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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

२४८ रामायणमीमांसा द्वादश
रामासुर ने राम के बल की परीक्षा लेनी चाही । वहाँ युद्ध हुआ । अन्त में रामासुर ने अपनी पराजय मान ली ।
इसके बाद रामासुर ने उन्हें त्रिमंध नामक अस्त्र दिया ।
राम-वनवास
दशरथ वृद्ध थे । वे अपना उत्तराधिकारी राम को बनाना चाहते थे । कैकेयी की बाँदी कुब्जी के कान
में यह सूचना पड़ी । कुब्जी को राम से बैर था, इसलिए उसकी पीठ में एक कूब था । राम ने तीर मारा तो बाहर
आ गया । इसपर बड़ी हँसी हुई थी । राजा ने कैकेयी को वर दिया था । एक बार युद्ध में दैत्य ने बाण से दशरथ के
रथ का धुरा तोड़ दिया था । कैकेयी ने अपना हाथ पहिये में डाल कर ईश्वर से प्रार्थना की कि वह राजा की रक्षा
करे । रानी की सहायता से राजा विजयी हुए । इसपर राजा ने रानी को वर दिया । कुब्जी ने कैकेयी को यह वर
माँगने को तैयार कर लिया कि राम को १४ वर्ष का वनवास और भरत को राज मिले । राजा ने बहुत समझाया
पर रानी हठकर गयी । उन्होंने दुःखी हृदय से कैकेयी की बात मान ली । राम वन चले गये । वे मनुष्यों की भलाई
में सदा तत्पर रहते थे । उन्होंने भूमि को राक्षसों से मुक्त करने का निश्चय किया । दशरथ को राम के वियोग से
बड़ा दुःख हुआ और उनकी मृत्यु हो गयी । राम चलते-चलते सतोंग नदी के तीर पहुँचे वहाँ अहेरियों का राजा
खुनन रहता था । उसने कहा कि आप यहाँ जङ्गल का राज करें । राम ने धन्यवादपूर्वक इस भेंट को अस्वीकार कर
दिया । राम भरद्वाज के आश्रम में पहुंचे । ऋषि ने उनका बड़ा सत्कार किया । ऋषि ने शरभङ्ग आश्रम
जाने को कहा । वह आश्रम भी अयोध्या के निकट था । तब ऋषि ने शतकूट पर्वत पर रहने को कहा । राम
वहाँ जाकर रहने लगे । भरत और शत्रुघ्न राम का सिंहासनारोहण सुनकर बड़े प्रसन्न हुए । अयोध्या पहुंचे
तो वहाँ उत्सव के बजाय रोना पीटना हो रहा था । तुरन्त ही वे वस्तुस्थिति को समझ गये । वे राम के परम भक्त
थे । वे राम का राज्य कैसे ले लेते ? पिता की अन्त्येष्टि करके वे माताओं को साथ लेकर पैदल यात्रा करके राम के
पास पहुँचे और उनसे अयोध्या का राज्य करने का आग्रह किया । राम ने पितृभक्ति के कारण वैसा स्वीकार नहीं
किया और जो इस विपत्ति का मूल कैकेयी थी, उससे भी द्वेष नहीं माना । पर भरत भी राज करने को तैयार
नहीं हुए । तब राम की पादुकाओं को गद्दी पर बैठा कर राम के प्रतिनिधि होकर भरत राज संभालने को तैयार
हुए । भरत ने प्रार्थना की कि यदि आप १४ वर्ष के बाद अयोध्या न लौटे तो हम अग्नि में प्रवेश कर जायेंगे । दुःखी
मन से भरत अयोध्या लौट आये ।
गोदावरी-तट पर
राम उसके बाद और घने जंगलों में चले गये । वहाँ उनको एक राजा, जिसका नाम सुदर्शन था, मिला ।
वह अपनी रानी के साथ तप करता था । उसने राम से अपने साथ रहने का आग्रह किया, पर राम ने वहाँ रहना
स्वीकार नहीं किया । अब वे बीख राक्षस के उपवन में आये । उसको ईश्वर के वरदान से समुद्र एवं अग्निदेव का
बल प्राप्त था । राक्षस के कर्मचारियों ने उन्हें रोका । लक्ष्मण ने सबको मार डाला । बीख ने बदला लेने का निश्चय
किया, पर वह बली होने पर भी राम-लक्ष्मण का मुकाबला न कर सका । अन्त में मारा गया । आगे उन्हें एक
अप्सरा मिली जिसका नाम सोबरी था । ईश्वर की आराधना में त्रुटि होने से उसे जलते हुए जङ्गल में रहने का
शाप मिला था । शाप छूटने की शर्त यह थी कि जब राम उस वन में आकर आग बुझायेंगे तब उसकी मुक्ति होगी ।
राम ने उस दुःखिया की टेर सुनी । आग बुझा दी और अप्सरा को दिव्य रूप प्राप्त करा दिया । आगे राम ऋषि
अगत्त से आश्रम में पहुँचे । ईश्वर ने अपना वह अस्त्र जिससे उन्होंने त्रिपुर को मारा था, इन्हीं अगत्त के संरक्षण में
रख दिया था कि जब राम आयें तो वह उनको दिया जाय । ऋषि से अस्त्र लेकर राम गोदावरी-तट आये । वहाँ
इन्द्र ने पहले ही उनके लिए तीन पर्णकुटियाँ बना रखी थीं ।

अध्याय विदेशी रामकथा की चर्चा ३४९
संमनखा
संमनखा और जिह्वा के पुत्र राक्षस कुम्भकस से राम-लक्ष्मण का सामना हो गया। तपस्या से विपुल शक्ति
प्राप्त करना उसका उद्देश्य था। ब्रह्मा ने उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर उसके लिए एक तलवार फेंक दी। उसने
इसे अपना अपमान समझा, अतः उसने तलवार स्वीकार नहीं की। उसी समय लक्ष्मण फल-फूल लेने जङ्गल में
गये थे। तलवार पड़ी देखकर उन्होंने उठा ली और यों ही हिलाने लगे। पास ही कुम्भकस भी समाधि में बैठा
था। उसकी आँखें खुली थीं। उसे क्रोध आया, दोनों में युद्ध हुआ। लक्ष्मण के हाथ राक्षस मारा गया। उसका
पिता जिह्वा भी उसी समय मारा गया। दशकण्ठ वनयात्रा की तैयारी कर रहा था। लङ्का का रक्षण जिह्वा के
अधीन था। उसने साहस और बुद्धिमत्ता से सप्ताह तक बिना नींद के लङ्का की रक्षा की थी। प्रकृतिवश नींद
आयी, परन्तु सोने से पहले उसने अपना शरीर इतना बढ़ाया कि उसकी जिह्वा ने लङ्का को चारों ओर से घेर
लिया जिससे कि उसके सोते समय कोई लङ्का पर चढ़ाई न कर सके। दशकण्ठ वन से लौटा। उस समय आधी
रात थी। चारों ओर अन्धकार था। नगरी में घुसने का कोई मार्ग नहीं था। उसने सोचा किसी शत्रु ने नगरी को
घेरा है। उसने मार्ग बनाने के लिए चक्र फेंका जो उसकी जिह्वा पर लगा और वह मर गया। पीछे मालूम होने
पर उसे बड़ा दुःख हुआ। उसकी बहन संमनखा विलासिनी थी। वैधव्य जीवन उसके लिए असह्य था। वह कुम्भकस
को देखने गयी। नये पति की तलाश में थी। सुन्दर स्त्री का वेश बनाकर वह राम के पास पहुँची। उनपर मोहित
हो गयी। राम ने उसपर ध्यान नहीं दिया। उसकी आँख सीता पर पड़ी। तो उसने सोचा सीता को समाप्त करने
पर राम को उसके आगे झुकना ही पड़ेगा। वह राक्षसी वेष से सीता से लड़ने लगी। राम ने उसे मार भगाया।
लक्ष्मण ने उसके नाक-कान काट लिये। वह रोमगन नगर गयी। खर से झूठी शिकायत की। खर लड़ने गया।
राम ने रामासुर के बाण से मार दिया। दूषक और तिसिर भी मारे गये।
सीता-हरण
वह झूठ बोलने में दक्ष थी। उसने दशकण्ठ से कहा मैंने जङ्गल में एक सुन्दरी रमणी देखी है। मैं
तुम्हारे लिए उसे ला रही थी, लक्ष्मण ने मेरा जङ्ग-भङ्ग कर दिया। सीता के रूप का हाल सुनकर दशकण्ठ मोहित
हो गया। मण्डो से राय ली तो उसने बहुत समझाया, पर वह सीता के लिए विह्वल था। उसने मारीच को आदेश
दिया कि तुम हरिण का रूप बना कर जाओ और राम तथा लक्ष्मण को सीता से पृथक् कर दो। मारीच ने
आज्ञा का पालन किया। सीता ने सुनहला चुलबुला हरिण देखकर राम से उसे पकड़ने को कहा। राम ने समझाया,
पर उन्होंने हठ किया। राम ने उसका पीछा किया, वह थक गया एवं राक्षसरूप में प्रकट हो गया। राम ने तीर
मारा, वह घायल हो गया। लक्ष्मण बचाओ कह कर वह चिल्लाया। आवाज सीता के कानों में आयी। उसने
लक्ष्मण को जाने को कहा। लक्ष्मण समझ गये कि ये राम के शब्द नहीं हैं, पर सीता ताने मारने लगी। अन्त में
लक्ष्मण देवों से सीता-की रक्षा की प्रार्थना करते हुए राम की तलाश में चल दिये। दशकण्ठ को अवसर मिला।
वह साधु का रूप बनाकर सीता के पास आया। सीता आतिथ्य करने लगी। उसने कहा 'सीते ! तुम मेरी रानी
बन जाओ। मैं दशकण्ठ हूँ।' सीता ने उसे कुटी से निकाल दिया। रावण जबरदस्ती सीता को रथ पर बैठा कर
चल पड़ा। एक बलिष्ठ पक्षी शतायु ने, जो राम का मित्र था, कहा सीता को छोड़ दो। रावण नहीं माना, उसने
युद्ध किया। उसकी सब सेना मार डाली। रावण ने बड़े प्रबल अस्त्रों को छोड़ा, पर वह हँस रहा था, उसपर
कुछ असर नहीं होता था। उसने कहा सिवाय उस अंगूठी के जो सीता के हाथ में है मुझपर किसी का प्रभाव नहीं
हो सकता। दशकण्ठ ने यह सुनकर सीता के हाथ से अंगूडी छीन ली और पक्षी पर दे मारी जिससे वह गिर गया,
परन्तु वह अपनी चोंच में अंगूठी को पकड़े रहा। उसकी आत्मा राम की प्रतीक्षा कर रही थी। दशकण्ठ लङ्का
पहुँच गया। उसने सीता को अपने सहस्र पुत्रों के संरक्षण में रख दिया।

३५० रामायणमीमांसा द्वादश
मारीच को मार कर राम लौट रहे थे। मार्ग में लक्ष्मण मिले । राम को भय हुआ । उन्होंने समझ लिया
कि किसी ने चालाकी से लक्ष्मण को अलग किया है । सीता अकेली छूट गयी होगी । दोनों भाई जल्दी कुटिया की
ओर दौड़े । देखा तो आशङ्का ठीक निकली । आनन्दवर्धिनी सीता वहाँ नहीं थी । दोनों बहुत दुःखी हुए । भाग्यवशात्
उसी समय इन्द्र आ गये । उन्होंने बताया कि सीता को इस मार्ग से ले जाया गया है । उसी रास्ते राम और लक्ष्मण
चल पड़े । आगे घायल शतायु (जटायू) राम की प्रतीक्षा करता हुआ मिला । पक्षी ने राम को सीता की अंगूठी देकर
'दशकण्ठ सीता को ले गया' कह कर प्राण छोड़ दिये । कृतज्ञ राम ने एक बाण छोड़ा जो अर्थी बन गया, दूसरा बाण
छोड़ा जिसने आग प्रज्वलित कर पक्षी के शरीर को जला दिया । तीसरा बाण छोड़कर जलती हुई अग्नि को शान्त
कर दिया । आगे चल कर राम को राक्षस मिला, जिसका नाम कुम्बल ( कबन्ध ) था । उसको ईश्वर ने शाप दिया
था जिससे उसका केवल ऊपरी शरीर ही बन पाया था। शाप मिटने की शर्त यह थी कि जब राम वन में आयेंगे
तो इस दोष से मुक्त करेंगे। उसने राम और लक्ष्मण को अपने हाथों में पकड़ कर चबा डालना चाहा, परन्तु उसकः
शरीर विचित्र भय से कम्पित हो गया। उसने समझ लिया कि मैंने जिन मनुष्यों को पकड़ा है वे साधारण मनुष्य
नहीं हैं। उसने झट उनको छोड़ दिया । जब उसने राम की विपत्ति का हाल सुना तो उनको परामर्श दिया कि वे
किष्किन्धा में राजा वाली से सहायता लें। खिदखिन और जम्बू की सेनाएँ लङ्कापर चढ़ाई कर सीता को छुड़ा
लायें । राम ने उसकी बात सुनकर उसको उस योनि से छुड़ाने के लिए तीर छोड़ा और वह मर गया । आगे एक
राक्षसी मिली जिसका नाम अशमुखी (अयोमुखी) था। वह भी दोनों भाइयों पर मोहित हो गयी। अपनी माया से
चारों ओर अन्धकार फैला कर लक्ष्मण को गोद में लेकर आकाश में उड़ गयी । राम भाई की सहायता के लिए दौड़
न सके, परन्तु राम के बाणों से अन्धकार छिन्न-भिन्न हो गया । लक्ष्मण सावधान हो गये । उन्होंने कुछ मन्त्र पढ़े
जिनके प्रभाव से लक्ष्मण सहित वह भूमि पर जा पड़ी। लक्ष्मण ने उसकी भुजाएँ काट डालीं। इसपर वह भाग
गयी । वे एक छायादार वृक्ष के नीचे बैठे । दैवयोग से उसपर हनुमान् बैठे थे । उन्होंने जानना चाहा कि ये दोनों
कौन हैं ? हनुमान् ने ध्यान आकर्षित करने के लिए एक शाखा हिलायी । राम थक कर सो गये थे । लक्ष्मण ने बन्दर
को भगाना चाहा, क्योंकि वे पहरे पर थे। परन्तु बन्दर नहीं टला, आग्रहपूर्वक शाखा हिलाता रहा। लक्ष्मण ने
धनुष उठाया । हनुमान् ने धनुष छीन लिया । इस धृष्टता को देखकर राम को जगाना पड़ा । राम ने ऊपर देखा तो
बन्दर के शरीर पर पूर्वोक्त कुण्डल आदि चिह्न दिखाई पड़े। हनुमान् ने देखा कि उसके चिह्नों को राम ने पहचान
लिया। यह अवश्य नारायण के अवतार राम हैं। हनुमान् वृक्ष से उतर आये और अपनी सेवाएँ राम को अर्पित
कर दीं ।
राम-सुग्रीव भेंट
राम की विपत्ति का हाल सुनकर हनुमान् ने अपने मित्र सुग्रीव से भेंट कराना उचित समझा । कैलास
पर्वत का द्वारपाल एक राक्षस नन्दकाल था । ईश्वर की कुछ भक्त अप्सराएँ एक उद्यान में फूल चुनने गयीं ।
वह राक्षस एक पर मोहित हो गया। अतः उसपर एक पुष्प फेंक दिया। उसकी शिकायत पर ईश्वर ने उसे
दरवनामक भैंसा हो जाने का शाप दे दिया और कहा कि तेरा पुत्र तुझे मारेगा तब तेरी मुक्ति होगी ।
वह भैंसों का सरदार हो गया। वह बहुत सी भैंसों में रहता था। जब कोई नर भैंसा उत्पन्न होता था तो
वह उसे मार देता था। एक भैंस गर्भिणी होकर किसी खोह में जा छिपी और वहाँ नर बच्चा पैदा हुआ। उसका
नाम दरवी हुआ । उसकी मां ने उसे बाप की स्थिति बता दी । देवों की रक्षा में वह बड़ा हुआ। उसने बाप से
युद्ध कर उसे मार दिया । विजय के घमण्ड से वह उद्दण्ड होकर देवताओं से लड़ने के लिए उत्सुक हुआ। देवताओं
ने समुद्र देव को बड़ा कहा पर वे लड़ने को तैयार न हुए। उन्होंने उसे ईश्वर के पास भेज दिया । ईश्वर ने कहा
तुम वाली के पास जाओ उसके हाथ से मर कर खर के पुत्र मङ्कुरकण्ठ होकर राम के तीर से मारे जाओगे । दरवी

