश्चेष्टामात्र है। चित्रकूटनिवास,
पर्णशाला-निर्माण आदि सभी प्रामाणिक ही हैं।
काक-वृत्तान्त
जयन्त काक का वृत्तान्त सुन्दरकाण्ड में हनुमान् के लिए अभिज्ञान के रूप में सुनाया था। राम के द्वारा
प्रयुक्त अस्त्र से वह कहीं भी त्राण न पाकर राम की शरण में आकर प्राण बचाता है। यह घटना अयोध्याकाण्ड की ही
है। अतः क्षेपक में या पुराणों में उसका वर्णन स्वाभाविक था। इसी दृष्टि से गौड़ीय पाठ ने उस सर्ग को प्रक्षिप्त नहीं
माना। नृसिंहपुराण, पद्मपुराण तथा रामचरितमानस में भी इसका वर्णन है। अध्यात्मरामायण तथा आनन्दरामायण
में भी उक्त वृत्तान्त है ही। रामकेर्ति तथा रामकियेन में काकासुर का वध वर्णित है, पर वह असुर है। अयोध्याकाण्ड
के काक-वृत्तान्त का काक तो इन्द्रपुत्र जयन्त है।
४४०वें अनु० में रसिकसम्प्रदाय की रचनाओं में रासलीला का वर्णन भावराज्य का विषय है। श्रीराम
परब्रह्म हैं। उनमें विविध भावनाओं से उपासक उनकी उपासना कर सकते हैं। वाल्मीकिरामायण में वर्णित मर्यादा-
पुरुषोत्तम की लीलाएँ प्रकट लीलाएँ हैं।
राम-वनगमन
राम-वनगमन की कथा में वाल्मीकिरामायण, अध्यात्मरामायण, आनन्दरामायण एवं पुराणों का ही
मुख्य प्रामाण्य है।
बौद्ध और जैन कथाओं में तो उसका विकृत रूप ही है। अतएव बौद्धों के अनुसार अशोकवनिका से सीता
का हरण या रावण द्वारा अयोध्या से सीता को ले जाना या राम का हिमालय प्रदेश में वनवास करना आदि
काल्पनिक ही हैं। राम ईश्वरावतार थे, इसलिए नारद का आना और अवतार का उद्देश्य स्मरण कराना अध्यात्म-
रामायण की कथा ठीक ही है।
अनेक रामायण
वाल्मीकिरामायण के अनुसार सीता ने कहा है कि लक्षणज्ञ ब्राह्मणों ने मेरे लिए वनवास कह रखा है—
"वस्तव्यं किल मे वने" (वा० रा० २।२९।८)। वे यह भी कहती हैं कि मैंने जितने रामायण सुने हैं। उनमें
सबमें सीता राम के साथ वन जाती हैं। आनन्दरामायण के अनुसार यह भी तर्क दिया है कि स्वयंवर के समय राम
को पतिस्वरूप में प्राप्त करने के लिए १४ वर्ष वनवास का व्रत किया है। बुल्के कहते हैं, "रामवनवास के अन्य कई
कारण बताये गये हैं। दशरथ द्वारा प्राणियों का वध (वा० रा० २।३९।४), अन्धमुनि-पुत्र-वध (वा० रा०
२।६३।११) एवं पूर्वजन्म में कौशल्या द्वारा गायों के स्तनों का काटना (वा० रा० २।५३।१९)।
"मन्ये खलु मया पूर्वं विवत्सा बहवः कृताः।
प्राणिनो हिंसिता वापि तन्मामिदमुपस्थितम् ॥" (वा० रा० २।३९।४)
"निःसंशयं मया मन्ये पुरा वीर कदर्यया।
पातुकामेषु वत्सेषु मातृणां शातिताः स्तनाः ॥" (वा० रा० २।४३।१७)
"नूनं जात्यन्तरे तात स्त्रियः पुत्रैर्वियोजिताः।
जनन्या मम सौमित्रे तदद्यैतदुपस्थितम् ॥" (वा० रा० ५।५३।१९)
इन वचनों का उक्त निष्कर्ष निकालना सर्वथा अनभिज्ञता ही है। यह तो दुःखाभिभूत प्राणियों की मनो-
भावना का निदर्शन है। इसलिए ‘मन्ये’, ‘नूनम्’ आदि संभावना के सूचक शब्द हैं। कौशल्या अपना दुःख देखकर दुःख के
आधार पर कल्पना करती है, मैं समझती हूँ कि मैंने बहुत प्राणियों का वध किया होगा। उनका फल सामने उपस्थित
है। मैंने निःसंशय पयःपानार्थी बछड़ों की माताओं के (गायों के) स्तनों को काटा होगा। मैंने बहुत सी माताओं
को उनके पुत्रों से वियुक्त किया होगा। वस्तुतः बुल्के बेचारे संस्कृत ज्ञानशून्य होने के कारण ‘मन्ये’ शब्द का उत्प्रेक्षा
अर्थ मानने में समर्थ नहीं। अतः ये सब वनगमन के हेतु नहीं हैं। दुःखी हृदय की कल्पना मात्र हैं। आश्चर्य है बुल्के
को यह कैसे विश्वास हो गया कि कौशल्या या दशरथ या राम को जन्मान्तरीय हेतुओं का किस प्रकार ज्ञान हो गया।
अन्धमुनि-शाप की हेतुता कही जा सकती है और दशरथ को शाप का ज्ञान था ही। प्रत्यक्ष हेतु तो कैकेयी के लिए
वरदान हैं।
अनु० ४४४ वें में बुल्के कहते हैं कि “लक्ष्मण कैकेयी का वध करना चाहते थे। वाल्मीकिरामायण सर्ग २१
के अनुसार लक्ष्मण ने दशरथ को मार डालने का प्रस्ताव किया था एवं कौशल्या ने लक्ष्मण के उस प्रस्ताव का समर्थन
किया था। सभी रामकथाओं में राम इस परीक्षा में खरे उतर कर पिता की आज्ञा के पालन में दृढ़ रहे। परन्तु
