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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 441

३६४ रामायणमीमांसा द्वादश
कर सामने स्थित है। राम को उसको मारना अच्छा न लगा। हनुमान् ने कहा आप इसके सौन्दर्य पर क्यों मोहित
होते हैं। राम सचेत हुए और उसपर ब्रह्मास्त्र छोड़ दिया। वह उसके हृदय में लगा। उसका असली कुरूप शरीर
सामने गिर पड़ा। जिसने संसार भर में मौतें ही मौतें ढायी थीं। वह आज स्वयं मौत का शिकार हो गया। उसने
धीरे से आँख खोली सामने विभेक को देखा। उसके मुंह से खेद, क्रोध, पश्चात्ताप और पीड़ा के शब्द निकले।
उसने प्राण त्यागते त्यागते विभेक से क्षमा माँगी और उससे राज को सँभालने तथा सुरक्षित रखने को कहा। उसी
समय हनुमान् ने आत्मा का पिंजड़ा तोड़ दिया दशकण्ठ का जीवन समाप्त हो गया। आकाश से फूलों का वर्षा
हुई एवं दुन्दुभियाँ बजने लगीं। शान्ति का पवन बहने लगा। तूफान की अंधेरी रात का अन्त हुआ।
अग्नि-परीक्षा
लङ्का में शोक छा गया। विभेक ने उसकी अन्त्येष्टि की। विभेक का अभिषेक हुआ। विभेक सीता को
राम के पास ले गये। राम यद्यपि सीता से मिलने के लिए प्रेम-विह्वल थे, यद्यपि वे जानते थे कि सीता पवित्र है
फिर भी समाज को ऐसा विश्वास कैसे दें यह चिन्तनीय विषय था। सीता की परीक्षा के लिए राम ने कुछ ऐसे
शब्द कहे जो सीता को वज्र से भी भीषण प्रतीत हुए। सीता ने अपने सतीत्व की अग्निपरीक्षा देकर देवताओं को
चकित कर दिया। सुग्रीव ने चिता बनाई। राम के बाण ने आग लगा दी। सीता सतीत्व के बल से अग्नि में
प्रविष्ट हो गयी। एक महान् चमत्कार हुआ। सीता के समक्ष प्रकृति ने अपना नैसर्गिक नियम त्याग दिया। हिरण्य-
मयी ज्वालाओं से नारायण की दुखिया पत्नी का आविर्भाव हुआ और अग्नि ठण्डी हो गयी। अग्नि की कठोर
ज्वालाएँ शीतल कमल पुष्पों में परिणत हो गयीं। उनकी सुगन्ध से संसार महँक उठा। सीता की सुनहरी जीती-
जागती मूर्ति ज्वालाओं से निकल कर सामने खड़ी थी और सन्देह करनेवालों को बता रही थी कि स्त्री के सतीत्व
में जलती अग्नि शीतल हो जाती है और अंगारे फूल बन जाते हैं।
राम का अयोध्या प्रत्यागमन
राम का समय बीत रहा था। राम को भय था कि समय पर न पहुँचने पर भरत और शत्रुघ्न प्राण
त्याग देंगे। विभेक ने राम से लङ्का का राज्य करने का आग्रह किया। राम ने स्वीकार नहीं किया। इस बीच में
दशगिरिवन और दशगिरिधर के धर्मपिता अशकरण ने सुना कि मेरे धर्मपुत्रों सहित दशकण्ठ मारा गया है। उसका
बदला लेने के लिए वह दौड़ पड़ा। वह भी युद्ध में राम के हाथ मारा गया। उसके टुकड़े-टुकड़े हो गये,
पर वे टुकड़े भी युद्ध करने लगे। उसे ईश्वर का वरदान था कि उसके चाहे कितने ही टुकड़े क्यों न हो जायं वे
सब राक्षस बनकर युद्ध करेंगे। विभेक ने उपाय बताया। राम ने बाण छोड़ा उसके टुकड़े टुकड़े हो गये। फिर
उन्होंने दूसरा बाण छोड़ा उससे वे टुकड़े नदी में बहा दिये गये। उन मृत टुकड़ों का जीवित होना असंभव हो गया
और वह मर गया। राम इस विचित्र शत्रु को मार कर भाई, भार्या तथा साथियों के साथ अयोध्या को चल पड़े।
समुद्र पार होते ही विभेक ने प्रार्थना की कि समुद्र का पुल तोड़ दिया जाय जिससे अनन्त सागर तरंगबाधा-रहित हो
जाय। इतने में दशकण्ठ का पुत्र प्रलयकल्प जो कालअग्नी के पेट से उत्पन्न था वज्रकल्प शब्दों से गरज कर बाप
का बदला लेने के लिए आगे आ गया। हनुमान् की बुद्धि से वह भी मारा गया। हनुमान् पहले तो भैंसा बनकर
कीचड़ में लोट गये। भैंसे से उसने पूछा राम और लक्ष्मण कहाँ हैं। भैंसे ने कहा पहले मुझे कीचड़ से निकालो
तब बताऊँगा। उसने बड़ी मुश्किल से निकाला वह थक कर चूर-चूर हो गया और फिर राम को पूछा।
हनुमान् ने कहा राम और लक्ष्मण के पीछे क्यों पड़ते हो? पर वह लड़ने के लिए एकदम सन्नद्ध था।
हनुमान् ने बन्दर का रूप धारण किया, युद्ध शुरू हो गया। वह थका तो था, परन्तु हारा नहीं; क्योंकि
उसका शरीर वरदान के बल से इतना चिकना था कि पकड़ में नहीं आता था। हनुमान् अपनी एक
मायावी मूर्ति से लड़ते रहे और स्वयं एक ऋषि के पास परामर्श लेने गये। ऋषि ने भूमि पर रेत फेंक दी।