युद्ध के लिए वाली के पास गया, खुले मैदान में दोनों बराबर रहे। दूसरे दिन खोह में लड़ाई होने का निश्चय
हुआ। वाली ने सुग्रीव को खोह के द्वार पर नियुक्त करके कहा बहता हुआ रुधिर देखना, रुधिर काला हो तो
दरवी का रुधिर होगा। रुधिर का रङ्ग हल्का हो तो समझना वाली मारा गया। उस समय खोह का द्वार बन्द
कर तुम चले जाना। सात दिन तक युद्ध होता रहा। अन्त में वाली ने पूछा तुममें इतनी शक्ति कैसे आयी। शक्ति
के नशे में कृतज्ञता भूल कर वह बोल उठा मेरी शक्ति मेरे सींगों में है। वाली ने देवताओं से कहा यह कृतघ्न है।
इसका साथ छोड़ दो। देवों की सहायता से वञ्चित होते ही वाली के घूंसे से वह मर गया। वर्षा के कारण उसके
रक्त का काला रंग फीका हो गया। सुग्रीव को वाली के मरने की भ्रान्ति हो गयी। वह खोह का द्वार पाषाण से बन्द
कर चला गया। वाली ने दरवी का सिर काट लिया द्वार पर आया तो द्वार को बन्द पाकर सोचा सुग्रीव मेरी
गद्दी लेना चाहता है। क्रोध में दरवी का सिर द्वार के पत्थर पर दे मारा जिससे खोह का द्वार खुल गया। महल
में आकर उसने सुग्रीव को निकाल दिया। सुग्रीव जङ्गल में भटक रहा था। हनुमान् से भेंट हो गयी। दोनों साथ-
साथ रहने लगे। सुग्रीव ने अपनी गाथा राम को सुनायी। दोनों में यह निश्चय हुआ कि सुग्रीव राम की सहायता से
वाली से लड़े और सुग्रीव की सहायता से दशकण्ठ को पराजित कर सीता को वापस लाया जाय।

वाली-वध
सुग्रीव ने बताया कि वाली ने प्रतिज्ञा-भङ्ग कर मेरी तारा को धर्मभ्रष्ट किया और ईश्वर का शाप है कि
नारायण के अवतार के हाथ उसका वध होगा। वाली को ईश्वर ने एक वर दिया था कि जिस किसी के साथ तुम
लड़ोगे उसका आधा बल तुममें आ जायेगा। सुग्रीव को बचाने के लिए राम ने अपने तीरों को जल में भिगोया और
जल को सुग्रीव के सिर पर छोड़ दिया। अब किष्किन्धा जाकर सुग्रीव ने वाली को युद्ध करने के लिए ललकारा।
राम ने सुग्रीव को वचन दिया था कि लड़ते समय वे वाली को तीर मारेंगे। परन्तु दोनों की कुश्ती होते समय
दोनों की तेजी से राम को पहचानना कठिन हुआ। वाली ने शीघ्र ही सुग्रीव को पछाड़ दिया और चक्रवाल पहाड़
पर दे मारा। परन्तु तीर के पवित्र जल ने सुग्रीव की रक्षा की। सुग्रीव ने राम के द्वारा बाण न छोड़ने की शिकायत
की। राम ने कहा कि वे वाली को पहचान न सके। सुग्रीव के हाथ में चिह्न बाँध दिया। दूसरे दिन कुश्ती के समय
राम ने बाण छोड़ा। बाली ने बाण पकड़ लिया। वाली ने राम को धिक्कारा तब राम ने नारायण रूप धारण कर
उसको अपनी प्रतिज्ञा-भङ्ग की याद दिलायी। वाली डर गया, उसने सुग्रीव और अङ्गद को राम की शरण में सौंपा
और अपना अन्त करने को तैयार हो गया। राम ने उसकी शर्त को समझा और चाहा कि उसका प्राणान्त न हो।
राम ने कहा केवल एक रक्त-बिन्दु दे दो जिससे ब्रह्मास्त्र का प्रभाव बना रहे। तुम्हारे शरीर के बाल के सातवें
भाग से अधिक घाव न होगा। परन्तु वाली ने अपमान सूचक घाव को अङ्गीकार नहीं किया और मृत्यु को ही
अपनाना उचित समझा, क्योंकि वह यश का पुजारी था। उसने सुग्रीव को रामभक्ति करने का उपदेश दिया और
तीर अपने हृदय में वेध कर सदा के लिए आँखें बन्द कर लीं।

युद्ध की तैयारी
वाली की अन्त्येष्टि और सुग्रीव को गद्दी हुई। राम नगर में नहीं गये। सुग्रीव ने राम से गन्धामास पर्वत
पर रहने की प्रार्थना की और स्वयं खिदखिन में सेना एकत्रित करने के लिए गया। राम को गन्धामास में एक
मोर मिला, जिसने सीता की सूचना दी। एक बन्दर मिला, जिसकी ओर सीता ने वस्त्र फेंक दिया था कि राम को
दे देना। राम ने सात दिन प्रतीक्षा की, लेकिन सुग्रीव के लौटने के कोई लक्षण नहीं दीख पड़े। लक्ष्मण उसकी
तलाश में निकले। सुग्रीव ने कहा कि देश में कुछ गड़बड़ मची है। सेना एकत्रित करने में समय लगेगा। प्रातः
सुग्रीव और हनुमान् राम से मिले। सुग्रीव ने बताया कि वाली का मित्र जम्बू, मित्र की मृत्यु का बदला लेने के लिए,

३५२ रामायणमीमांसा द्वादश
खिदखिन के लोगों को एकत्रित कर रहा है। राम ने पत्र लिख कर उसको बुलाया। जम्बू को पत्र तो मिला, पर उसे
विश्वास नहीं हुआ कि राम का ही पत्र है। फिर भी उसने अपनी भक्ति का आश्वासन दिया। हनुमान् इससे सन्तुष्ट
नहीं हुए, अतः उन्होंने माया से महल के सब लोगों को सुला दिया और पलंग सहित जम्बू को राम के समक्ष उपस्थित
कर दिया। वह जागा तो देखा कि वह नारायण के समक्ष है। उसने निःसंकोच नारायण के प्रति भक्ति प्रकट की।
इस तरह जम्बू और सुग्रीव दोनों की सेना इकट्ठी हो गयी।
हनुमान् की लङ्का-यात्रा
जब सेना की तैयारी हो गयी तब निश्चय हुआ कि हनुमान्, जम्बू, नल तथा नीलवद् की अध्यक्षता में
एक परीक्षक दल भेजा जाय । वह सीता के निवास-स्थान का पता लगाये। राम ने हनुमान् को अँगूठी दी और सीता
का चीर दिया जिससे सीता जान सके कि यह राम का ही दूत है। हनुमान् को भय था कि शायद वे मुझे शत्रु ही
समझें, क्योंकि राक्षस भी इन चिह्नों को कपट से प्राप्त कर सकते हैं। इसपर राम ने मिथिला के महलों की खिड़की
में से विवाह के पहले उन दोनों ने एक दूसरे को देखा था और जिस प्रकार दोनों के हृदयों में प्रेम का बीज उगा था
इत्यादि ऐसी बातों को बताया जिन्हें वे दोनों ही जानते थे और कोई नहीं। ये लोग उड़ते हुए यमन नगर में आये ।
वहाँ एक अप्सरा पुष्पमाली दिन काट रही थी। राम के सैनिकों से भेंट होने पर उसकी शाप-मुक्ति होनी थी।
हनुमान् ने उससे कहा मैं राम का दूत हूँ; उसे इसमें शङ्का हुई । इसपर हनुमान् ने चतुर्मुखी विराट् रूप दिखाया ।
उनके चारों मुखों से अनेक सूर्य, चन्द्र तथा तारागण चमकने लगे। पुष्पमाली मान गयी और उसने हनुमान् को लङ्का
का रास्ता बता दिया। हनुमान् को उस अप्सरा से प्रेम हो गया। उन्होंने उसे स्वर्ग भेज दिया। वह शाप-मुक्त हो
गयी। आगे चलने पर एक अत्यन्त वेगवती नदी मिली, जिसको पार करना कठिन था। हनुमान् ने अपनी पूँछ फैला
दी उसी पर चढ़कर सब बन्दर पार हो गये। आगे समुद्र मिला। वह पारावारविहीन था। हनुमान् बोले कि शतायु
के समान यशस्वी मृत्यु मुझे प्रिय है, परन्तु यह स्वीकार नहीं कि समुद्र से हार मान लूँ । शतायु का नाम आते ही एक
जादू हो गया। निकटस्थ पहाड़ की खोह से समवादी नाम का एक पक्षी निकला जो शतायु का बड़ा भाई था। उसके
पर कटे हुए थे। जब शतायु अनजान बालक था तब उसने उषःकाल में खिड़की से सूर्य को देखा तो उसने उसे कोई
सुन्दर फल समझा और उसे लेने के लिए उड़ा । भाई को विपत्ति से बचाने के लिए समवादी ने उसको अपने परों
में छिपा लिया, अतः सूर्य भगवान् का समस्त क्रोध अपने ही ऊपर ले लिया। उसके समस्त पङ्ख जल गये। सूर्य-
नारायण ने कहा कि उसके नये पङ्ख तभी उगेंगे जब राम का दल तीन बार स्वागत-ध्वनि करेगा। अन्त में आज वह
अवसर आ ही गया। वह समय हर्ष का भी था, शतायु की मृत्यु का दुःखद समाचार सुना, परन्तु स्वागत-ध्वनि ने
नये पर उपजा दिये जिससे नये जीवन तथा नयी शक्ति का संचार हुआ। वह आकाश में उड़ने लगा। कृतज्ञ पक्षी ने
कहा कि मेरी पीठ पर बैठ जाओ मैं तुम सबको गन्धशिखर पर ले चलता हूँ, जो हेमतीरन और लङ्का के बीच में
है। जब वे वहाँ पहुँचे तो समवादी ने हनुमान् को नीलाचल पर्वत दिखलाया जिसकी ऊँची चोटी आसमान से बात
करती थी । हनुमान् ने एक छलाँग मारी और वहाँ से निर्दिष्ट स्थान की ओर उड़े। मार्ग में एक भयानक राक्षसी
मिली, जिसको दशकण्ठ ने समुद्र को सुरक्षित रखने के लिए नियुक्त किया था। हनुमान् उसके मुँह में घुस गये और
उसकी आँते बाहर निकाल लीं। वह मर गयी । उनकी छलाँग इतनी बड़ी थी कि वे नीलकाल पर्वत के भी आगे बढ़
गये और मौलाह पर्वत पर पहुँच गये, जहाँ नारद ऋषि रहते थे। हनुमान् ने एक रात रहने की अनुमति माँगी,
नारद ने एक झोपड़ी बता दी। हनुमान् ने नारद की महत्ता देखने के लिए अपना शरीर इतना बढ़ा लिया कि वह
झोपड़ी में न समाये। पर नारदजी की शक्ति से झोपड़ी बढ़ती गयी। नारद ने ऐसी वर्षा बरसायी कि हनुमान् का
शरीर ठिठुर कर पहला जैसा ही हो गया। ऋषि हनुमान् को जाड़ा खाते छोड़ कर तालाब में घुस गये। एक लकड़ी