उक्त विचार अशुद्ध हैं। वस्तुतः लक्ष्मण जैसे धर्मनिष्ठ व्यक्ति में दशरथ के वध की कल्पना नहीं की जा सकती है।
राम-प्रेमपरतन्त्र लक्ष्मण राम के विरुद्ध जो भी हो उसके प्रति अपना क्रोधमात्र व्यक्त कर रहे थे। वध शब्द का वहाँ
बन्धन भी अर्थ है। कैकेयी के भी वध की बात वहाँ नहीं है। अतएव अगले श्लोक में कहा गया है कि उत्पथ प्रतिपन्न
कार्याकार्य विवेकशून्य गुरु का भी शासन करना चाहिये। कौशल्या ने वध का समर्थन किया, यह कहना सर्वथा ही
निर्मूल है। लक्ष्मण की बात सुनकर रोती हुई शोकव्याकुल कौशल्या ने कहा पुत्र, तुमने लक्ष्मण की बात सुन ली।
अब जो उचित लगता है वह करो—‘यदत्रानन्तरं तत्त्वं कुरुष्व यदि रोचते।’ अनन्तरं युक्तं कार्यम् (तिलक)।
जो उचित है, अच्छा लगता है सो करो—‘‘अनेन कौशल्याया गूढं स्वानभिमतत्वं लक्ष्मणोक्तस्य सूचितम् ।’’
(तिलक) इससे स्पष्ट विदित होता है कि कौशल्या को लक्ष्मण की बात अभिमत नहीं है। ‘यदत्रानन्तरं तत्त्वं कुरुष्व
यदि रोचते।’ इस वाक्य में समर्थन का सूचक कोई भी शब्द नहीं है। ‘अनन्तरम्’ ‘यदि’ ‘रोचते’ तीनों बुल्के के
विरुद्ध हैं।
लक्ष्मण ने कहा—देवकल्प, ऋजु, दान्त तथा शत्रुओं पर भी अनुग्रह करनेवाले राम ऐसे पुत्र का त्याग
कौन कर सकता है। अतः पुनः बाल्यभाव को प्राप्त राजा को वनवास सम्बन्धी बात को राजवृत्त का स्मरण करने-
वाला कौन पुत्र हृदय में ला सकता है। अतः वनवास की बात प्रकट होने के पहले ही मेरे साथ आप को शीघ्र शासन
हस्तगत कर लेना चाहिए। धनुषयुक्त मेरे द्वारा सुरक्षित कृतान्त के समान आप के अभिषेक में विघ्न कौन कर
सकता है। भरत या भरतपक्षीय जो भी विपरीत होगा सबका वध कर दूँगा। यदि कैकेयी के प्रोत्साहन में पिता भी
प्रतिकूल होंगे तो उन्हें बन्धन में डाल दूँगा।
सेनासहित भरत के चित्रकूट पहुँचने पर लक्ष्मण ने जब भरत के वध करने की बात कही तब राम ने
लक्ष्मण को शान्त किया और कहा कि जब स्वयं भरत आये हैं तब धनुष की क्या आवश्यकता है ? भरत को मारकर
सापवाद राज्य से क्या लाभ ? बान्धवों और मित्रों के क्षय से जो द्रव्य मिलता है उसे विषमिश्रित भक्ष्य के समान मैं
कभी नहीं ले सकता हूँ (वा० रा० २।९८।३४)। वन में लक्ष्मण ने कैकेयी को क्रूरदर्शिनी कहा तो राम ने लक्ष्मण
से कहा कि मध्यमा माँ कैकेयी की गर्हणा नहीं करनी चाहिये—‘‘न तेऽम्बा मध्यमा तात गर्हितव्या ।’’ (वा० रा०
३।१६।३७) अतः स्पष्ट है कि प्रकृत में कैकेयी या दशरथ के मार डालने की बात यदि लक्ष्मण ने कही होती तो
राम ने अवश्य ही उसका विरोध किया होता। दशरथकथानम् के अनुसार सौतेली माँ के षड्यन्त्र के भय से
अध्याय अयोध्याकाण्ड ४६९
दशरथ राम और लक्ष्मण दोनों पुत्रों को बन में भेज देते हैं। अनामकं जातकं के अनुसार मामा के आक्रमण की
तैयारियाँ सुनकर स्वेच्छा से राम वन जाते हैं। पउमचरियं के अनुसार भी भरत को राज्य देने का समाचार सुनकर
वे स्वेच्छा से वन जाते हैं।
तिब्बती रामायण के अनुसार जब पिता 'किसको राज्य दें?' इस सम्बन्ध में किंकर्तव्यविमूढ़ हो गये तब
राम आश्रम में जाकर तपस्या करने लगे। सेरीरामरामायण के अनुसार मन्थरा को पीटने के कारण राम की बदनामी
हो गयी थी। सीता-स्वयंवर के समय भरत को राज्य दिये जाने का समाचार सुनकर राम राजधानी न लौटकर
सीता एवं लक्ष्मण के साथ वन चले गये। सेरीराम के अन्य पाठ के अनुसार सीता, राम और लक्ष्मण घर लौट आते
हैं। भरत की माता भरत के लिए राज्य माँग लेती है और दशरथ के सोते समय ही राम को राज्य से वञ्चित होने
का समाचार सुनाती है। राम प्रसन्न होकर ऋषि बनने के लिए वन चले जाते हैं।
सिंहली रामकथा के अनुसार शनि की अशुभ दशा से बचने के लिए राम राजधानी छोड़कर सात वर्ष वन में
रहते हैं। पाश्चात्य वृत्तान्त नं० १ के अनुसार ताड़का-वध के प्रायश्चित्तस्वरूप राम तपस्या करने के लिए बन चले जाते
हैं। किसी अन्य वृत्तान्त के अनुसार एक ब्राह्मण के शाप से राम का ईश्वरीय ज्ञान लुप्त हो गया था। बाद में कैकेयी
की प्रार्थना से राम स्वेच्छा से ही वन में प्रवेश करते हैं। वस्तुतः मूल प्रमाण से जो लोग जितने दूर हुए हैं उन लोगों
