सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 535, कुल 1049 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 535

४५८ रामायणमीमांसा चतुर्दश
रहेगा। 'अथ राजः' यहीं से रामायण का आरम्भ है, यह कहना भी असङ्गत ही है। जब किसी सामान्य लेख का
भी कोई उपोद्घात या भूमिका होती है तब बिना उपोद्घात के वाल्मीकिरामायण का आरम्भ मान लेना कैसे सङ्गत
होगा ? पूर्वोक्त पंक्तियों में न तो शब्दतः और नहीं अर्थतः पुनरुक्ति है। शुक्लयजुः के ४० वें अध्याय में "अनेजदेकं
मनसो जवीयो" (ईशा० उ० ३) "तदेजति तन्नैजति" (ईशा० उ० ५) इत्यादि समान शब्द और समान अर्थ
का आवर्तन होने पर भी किसी को प्रक्षिप्त नहीं माना जाता है। गीता में दूसरे अध्याय के स्थितप्रज्ञ-लक्षणों तथा
१२ वें अध्याय के भक्त-लक्षणों और १४ वें के गुणातीत-लक्षणों में बहुत कुछ समानता है। क्या उन्हें भी प्रक्षेप माना
जाय ? ११ वे अध्याय के अन्त में 'मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः' (गी० ११।५४) जो कुछ कहा गया है वही १२ वें
अध्याय में कहा गया है। विशेषतः भारतीय दृष्टिकोण से सिद्धों के जो स्वाभाविक लक्षण होते हैं वे ही साधकों के
लिए साधन होते हैं। 'अमानित्वम्, अदम्भित्वम्' (गी० १२।७) आदि सिद्ध ज्ञानी के स्वाभाविक गुणों का इसलिए
विस्तृत वर्णन किया जाता है कि वे सब धार्मिक तथा राजनीतिक साधकों के लिए परम अनुकरणीय एवं अनुष्ठेय हैं।
विशेषतः उत्तरमीमांसा के अनुसार ईश्वर के गुणों का वर्णन उपासनार्थ अपेक्षित होता है जैसे सर्वगन्धत्व, सर्वरसत्व,
भामनीत्व, वामनीत्व आदि गुणों से विशिष्ट परमेश्वर की उपासना करने से उपासकों को वे ही सब गुण फल के
रूप में मिलते हैं। उसी तरह उपर्युक्त गुणों से विशिष्ट राम की उपासना करने से वे सब गुण उपासकों को फलरूप
में मिलते हैं। अतः गुणों का वर्णन निरर्थक नहीं है। पर राम के द्वेषी बुल्के को रामोपासना से क्या लेना देना
है। आवृत्ति तो है ही नहीं, साथ ही प्रशंसा भी नहीं है, क्योंकि अविद्यमान गुणों का वर्णन ही प्रशंसा है। भगवान् के
तो विद्यमान गुणों का भी पूरा वर्णन सम्भव नहीं है, फिर अविद्यमान गुणों के वर्णन का तो प्रसङ्ग ही कहाँ है ?
सर्वथापि अयोध्याकाण्ड के प्रथम सर्ग को प्रक्षिप्त कहना अत्यन्त निराधार एवं दुरभिसन्धिपूर्ण है। वस्तुतः इस सर्ग को
प्रक्षिप्त कहने का बुल्के का उद्देश्य यह है कि इससे उनके अभिमत के विरुद्ध राम विष्णु के अवतार सिद्ध होते हैं। उसमें
स्पष्ट कहा गया है दृप्त रावण के वध के लिए देवताओं की प्रार्थना से विष्णु राम के रूप में अवतीर्ण हुए हैं। बुल्के
अयोध्द्यादि पाँच ही काण्डों को प्रमाण मानते हैं। उनमें भी अवतारवाद सिद्ध होने से बुल्के का पक्ष निर्बल होता है।
इसी लिए वे उसे प्रक्षिप्त कहने का वृथा साहस करते हैं। परन्तु उनके तर्क निःसार हैं। यदि उनके मन्तव्यानुसार
बालकाण्ड वाल्मीकिरामायण का है नहीं तो उसकी आवृत्ति कैसे कही जा सकती है ? डा० याकोबी का यह कथन
भी निराधार है कि आदिरामायण में राम के प्रस्थान के अनन्तर उनकी चित्रकूट तक की यात्रा का वर्णन किया
गया था, क्योंकि जिसका वनप्रस्थान से लेकर युद्धकाण्ड तक विस्तृत चरित्रवर्णन है उसके जन्म और जन्मस्थान तथा
उसके गुण और स्वभाव का वर्णन न हो तो उस ग्रन्थ की बड़ी न्यूनता ही समझी जायगी। जिस सीता के वनगमन
एवं हरण का वर्णन है, जिसके लिए समुद्र में सेतुबन्धन हुआ वह कौन थी, कहाँ की थी, उसका विवाह कब कैसे
हुआ था ? इसका वर्णन न होना भी एक चरित्रचित्रण की त्रुटि ही मानी जायेगी। सर्ग ४१-४९ को प्रक्षिप्त कहना
भी वैसा ही है। इसी तरह उनका यह कथन भी असङ्गत ही है कि प्रतीत होता है कि अन्ध मुनि के पुत्र के वध-
प्रसङ्ग रामायण के पूर्व प्रचलित थे; बहुत संभव है सर्ग ६३ और ६४ की भी अधिकांश सामग्री प्रक्षिप्त हो । सर्ग
६६-९६ में भी पुनरावृत्तियाँ पायी जाती हैं। वाल्मीकिकृत रामायण में प्रसङ्ग इतना विस्तृत नहीं था। वस्तुतः
वस्तुस्थिति अनुमान पर निर्भर नहीं होती। अनुमान लोग अपने-अपने संस्कारों के अनुसार कर लेते हैं। कई लोग
यह भी अनुमान कर सकते हैं कि बाइबिल का इतना विस्तृत रूप प्रारम्भ में नहीं रहा होगा। बहुत कुछ
विशेषतः चमत्कार की बातें मत-प्रचारक ईसाइयों ने जोड़ ली होंगी ? पुनरावृत्तियों की भ्रान्ति भी वैसे
ही है। ऋक्संहिता, अथर्वसंहिता तथा यजुःसंहिता में पुरुषसूक्त हैं। सबमें बहुत कुछ समानता ही है, फिर भी शाखा-
भेद से सभी प्रामाणिक पाठ माने जाते हैं। कभी प्रसङ्गानुसार भी वही बात दुबारा कहनी आवश्यक हो जाती है।
१०० वें सर्ग के प्रक्षिप्त होने का कारण यह कहा गया है कि उसमें राम भरत से उनके राज्य के विषय में बहुत से