अध्याय विदेशी रामकथा की चर्चा ३५३
को जोंक बना दिया। हनुमान् प्रातः स्नानार्थ घुसे तो वह हनुमान् की दाढ़ी में चिपक गयी। हनुमान् ऋषि की शरण
गये, तब वह छूट गयी।
लङ्का-दहन
हनुमान् लङ्का पहुँच गये। उसके संरक्षक चतुर्भुजी और अष्टभुजी थे। उन्हें मार कर हनुमान् राक्षस के
रूप में लङ्का में प्रविष्ट हुए। अँधेरी रात थी। सहस्रपति ब्रह्मा की सृष्टि का सौन्दर्य नहीं दिखता था। हनुमान् ने माया
के जोर से सब को सुला दिया। दशकण्ठ के महलों में घुस गये। पर सीता को न पाया। नारद के पास जाकर
परामर्श किया। उनके परामर्श से छोटे बन्दर के रूप में वाटिका में घुसे। वहाँ सीता इस प्रकार छिपी थी जिस
प्रकार बादलों में चन्द्रमा। फिर रात का समय हुआ तो दशकण्ठ नारायण-पत्नी सीता को मनाने लगा। अनुनय-
विनय की, परन्तु सीता के भक्तिपूर्ण शुद्ध हृदय में बुरी भावना नहीं उठ सकती थी। वह निराश होकर लौट गया।
सीता ने संतप्त होकर फाँसी लगानी चाही। यह देख हनुमान् चौंक पड़े। वह वृक्ष पर चढ़ गये रस्सी की गाँठ खोल
दी। सीता को जीवित जानकर उन्हें प्रसन्नता हुई। उन्होंने सीता को अपना परिचय दिया। सीता को हनुमान् की
सत्यता पर विश्वास हुआ तो मुख पर हर्ष के आँसू बहने लगे। हनुमान् ने चाहा कि सीता को अपनी हथेली पर बैठा
कर राम के पास ले जायें, परन्तु सीता इसके लिए राजी नहीं हुई। दशकण्ठ द्वारा अपहरण किये जाने से उसका
बहुत बड़ा अपमान हो चुका था। वह नहीं चाहती थी कि दूसरी बार वह किसी पुरुष के द्वारा भाग निकले। वह
राम के लिए जीवित रहने को तैयार हो गयी।
हनुमान् ने दशकण्ठ के बाग के बहुत से पेड़ उखाड़ दिये। बहुत से राक्षस उनपर झपटे पर सब मारे
गये। दशकण्ठ के सहस्र कुमार भी कुछ न कर सके। इन्द्रजित् आगे बढ़ा, राक्षस की शक्ति की परीक्षा के लिए
इन्द्रजित् की रस्सी से बँध गये। दशकण्ठ के सामने लाये गये। दशकण्ठ ने उनकी वीरता की प्रशंसा की और अपनी
सेना में सम्मिलित होने को कहा। हनुमान् ने स्वीकार नहीं किया। राक्षसों ने उनकी पूँछ में रुई लपेट कर आग लगा
दी। समस्त शरीर जल उठा। हनुमान् पर्वताकार हो गये। एक झटके से उन्होंने बन्धन तोड़ दिये। एक छत से
दूसरी छत पर कूद कूद कर सारी लङ्का जला डाली। रावण का महल जल कर राख हो गया। समुद्र में कूद कर
उन्होंने आग बुझायी, परन्तु पूँछ जलती ही रही। नारद से पूछा तो उन्होंने कहा तुझे अपने छोटे से कुएँ का पता
नहीं है। हनुमान् समझ गये। पूँछ मुख में रख ली आग बुझ गयी। बाद में अपने साथियों के पास पहुँच कर राम
के पास पहुँच गये। राम को सब समाचार सुनाया। राम की सेना लङ्का पर चढ़ायी करने चल पड़ी। समुद्रदेव लङ्का
घेरे हुए हलरें मार रहे थे।
विसेक (विभीषण) की रामभक्ति
लङ्का-दहन से हानि अवश्य हुई थी पर दशकण्ठ निश्चिन्त था, क्योंकि सब देवता उसके वश में थे। उसने
स्वप्न में देखा काली चील पश्चिम से आयी और सफेद दक्षिण से आयी, दोनों लड़ पड़ीं। काली मर गयी। उसके
शरीर से एक राक्षस उत्पन्न हुआ। उसने यह भी देखा कि नारियल में तेल डाल कर बत्ती रख कर अपने हाथ में
लिये एक स्त्री आयी। उसने बत्ती जलायी। बत्ती ने समस्त दीपक को जला दिया। आग हथेली तक पहुँच गयी।
उसके शरीर में जलन होने लगी। उसकी आँखें खुल गयीं। वह भय से काँप उठा। सुबह उसने विसेक को बुलाया
और स्वप्न का अर्थ पूछा। विसेक ने बताया काली चील दशकण्ठ हैं और सफेद चील राम हैं। नारियल लङ्का है,
तेल दशकण्ठ-वंश है, बत्ती दशकण्ठ है, स्त्री समनखा है और ज्वाला सीता है। नक्षत्रों द्वारा दशकण्ठ पर आनेवाली
विपत्ति के सूचनार्थ ही स्वप्न है। इसका एक ही उपाय है कि सीता को लौटा कर क्षमा माँग ली जाय। पर रावण
४५

को यह सब नहीं सुहाया। वह विभेक पर क्रुद्ध हुआ। विभेक को लङ्का से निकाल दिया। त्रिजटा को सीता पर
पहरा देने को नियुक्त कर दिया।
विभेक बन्दरों की छावनी में आया। सेना देख कर उसे आश्चर्य हुआ। सुग्रीव ने बन्दरों को आज्ञा दी।
वे अपनी शक्ति प्रदर्शन करें। किसी ने पहाड़ हथेली पर रख लिये, किसी ने सूर्य को छिपाकर संसार को अन्धकारमय
बना दिया, किसी ने समुद्र को सुखा डाला और किसी ने प्रलय का तूफान उठा दिया। इसकी खबर दशकण्ठ तक
पहुँची। बीसों कान खड़े हो गये। कोलाहल मच गया। दशकण्ठ ने राक्षस शुक्रसर को शक्ति जांचने के लिए भेजा,
क्योंकि उन सबको रामसेना की शक्ति पर विश्वास न था। राक्षस चील बन कर गया। वहाँ जाकर बन्दर बन
गया। विभेक ने उसे जान लिया एवं हनुमान् को सूचित कर दिया। हनुमान् ने तुरन्त हथेली इतनी बड़ी बना ली
मानो वह कोई बड़ा तम्बू हो। उससे सेना को ढंक लिया। सारे बन्दर एक एक करके उसकी अङ्गुलियों की सन्धियों
से निकलने लगे। अन्त में शुक्रसर निकला। उससे और बन्दरों से भिन्नता थी। उसकी छाया नहीं पड़ती थी। उसकी
आँखों की पलकों में कम्पन नहीं था। वह पहचान लिया गया। उसपर मार पड़ी। उसने जाकर अपने राजा को
सब हाल बताया। दशकण्ठ स्वयं साधु बन कर आया। राम ने आतिथ्य सत्कार किया। विभेक ने पहिचान लिया।
फिर भी दशकण्ठ ने अपनी माया से उसे गूँगा कर दिया, जिससे वह बोल न सका। दशकण्ठ राम को लङ्का पर चढ़ाई
करने से रोकना चाहता था, परन्तु उसका प्रयत्न व्यर्थ हुआ, क्योंकि राम पीछे हटना जानते ही न थे। दशकण्ठ ने
विभेक की लड़की बेंजकाया को आज्ञा दी कि तू सीता का रूप धारण कर शत्रुदल के निकट जलधारा में ऐसे तैरने
लग जिससे सब समझें कि सीता मर गयी। राम प्रातः स्नान को गये तो वैसे दृश्य देखकर वे बड़े दुःखी हुए।
लक्ष्मण भी मृत सीता को देख कर रोने लगे। विभेक, हनुमान् आदि भी वहाँ गये। राम को लगा कि हनुमान् की
धृष्टता का ही रावण ने यह बदला चुकाया होगा। हनुमान् सीता की उस लाश को देखते रहे। उन्होंने सोचा यह
बहाव के ऊपर की ओर तैर रही है और सड़ी भी नहीं है। हनुमान् की सूचना पर उसे चिता पर रखा गया तब
बेंजकाया चीख पड़ी। पवनसुत ने लपक कर उसे पकड़ लिया। सुग्रीव की मार से उसका भेद खुल गया। विभेक
की लड़की जान कर राम ने कहा इसका न्याय विभीषण ही करेंगे। विभेक ने निष्पक्ष हो उसे मृत्युदण्ड सुनाया।
इससे प्रसन्न होकर राम ने उसे क्षमा प्रदान किया। हनुमान् का उससे प्रेम हो गया। उससे एक पुत्र हुआ जिसका
नाम असुरपाद था।
सेतुबन्ध
सेना पार करने के लिए समुद्र में पुल बाँधने का निर्णय हुआ। काम करने में नीलवद् का हनुमान् से
झगड़ा हो गया। राम ने नीलवद् से कहा तुम सुग्रीव के स्थान में राज करो और रसद पहुँचाओ। हनुमान् को सात
दिन में पुल तैयार करने की आज्ञा हुई। हनुमान् ने बड़े जोर से काम लगा दिया। दशकण्ठ को पुल बनने का शोर
सुनायी पड़ा। उसकी नींद उड़ गयी। उसने अपनी पुत्री स्वर्णमच्छा को पुल में विघ्न डालने को कहा। वह अपनी
सहेलियों के साथ समुद्र में डाले गये पत्थरों को समुद्र की तह में लुप्त करने लगी। हनुमान् ने गोता लगा कर सब
कुछ जान लिया और उनको वैसा करने से विरत होने को बाध्य कर दिया। हनुमान् का स्वर्णमच्छा से प्रेम हो
गया। उससे भी हनुमान् का पुत्र मच्छानु हुआ। पुल तैयार हो गया। इन्द्र ने अपना रथ दिया जिसको मातलि
हाँक रहा था। राम पुल से लङ्का पहुँचे। एक हरे भरे स्थान पर जहाँ मखमल के समान घास उगी थी, सेना ने
पड़ाव डाला। परन्तु वह एक मायावन था, वहाँ न कोई पक्षी गीत गाता था, न फल खाता था। दशकण्ठ की आज्ञा
से भानुराज वानरसेना सहित जंगल को जमीन में धंसा देना चाहता था। हनुमान् यह चाल समझ गये। उन्होंने
भूमि के भीतर प्रविष्ट होकर उस भानुराज को एक ही घूंसे से खत्म कर दिया।

अध्याय विदेशी रामकथा की चर्चा ३५५
राम ने शान्ति की कामना से अङ्गद को दूत बनाकर भेजा। अनेक राक्षसों को मार कर वे दरबार में
पहुँचे। अङ्गद ने रावण के दरबार में दूत के बैठने का स्थान न देख कर अपनी पूंछ बढ़ा कर कुण्डली बना कर
दशकण्ठ के मंच से भी ऊँचा स्थान बना लिया। उस गद्दी पर बैठकर राम का संदेश बड़ी तीव्र भाषा में कहना
उसने आरम्भ किया। दशकण्ठ को क्रोध आया। उसने अपने चार वीरों को अङ्गद को मारने के लिए नियुक्त
किया। अङ्गद ने सबको मार गिराया और अपने पड़ाव पर आ गये। दशकण्ठ ने राम की सेना को मारने के लिए
माया रचने का स्वयं भी यत्न किया। ब्रह्मा ने उसको एक छत्र दिया था। उसके खुलने से सूर्य छिप जाता था।
जगत्भर में अँधेरा छा जाता था। उसने वह छत्र खोल दिया। चारों ओर अँधेरा छा गया। राम-सेना को लङ्का
दिखायी नहीं पड़ती थी, परन्तु सुग्रीव ने आक्रमण करके उस छत्र को तोड़ डाला। सूर्य किरणें फिर निकल
आयीं। आकाश से लौटते हुए सुग्रीव ने दशकण्ठ के मुकुटों को छीन कर राम के चरणों पर लाकर रखा। अब रावण
चिन्तित होने लगा।
राम का हरण
दशकण्ठ ने मारीच-पुत्र वैयविक को पाताल भेजा। सहमालिवन के पुत्र मैयराव को लङ्का बुलाया।
उससे सभी डरते थे। उसने अपने गुरु सुमेध मुनि से युद्धविद्या के रहस्य सीखे थे। सुमेध मैयराव से बहुत खुश था।
उसने मैयराव की आत्मा को उसके शरीर से निकाल कर भौंरे के रूप में त्रिकूट पर्वत पर छिपा दिया था, इससे वह
अमर सा हो गया था। उसको मृत्यु का भय न था। उसके पास एक मायावी राख थी जिससे वह नींद बुला सकता
था। वह इस राख को लेकर बन्दरों के पड़ाव पर आया। बहुत सावधानी से आने पर भी वह विभीषण की आँख
से न बच सका। विपत्ति से बचने का उपाय सोच लिया गया। हनुमान् ने ब्रह्मा के बराबर मुख बनाकर उसमें राम
को रख लिया। फिर भी मैयराव की माया के सामने उसकी कुछ न चल सकी। मैयराव बन्दर बन कर बन्दरों में
मिल गया। वहाँ उसे मालूम हुआ कि विभेक पहले ही सचेत कर रहा था कि यह माया प्रातःकाल के पूर्व ही समाप्त
हो जावेगी। मैयराव के पास एक बाँसुरी थी। वह सेनादल को छोड़कर पहाड़ पर चढ़ गया और वहाँ उसने अपनी
बाँसुरी उठायी। माया के बल से आकाश एक स्थिर समुद्र जैसा दिखाई पड़ने लगा। प्रातःकाल के तारे चमकने लगे,
बन्दरों ने हर्ष मनाते हुए सोचा कि वह रात बीत गयी। निश्चिन्त होकर पहरे ढीले कर दिये। मैयराव अपनी माया
की राख लेकर आया और बाँसुरी बजाने लगा। धीरे-धीरे सब बन्दरों को नींद आ गयी। सुग्रीव सोया पड़ा था।
हनुमान् निर्जीव से दिखायी पड़ते थे। सीता के प्राणप्रिय राम भी बेहोश थे। सबको बेहोश देख मैयराव धीरे-धीरे
आया। राम को उठाकर पाताल ले गया। बन्दर जागे तो विपत्ति का पता लगा, पर विभेक तो अपने दिव्य चक्षु से
अदृश्य को भी देख रहा था। विभेक के बताये मार्ग से हनुमान् दौड़े। एक तालाब पर पहुँचे। उसमें कमल खिले
थे। उन्होंने एक कमल का पत्ता तोड़ा, उसके डंठल में एक खोखला मार्ग दिखायी दिया। हनुमान् उसमें होकर एक
दीवार के पास पहुँचे, जहाँ एक राक्षस पहरा दे रहा था। उसे हनुमान् ने लात से मारा, वह मर गया और दीवार
टूट गयी। हनुमान् आगे बढ़े। वहाँ एक मदमत्त हाथी मिला। हनुमान् ने उसको पछाड़ दिया। पुनश्च आगे बढ़े, एक
पर्वत मिला, जिसपर आग की ज्वाला धधक रही थी। उन्होंने लात मार कर पर्वत की आग बुझा दी। फिर आगे
बढ़े, मच्छर मिले जो मुर्गों के बराबर थे। हनुमान् थके नहीं बढ़ते गये। एक अन्य तालाब मिला। उसमें कमल खिले
थे। वहाँ एक ऐसे व्यक्ति का मुकाबला करना पड़ा जो उनके जोड़ का था। इसपर हनुमान् के पुत्र मच्छानु का
पहरा था। सुवर्णम छा उसे तट पर छोड़कर चली गयी थी। मैयराव ने उसे पाला था। पिता और पुत्र का भयंकर
युद्ध हुआ। युद्ध होता रहा पर किसी की विजय नहीं हुई। दोनों एक दूसरे की वीरता से चकित रह गये। पूछने पर
दोनों पिता-पुत्र निकले। दोनों में युद्ध के बदले प्रेम हो गया। हनुमान् ने पाताल आने का प्रयोजन बताया। मच्छानु