की रामकथाओं में उतनी ही अधिक विकृतियाँ हुई हैं। भारतीय रामायणों, पुराणों, महाभारत तथा संहिताओं की
रामकथाओं तथा दूरत्व के दोषों के कारण या दुरभिसन्धि के कारण ये विकृतियाँ आ गयी हैं उनका समन्वय निरर्थक
एवं असम्भव ही हैं। यही कहा जा सकता है कि जिस किसी तरह भी राम-सम्बन्ध होना अच्छा ही है।
'भाव कुभाव अनख आलसहूँ। नाम जपत मङ्गल दिसि दसहूँ।'
(रा० मा० १।२७।१)
फिर भी रामायण तथा रामतत्त्व का याथात्म्य समझने के लिए वाल्मीकिरामायण, अध्यात्मरामायण,
आनन्दरामायण, महाभारत तथा पुराणों का ही आश्रयण अपेक्षित है। उसके बिना मूल आदर्श से वञ्चित रह जाने की
अधिक सम्भावना है।
कैकेयी को वर-प्राप्ति
४४७ वें अनु० में बुल्के कहते हैं "वाल्मीकिरामायण के अनुसार देवासुरसंग्राम में शम्बरासुर से युद्ध करते
हुए दशरथ आहत होकर कैकेयी द्वारा रणभूमि से हटाये जाते हैं। इसके लिए दशरथ उन्हें दो वर प्रदान करते हैं।
इनमें से वह एक से भरत के लिए राज्य और दूसरे से राम के लिए वनवास माँगती है-
"तत्राकरोन्महायुद्धं राजा दशरथस्तदा ।
असुरैश्च महाबाहुः शस्त्रैश्च शकलीकृतः ॥
अपवाह्य त्वया देवि संग्रामाद्भ्रष्टचेतनः ।
तत्रापि विक्षतः शस्त्रैः पतिस्ते रक्षितस्त्वया ॥
तुष्टेन तेन दत्तौ ते द्वौ वरौ शुभदर्शने ।
स त्वयोक्तः पतिर्देवि यदेच्छेयं तदा वरम् ॥
गृह्णीयाम्...............।" (वा० रा० २।९।१५-१७)
वाल्मीकिरामायण पश्चिमोत्तरीय पाठ में कहा गया है कि एक ब्राह्मण को प्रसन्न कर कैकेयी ने विद्याबल
पाया था। जिससे वह पति को बचाने में सफल हो सकी थी। शम्बर युद्ध में माया का सहारा लेता था, पर कैकेयी
४७० रामायणमीमांसा चतुर्दश
को भी वह माया विदित थी, अतः कैकेयी ने शम्बर का माया-प्रभाव नष्ट कर दशरथ को बचाया था। तेलगू द्विपद-
रामायण ( २।२ ) में ऐसा भी वृत्तान्त है कि युद्ध में दशरथ के रथ का अक्ष टूटा देखकर कैकेयी ने उसमें अपना
हाथ डाल दिया ( उन्हें उसी का वरदान मिला था कि हाथ लोहसार का हो जायेगा ) । ब्रह्मपुराण ( अ० १२३ ),
पद्मपुराण, अध्यात्मरामायण ( २।१।६६ ), आनन्दरामायण ( १।१।८२ ) तथा रामकियेन ( अध्याय १४ ) ।
भावार्थरामायण के अनुसार अन्ध मुनि के शाप के कारण दशरथ के राज्य में अनावृष्टि हो गयी थी ।
दशरथ इन्द्र से युद्ध करने गये । उसमें अक्ष टूट जाने पर कैकेयी ने अपनी भुजा से रथ संभाला था। इन्द्र की पराजय
हुई थी । कृत्तिवासरामायण और असमिया बालकाण्ड के अनुसार एक वर शम्बरासुर के युद्ध में मिला था और
दूसरा वर दशरथ के व्रण की पीब चूस लेने के कारण मिला था । पाश्चात्य वृत्तान्त नं० ३ तथा नं० १३ के
अनुसार बिच्छू के डंक से पीड़ित दशरथ को स्वस्थ करने के कारण दूसरा वर मिला था ।
सेरीराम में भी ऐसी ही कथा है। वसुदेवहिण्डि में कामशास्त्रनिपुणता के कारण कैकेयी को एक वर मिला
था । दूसरा वर, युद्ध में किसी राजा ने दशरथ को बन्दी बना लिया था, कैकेयी ने सेना का नेतृत्व कर विरोधी
राजा को हराकर दशरथ को मुक्त कराया था, तब मिला था ।
कहना न होगा कि आर्ष वाल्मीकिरामायण और पुराणों की ही कथाएँ श्रद्धेय हैं। बहुत से लोग अपनी
रचनाओं में मौलिकता और चमत्कृति लाने की दृष्टि से भी अपनी अभिनव कल्पनाओं को निविष्ट कर देते हैं ।
पउमचरियं के अनुसार स्वयंवर में दशरथ का रथ हाँक कर अन्य राजाओं के विरुद्ध दशरथ की सहायता करने के
कारण वर मिला था ।
महाभारत ( ३।२६१।२१ ), रामकियेन तथा पद्मपुराण के अनुसार एक ही वरदान से भरत के लिए
राज्य और राम के लिए वनवास माँगा गया था। परन्तु कई स्थलों में जातित्वात् एकवचन का प्रयोग हो जाता है,
अतः दो वरदानों की बात ही प्रामाणिक है। ब्रह्मपुराण ( अध्याय १२३ ) के अनुसार देवासुरयुद्ध में कैकेयी ने अपने
हाथ से दशरथ-रथ का टूटा हुआ अक्ष सम्भाला था। इसपर प्रसन्न होकर दशरथ ने तीन वर दिये थे। कल्पभेद से
भी पुराणों का समन्वय किया जा सकता है ।
कैकेयी का दोष निवारण
आदि कवि वाल्मीकि ने कैकेयी की कुटिलता का स्पष्ट शब्दों में चित्रण किया है। कहा जाता है कि राम
ने कैकेयी के सम्बन्ध में यह शङ्का की थी कि वह देवी राज्य के कारण कहीं महाराज दशरथ का ही प्राण न ले ले
