सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 541, कुल 1049 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 541

४६४ रामायणमीमांसा चतुर्दश
आमिष न खाकर कन्द, मूल, फलों और अग्निपक्व मांस आदि से ही जीवन चलाते हुए वन में निवास करूंगा ।
"ऐणेयं मांसमाहृत्य शालां यक्ष्यामहे वयम् ।” ( वा० रा० २।५६।२२ ) के अनुसार ऐणेय मांस से ही वास्तुशान्ति
आदि कार्य भी राम ने किया था । अतएव श्राद्धादि धर्म में भी शुद्ध मांस का प्रयोग होता है ।
इस दृष्टि से “इदं मेध्यमिदं स्वादु निष्टप्तमिदमग्निना ।” ( वा० रा० २।९६।२ ) इन वचनों के साथ
समन्वय हो जाता है ( तिलक ) । २।४२।१०२ की टीका में तिलककार कहते हैं- 'मांसस्य वन्याहारान्तर्गतत्वान्न
दोषः, मृगयाधर्मकत्वाच्च न मृगहनने दोषः ।' अर्थात् शुद्ध मांस वन्य आहार के अन्तर्गत होने से शुद्ध मृगमांस खाना
दोष नहीं है । इसके अतिरिक्त मृगयाधर्म से मृग मारना भी दोष नहीं है । यदि मृगया भी अप्रामाणिक कही जाय तब
तो मारीचवध आदि सभी कथाओं को प्रक्षेप ही कहना पड़ेगा ( तिलक ) ।
बुल्के कहते हैं कि “महाभारत के रामोपाख्यान में गुह का उल्लेख नहीं है । किन्तु वाल्मीकिरामायण के
अनुसार राम चित्रकूट की यात्रा में अपने सखा गुह के यहाँ रात बिताते हैं । गुह लक्ष्मण तथा सुमन्त्र के साथ सोते
हुए राम और सीता की रक्षा करता है । अगले दिन नौका मँगाकर राम, सीता और लक्ष्मण को गङ्गा पार पहुँचाता
है ।” पर रामोपाख्यान में तो वाल्मीकिरामायण की ही संक्षिप्त कथा वर्णित है । केवट की कथा भी मूल से अविरुद्ध है,
अतः शतकोटिप्रविस्तर रामायण का ही अंश समझना चाहिये । अध्यात्मरामायण के अनुसार चित्रकूट-यात्रा प्रसङ्ग में
ही उसका वर्णन सङ्गत है । राम के चरित्र अनन्त हैं, अतः तापस-वन्दना तथा ग्राम-वधूटियों की कथा भी
प्रामाणिक है ।
अन्धमुनि-पुत्र के वध की कथा अन्य पुराणों और रामायण के अनुसार तो है ही, परन्तु वाल्मीकिरामायण
के अनुसार भी उसे विकास या प्रक्षेप कहना साहस है । तिलक आदि टीकाकारों को वह पाठ सम्मत भी है । ( वा०-
रा० २।६३।४०, ४१ ) में स्पष्ट कहा गया है कि ब्रह्महत्या का भय हृदय से निकाल दो । मैं ब्राह्मण नहीं हूँ, वैश्य से
शूद्रा में उत्पन्न हूँ-
“ब्रह्महत्याकृतं पापं हृदयादपनीयताम् ।
न द्विजातिरनं राजन् मा भूत्ते मनसो व्यथा ॥
शूद्रायामस्मि वैश्येन जातो नरवराधिप ।”
उसकी विभिन्न कथाओं का यथासम्भव समन्वय किया जा सकता है । अन्धमुनि और उसका पुत्र तपोनिष्ठ
था, इसी दृष्टि से क्वचित् उसके ब्राह्मणत्व का व्यवहार हुआ है । "ब्रह्महत्या स्पृशेन्न त्वां वैश्योऽहं तपसि स्थितः ।"
( वा० रा० २।७।२७ ) के अनुसार वह वैश्य था, अतः ब्रह्महत्या का स्पर्श नहीं हुआ । नामभेद की प्रसिद्धि देशभेद
से भिन्न भी हो सकती है ।
सेरीराम और श्याम की कथाओं का समन्वय करने से यही प्रतीत होता है कि हानिकारक हाथियों के ही
मारने का अनुरोध दशरथ से विभिन्न सूत्रों द्वारा किया गया था । उसी प्रसङ्ग में हाथी के भ्रम से दशरथ ने अन्ध-
मुनि-पुत्र को मारा था । अन्धमुनि के अन्ध होने और पुत्रदुःख-प्राप्ति के विभिन्न कारण भी हो ही सकते हैं, अतः वैसे
वर्णन भी अप्रामाणिक नहीं ।
कई कथाओं में कल्पभेद से भेद हुआ है । उसके अनुसार भी रामायणों का समन्वय संभव है । रामचरित-
मानस के अनुसार जनक के चित्रकूटगमन की कथा स्वाभाविक ही लगती है । इतनी बड़ी घटना का पता न लगना भी
संभव नहीं और पता लगने पर तटस्थ या उदासीन रहना भी सम्भव नहीं था, अतः शिव-भुशुण्डि-परम्परा में जनक
की कथा का होना स्वाभाविक है ।