कृतघ्न न था। वह अपने पालक पिता का भेद बताने को तैयार न था पर वह अपने पिता को भी निराश नहीं कर
सकता था। अजी, मार्ग तो दीखता है उसी पर क्यों नहीं चलते। हनुमान् समझ गये, उन्होंने एक कमल तोड़ा उसमें
एक खोखला मार्ग दिखायी पड़ा। उसी मार्ग से वे पाताल पहुँच गये। उन्हें एक रोती हुई स्त्री के विलाप की ध्वनि
सुनायी पड़ी जो समस्त पाताल में गूँज रही थी। वह मैयराव की बहन बीरबक्कन थी, जो पुत्र के लिए शोक कर रही
थी। उसको आज्ञा हुई थी कि वह एक कड़ाही चढ़ाये उसमें अपने पुत्र वैयविक को राम के साथ भून डाले, परन्तु
कोई माता अपने ही पुत्र को कैसे भूनती ? वह रोती पीटती कड़ाही चढ़ा कर पानी डाल रही थी। चुपके से हनुमान्
आ गये। उन्होंने ढाढस दिया और कहा कि यदि तुम मुझे वहाँ ले चलो जहाँ राम को रखा गया है तो मैं तुम्हारे
पुत्र की जान बचा दूंगा। यह काम कठिन था, क्योंकि बड़े-बड़े बलवान् राक्षस पहरा दे रहे थे यहाँ से गुजरने पर
सबको एक तराजू पर तुलना पड़ता था। वह इतना बारीक था कि उसपर बाल बराबर भेद भी मालूम हो जाता
था। तिल भर भी बोझ बढ़ने पर मौत निश्चित थी। फिर भी हनुमान् ने फाटक पर ले चलने का आग्रह किया।
हनुमान् ने एक बारीक कमलतन्तु का रूप धारण कर लिया। उसके वस्त्र में लग गये, परन्तु जब वह राक्षसी तराजू
पर रखी गयी तो तराजू टूट गया, राक्षसों ने उसे मारने को तलवार उठायी। वह चिल्लायी कि मेरा कोई दोष
नहीं है, मेरे पास कुछ नहीं है। तलाशी में कमलतन्तु के सिवा और कुछ भी न निकला, अतः उन्होंने उसे जाने
दिया। हनुमान् वहाँ पहुँचे, ताड़ वृक्षों में लोहे का पिंजड़ा रखा था उसमें राम पड़े सो रहे थे। उन्हें कुछ पता नहीं
था। रामभक्त हनुमान् ने उन्हें धीरे से उठाया और सुरक्षित स्थान पर रख दिया। वे स्वयं मैयराव की खोज में
चले। वह मिल गया। दोनों में इतना घोर युद्ध हुआ कि पाताल हिल गया। हनुमान् ताड़ वृक्षों से उसे मारते थे
पर उसपर असर नहीं होता था। उस समय बीरबक्कन ने स्मरण दिलाया कि उसकी आत्मा त्रिकूट में भौंरे के
रूप में छिपी है। हनुमान् ने अपना शरीर बढ़ाया, अपना हाथ त्रिकूट तक फैलाया। भौंरे के रूप में छिपी उसकी
आत्मा को मसल डाला। भौंरे के मरते ही मैयराव प्राणहीन हो गया। हनुमान् ने वैयविक को पाताल की गद्दी दी,
मच्छानु को युवराज बनाया और राम को लेकर बन्दरों की छावनी में आ गये। सबको बड़ी खुशी हुई, पर राक्षसों
को इससे अवर्णनीय दुःख हुआ।

कुम्भकर्ण

दशकण्ठ मैयराव के मरने से काँप उठा। उसने कुम्भकर्ण से मैयराव का बदला चुकाने के लिए कहा।
उसको न्याय में श्रद्धा थी, वह सीता को लौटाने के पक्ष में था। दशकण्ठ ने कहा तू राम से डरता है। वह अस्त्र
उठाकर भाई की सहायता के लिए तैयार हो गया। विभेक हाथ जोड़ कर आगे बढ़ा, पर कुम्भकर्ण न्यायप्रिय होने
पर भी राजा और देश से मुंह नहीं मोड़ सकता था। उसने विभेक से कहा तुम्हारे पास यही बहाना है कि राम
नारायण के अवतार हैं, पर मैं तब यह मानूंगा जब मेरे प्रश्न का समाधान करें। मूर्ख साधु कौन ? सीधे दाँत का
हाथी कौन ? चालाक स्त्री कौन ? दुष्ट मनुष्य कौन ? पर इसका उत्तर किसी को नहीं सूझा। अङ्गद कुम्भकर्ण के
पास भेजा गया कि वह उससे ही उत्तर लाये। अङ्गद ने कहा राम उत्तर जानते हैं, पर सही उत्तर से मिलाना
चाहते हैं। कुम्भकर्ण ने राम की खिल्ली उड़ा कर अभिमान से कहा मूर्ख साधु आदमी तो स्वयं राम हैं, जो सीता
को जंगल में छोड़कर चले गये। सीधे दाँतवाला हाथी दशकण्ठ है जो अपनी स्त्री से सन्तुष्ट न होकर अन्य पर दृष्टि
डालता है। चालाक स्त्री सम्मनखा है। दुष्ट मनुष्य विभेक है जो अपने देश और नरेश का विरोधी है। सुग्रीव
कुम्भकर्ण का युद्ध हुआ। सुग्रीव अत्यधिक बलवान् थे। वह पर्वत से विशाल वृक्ष उखाड़ कर लड़ने लगे।
सुग्रीव थक गये उन्हें बगल में दबाकर कुम्भकर्ण लङ्का को चल पड़ा। हनुमान् सहायता के लिए दौड़
पड़े। कुम्भकर्ण हनुमान् का मुकाबला न कर सका। सुग्रीव को वहीं छोड़कर लङ्का भाग गया। हनुमान्

ने उसके नाक-कान नोच लिये । अन्त में यश की रक्षा के लिए अपनी मोक्खशक्ति महान् अस्त्र छोड़ने को
तैयार हुआ, पर उसके पहले देवों की आराधना आवश्यक थी । इसलिए वह शुभ मुहूर्त में नदी किनारे अनुष्ठान
करने लगा । हवन की सुगन्ध फैल गयी, फूल खिल गये, अस्त्र सामने था एवं वह समाधि लगाये बैठा था । कुम्भकर्ण
की आँख खुल गयी । दुर्गन्ध से वह घबड़ा गया । देखा तो एक मृत कुत्ता नदी में बहा आ रहा है । कौए नोचकर
माँस खा रहे हैं, पर यह विभेक की माया थी । विभेक ने अपने शीशे से कुम्भकर्ण का अभिप्राय जान लिया था ।
हनुमान् मृत कुत्ता बन गये एवं अङ्गद कौआ । कुम्भकर्ण की समाधि टूट गयी, अतः अस्त्र के महत्त्व का लाभ नहीं
मिला । फिर भी वह निराश नहीं हुआ । मोक्खशक्ति लेकर शत्रुदल पर टूट पड़ा । लक्ष्मण ने सामना किया ।
मोक्खशक्ति लक्ष्मण के शरीर में घुस गयी । पर विभेक ने उपाय निकाल लिया । हनुमान् को स्वयं पर्वत भेजकर
अमरबूटी मँगवायी और साथ ही यह कहा कि सूर्य निकलते ही उसका प्रभाव नष्ट हो जायगा । हनुमान् उड़ पड़े ।
उनके श्वेत अङ्ग पर लाली आ गयी । पता चला सूर्योदय होना ही चाहता है । वैसा होने पर आशाओं पर पानी
फिर जाता । वह सूर्य का रथ रोकने के लिए आगे बढ़े, पर सूर्य के ताप से झुलस गये । सूर्य को भेद मालूम हुआ ।
उनको पश्चात्ताप हुआ कि रामदूत को भ्रम से क्षति पहुँची । सूर्य ने हनुमान् के शरीर को स्वस्थ कर दिया । हनुमान्
ने गति मन्द करने की सूर्य से प्रार्थना की । मानवी घृणा या दुःख सृष्टि के नियम को रोक नहीं सकते; परन्तु सूर्य ने
कहा मैं चलता तो रहूँगा पर बादलों की ओट में रहूँगा । हनुमान् आगे बढ़े, अमर बूटी को आवाज दी । उसने कहा
मैं यहाँ हूँ । वहाँ गये, तो कहा मैं इधर हूँ । हनुमान् हैरान हो गये । हनुमान् ने शरीर बढ़ाकर सारा पर्वत पूँछ से
लपेट 'लिया जिधर से आवाज आई वहीं से उन्होंने बूटी उखाड़ ली । बूटी तो मिल गयी, पर पाँच नदियों का जल
भी चाहिये था । अयोध्या भरत के अधिकार में थी । हनुमान् डरना तो जानते ही न थे । तुरन्त अयोध्या दौड़ गये ।
जल लाये, बूटी आयी । लक्ष्मण स्वस्थ हो गये । लक्ष्मण के स्वस्थ होने पर राम की सेना में हर्ष फैल गया । कुम्भकर्ण
ने ब्रह्मा जैसा शरीर बढ़ाकर पहाड़ की उस नदी को रोक दिया जिससे सेना पानी लेती थी । वह सात दिनों तक
नदी रोके रहा । बन्दर प्यास से मरने लगे । विभेक जान गया कि कुम्भकर्ण का काम है । परन्तु उसे पता नहीं था
कि वह कहाँ है । उसकी फूलदासियों को ही पता था । विभेक की सूचना पर हनुमान् चील बनकर उड़ गये । एक
फूलदासी को मार डाला और उसका रूप धारण कर अन्य फूलदासियों के साथ वहाँ पहुँचे जहाँ वह पानी रोके पड़ा
था । वहाँ पहुँच कर हनुमान् ने अपने रूप में प्रकट होकर कुम्भकर्ण को ऐसी लात मारी कि वह खड़ा हो गया ।
पानी बहने लगा । प्यासे बन्दरों की मृत्यु टल गयी । कुम्भकर्ण हनुमान् का सामना न कर सका । दूसरे दिन राम ने
उसका सामना किया और वह नारायण के ब्रह्मास्त्र से मर गया । मरते समय उसने देखा साक्षात् नारायण चारों
हाथों में शङ्ख, चक्र, गदा और त्रिशूल लिये हैं । उन्होंने पश्चात्तापशील रामभक्त के लिए स्वर्ग का द्वार खोल दिया ।

लक्ष्मण-इन्द्रजित् का युद्ध

इन्द्रजित् मण्डो का पुत्र था । ईश्वर से ब्रह्मपाश, ब्रह्मा से नागपाश तथा विष्णु से विष्णुयन उसे प्राप्त थे ।
इन्हीं अस्त्रों के बल पर उसने इन्द्र को जीता था । लक्ष्मण ने उसका सामना किया । भयंकर युद्ध हुआ । यह पहला
अवसर था । जब वह विजय के बिना रणक्षेत्र से लौटा था । उसने कुम्भनीय यज्ञ से अस्त्र-शक्तियों को जगाना चाहा ।
वह आकाशगिरि में जाकर यज्ञ करने लगा । लड़का की रक्षा में मङ्कुकण्ठ खरपुत्र, जो पिछले जन्म में दरवी था,
नियुक्त हुआ । उसने खूब युद्ध किया और राम के हाथ मारा गया । विभेक ने इन्द्रजित् के यज्ञ में बाधा डालने के
लिए सब उपाय बना दिये । जिस वृक्ष के नीचे वह यज्ञ करता है, यदि कोई रीछ उसे तोड़ दे तो यज्ञभङ्ग हो जायगा ।
जम्बूवान ने यह काम अपने ऊपर लिया । रीछ का रूप धारण कर वह वहाँ पहुँचा । इन्द्रजित् ध्यानमग्न था । मन्त्रों
के प्रभाव से संसार भर के सर्प नागपाश को घोर विषैला बनाने हेतु अपना विष प्रदान कर रहे थे । इतने में वृक्ष टूट