और कहीं कौशल्या और सुमित्रा को जहर न दे दे । ( वा० रा० २।५३।७-१८ ) । युद्धकाण्ड में सीता ने भी श्रीराम
का माया सिर तथा धनुष उनके सामने उपस्थित करने पर कहा था कि कलहशीला कैकेयी ने सारे कुल का उत्सादन
कर डाला—
"कुलमुत्सादितं सर्वं त्वया कलहशीलया" ( वा० रा० ६।३२।४ )
परन्तु ऐसी सभी बातें दुःख और शोक के आवेश का तात्कालिक परिणाम हैं। ये उनके हृद्गत भावों
के सूचक नहीं हैं। भारद्वाज ठीक कहते हैं—राम के वनवास से देवताओं, दानवों तथा भावितात्मा ऋषियों का
हित ही होगा। इसमें कैकेयी का कोई दोष नहीं है ( वा० रा० २।९२।३१ ) ।
राम ने भी भरत से कहा था—विवाह के समय महाराज ने मां कैकेयी के पिता से कैकेयी के पुत्र के
लिए राज्य देने की प्रतिज्ञा की थी ( वा० रा० २।१०७।३ ) । गौड़ीय तथा पश्चिमोत्तरीय पाठों में कहा गया है कि
शाप-मोहित होकर कैकेयी मन्थरा के जाल में फँस गयी थी। विमलसूरि के अनुसार भरत का वैराग्य दूर करने के
लिए राज्य माँगा गया था। सीता और लक्ष्मण के साथ राम स्वेच्छा से ही वन चले गये। सबको शोकातुर देखकर
कैकेयी ने ही भरत को राम को लौटा लाने के लिए भेजा था, किन्तु राम भरत का अभिषेक करके उन्हें अयोध्या
लौटा देते हैं। तत्त्वसंग्रहरामायण के अनुसार अयोध्यावासियों को दुखी देखकर कैकेयी स्वयं द्रवित हो जाती है। वह
राम की आराधना करके क्षमा माँगती है। प्रतिमानाटक के अनुसार शाप के कारण पुत्रवियोग से दशरथ की मृत्यु
अनिवार्य थी। कैकेयी ने राम को विकट विपत्ति से बचाने के लिए वसिष्ठादि से परामर्श करके राम को वनवास
दिलाया था। १४ दिन के स्थान में भूल से १४ वर्ष मुख से निकल गया। महावीरचरित तथा अनर्घराघव के
अनुसार स्वयंवर के समय शूर्पणखा मन्थरा के वेष में मिथिला पहुँच कर दशरथ को कैकेयी का जाली पत्र देती है
जिसमें वर केवल राम का वनवास ही मांगा गया है। फलतः राम मिथिला से ही वन चले जाते हैं। अध्यात्मरामायण
(२।२।४४-४६) के अनुसार सरस्वती की प्रेरणा से कैकेयी वैसा करती है। आनन्दरामायण तथा रामचरितमानस
में भी यही बात है। रामलिङ्गामृत (सर्ग १२) के अनुसार देवेन्द्र की प्रेरणा से कैकेयी राम को वन भेजती हैं।
अध्यात्मरामायण के अनुसार राम ने कहा था कि वाणी मुझसे प्रेरित होकर आपके मुख से निकली थी—
“मयैव प्रेरिता वाणी तव वक्त्राद् विनिर्गता।” (२।७।६३)
किन्हीं सूक्ष्म अदृष्ट कारणों से विविध घटनाएँ घटती ही हैं। इसमें वाल्मीकिरामायण का भी कोई
विरोध नहीं है।
मन्थरा
मन्थरा के सम्बन्ध की भी विभिन्न कथाएँ संगत हैं। अग्निपुराण (अध्याय ६६।८) के अनुसार राम ने
बाल्यावस्था में मन्थरा का पैर पकड़ कर खींचा था। इस कारण उसने कैकेयी को उकसाया था। अन्य रामकथाओं
में इसी का पल्लवन किया गया है। सत्योपाख्यान के अनुसार विरोचन दैत्य की पुत्री ने देवासुरयुद्ध में देवताओं के
विमानों और वाहनों को अपने पाशों से बाँध दिया था। इसपर विष्णु की आज्ञा से इन्द्र ने उसे वज्र से मारा था।
उस वैर से ही उसने मन्थरा बनकर बदला चुकाया। आनन्दरामायण (९।५।३५) के अनुसार वही पूतना बनी है।
कल्पान्तर में वही कुब्जा हुई थी (आ० रा० १।२।३)। भारतीय संस्कृति के अनुसार राम और कृष्ण साक्षात्
परब्रह्मस्वरूप ही हैं। उनका यथाकथञ्चित् सम्बन्ध भी कल्याणकारक है, अतः उनके अनुकूल तथा प्रतिकूल सभी का
कुछ विशिष्ट स्थान है। इसी दृष्टि से उनकी जन्मान्तरीय कथाओं की छानबीन की गयी है। पर जन्मान्तरीय ज्ञान
ऋषियों को ही हो सकता है, अन्य को नहीं, अतः आर्ष पुराणादि ही उस सम्बन्ध में प्रमाण हैं, अन्य नहीं।
पञ्चदश अध्याय
अरण्यकाण्ड
अरण्यकाण्ड में ३१ वें सर्ग के सम्बन्ध में भी ऋषियों के स्वागत को बुल्के प्रक्षेप कहते हैं। इसके अनुसार
अकम्पन रावण के पास जाकर खर के वध का समाचार सुनाता है। सीता के सौन्दर्य की प्रशंसा कर उनको हर
लेने का परामर्श देता है। रावण इसके लिए मारीच के पास जाकर सहायता माँगता है। मारीच राम की वीरता की
प्रशंसा करके सीता-हरण रोक देता है। वाल्मीकिरामायण के गौड़ीय व पश्चिमोत्तरीय पाठ में यह सर्ग नहीं है।
उनके अनुसार शूर्पणखा ही सीता के सौन्दर्य की प्रशंसा करती है। इसी तरह ६० वें सर्ग में राम वृक्षों एवं पशुओं
को सम्बोधित करके सीता का पता पूछते हैं—यह गौड़ीय पाठ में बुल्के के अनुसार ६२ वें तथा ६३ वें सर्ग में वर्णित
राम का विलाप ६० वें सर्ग की पुनरावृत्ति है।
अयोमुखीवध-वृत्तान्त भी दाक्षिणात्य पाठ में ही है। इन्द्र द्वारा सीता के पास पायस लाने का वृत्तान्त
दाक्षिणात्य पाठ सर्ग ५६ में प्रक्षिप्त है, परन्तु वह अन्य पाठों में प्रक्षिप्त नहीं है।
याकोबी के अनुसार “आदिरामायण में चित्रकूट के लिए प्रस्थान करने के बाद अरण्यकाण्ड के ११ वें सर्ग
का आरम्भ मिलता है।
“अग्रतः प्रययौ रामः सीता मध्ये सुशोभना।
पृष्ठतस्तु धनुष्पाणिर्लक्ष्मणोऽनुजगाम ह॥”
अनन्तर पञ्चवटी में आगमन का वर्णन था (१५ वां सर्ग)। उनके अनुसार विराध-वध, शरभङ्ग,
सुतीक्ष्ण तथा अगस्त्य के आश्रमों में गमन, सीताहरण से पहले जटायु से भेंट ये सब वृत्तान्त आदिवाल्मीकिरामायण
में नहीं थे, क्योंकि आधिकारिक कथावस्तु के दृष्टिकोण से उनका महत्त्व नहीं है। भरत के प्रस्थान के पश्चात् शूर्पणखा
आगमन तक की ११-१२ वर्ष की अवधि का कुछ वर्णन करने के उद्देश्य से उपर्युक्त वृत्तान्त रखे गये होंगे।” बुल्के की
दृष्टि में भी उनका यह अनुमान न्यायसङ्गत है। ऐसी भी रामकथाएँ हैं जिनमें सीताहरण के पश्चात् ही राम जटायु
से मिलते हैं तथा रामायण से भी ऐसी ही ध्वनि निकलती है। परन्तु यह ठीक नहीं है। केवल अनुमानमात्र के
आधार पर प्रामाणिक परम्पराप्राप्त पाठों का अपलाप नहीं किया जा सकता। पाठ के अनुसार घटनाओं का अस्तित्व
जानना उचित है। अनुमान के अनुसार विद्यमान पाठों का अपलाप नहीं किया जा सकता। पाठभेद के आधार पर
भी ऐसी कल्पना करना पाठभेद का दुरुपयोग करना ही है। कहा जाता है—
“अनेन सीता वैदेही भक्षिता नात्र संशयः।
गृध्ररूपमिदं व्यक्तं रक्षो भ्रमति काननम्॥” (वा० रा० ३।६७।११)
इस वचन से यही ध्वनि निकलती है कि जटायु को राम पहले से नहीं जानते थे, परन्तु यह ठीक नहीं है,
क्योंकि यह तो शोकव्याकुल राम का भ्रममात्र था। पिछले प्रसंग से विदित होता है कि सीता जटायु से परिचित थीं।
अतएव सीता ने कहा था जटायो ! राम और लक्ष्मण के लिए मेरे हरण का सारा वृत्तान्त कह देना—
“रामाय तु यथातथ्यं जटायो हरणं मम।
लक्ष्मणाय च तत्सर्वमाख्यातव्यमशेषतः॥” (वा० रा० ३।४९।४०)
इससे यह भी ध्वनि निकलती है कि सीता जटायु से परिचित थीं। राम जिस वन में विचरण कर रहे हैं
वहीं अगस्त्य, सुतीक्ष्ण आदि के आश्रम हैं। परम आस्तिक वैदिक राम उन लोगों से न मिलते यह कैसे संभव हो सकता
था ! वस्तुतः याकोबी या बुल्के इन कथाओं के सर्गों को इसलिए प्रक्षिप्त कहते हैं कि इनमें राम की
दिव्यता और अलौकिकता का वर्णन है। शरभङ्ग और अगस्त्य के आश्रमों में देवताओं सहित इन्द्र का
वर्णन है। अगस्त्य द्वारा राम के लिए दिव्य धनुष का प्रदान वर्णित है। राम के अवतारत्व का. भी वर्णन
है। अकम्पन के वृत्तान्त में भी राम के अवतारत्व का वर्णन है। इसी लिए अवतारत्व-स्वीकार अभीष्ट न
होने से ये सब दुष्ट कल्पनाएँ हैं। रामायण के अनुसार रावणादि राक्षसों के वधार्थ राम का अवतार हुआ
है। ऋषियों और देवताओं का असुरों और राक्षसों से मुख्य विरोध है। अतः राम का देवताओं तथा
ऋषियों से परामर्श ग्रहण करके कार्य करना महत्त्वपूर्ण ही है। फिर मौसरे भाई याकोबी या बुल्के का
इन्हें महत्त्वपूर्ण न मानना निरी अज्ञानता ही है।
इसी तरह अनसूया-सीता-संवाद को भी प्रक्षिप्त कहना प्रमाद है, यह कहा जा चुका है।
विराध-वध के बाद उसके दिव्य रूप धारण करने का उल्लेख दाक्षिणात्य पाठ में न होने पर भी “अप्रति-
षिद्धं परमतमनुमतं भवति” के अनुसार अप्रतिषिद्ध परमत अनुमत ही माना जाता है और वह गौडीय पाठ तथा
अध्यात्मरामायण के अनुसार ठीक ही है। कल्पभेद से कभी तुम्बुरु कुबेर के शाप से विराध बना था। उसी कल्प में
दुर्वासा द्वारा शापित विद्याधर विराध बनता है।
४५९ वें अनु० का खण्डन पिछले प्रसंग में किया जा चुका है। वाल्मीकिरामायण के अनुसार राम मर्यादा-
पुरुषोत्तम हैं। श्रीमद्भागवत के अनुसार भी राम का अवतार मर्त्यशिक्षणार्थ है, अतः राम ऋषियों के आश्रम में जाते