गया। सर्पों ने समझा गरुड़ आ गये, वे सब भूमि में समा गये। जाम्बवान आकाश में उड़ कर राम-सेना में पहुँच गये।
विघ्न के कारण इन्द्रजित् प्रसुप्तशक्ति बाणों को ही लेकर युद्ध के लिए चल पड़ा। उसने बड़ी शक्ति से राम-सेना पर
आक्रमण किया, परन्तु लक्ष्मण के सामने राक्षस मरने लगे। घोर युद्ध हुआ। किसी की जीत निश्चित नहीं थी।
इन्द्रजित् ने विरूपमुख को परामर्श दिया कि वह इन्द्रजित् का रूप धारण कर उसकी सेना को लेकर लड़ाई करता
रहे और आकाश में जाकर नागपाश को छोड़ दे। लक्ष्मण को इसका पता लगने न पाये। शीघ्र वैसा ही हुआ।
असली इन्द्रजित् को अवसर मिल गया, नागपाश से सैकड़ों साँप निकल पड़े और विष छोड़ने लगे। सेना के वानर
तथा लक्ष्मण सब साँपों की लपेट में आकर बेहोश हो गये। इन्द्रजित् विजय-दुन्दुभि बजाता हुआ घर लौट गया।
वानर और लक्ष्मण सब रणक्षेत्र में पड़े रहे। राम रणस्थल पर पहुँचे तो विभेष की प्रेरणा से राम ने अपना क्षैब्रत
तीर आकाश में छोड़ा। फलस्वरूप गरुड़ आ गये और सर्पों का सफाया करने लगे। लक्ष्मण और उनके साथी
बन्दर ऐसे उठे मानो वे सो कर उठे हों। इन्द्रजित् को आश्चर्य हुआ। फिर भी इन सबको मौत के जबड़ों में रखने
के लिए वह समुद्रतट पर जाकर अस्त्रशक्ति जाग्रत् करने के लिए ईश्वर की आराधना करने लगा। हनुमान् ने इसी
बीच कम्पन को मारा। दशकण्ठ ने उसकी सूचना इन्द्रजित् को दी। इस अशुभ समाचार से इन्द्रजित् का यज्ञ
खण्डित हो गया। अब एक ही उपाय था कि कृष्ण गोवलि से पाशशक्ति जाग्रत् करे। वैसा करके उसने पाशशक्ति
जाग्रत् कर ली। अजेय ब्रह्मास्त्र को लेकर उसने आक्रमण किया। माया के बल से इन्द्रजित् इन्द्र बन गया।
देवगणों से आवृत इन्द्र के द्वारा रणक्षेत्र में स्वर्ग का-सा दृश्य आ गया। लक्ष्मण तथा वानर जो कार्य कर रहे थे
क्षण भर के लिए वह भूल गये कि हम स्वर्ग में हैं या रणक्षेत्र में। उसने ब्रह्मास्त्र लक्ष्मण पर छोड़ दिया। समस्त
सेना धराशायी हो गयी पर हनुमान् जीवित थे। उन्होंने देख लिया अस्त्र किसने छोड़ा। उन्होंने आकाश में छलाँग
मार कर नकली इन्द्र के ऐरावत की गर्दन तोड़ दी। पर इन्द्रजित् ने ऐसा घूंसा मारा कि हनुमान् भूमि पर गिर पड़े।
वह विजय का डंका पीटकर घर चला गया। राम घटना स्थल पर पहुँच कर लक्ष्मण तथा सेना का हाल देखकर
मूच्छित हो गये। सारा रणक्षेत्र श्मशान हो गया। रावण ने प्रसन्न होकर सीता को समाचार भेजा कि तुम्हारे पति
का अन्त हो गया है तथा वानर-सेना नष्ट हो गयी है, तुम चाहो तो देख लो। त्रिजटा के साथ सीता पुष्पक पर चढ़ कर
घटना-स्थल पर पहुँचीं। वहाँ का भयानक दृश्य देखकर अयोध्या-नरेश राम की लाश पड़ी है, लक्ष्मण पड़े हैं —सीता
का हृदय व्याकुल होकर फटने लगा, पर त्रिजटा ने कहा ध्यान से देखो। राम मूच्छित हैं, मरे नहीं हैं। पुष्पक विमान
विधवा को लेकर उड़ नहीं सकता। मण्डो ने इस बात की परीक्षा ली थी। सीता विमान पर बैठ गयी। विमान उड़ गया
सीता अशोकवाटिका में आ गयीं। सीता को विश्वास हो गया कि राम मरे नहीं हैं। एक न एक दिन मेरा दुःख
दूर करेंगे। विभेष कहीं काम से गये थे। लौटने पर उन्होंने सेना की यह दुर्गति देखी, पर वे निराश नहीं हुए।
वह जानते थे कि हनुमान् को ईश्वर की ओर से अमरत्व का वरदान मिला है। उन्होंने एक मन्त्र पढ़कर हनुमान्
की ओर फूँक मारी। हनुमान् ने आँखें खोल दीं। उन्हें परिस्थिति का ज्ञान हो गया। वे उठ खड़े हुए। रात का
समय था। पड़ी हुई लाशों पर ओस की बूंदों का अमृततुल्य प्रभाव पड़ रहा था। एक एक करके सैनिक उठने
लगे, पर लक्ष्मण और ब्रह्मपाश से आहत सैनिक अभी पड़े ही थे। ब्रह्मास्त्र के व्रणों का इलाज विदेह देश के आबुद्ध
पर्वत की बूटियाँ ही थीं। उनका ज्ञान जाम्बवान को ही था, क्योंकि ईश्वर सेवा के समय उसे उनका परिचय
हुआ था। बूटी के ऊपर एक चक्र घूमता रहता था। बूटी लेनेवाले को वह मार देता था। हनुमान् ही उसे ला
सकते थे। हनुमान् दौड़कर उस पर्वत पर पहुँचे। वे जब वहाँ पहुँचे तो देखते हैं कि चाँद छिप गया। आकाश में
अन्धकार हो गया। उन्होंने पूरा पहाड़ उठा लिया, पर पहाड़ रखा कहाँ जाय? लङ्का तो जङ्गम द्वीप था, उस
पर पर्वत का टिकना संभव नहीं था। उसे उत्तर दिशा में रखा गया। उन बूटियों की सुगन्ध लगने से ब्रह्मास्त्र
द्वारा मूच्छित सैनिक जागने लगे। लक्ष्मण एवं उनके साथी सब जी उठे। इन्द्रजित् चिन्तित हुआ, पर उसने सोचा

कि सीता के लिए ही यह सब उपद्रव हो रहा है; सीता का ही अन्त कर दिया जाय तो युद्ध का भी अन्त हो
जायगा। परन्तु दशकण्ठ ऐसा नहीं चाहता था, इसलिए नकली सीता बनायी गयी। शुक्रसर ने अपना कर्तव्य
पालन नहीं किया था, अतः उसे प्राणदण्ड का हुक्म हो चुका था। इन्द्रजित् के सुझाव पर दशकण्ठ ने शुक्रसर
को आदेश दिया कि वह सीता का रूप धारण कर इन्द्रजित् के साथ रथ पर बैठ जाय। इस प्रकार नकली
सीता को लेकर इन्द्रजित् रणक्षेत्र में पहुँचा। लक्ष्मण का सामना हुआ, परन्तु लक्ष्मण का तीर उनके धनुष
में ही लटका रह गया। दुःखित सीता के ऊपर लक्ष्मण की दृष्टि पड़ी तो उनके होश उड़ गये। इन्द्रजित् ने ललकारा
तो उन्हें होश आया। इन्द्रजित् ने कहा आगे आकर सीता को लो और लङ्का का पिण्ड छोड़ो। लक्ष्मण सहर्ष आगे
बढ़े, पर वह सीता को शत्रु के हवाले कर अपने यश में बट्टा नहीं लगाना चाहता था। उसने तलवार से सिर काट
कर लक्ष्मण की गोद में फेंक दिया। लक्ष्मण सन्न रह गये। इन्द्रजित् ने दहाड़ कर कहा अभी क्या अभी तो तुम्हारी
राजधानी अयोध्या पर भी चढ़ाई करूँगा। इस तरह विजय-पताका फहरा कर अपने स्थान को लौट गया। विभेक
जान गया कि यह तो शुक्रसर का सिर है। असली सीता तो अभी जीवित है, क्योंकि इन्द्रजित् कुम्भनीय यज्ञ करना
चाहता है, जिससे वह अजेय हो जायेगा। विभेक लक्ष्मण को उसी स्थान पर ले गये जहाँ वह अपने को सुरक्षित
समझकर यज्ञ कर रहा था। विघ्न देखकर वह उठ खड़ा हुआ। विघ्नकारियों को ढूँढने लगा वह अन्धकार उत्पन्न
कर माता-पिता के दर्शनार्थ गया। आज लक्ष्मण इन्द्रजित् का सिर काटने का निश्चय कर चुके थे, परन्तु ब्रह्मा का
उसे ऐसा वरदान था कि इन्द्रजित् का सिर कटकर जिस दिन भूमि में पड़ेगा उसी दिन प्रलय हो जायेगा।
प्रलय की अग्नि प्रज्वलित होगी और समस्त संसार उसमें जल जायगा, इसलिए अङ्गद आकाश में उड़
गये। स्वर्गलोक में जाकर वहाँ से ब्रह्मा का एक पात्र उठा लाये, जिससे भूमि पर इन्द्रजित् का सिर गिरने न पाये।
ज्यों ही वे लौटे लक्ष्मण ने अपना ब्रह्मास्त्र छोड़ा। उसका सिर कट कर ब्रह्मा के पात्र में गिर पड़ा। अब राम ने
एक ऐसा बाण छोड़ा जिसने अग्नि उत्पन्न कर इन्द्रजित् का सिर जला कर राख कर दिया। जगत् भस्म होने से
बच गया। उसका धड़ रणक्षेत्र में गिर पड़ा। वानर-सेना में विजय की उमँग छा गयी।
दशकण्ठ और उसके मित्र
इन्द्रजित् की मृत्यु से दशकण्ठ बहुत दुःखी हुआ और सीता को मार डालने की बात सोचने लगा, पर
उसे पौवनासुर ने यह कहकर रोका कि ऐसा करना तो नामर्दी है, बदला लेना है तो राम से लड़ो। दशकण्ठ मैदान में
उतरा। सेनाध्यक्ष ओर दस पुत्र उसके साथ थे, जिन्होंने वायु, अग्नि, सूर्य तथा इन्द्र को परास्त किया था। इधर भी
वायुपुत्र हनुमान्, अग्निपुत्र नील नल, सूर्यपुत्र सुग्रीव तथा इन्द्रपौत्र अङ्गद विद्यमान थे। यह विचित्र बात हुई कि
उनकी मृत्यु उन्हीं देवों की सन्तानों से हुई। दशकण्ठ दस भुजाओं से आक्रमण करता था, दस से दूसरों का आक्रमण
रोकता था, फिर भी विजय न हुई। वह लौट गया। उसने अपने मित्र पंगताल के राजा मूलवलम को बुलाया।
वह अपने भाई सहस्त्रेज के साथ आया। ईश्वर के वरदान से वह सहस्र सिर तथा द्विसहस्र भुजाओंवाला था। वह
अजेय था। उसके पास एक गदा थी, जिसके नुकीले सिर से शत्रु की मृत्यु अवश्यंभावी थी। दोनों भाई बड़े उत्साह
से रणक्षेत्र में आये। बन्दर उनके तेज से भाग खड़े हुए। लक्ष्मण के तीर ने मूलवलम को ढेर कर दिया, हनुमान्
की बुद्धिमत्ता से सहस्त्रेज की प्रगति रुक गयी। हनुमान् एक छोटा वन्दर बनकर उसके रथपर चढ़ गये। क्रोध के
जोश में उसने बन्दर को उठा लिया। बन्दर ने कहा मैं वाली का सेवक हूँ। मालिक का बदला लेने आया हूँ।
राक्षस ने विश्वास करके उसे अपना मित्र बना लिया। उसने उसकी मीठी बातों में आकर गदा दे दी। गदा पाते
हनुमान् ने विकराल रूप धारण कर लिया। अपनी पूँछ से लपेटकर उसके सिर काटकर राम के सामने रख दिये।
सेंगआदित्य मकरकण्ठ का भाई था। उसके पास एक माया का सीसा था। उसमें जिसकी छाया पड़ती वह भस्म