हैं, उनका दर्शन करते हैं। वे मुनियों का पाद-स्पर्श करते हैं। ऋषि लोग राम को प्रिय अतिथि मानकर इतना
आदर करते हैं कि वे उनको बिना देखे ब्रह्मलोक भी जाना नहीं चाहते—
ब्रह्मलोकं न गच्छामि त्वामदृष्ट्वा प्रियातिथिम् ।” ( वा० रा० ५।२९।३ )
इस सम्बन्ध में कम्बरामायण ( ३।२ ) का वर्णन ठीक ही है कि इन्द्र शरभङ्ग को ब्रह्मलोक ले जाने के
लिए आये थे, परब्रह्म विष्णुरूप राम से मिलकर ही वे मुक्ति के पद को प्राप्त हुए। “राम अगस्त्य के पास पहुँचकर
उनके पैर छूते हैं” वाल्मीकिरामायण की यह बात ठीक ही है। परन्तु अगस्त्य उनको केवल एक राजा मानकर नहीं,
किन्तु सर्वलोक का राजा ईश्वर मानकर उनका आतिथ्य करते हैं। लौकिक राजा एक राज्य का राजा होता है।
सर्वलोक का राजा ईश्वर ही हो सकता है, वही ऋषियों का भी पूज्य हो सकता है, सामान्य राजा नहीं।
“राजा सर्वस्य लोकस्य धर्मचारी महारथः ।
पूजनीयश्च मान्यश्च भवान् प्राप्तः प्रियातिथिः ॥”
अध्यात्मरामायण, आनन्दरामायण, भावार्थरामायण तथा तुलसीकृत रामचरितमानस में राम के ऐश्वर्य-
प्रधान रूप का वर्णन है, अतः उनके अनुसार ऋषि लोग उनकी स्तुति, पूजा आदि करते हैं। ऋषि लोग उनका
परमेश्वर के रूप में सम्मान करते थे। अध्यात्मरामायण, आनन्दरामायण तथा पुराणों का यही दृष्टिकोण है।
लक्ष्मण का संयम
अध्यात्मरामायण के अनुसार जो बारह वर्ष तक निद्रा एवं आहार छोड़ सकता है, वही मेघनाद का वध
भी कर सकता है—युद्धकाण्ड सर्ग ८ । कृत्तिवासरामायण में इसी बात का उपबृंहण है।
“नाहं जानामि केयूरे नाहं जानामि कुण्डले ।
नूपुरे त्वभिजानामि नित्यं पादाभिवन्दनात् ॥” ( वा० रा० ४।६।२२ )
४७४ रामायणमीमांसा पञ्चदश
यह श्लोक भी लक्ष्मण के संयम का सूचक है। लक्ष्मण कहते हैं कि मैं सीता के केयूरों और कुण्डलों को
नहीं पहचानता, किन्तु नित्य पादवन्दना के कारण उनके नूपुरों को पहचानता हूँ, ये उन्हीं के हैं। विश्वामित्र
की बला और अतिबला विद्याओं में ये गुण विद्यमान थे जिनसे श्रम, ताप और रूपविपर्यय तथा क्षुधा-पिपासा की
बाधा नही होती थी—
“मन्त्रग्रामं गृहाण त्वं बलामतिबलां तथा ।
न श्रमो न ज्वरो वा ते न रूपस्य विपर्ययः ॥
न च सुप्तं प्रमत्तं वा धर्षयिष्यन्ति नैर्ऋताः।
क्षुत्पिपासे न ते राम भविष्येते नरोत्तम ॥” (वा० रा० १।२२।१३,१८)
यद्यपि वाल्मीकिरामायण के अनुसार विश्वामित्र ने यह विद्या राम को ही प्रदान की थी। तिलकटीका-
कार कहते हैं—“'गृहाण त्वं' में 'त्वम्' उपलक्षण है। लक्ष्मण को भी वह विद्या दी गयी है, क्योंकि क्षुधा और
पिपासा के सहनारूप फल दोनों में ही परिलक्षित होते हैं। राक्षसरूपी अरियों के वधार्थ इसकी अपेक्षा भी दोनों को
ही थी।
“तौ तत्र हत्वा चतुरो महामृगान् वराहमृश्यं पृषतं महारुरुम् ।
आदाय मेध्यं त्वरितं बुभुक्षितौ वासाय काले ययतुर्वनस्पतिम् ॥”
( वा० रा० ३।५५।३२ )
“बहून् मेध्यान् मृगान् हत्वा चेरतुर्यमुनात्तटे ।” ( वा० रा० ३।५५।३२ )
इत्यादि जहाँ कहीं राम, लक्ष्मण आदि का साथ भोजन करना वर्णित है वहाँ भी 'ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य
लोके' ( क० उ० १।३।१ ) “अनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति” के अनुसार “एकः पिबति अन्यः पाययति
पिबन्तौ” की तरह समझना चाहिये ।
जीव कर्मफल का भोक्ता है ईश्वर अभोक्ता द्रष्टा ही है तथापि जैसे एक के छत्री होने पर भी बहुत
छत्रहीन यात्रियों में 'छत्रिणो यान्ति' का व्यवहार होता है वैसे ही एक के भोक्ता होने पर भी दोनों में भोक्तृत्व का
व्यवहार होता है, उसी तरह राम और सीता के भोजन में ही तीनों के भोक्तृत्व का व्यवहार हो सकता है। कम्ब-
रामायण की कल्पना ठीक ही है कि शृङ्गवेर में निद्रादेवी लक्ष्मण के सामने आयी तब उन्होंने कह दिया कि अयोध्या
लौटकर आयेंगे, तब आना ( कम्ब रा० २।६।११ ) ।
द्विपदरामायण के अनुसार उन्होंने उसे उर्मिला के पास भेज दिया। अतएव लक्ष्मण के लौटने तक उर्मिला
सोती ही रही । रामकेति ( सर्ग १ ) के अनुसार निद्रा लक्ष्मण की एक हितैषिणी थी। जो नींद देने आया करती