३६० रामायणमीमांसा द्वादश
हो जाता था, पर वह सीसा ब्रह्मा के पास रहता था। अङ्गद सेंगआदित्य के सेनाध्यक्ष का रूप धारण कर ब्रह्मा के
पास गये और उस सीसे को ले आये। उस विषैले अस्त्र से वञ्चित होने के कारण वह राक्षस भी राम के हाथ
मारा गया।
अचानक उसे स्मरण हुआ कि चक्रवाल का राजा सतलुंग और त्रिशिरा का बेटा त्रिमेध जीवित हैं।
उनका उसने आह्वान किया। वे बड़ी सेना लेकर आये। राम के तीर से सतलुंग मारा गया। त्रिमेध मारे भय के
प्राण लेकर भागा। हनुमान् ने उसका पीछा किया। वह भी मारा गया। अब दशकण्ठ ने अपनी शक्ति से लड़ने का
निश्चय किया। वह अपने मांस को हीरा बना सकता था। अङ्गुलियों में मृत्युदेव की शक्ति भर सकता था। नन्दक
के रूप में ईश्वर की सेवा करके वह शक्तिसम्पन्न हुआ था, पर इसमें शर्त यह थी कि वह सात दिन तक प्रसुप्त
सागर के समान शान्त रहे। क्षणिक क्रोध या अशान्ति से वरदान निष्फल हो जाता था। वह नीलकाय पर्वत की
खोह में तप और यज्ञ करने लगा। परन्तु हनुमान् की शक्ति का अनुमान नहीं था। बिभेक के इशारे पर हनुमान्,
नील, नल और अङ्गद वहाँ पहुँच गये, पर माया से खोह का द्वार बन्द था। किसी स्त्री के अशुद्ध पैर के धोवन जल
के छिड़के जाने पर वह खुल सकता था। हनुमान् अपनी राक्षसी बैंञ्जकाया पत्नी से वैसा पानी लाये। उसके
छिड़कते ही खोह का द्वार खुल गया। तीनों भीतर जाकर उसको काट कर नोच कर क्रोध भड़काने लगे, पर वह
विचलित नहीं हुआ। हनुमान् रानी मण्डों को उठा लाया; लङ्का की रानी को बानर के हाथ में देखकर रावण हनुमान्
से युद्ध करने बढ़ा। मन के क्षुब्ध होने से वर का प्रभाव समाप्त हो गया।
अब अष्टाङ्ग राजा सद्धासुर और दूषणपुत्र विरूणचम्बक युद्ध के लिए आये। सद्धासुर को वरदान था कि
वह समस्त देवलोक के शस्त्रों को प्राप्त कर सकता था और अपने घोड़े के साथ अदृश्य हो सकता था। हनुमान् ने
बन्दरों से कहा तुम बादलों में छिप जाना, सद्धासुर की प्रार्थना पर देवलोक से देव आयुध डालें तो बीच में ही लपक
कर ले लेना। इसके बाद हनुमान् ने उसको ललकारा, उसने देवताओं से अस्त्रों की माँग की, पर वे बीच में ही
बन्दरों द्वारा लपक कर ले लिये गये। वह अपनी ही शक्ति पर लड़ने आया। हनुमान् के द्वारा मारा गया। विरूण-
चम्बक अदृश्य होकर सेना का संहार करने लगा। राम ने एक मौत का बुझा बाण छोड़ा जिससे उसके साथी और
अदृश्य घोड़ा मर गया। उसने एक रूमाल निकाला, माया के बल से नकली रूप बना कर लड़ता रहा और स्वयं
आकाश पर्वत में चला गया। एक वानरिन अप्सरा ने उसे समुद्रफेन में छिपने का परामर्श दिया, पर वह हनुमान् के
चंगुल में आ ही गया। हनुमान् उस पर्वत पर पहुँच कर वानरिन से मिले। वह युगों से उनकी प्रतीक्षा में थी। वह
कभी ईश्वर की आज्ञा का पालन करना किसी मित्र से बातचीत के प्रसंग में भूल गयी थी, अतः ईश्वरकोप से वह
पतित हो गयी थी। ईश्वर ने कहा था विरूणचम्बक की खोज में जब हनुमान् की सहायता करेगी तब शापमुक्त
होगी। हनुमान् ने बड़ा सुन्दर रूप बना कर उसके पास जाकर अपना मुँह खोलकर उसमें चाँद और सूर्य दिखाये।
उसे विश्वास हो गया कि यह हनुमान् है। वह हनुमान् की हो गयी। उसका शाप छूट गया। इस अप्सरा के बताये
मार्ग पर चलकर हनुमान् वहाँ पहुँच गये, जहाँ फेन में वह राक्षस पड़ा था। हनुमान् के वहाँ पहुँचते ही वह माया से
समुद्र में छेद कर समुद्र की तलहटी में छिप गया। हनुमान् की लम्बी पूंछ ने उसे वहाँ से भी घसीट लिया
और मार दिया।
अब दशकण्ठ को अपने पितामह ब्रह्मा मालीय की याद आयी जो समस्त देवों, गन्धर्वों तथा दिव्य योनियों
के अध्यक्ष थे। उनके शाप से राम की मृत्यु हो सकती थी। दशकण्ठ ने इन्हें न्याय के लिए बुलाया। परन्तु वह
मालीयराज राम के पितामह महाराज अजपाल का मित्र था। उसने न्यायाधीश बनने की स्वीकृति दे दी। वह स्वर्ग
से लङ्का गया परन्तु वह निष्पक्षता की दृष्टि से दशकण्ठ और राम दोनों के यहाँ न जाकर रणक्षेत्र में उतरा, क्योंकि
वह रणक्षेत्र तो दोनों का ही था। दशकण्ठ ने आकर शिकायत की राम ने मेरे साथ बड़ा अन्याय किया है। परन्तु

मालीवराज बड़े न्यायकारी थे। उन्होंने सब देवी देवताओं को इकट्ठा करके राम को बुलाया। तुरन्त ही रणक्षेत्र एक
न्यायालय बन गया। वहाँ मारकाट के बदले हर्षपूर्वक वार्तालाप होने लगा। राम अपने साथियों के साथ वहाँ आये।
मालीवराज ने जानना चाहा कि लड़ाई का सूत्रपात कैसे हुआ? दशकण्ठ ने कहा महाराज ! सुनिये, राम ने व्यर्थ ही
एक औरत के पीछे यहाँ टण्टा बढ़ा रखा है। यह इतनी बड़ी सेना लेकर मेरी राजधानी घेरे पड़ा है। बात बहुत
छोटी है। मैंने एक स्त्री को जङ्गल में अकेली देखा। उस बेचारी के साथ कोई न था। मुझे उसपर दया आयी।
उसे अपने नगर में ले आया। बात केवल इतनी ही है। परन्तु राम ने सब ठीक बातें बतायीं कि दशकण्ठ मेरी पत्नी
सीता को चुरा कर लाया है। सीता बुलायी गयी। उसके साथ बन्दर भी थे और राक्षस भी थे जिससे सीता को
सिखाने के लिए किसी को अवसर न मिले। सीता की गवाही और देवों की साक्षिता से सिद्ध हो गया कि राम का पक्ष
सत्य है। दशकण्ठ का मुंह बन्द हो गया। फिर उसने यह बहाना लिया कि उसने कई बार देवताओं को पराजित
किया था, अतः वे ईर्ष्या रखते हैं। उसको सताने की तरकीबें सोचते रहते हैं। परन्तु अब मालीवराज का विश्वास
दशकण्ठ से उठ गया। अन्तिम बात ने तो उसको स्पष्ट ही दशकण्ठ के विरुद्ध कर दिया। उन्होंने आज्ञा दी कि
दशकण्ठ सीता को वापस कर दे, युद्ध समाप्त किया जाय। पर दशकण्ठ अड़ गया। अपनी इच्छा के सामने उसने सत्य
और न्याय को त्याग दिया। न्यायाधीश की बात को मानने से इनकार कर दिया। अन्त में वे यह निर्णय करके चले
गये कि दशकण्ठ राम के हाथ से मारा जाय। मालीवराज के साथी देवता भी स्वर्ग चले गये।

महास्त्र कपिलवद्
दशकण्ठ ने महास्त्र कपिलवद् को जाग्रत् करना चाहा। उसे ईश्वर की ओर से वरदान मिला था। इसके
जाग्रत् होने पर वह देवों सहित मालीवराज को भस्मीभूत कर सकेगा। दशकण्ठ ने साधुवेश में मेरुपर्वत की तलहटी
में यज्ञ की अग्नि प्रज्वलित कर मिट्टी की देवमूर्तियाँ बनायी। वह वेद-मन्त्रों के पाठ से प्रज्वलित हुई अग्नि में देव-
मूर्तियों को डालने लगा। देवों में खलबली मच गयी। देवों के राजा ने देखा कि वह उन सबको भस्म करना चाहता
है। वे ईश्वर के पास दौड़े। सहायता माँगी। दयालु ईश्वर ने “वाली, जो दूसरा जन्म लेकर देव बन गया था, से
कहा जाओ, मेरुपर्वत को आग में झोंक दो।” शान्तिपूर्वक यज्ञ करते हुए दशकण्ठ ने वाली को देखा, परन्तु वाली
देव था। दशकण्ठ की उसके सामने कुछ न चली। वह निराश होकर भाग निकला। दशकण्ठ ने देखा ईश्वर ने वाली
को देव बना दिया। वह राम का पक्ष लेते हैं तो उसे बहुत बुरा लगा। परन्तु मण्डो ने बहुत समझाया और कहा
शायद विभंक के समझाने पर हनुमान् आया होगा। उसी ने वाली का रूप धारण कर लिया होगा। विभेक ही सब
बलाओं की जड़ है। पहले उसी को मारना चाहिये। दशकण्ठ को इसपर विश्वास हो गया। दूसरे दिन महास्त्र
कपिलवद् को लेकर वह विभेक को मारने चला। उसे राम, लक्ष्मण और विभेक का मुकाबला करना पड़ा। कपिलवद्
विभेक का रुधिर पीने लपका। विभेक ने वेग से अपने को बचा लिया। लक्ष्मण ने महास्त्र को वापस भेजा; लक्ष्मण
के तीर से महास्त्र र्का मार्ग. तिरछा हो गया, पर दशकण्ठ का तीर लक्ष्मण को लगा। वह मूर्च्छित होकर गिर पड़े।
यह देखकर राम ने भयङ्कर बाण-वर्षा की। दशकण्ठ को छोड़कर कोई राक्षस जीवित न रहा। दशकण्ठ भागकर
महलों में जा छिपा। अब लक्ष्मण के घाव को ठीक करने के लिए विभेक ने उपाय किया। इसकी तीन बूटियाँ थीं।
तुलुवा, संकरणी एवं त्रिजवा। परन्तु ये बूटियाँ उत्तरकुरु प्रदेश के सञ्जोवसञ्जी पर्वत पर ही मिल सकती थीं। इन
बूटियों को इन्द्रकाल पर्वत की गुफा स्थित ईश्वर की गाय के गोबर में मिलाना पड़ता था। वहाँ जाने की गति उसी
में थी जिसके मुंह में चाँद और नक्षत्र दीखते हों। हनुमान् ही इसके योग्य थे। वे तुरन्त गये। क्षण भर में बूटियाँ
ले आये, पीसने की सिल भी पाताल के राजा कालानाग के पास थी और बट्टा दशकण्ठ के पास था। हनुमान् दौड़कर
पाताल से सिल लाये, बट्टा लेने दशानन के घर में घुस गये। वह उसे तकिया बनाकर सो रहा था। हनुमान् ने
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सिरहाने से बट्टा खींच लिया। चलते समय हनुमान् ने दशकण्ठ की लट रानी की लट से बाँध दी और शाप
दिया कि जब तक रानी राजा को तीन थप्पड़ न मारे तब तक लट न खुले। यह शाप रावण के माथे पर लिख
दिया। बूटियों के प्रयोग से लक्ष्मण उठ गये। सबको बड़ा हर्ष हुआ। सब उपायों से थककर रावण को लाचारी से
पत्नी के तीन थप्पड़ खाकर बन्धन से छुटकारा मिला।
संजीवयज्ञ
महारानी मण्डो पतिव्रता थी। वह मृत्यु को वश में करना जानती थी। उसने उमा की सेवा में रहकर
अमृत बनाना सीखा था। अमृत बन जाने पर वह सब पुत्रों तथा सेनाओं सहित रावण को जीवित कर सकती थी
और फिर राम के बाणों के लिए भी कठिनाई उत्पन्न हो सकती थी। उसने संजीवयज्ञ आरम्भ कर दिया। इससे
दशकण्ठ आशावान् होकर अपने दशगिरिवन और दशगिरिधर दो पुत्रों के साथ रणक्षेत्र में आया। लक्ष्मण ने दोनों
को मार भगाया। राम ने दशकण्ठ का रास्ता रोका इसी समय मण्डो का अमृत बनकर तैयार हो गया। अमृत
छिड़कते ही सारी सेना जी उठी। कुम्भकर्ण, इन्द्रजित्, सहस्तेज आदि सब जाग उठे। फिर जोरों से युद्ध छिड़
गया। अब युद्ध का अन्त होना बहुत कठिन हो गया। अब इसका यही उपाय था कि मण्डो का यज्ञ रोका जाय।
यदि मण्डो में विषयवासना जाग्रत् हो जाय तो यह यज्ञ असफल हो सकता था, क्योंकि यज्ञ के लिए आत्मसंयम
अपेक्षित था। हनुमान् ने दशकण्ठ का वेष बनाया। नीलवद् उसका हाथी बन गया, कोई महावत बन गया। वह
बनावटी दशकण्ठ विजय की खुशी मनाते हुए लङ्का में जुलूस के साथ आया और वहाँ पहुँचा जहाँ तपस्विनी
बनकर मण्डो अमृत बनाने में संलग्न थी। दशकण्ठ ने कहा अब अमृत की आवश्यकता नहीं है। राम और उनकी
सेना के सैनिक सब मरे पड़े हैं।
मण्डो हर्ष से उछल पड़ी और नकली दशकण्ठ के गले लिपट गयी। विषयवासनापूर्ण चुम्बन उसके ओठ
पर दिया गया और विषयवासनापूर्ण आलिङ्गन से मण्डो की मनोवृत्ति बदल गयी। इस प्रकार हनुमान्‌जी की
बुद्धिमानी से मण्डो का काम बिगड़ गया। दशकण्ठरूपी हनुमान् यह बहाना करके वहाँ से निकल गये कि अभी
विभेक जीता है उसे मारकर मैं अभी आता हूँ। उधर दशकण्ठ अमृत की राह देख रहा था। पहले जिलाये हुए
राक्षस मर चुके थे। उनको फिर से जिलाना था। घण्टों प्रतीक्षा के बाद भी अमृत न आया। वह मण्डो की
यज्ञशाला की ओर लपका। उसको हनुमान् के छल का पता लग गया। मण्डो को ज्ञात हुआ कि उसका सतीत्व
नष्ट हो गया। वह बेहोश होकर गिर पड़ी। फिर भी मण्डो एवं दशकण्ठ का प्रेम ज्यों का त्यों बना रहा।
आत्मा का पिंजरा
हनुमान् की करनी पर क्रुद्ध होकर दशकण्ठ युद्ध के लिए चल पड़ा। राम ने बेशुमार तीरों की वर्षा से
सामना किया। दोनों ओर से तीर छूट रहे थे। आकाश में अँधेरा छा गया था। राम अद्वितीय वीरता से लड़े
पर रावण पर विशेष असर नहीं हुआ। उसके सिर और भुजाएँ कटकर गिर जाती परन्तु फिर नये सिर और नयी
भुजाएँ बन जाती थीं। तीव्र से तीव्र बाण उसका कुछ बिगाड़ न सके। विभेक ने बताया कि दशकण्ठ की आत्मा तो
उसके गुरु गोपुत्र के पास एक पिंजड़े में सुरक्षित है। दशकण्ठ तो तभी मरेगा जब उसकी आत्मा को मार डाला जाय।
हनुमान् इस काम के लिए चल पड़े, पर उन्होंने राम से कहा महाराज, इस काम को सिद्ध करने में कई चालें
चलनी पड़ेंगी। मुझे शत्रुदल में शामिल देखकर मेरी भक्ति में सन्देह न कीजियेगा। इस तरह राम को सचेत कर
हनुमान् गोपुत्र की कुटिया पर चले गये। गोपुत्र मूर्ख था। हनुमान् के साथ इन्द्र का पौत्र अङ्गद भी था। हनुमान्
गुरु की कुटिया में पहुँच गये। वहाँ पहुँचकर हनुमान् झूठमूठ का रोना रोने लगे और बोले राम ने हमारे साथ
बड़ा दुर्व्यवहार किया। हमने सदा उनकी सेवा की, पर वे बड़े कृतघ्न निकले। हम दशकण्ठ की सेना में आना