थी । गुह मिलने के बाद उन्होंने उससे कहा कि तुम १४ वर्ष बाद आना । इस अवधि में भोजन भी नहीं करूँगा ।
तुम क्षुधा को मुझसे हटाकर स्वस्थ सबल बनाये रखो । निद्रा ने वैसा ही करने की प्रतिज्ञा की ।
सीताहरण के पश्चात् राम सीता के पलंग पर मूर्च्छित होकर गिर जाते हैं । लक्ष्मण चालीस दिन तक
तक निद्रा और अन्न त्याग कर राम का सिर गोद में लेकर निश्चल बैठे रहे। आकाशवाणी उनके इस संयम की
प्रशंसा करती है । यह भी कहती है कि राम-सीता का वियोग १२ वर्ष बाद समाप्त होगा। इन सबमें आर्षवचन ही
प्रमाण हैं । अन्य कथाओं में अनेक कल्पनाएँ जुड़ गयी हैं ।
अनु० ४६२ में बुल्के कहते हैं कि “वाल्मीकिरामायण में सीता लक्ष्मण के सम्बन्ध का कोई विशेष ध्यान
नहीं रखा गया । लक्ष्मण राम और सीता दोनों की सेवा करते हुए निःसंकोच बातचीत तथा व्यवहार करते थे ।
लक्ष्मण राम तथा सीता दोनों ही के पैर धोते थे ।” ( वा० रा० २।५०।४९ )
अध्याय] अरण्यकाण्ड ४७५
परन्तु इसमें संकोच का प्रश्न ही नहीं था। क्योंकि लक्ष्मण सीता और राम को अपने माता-पिता मानते
थे। फिर पैर धोने में क्या आपत्ति हो सकती है। वस्तुतः श्लोक का वैसा अर्थ स्पष्ट नहीं है, जैसा अज्ञानी बुल्के ने
किया। श्लोक यह है—
“तस्य भूमौ शयानस्य पादौ प्रक्षाल्य लक्ष्मणः ।
सभार्यस्य ततोऽभ्येत्य तस्थौ वृक्षमपाश्रितः ॥ वा० रा० २।५०।४९)
अर्थ—भूमि पर भार्या के सहित सोये राम के दोनों पैरों का प्रक्षालन करके वहाँ से हटकर वृक्षमूल में
लक्ष्मण खड़े हो गये।
बुल्के यह भी कहते हैं—राम लक्ष्मण को आज्ञा देते हैं कि वह सीता को उठाकर नाव पर रख दे—
“सीतां चारोपयान्वक्षं परिगृह्य मनस्विनीम् ।” ( वा० रा० २।५२।७५ )
वस्तुतः भारतीय संस्कृति एवं संस्कृत से अपरिचित बुल्के अनेक स्थलों पर अर्थ समझने में प्रमाद करते
हैं। पीछे भी लिखा है कि रावण को मारने के बाद राम हमारे दर्शन के योग्य बनेंगे, वैसे ही यहाँ भी प्रमाद ही है।
श्लोक यह है—“आरोह त्वं नरव्याघ्र स्थितां नावमिमां शनैः ।
सीतां चारोपयान्वक्षं परिगृह्य मनस्विनीम् ॥”
श्लोकार्थ यह है कि हे नरव्याघ्र ! घाट पर स्थित इस नाव को पकड़ कर सीता को नाव पर चढ़ाओ और
पश्चात् तुम चढ़ो । “उठाकर नाव पर रख दो” यह तो किसी शब्द का अर्थ नहीं है। चढ़ाने का भी यही अर्थ हैं कि
चढ़ने में सहायता दे दो ।
“एक ही पर्णशाला का निर्माण हुआ था, अतः तीनों एक में ही रहते थे ।” यह कथन भी ठीक नहीं है।
यद्यपि माता, पिता और पुत्र के समान एक पर्णशाला में भी रहने में कोई दोष नहीं है, फिर भी ऐसा कोई वचन नही
है कि तीनों एक ही पर्णशाला में सोते थे। प्रत्युत सर्वदा राम और सीता के रक्षण की दृष्टि से धनुष-बाण लेकर
लक्ष्मण कुछ दूर ही रहकर प्रहरी का काम करते थे। राम के सोने पर तमसातीर पर सुमन्त्र और सूत दोनों ही
जागते हुए पहरा दे रहे थे—
“जाग्रतोरेव तां रात्रिं सौमित्रेरुदितो रविः ।
सूतस्य तमसा तीरे रामस्य ब्रुवतो गुणान् ॥” ( वा० रा० २।४६।१६ )
“तं जाग्रतमदम्भेन भ्रातुरर्थाय लक्ष्मणम् ।
गुहः संतापसंतप्तो राघवं वाक्यमब्रवीत् ॥” ( वा० रा० २।५१।१ )
गुह के प्रार्थना करने पर भी कि किसी भय से नहीं, किन्तु धर्मबुद्धि से हम जागरण करते हैं। सीता के
साथ राम के भूमि पर सोते हुए निद्रा और सुख कहाँ ?
बुल्के भी यह कहते है “अपहरण के ठीक पहले राम की आर्त वाणी सुनकर अपने पति की सुरक्षा के
विषय में चिन्तित सीता उत्तेजित होकर अपने देवर पर यह आरोप लगाती हैं कि वह अपनी भाभी पर अनुरक्त हैं,
इसी लिए राम के साथ वन में चले आये हैं ।” वस्तुतः यहाँ भी बहिर्मुखता के कारण ही अन्यथा कल्पना की जाती
है। तिलक आदि टीकाओं में स्पष्ट वर्णन है।
व्यावहारिक दृष्टि से यह सब शोकावेश का प्रभाव था। परमार्थतः तो लोकव्यवहार के अनुसार वह
नाट्यमात्र था। लक्ष्मण ने भी लोकवत् ही व्यवहार किया था ।
एवं विबोधिततत्त्वोऽपि मनुष्यनाटनेन लोकव्यवहारविल्लक्ष्मणोऽवददित्याह ।
बुल्के कहते हैं "सीता की इसी लाञ्छना के अनुसार स्कन्दपुराण के नागरखण्ड (अ० २) में लक्ष्मण
के स्वामिद्रोह की कल्पना कर ली गयी है।" परन्तु यह प्रमाद ही है। बुल्के भारतीय अर्थवादों की स्थिति से
अपरिचित ही हैं।
यह ठीक है निम्नोक्त वर्णन पुराणों में है कि—
पितृकूपिका तीर्थ में राम श्राद्ध करते हैं, सीता कहीं छिप जाती हैं। लक्ष्मण को विप्रों की सेवा करनी
पड़ती है। श्राद्ध के बाद सीता दिखायी पड़ती हैं जिससे लक्ष्मण को क्रोध होता है। वह सांथरी के लीपने तथा पैर
धोने के लिए पानी ले आना भी अस्वीकार करते हैं। बाद में कोपसंरक्त लक्ष्मण दूर से राम को देखते हैं तो उनके
मनमें राम का वध करके सीता को पत्नी बना लेने का विचार उठता है।
“हृत्वैवं राघवं सुप्तं सीतां पत्नीं विधाय च।
किं गच्छामि निजं स्थानं विदेशं वापि दूरतः” ॥४५॥
प्रातः राम और सीता दक्षिण के लिए प्रस्थान करते हैं। लक्ष्मण राम के वध का अवसर ढूंढ़ते हुए दिन-
भर उनका पीछा करते हैं—
“लक्ष्मणोऽपि धनुः सज्यं कृत्वा संधाय सायकम्।
अनुव्रजति पृष्ठस्थस्तस्य छिद्रं विलोकयन्” ॥४९॥
शाम को गोकर्ण पहुँचकर लक्ष्मण राम के पास जाकर अपना अपराध स्वीकार करते हैं और राम से
क्षमा पाते हैं। लक्ष्मण आत्मशुद्धि के उद्देश्य से राम के हाथ से मृत्यु चाहते हैं। नहीं तो अग्नि में प्रवेश करने की
सोच रहे थे। उसी समय मार्कण्डेय आ पहुँचते हैं तथा स्वामिद्रोह के लिए बालमण्डन तीर्थ में स्नान करने का परामर्श
देते हैं। पद्मपुराण (सृष्टिखण्ड २९।१२६-१९०) में लक्ष्मण का विद्रोह और पश्चात्ताप वर्णित है, किन्तु
वहाँ सीता के प्रति दुर्भाव का वर्णन नहीं है।
“एहि लक्ष्मण शीघ्रं त्वं पुष्कराज्जलमानय ।
पादप्रक्षालनं कृत्वा शयनं कुरु सत्वरम् ॥१२६॥
विभावर्यां निवृत्तायां यास्यामो दक्षिणां दिशम् ।
लक्ष्मणस्त्वब्रवीद् रामं सीतयाऽऽनीयतां पयः ॥१२७॥
नाहं राम सर्वकालं दासभावं करोमि ते।
इयं पुष्टा च सुभृशं पीवरी च ममाप्युत ॥१२८॥
करिष्यसि किमनया भार्यया वद साम्प्रतम् ।
किं वा मृतस्य ते प्रेत्य इयं यास्यति ते प्रिया ॥१२९॥
रक्षसि त्वं सदाकालं सुपुष्टां चैव सर्वदा।
करोषि क्लेशवहनं सततं मां रघूद्वह ॥१३०॥
मय्यपि क्लेशिते राम परत्र जायते क्षतिः ।
त्वत्कृते च सदा चाहं पिपासां क्षुधया सह ॥१३१॥
सुसहामि न सन्देहः परत्र च निशामय ।
मृतानां पृष्ठतः कश्चित् गतो नैवेह दृश्यते ॥१३२॥
अध्याय अरण्यकाण्ड ४७७
करिष्यसे किमनया वद राघव साम्प्रतम् ।
श्रुत्वा स नोक्तपूर्वं तु वाक्यं लक्ष्मणभाषितम् ॥१३६॥
विमना राघवस्तस्थौ सीता चापि वरानना ॥१३७॥
श्रीराम उवाच
एह्युत्तिष्ठस्व सौमित्रे व्रजामो दक्षिणां दिशम् ।
सौमित्रिरब्रवीद् वाक्यं नाहं यास्ये कथञ्चन ॥१३९॥
व्रज त्वमनया सार्धं भार्यया कमलेक्षण ॥१४०॥
अनारतं दिवा चाहं रात्रौ चैव परन्तप ॥१४६॥
कर्म कर्तुं न शक्नोमि व्रज सौम्य यथासुखम् ॥१४७॥
मा मानुव्रज सौमित्र एको यास्यामि काननम् ।
द्वितीया मे त्वियं सीता रामेणोक्तस्तु लक्ष्मणः ॥१५२॥
अथ गृह्य समुत्तस्थौ रामवाक्यं स लक्ष्मणः ।
मर्यादापर्वतं प्राप्तः क्षेत्रसीमां परन्तप ॥१५३॥
इन्द्रमार्गां नदीं प्राप्य जटाजूटं नियम्य च ।
विहस्य लक्ष्मणेत्युक्त्वा इदमर्पय मे धनुः ॥१८१॥
नापराध्यामि रामस्य कर्मणा मनसा गिरा।
उभौ हस्तौ मुखे कृत्वा साश्रुकण्ठोऽब्रवीदिदम् ॥१८६॥
स्पृष्टौ ते चरणौ देव मम नान्या गतिर्भवेत् ।
ततः सीताब्रवीद् रामं त्यक्तः किमनुजस्त्वया ।
वैषम्यं त्यज्यतां बाले लक्ष्मणे लक्ष्मिवर्धने ॥१८७॥
राघवस्त्वब्रवीत्सीतां नाहं त्यक्ष्यामि लक्ष्मणम् ॥
न कदाचिदपि स्वप्ने लक्ष्मणस्येदृशं प्रिये ।
श्रुतपूर्वं च सुश्रोणि क्षेत्रस्यास्य विचेष्टितम् ॥१८८॥
अत्र क्षेत्रे न सौभ्रात्रं सर्वे हि स्वार्थतत्पराः ।
परस्परं न मन्यन्ते स्वार्थनिष्ठैकहेतवः ॥१८९॥
न शृण्वन्ति पितुः पुत्राः पुत्राणां च तथा पिता ।
न शिष्यो हि गुरोर्वाक्यं शिष्यस्यापि तथा गुरुः ॥
अर्थानुबन्धिनी प्रीतिर्न कश्चित्कस्यचित्प्रियः १॥”१९०॥
× × ×
“हत्वैनं राघवं सुप्तं सीतां पत्नीं विधाय च।
किं गच्छामि निजस्थानं विदेशं वापि दूरतः ॥
लक्ष्मणोऽपि धनुः सज्यं कृत्वा सन्धाय सायकम् ।
अनुव्रजति पृष्ठस्थस्तस्य च्छिद्रं विलोकयन्२ ॥”
× × ×
१. पद्मपुराण सृष्टिखण्ड अध्याय १९ श्लो० १२६-१९० बालमण्डनतीर्थ-माहात्म्य ।
२. स्कन्दपुराण नागरखण्ड अ० २० ।