चाहते हैं। पर शायद दशकण्ठ हमको स्वीकार न करें, क्योंकि हमने उनके भाइयों और पुत्रों का वध किया है।
गुरुजी ! आप कृपा कर हमें साथ ले चलें। हमको उनसे मिला दें। यह कहकर हनुमान् फिर रोने लगे। आँसुओं
की धारा उनके मुख पर बह चली। यह देख गोपुत्र राजी हो गया और वे सब दशकण्ठ के महल की ओर चल पड़े।
हनुमान् ने कहा गुरुजी आत्मा के पिंजड़े को घर पर न छोड़िये। राम उसकी ताक में हैं। अवसर मिलते ही उड़ा
ले जायगा, अतः इसको साथ ही रखना चाहिये। वह हनुमान् की बातों में आ गया और पिंजड़ा ले लिया। लङ्का
के राक्षस हनुमान् को देखकर डर गये। हनुमान् की उपस्थिति से लङ्का में तूफान आ गया। पर आगे चलने पर
विचार हुआ कि दशकण्ठ के पास पिंजड़ा कैसे ले जाया जाय। जैसे पक्षी अपने घोंसले को देखकर उसमें भाग जाता
है इसी प्रकार दशकण्ठ की आत्मा उसकी देह में घुस जायगी। हनुमान् ने सुझाया कि आत्मा का पिंजड़ा अङ्गद
के हाथ में छोड़ दिया जाय। आप और हम नगर के अन्दर चलें। लौट कर फिर इसे ले लेंगे। इस तरह पिंजड़ा
अङ्गद के हाथ में देकर दोनों चल पड़े। चलते-चलते अचानक हनुमान् बोले गुरुजी आप चलिये, मैं अङ्गद को एक
बात बता आऊँ कि उसे सावधान रहना चाहिये। कहीं अकेला पाकर शत्रु समझ कर राक्षस उसे मार न डालें।
इस बहाने से अङ्गद के पास जाकर नकली पिंजड़ा बनाकर अङ्गद को दिया और बोले असली पिंजड़े को ले जाकर
समुद्र के तट पर गाड़ दो। यहाँ आकर नकली पिंजड़ा गुरुजी को दे देना। यह कहकर गुरुजी के साथ दशकण्ठ के
पास पहुँच गये। उसके सामने भी राम के दुर्व्यवहार की कहानी सुनायी। वह बोला, क्या लङ्का जलाने का यही
पुरस्कार है ? स्नान करने का अंगोछा पकड़ा दिया। दशकण्ठ उछल पड़ा तालियाँ बजाता हुआ खुश होकर बोला
आज से तू मेरा धर्मपुत्र हुआ। वह भी हनुमान् का छद्म नहीं जान सका। हनुमान् खुश थे। दूसरे दिन हनुमान् ने
कहा आज मैं अकेला ही राम और उनकी सेना से लड़ूँगा। दोनों को पकड़ लेना कोई कठिन काम नहीं है।
हनुमान् को रावण की ओर से लड़ता देखकर बन्दर डरकर भागने लगे। लक्ष्मण अकेले रह गये उनको भी इस
षड्यन्त्र का पता नहीं था। लक्ष्मण साश्चर्य हनुमान् से लड़ने लगे। हनुमान् झूठमूठ का युद्ध करते रहे। संध्या को
युद्ध रुक गया। हनुमान् लङ्कापति के पास पहुँचे और अपनी बड़ाई की डींग मारने लगे। महाराज, सब बन्दर भाग
गये। संध्या न होती तो आज ही राम और लक्ष्मण को पकड़ लाता। आप के चरणों में उपस्थित कर देता। दश-
कण्ठ हर्ष से फूल गया। पुरस्कार के रूप में इन्द्रजित् की सब सम्पत्ति दे दी। उसकी असली स्त्री को भी हनुमान्
के हवाले कर दिया।
प्रातः पुनः रणभेरी बजी। इस बार दशकण्ठ भी हनुमान् के साथ हो लिये। निश्चित हुआ कि हनुमान्
आकाश में अँधेरा उत्पन्न कर राम और लक्ष्मण को ले जाय। दशकण्ठ पीछे से समस्त दल को नष्ट कर दे। पर
जैसे ही हनुमान् आकाश में पहुँचे एक जँभाई ली, उनके मुख में चाँद और सूर्य चमकने लगे। अङ्गद खड़ा समुद्र
तट पर देख रहा था। वह कूदा और आत्मा का पिंजरा हनुमान् के हाथ में दिया। हनुमान् ने पिंजरा लाकर राम
के हवाले कर दिया। राम हर्ष और कृतज्ञता से फूले न समाये। लक्ष्मण बोल उठे आकाश के तारे गिने जा सकते
हैं, समुद्र की थाह लेना भी आसान है, पर हनुमान् की बुद्धि की प्रशंसा करना कठिन है। राम ने कहा हनुमान्
रत्नों का रत्न है। तीनों लोकों में हनुमान् जैसा कोई नहीं मिल सकता। यह तय हुआ कि राम ब्रह्मास्त्र छोड़ें
और हनुमान् आत्मा पिजड़े को तोड़ दें। दशकण्ठ हनुमान् की गतिविधि देखकर दंग रह गया और कृतघ्न तथा
विश्वासघाती कह कर हनुमान् को धिक्कारने लगा। हनुमान् ने कहा पिंजरा तब दूँगा जब तुम सीता को लौटा
दोगे। दशकण्ठ ने यह स्वीकार नहीं किया और मण्डो से मिलने के लिए लौट पड़ा। महलों में जाकर मण्डो से
मिला और प्रातः उससे विदा लेना चाहा। मण्डो ने सीता को लौटा देने की सलाह दी, पर वह अपनी जिद पर
अड़ा रहा। वह युद्ध के लिए चल पड़ा। राम से मुठभेड़ हुई। उसने एक अस्त्र छोड़ा उसमें से फूल निकल कर राम
के चारों तरफ गिरने लगे। राम ने चकित होकर देखा सामने इन्द्र हैं। रावण इन्द्र के समान सुन्दर रूप धारण

३६४ रामायणमीमांसा द्वादश
कर सामने स्थित है। राम को उसको मारना अच्छा न लगा। हनुमान् ने कहा आप इसके सौन्दर्य पर क्यों मोहित
होते हैं। राम सचेत हुए और उसपर ब्रह्मास्त्र छोड़ दिया। वह उसके हृदय में लगा। उसका असली कुरूप शरीर
सामने गिर पड़ा। जिसने संसार भर में मौतें ही मौतें ढायी थीं। वह आज स्वयं मौत का शिकार हो गया। उसने
धीरे से आँख खोली सामने विभेक को देखा। उसके मुंह से खेद, क्रोध, पश्चात्ताप और पीड़ा के शब्द निकले।
उसने प्राण त्यागते त्यागते विभेक से क्षमा माँगी और उससे राज को सँभालने तथा सुरक्षित रखने को कहा। उसी
समय हनुमान् ने आत्मा का पिंजड़ा तोड़ दिया दशकण्ठ का जीवन समाप्त हो गया। आकाश से फूलों का वर्षा
हुई एवं दुन्दुभियाँ बजने लगीं। शान्ति का पवन बहने लगा। तूफान की अंधेरी रात का अन्त हुआ।
अग्नि-परीक्षा
लङ्का में शोक छा गया। विभेक ने उसकी अन्त्येष्टि की। विभेक का अभिषेक हुआ। विभेक सीता को
राम के पास ले गये। राम यद्यपि सीता से मिलने के लिए प्रेम-विह्वल थे, यद्यपि वे जानते थे कि सीता पवित्र है
फिर भी समाज को ऐसा विश्वास कैसे दें यह चिन्तनीय विषय था। सीता की परीक्षा के लिए राम ने कुछ ऐसे
शब्द कहे जो सीता को वज्र से भी भीषण प्रतीत हुए। सीता ने अपने सतीत्व की अग्निपरीक्षा देकर देवताओं को
चकित कर दिया। सुग्रीव ने चिता बनाई। राम के बाण ने आग लगा दी। सीता सतीत्व के बल से अग्नि में
प्रविष्ट हो गयी। एक महान् चमत्कार हुआ। सीता के समक्ष प्रकृति ने अपना नैसर्गिक नियम त्याग दिया। हिरण्य-
मयी ज्वालाओं से नारायण की दुखिया पत्नी का आविर्भाव हुआ और अग्नि ठण्डी हो गयी। अग्नि की कठोर
ज्वालाएँ शीतल कमल पुष्पों में परिणत हो गयीं। उनकी सुगन्ध से संसार महँक उठा। सीता की सुनहरी जीती-
जागती मूर्ति ज्वालाओं से निकल कर सामने खड़ी थी और सन्देह करनेवालों को बता रही थी कि स्त्री के सतीत्व
में जलती अग्नि शीतल हो जाती है और अंगारे फूल बन जाते हैं।
राम का अयोध्या प्रत्यागमन
राम का समय बीत रहा था। राम को भय था कि समय पर न पहुँचने पर भरत और शत्रुघ्न प्राण
त्याग देंगे। विभेक ने राम से लङ्का का राज्य करने का आग्रह किया। राम ने स्वीकार नहीं किया। इस बीच में
दशगिरिवन और दशगिरिधर के धर्मपिता अशकरण ने सुना कि मेरे धर्मपुत्रों सहित दशकण्ठ मारा गया है। उसका
बदला लेने के लिए वह दौड़ पड़ा। वह भी युद्ध में राम के हाथ मारा गया। उसके टुकड़े-टुकड़े हो गये,
पर वे टुकड़े भी युद्ध करने लगे। उसे ईश्वर का वरदान था कि उसके चाहे कितने ही टुकड़े क्यों न हो जायं वे
सब राक्षस बनकर युद्ध करेंगे। विभेक ने उपाय बताया। राम ने बाण छोड़ा उसके टुकड़े टुकड़े हो गये। फिर
उन्होंने दूसरा बाण छोड़ा उससे वे टुकड़े नदी में बहा दिये गये। उन मृत टुकड़ों का जीवित होना असंभव हो गया
और वह मर गया। राम इस विचित्र शत्रु को मार कर भाई, भार्या तथा साथियों के साथ अयोध्या को चल पड़े।
समुद्र पार होते ही विभेक ने प्रार्थना की कि समुद्र का पुल तोड़ दिया जाय जिससे अनन्त सागर तरंगबाधा-रहित हो
जाय। इतने में दशकण्ठ का पुत्र प्रलयकल्प जो कालअग्नी के पेट से उत्पन्न था वज्रकल्प शब्दों से गरज कर बाप
का बदला लेने के लिए आगे आ गया। हनुमान् की बुद्धि से वह भी मारा गया। हनुमान् पहले तो भैंसा बनकर
कीचड़ में लोट गये। भैंसे से उसने पूछा राम और लक्ष्मण कहाँ हैं। भैंसे ने कहा पहले मुझे कीचड़ से निकालो
तब बताऊँगा। उसने बड़ी मुश्किल से निकाला वह थक कर चूर-चूर हो गया और फिर राम को पूछा।
हनुमान् ने कहा राम और लक्ष्मण के पीछे क्यों पड़ते हो? पर वह लड़ने के लिए एकदम सन्नद्ध था।
हनुमान् ने बन्दर का रूप धारण किया, युद्ध शुरू हो गया। वह थका तो था, परन्तु हारा नहीं; क्योंकि
उसका शरीर वरदान के बल से इतना चिकना था कि पकड़ में नहीं आता था। हनुमान् अपनी एक
मायावी मूर्ति से लड़ते रहे और स्वयं एक ऋषि के पास परामर्श लेने गये। ऋषि ने भूमि पर रेत फेंक दी।

अध्याय विदेशी रामकथा की चर्चा ३९५
हनुमान् समझ गये चिकनाहट कम करने के लिए उस पर रेत फेंक दी । चिकनाहट कम हो गयी । उसको
जकड़ कर मार दिया । राम अयोध्या पहुँच गये । राक्षसों के षड्यन्त्रों से भरत और शत्रुघ्न निराश होकर प्राण
त्यागने के लिए तैयार थे । ठीक समय पर राम आ गये । राम का विधिवत् अभिषेक हुआ । लक्ष्मण को
रोमगल प्रदेश का राजा और भरत तथा शत्रुघ्न को युवराज बनाया । सुग्रीव को खिदखिन का तथा विभेक को लङ्का
का राजा बनाया गया । अङ्गद को फ्रया इन्द्रानुभाव के नाम से खिदखिन का युवराज बनाया गया । जम्बूवान को
पंगताल का राज मिला । हनुमान् को अयोध्या का शासक बनाया गया । उसकी पदवी फ्रया अनुजित चक्र कृष्ण
विषदन वोङ्गस हुई, परन्तु वह तो नारायण के वंशजों का राज था । ज्यों ही वह गद्दी पर बैठा उसके शरीर में
आग सी लगने लगी । वह झट गद्दी पर से उतर पड़ा और अयोध्या की गद्दी गद्दी के अधिकारी को दे दी । कृतज्ञ
राम ने एक तीर मारा और अनुजित को आज्ञा दी कि इसके मार्ग का पीछा करो जहाँ तीर गिरे वहीं तुम अपनी
राजधानी बनाओ । तीर नौ चोटियोंवाले पहाड़ पर गिरा वह चूर चूर हो गया । राम ने विश्वकर्मा को आज्ञा दी
"वहाँ अनुजित के लिए नगर बसाओ।" उसका नाम नवपुरी हुआ । फ्रया अनुजित वहाँ के राजा बने । राम सबके
महाराज बने ।
लङ्का में विद्रोह
चक्रवाल के राजा महापाल ने विभेक पर, जो कि दशगिरिवंश के नाम से वहाँ का राज करता था,
आक्रमण कर दिया । राम ने अनुजित (हनुमान्) को सहायतार्थ भेजा । हनुमान् ने उसकी टाँग पकड़कर उसे चीर
डाला, पर वह फिर से जुड़कर जी गया । विभेक के बताने पर हनुमान् ने उसका हृदय निकाल लिया, तब वह मर
गया । कुछ दिन बाद लङ्का में फिर विद्रोह हो गया । मण्डो जब विभेक की रानी हुई तब वह गर्भवती थी । उसके
पुत्र उत्पन्न हुआ उसका नाम वैणासुरिवंश था । बड़ा होने पर गुरु ने उसके पिता का इतिहास बताया । वह विभेक
से बदला लेने को तैयार हुआ । मण्डो ने समझाया पर वह नहीं माना । गुरुवरणीसुर और वैणासुरिवंश चक्रवर्ती
मलिवन के पास पहुँचे । उसके पास अग्निमृत्यु और जलमृत्यु की खाइयाँ थीं । दोनों ने एक विधि से कुछ वैदिक मन्त्र
पढ़े । उससे अग्नि बुझ गयी, जल पर रेत डालकर वे घुस गये । मलिवन ने उसकी सहायता के लिए लंका पर चढ़ाई
कर दी और विभेक को कैद कर वैणासुरीवंश को लंका का राजा बना दिया । हनुमान् का लड़का, जो बैङ्गकाया से
पैदा था, निकल भागा और पिता को सूचना दी । हनुमान् ने अयोध्या और खिदखिन की सेना लेकर लंका पर चढ़ायी
की । नीलवद् ने अपना शरीर बढ़ा लिया, सागर पट गया उसी से सेना उतर गयी । भयंकर युद्ध हुआ । वैणासुरिवंश
मारा गया । विभेक मुक्त हुए । मलिवन पर भी आक्रमण किया गया, वह भी मारा गया । उसकी गद्दी पर मच्छानु
को बैठाया गया ।
सीता-वनवास
विपत्ति के दिन बीत गये, आनन्द का समय आया । परन्तु भाग्य तो क्षण-क्षण में बदलता है । सीता
गर्भवती थीं । सम्मनर्खा की बेटी अतुल ने संबन्धियों का बदला लेने की दृष्टि से महल की दासियों का रूप लेकर
सीता से पूछा दशकण्ठ कैसा लगता था । उसको इस छल का भेद मालूम न था । उसने स्लेट पर उसका चित्र खींच
दिया । वह राक्षसी उसी में समा गयी । राम अचानक आ गये । सीता ने चित्र मिटाना चाहा पर वह और अधिक
चमक उठा । सीता ने उसको तकिया के नीचे छिपा दिया । राम पलंग पर लेटे तो गर्मी मालूम होने लगी, क्योंकि
अतुल स्लेट के द्वारा आग जला रही थी । राम को नींद न आयी । राम ने लक्ष्मण को बुलाया । कमरे भर में गर्मी
के कारण की तलाश हुई तो इस स्लेट का पता लगा । राम को आश्चर्य हुआ कि इस हत्यारे का चित्र किसने
बनाया । सीता से पूछा तो उन्होंने सच-सच कह दिया । राम को इससे बड़ा आघात लगा । राम ने लक्ष्मण को

आदेश दिया सीता को ले जाओ इसे मारकर इसका कलेजा मेरे सामने लाओ । अयोध्या के भावी राजा की माता ने
राम को समझाने का प्रयत्न किया, परन्तु राम ने कुछ नहीं सुना । लक्ष्मण को सन्देह नहीं था । परन्तु राजाज्ञा के
सामने वह लाचार थे । दुःखी सीता रोती हुई लक्ष्मण के साथ बन की ओर चल पड़ी । किसी वृक्ष की छाया में सीता
बैठ गयी और लक्ष्मण से आज्ञा पूर्ण करने की अनुरोध किया । पर लक्ष्मण निर्दोष सीता को मारने को तैयार नहीं हो
सके । सीता ने मर्मभेदी वचन कहकर उन्हें उत्तेजित किया । लक्ष्मण ने लाचारी से तलवार चलायी, किन्तु स्वयं ही
बेहोश होकर गिर पड़े । तलवार फूलों की माला के रूप में परिणत हो गयी । यह सीता के सतीत्व का चमत्कार
था । होश आने पर लक्ष्मण सीता को जीवित देखकर प्रसन्न हुए । सच ने झूठ का मुँह काला कर दिया । लक्ष्मण
देवताओं से सीता की रक्षा की प्रार्थना करके अयोध्या की ओर चल पड़े । सीता की चिन्ता में लक्ष्मण व्याकुल थे ।
साथ ही सीता का कलेजा भी राम के सामने हाजिर करना था । इन्द्र को दया आयी उसने माया से रेत के मैदान में
एक मृत हरिण डाल दिया । लक्ष्मण ने उसका कलेजा निकाल कर राम को उसकी सूचना दे दी । राम ने उसे देखा ।
सीता की अवस्था पर इन्द्र को दया आयी । वह भैंसे का रूप धारण कर सीता के निकट आया । आँखों से मूक
इशारा किया कि उसके साथ आओ । सीता उसके पीछे चल पड़ी । वह ऋषि की कुटिया में पहुँच गयी । दयाल
ऋषि ने पितृवत् स्नेह दिया । वहीं भावी अयोध्या के राजा का जन्म हुआ । इन्द्र की पत्नियाँ धाय का काम करने
लगीं । ऋषि ने बालक का नाम मङ्कुट रखा । पुत्र के मुख पर सीता के पति के सभी चिह्न थे, जिनको देखकर
कलेजा दो टूक हुआ जाता था । एक दिन बालक को ऋषि के संरक्षण में छोड़कर सीता नदी में स्नान करने के
लिए गयी । उसने देखा बन्दरियाँ अपने बच्चे को गले से चिपकाये हैं । बन्दरियों को कूदते देख सीता ने उनसे कहा
तुम ऐसे क्यों कूदती हो, बच्चे का ध्यान नहीं ? बन्दिरियों ने कहा तुम तो हमसे भी असावधान हो । ऋषि जो कि
समाधि में बैठा है, जिसे संसार की खबर ही नहीं है, उसके संरक्षण में बच्चे को छोड़कर आयी हो । सीता पर
उसका असर पड़ा । वह लौट कर बच्चे को उठा लायी । इसी बीच ऋषि की समाधि खुली । बच्चा न देखकर
उन्होंने दुर्घटना की सम्भावना कर सीता को दुःख से बचाने के लिए पहले बच्चे की आकृति का ही दूसरा बच्चा
बना दिया । सीता ने दोनों का पालन किया । दूसरे का नाम लव हुआ । इस तरह सीता दो पुत्रों की माँ बन गयीं ।
लड़के दस ही वर्ष की आयु में तेजस्विता और वीरता में बड़े-बड़े सूरमाओं से भी बढ़ गये । मङ्कुट ने अपना धनुष
लिया निशाना अजमाने के लिए एक वृक्ष की चोटी पर तीर छोड़ा । बाण ने विद्युत्-वेग से वृक्ष के दो टुकड़े कर
दिये । उसका धमाका भूकम्प जैसा हुआ । धमाके की आवाज अयोध्या तक पहुँची । अभी तो नारायण नर-लीला कर
ही रहे हैं यह कौन नया तेजस्वी पैदा हुआ । राम ने अश्वमेध रचाया । हनुमान्, भरत और शत्रुघ्न घोड़े के रक्षक
नियुक्त हुए । घोड़ा घूमते हुए वहीं पहुँच गया जहाँ से वह धमाका हुआ था । घोड़े के गले में एक तख्ती बँधी थी
उसमें लिखा था जो घोड़े पर चढ़ेगा विद्रोही समझा जायगा । दोनों भाइयों ने घोड़ा पकड़ लिया । युद्ध हुआ, हनुमान्
मूर्च्छित हुए । परन्तु मूर्च्छा खुल गयी । मङ्कुट ने उसे ऐसा बाँध दिया कि जब तक मालिक न आयेगा बँधा ही
रहेगा । भरत आदि ने बहुत यत्न किया पर बन्धन न खुला । हनुमान् लज्जित होकर राम के पास आये तो बन्धन
टूटा । राम ने भरत आदि को आज्ञा दी कि लड़कों को पकड़ कर लाओ । घोर युद्ध हुआ । भरत के तीर से मङ्कुट
आहत हुआ । लव माता की कुटिया में चला गया । मङ्कुट को भरत कैद कर अयोध्या ले गये । लव ने माँ से सब
हाल कहा । सीता के पास एक माया की अंगूठी थी जिससे बड़े से बड़े बन्धन टूट जाते थे । लव उसे लेकर अयोध्या
आया । अंगूठी के प्रभाव से मङ्कुट बन्धनमुक्त हो गया । दोनों वन वापस आये । राम ने बड़ी सेना लेकर मङ्कुट का
पीछा किया । बाप-बेटों में घोर युद्ध हुआ । पुत्रों के तीर फूल बनकर पिता के चरणों पर गिरते थे पिता के तीर
ऊपर ही ऊपर चले जाते थे । राम ने जानना चाहा ये किसके पुत्र हैं । जब उन्होंने सीता के पुत्र हैं, यह कहा तो
उनको बड़ा कौतुक हुआ । लक्ष्मण ने राम को सीता की पूरी कहानी सुनायी, राम को बड़ा हर्ष हुआ कि महारानी

अध्याय विदेशी रामकथा की चर्चा ३६७
सीता का हृदय इतना पवित्र था। दोनों पुत्रों को लेकर कुटिया पर आये जहाँ सीता पुत्रों की प्रतीक्षा कर रही थी।
राम को आता जान कर सीता को बड़ा क्रोध आया। राम ने क्षमा माँगी, महलों में लौटने को कहा। सीता ने
अस्वीकार कर दिया। कहा लङ्का में तो पहरे में थी, परन्तु जंगल में मैं दस वर्षों से अकेली हूँ। मेरे प्रति सन्देह के
लिए अब तो पहले से भी प्रबल कारण हैं। अब मुझको पत्नी के रूप में कैसे स्वीकार कर सकते हैं। राम निरुत्तर
थे। पर सीता ने पुत्रों को जाने की अनुमति दे दी। अयोध्या पहुँचने पर उनका भव्य स्वागत हुआ। दादियों ने
बड़ा ही प्रेम किया। सीता को बुलाने के लिए यह मिथ्या कहलाया गया कि राम का देहान्त हो गया है। समाचार
सुनकर सीता बहुत दुःखी हुई और वह राम के शरीर का अन्तिम दर्शन करने को आयी। जहाँ राम की कल्पित
अर्थी रखी हुई थी, सीता विलाप करने लगी। राम परदे के पीछे खड़े थे, निकल आये और सीता को अपने संतप्त
हृदय से लगाना चाहा। पर यह देखकर तो सीता एकदम क्रुद्ध हो गयी। राम ने सीता को बलात् रोकना चाहा,
पर उसने अपने मार्ग को अवरुद्ध देखकर पृथ्वी से प्रार्थना की वह उसे स्थान दे — पृथ्वी फट गयी। वह उसमें होकर
पाताल चली गयी, भूमि-विवर बन्द हो गया। श्रीराम विभेक की राय से वन में जाकर तप करने लगे और राक्षसों
का सफाया भी। यहाँ राम ने कुम्भाण्ड नामक देव का, जो राक्षसयोनि में था, उद्धार किया। इन्द्र ने ईश्वर से
प्रार्थना की कि राम के प्रताप से राक्षसों का अन्त हो गया है। उन्होंने सम्पूर्ण जगत् को पीड़ामुक्त कर दिया है,
परन्तु वे स्वयं अत्यन्त सन्तप्त हैं। उनकी प्रिय पत्नी सीता उनको त्याग कर चली गयी है। दयालु ईश्वर ने राम
और सीता को बुलाया। दोनों कैलास पर्वत पर उपस्थित हुए। राम ने अनुताप से अपना दोष स्वीकार कर लिया।
सीता से क्षमा-याचना की। परन्तु सीता अपने अपमान को न भूल सकती थीं और न क्षमा कर सकती थीं। फिर
भी ईश्वर की निरन्तर प्रेरणा से सीता का हृदय पिघला। वह फिर राम पर स्नेह करने के लिए राजी हो गयीं।
राम हर्ष से गद्गद हो गये। उनका मन आनन्द सागर में किलोलें करने लगा। प्रेम की ज्योति जाग्रत् हुई।
राम आनन्द सागर में क्रीड़ा करने लगे। उनके यशपूर्ण पराक्रम से सारा जगत् जगमगा उठा। उनकी ख्याति की
सुरभि से युग-युगान्तर और देश-देशान्तर सुरभित हो गये।
इसी तरह अनेक देशों के अनेक विद्वानों, कवियों तथा महापुरुषों ने राम का गुणगान किया है। भले
ही, महर्षि वाल्मीकि और व्यास जैसा आर्ष ज्ञान न होने से उनके वर्णनों में कहीं-कहीं रामायण के आदर्श से
विभिन्नता आ गयी है। बहुत सी विचित्र एवं नयी बातें भी जुड़ गयी हैं। फिर भी उनकी भावनाएँ शुद्ध हैं। अतः
वह सब भी भाव-वश्य भगवान् की आराधना ही है। परन्तु कुछ अनीश्वरवादी जैनों, बौद्धों तथा ईश्वरवादी कुछ
ईसाइयों और मुस्लिमों—वेदादि शास्त्र विरोधी तत्त्वों—ने तो दुष्ट भावना से रामचरित्र को विकृत करने की भी
चेष्टाएँ की हैं। उनके लिए भी यह कहा जा सकता है कि भाव-कुभाव, जैसे-तैसे, उन लोगों ने भी भगवान् राम का
नाम, गुण, प्रभाव आदि का चिन्तन किया है। जैसे अनिच्छा से भी अग्निदेव का स्पर्श हो जाने पर वह दहन करता
ही है। अतः उनका भी कल्याण होना उचित है। वैसे ही जाने अनजाने लिया गया भगवन्नाम भी पापों को नष्ट
कर देता है—
“हरिर्हरति पापानि दुष्टचित्तेरपि स्मृतः।
अनिच्छयापि संस्पृष्टो दहत्येव हि पावकः ॥”
उदयनाचार्य नास्तिकों की सिफारिश करते हुए भगवान् से कहते हैं कि मैंने यद्यपि श्रुति-युक्ति रूप निर्मल
जल से नास्तिकों के दुस्तर्क कलङ्क पङ्क से मसृणित मानस का प्रक्षालन किया तब भी यदि उनके मन में आप
(परमेश्वर) पर आस्था नहीं होती तो उनके मन या अन्तःकरण को वज्र ही समझना चाहिये। किन्तु हे अकारण-
करुणावरुणालय प्रभो ! प्रस्तुत ईश्वरसिद्धिविरोध के प्रसङ्ग से नास्तिक भी बड़े अभिनिवेश से आप का चिन्तन करते