रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६० रामायणमीमांसा द्वादश
हो जाता था, पर वह सीसा ब्रह्मा के पास रहता था। अङ्गद सेंगआदित्य के सेनाध्यक्ष का रूप धारण कर ब्रह्मा के
पास गये और उस सीसे को ले आये। उस विषैले अस्त्र से वञ्चित होने के कारण वह राक्षस भी राम के हाथ
मारा गया।
अचानक उसे स्मरण हुआ कि चक्रवाल का राजा सतलुंग और त्रिशिरा का बेटा त्रिमेध जीवित हैं।
उनका उसने आह्वान किया। वे बड़ी सेना लेकर आये। राम के तीर से सतलुंग मारा गया। त्रिमेध मारे भय के
प्राण लेकर भागा। हनुमान् ने उसका पीछा किया। वह भी मारा गया। अब दशकण्ठ ने अपनी शक्ति से लड़ने का
निश्चय किया। वह अपने मांस को हीरा बना सकता था। अङ्गुलियों में मृत्युदेव की शक्ति भर सकता था। नन्दक
के रूप में ईश्वर की सेवा करके वह शक्तिसम्पन्न हुआ था, पर इसमें शर्त यह थी कि वह सात दिन तक प्रसुप्त
सागर के समान शान्त रहे। क्षणिक क्रोध या अशान्ति से वरदान निष्फल हो जाता था। वह नीलकाय पर्वत की
खोह में तप और यज्ञ करने लगा। परन्तु हनुमान् की शक्ति का अनुमान नहीं था। बिभेक के इशारे पर हनुमान्,
नील, नल और अङ्गद वहाँ पहुँच गये, पर माया से खोह का द्वार बन्द था। किसी स्त्री के अशुद्ध पैर के धोवन जल
के छिड़के जाने पर वह खुल सकता था। हनुमान् अपनी राक्षसी बैंञ्जकाया पत्नी से वैसा पानी लाये। उसके
छिड़कते ही खोह का द्वार खुल गया। तीनों भीतर जाकर उसको काट कर नोच कर क्रोध भड़काने लगे, पर वह
विचलित नहीं हुआ। हनुमान् रानी मण्डों को उठा लाया; लङ्का की रानी को बानर के हाथ में देखकर रावण हनुमान्
से युद्ध करने बढ़ा। मन के क्षुब्ध होने से वर का प्रभाव समाप्त हो गया।
अब अष्टाङ्ग राजा सद्धासुर और दूषणपुत्र विरूणचम्बक युद्ध के लिए आये। सद्धासुर को वरदान था कि
वह समस्त देवलोक के शस्त्रों को प्राप्त कर सकता था और अपने घोड़े के साथ अदृश्य हो सकता था। हनुमान् ने
बन्दरों से कहा तुम बादलों में छिप जाना, सद्धासुर की प्रार्थना पर देवलोक से देव आयुध डालें तो बीच में ही लपक
कर ले लेना। इसके बाद हनुमान् ने उसको ललकारा, उसने देवताओं से अस्त्रों की माँग की, पर वे बीच में ही
बन्दरों द्वारा लपक कर ले लिये गये। वह अपनी ही शक्ति पर लड़ने आया। हनुमान् के द्वारा मारा गया। विरूण-
चम्बक अदृश्य होकर सेना का संहार करने लगा। राम ने एक मौत का बुझा बाण छोड़ा जिससे उसके साथी और
अदृश्य घोड़ा मर गया। उसने एक रूमाल निकाला, माया के बल से नकली रूप बना कर लड़ता रहा और स्वयं
आकाश पर्वत में चला गया। एक वानरिन अप्सरा ने उसे समुद्रफेन में छिपने का परामर्श दिया, पर वह हनुमान् के
चंगुल में आ ही गया। हनुमान् उस पर्वत पर पहुँच कर वानरिन से मिले। वह युगों से उनकी प्रतीक्षा में थी। वह
कभी ईश्वर की आज्ञा का पालन करना किसी मित्र से बातचीत के प्रसंग में भूल गयी थी, अतः ईश्वरकोप से वह
पतित हो गयी थी। ईश्वर ने कहा था विरूणचम्बक की खोज में जब हनुमान् की सहायता करेगी तब शापमुक्त
होगी। हनुमान् ने बड़ा सुन्दर रूप बना कर उसके पास जाकर अपना मुँह खोलकर उसमें चाँद और सूर्य दिखाये।
उसे विश्वास हो गया कि यह हनुमान् है। वह हनुमान् की हो गयी। उसका शाप छूट गया। इस अप्सरा के बताये
मार्ग पर चलकर हनुमान् वहाँ पहुँच गये, जहाँ फेन में वह राक्षस पड़ा था। हनुमान् के वहाँ पहुँचते ही वह माया से
समुद्र में छेद कर समुद्र की तलहटी में छिप गया। हनुमान् की लम्बी पूंछ ने उसे वहाँ से भी घसीट लिया
और मार दिया।
अब दशकण्ठ को अपने पितामह ब्रह्मा मालीय की याद आयी जो समस्त देवों, गन्धर्वों तथा दिव्य योनियों
के अध्यक्ष थे। उनके शाप से राम की मृत्यु हो सकती थी। दशकण्ठ ने इन्हें न्याय के लिए बुलाया। परन्तु वह
मालीयराज राम के पितामह महाराज अजपाल का मित्र था। उसने न्यायाधीश बनने की स्वीकृति दे दी। वह स्वर्ग
से लङ्का गया परन्तु वह निष्पक्षता की दृष्टि से दशकण्ठ और राम दोनों के यहाँ न जाकर रणक्षेत्र में उतरा, क्योंकि
वह रणक्षेत्र तो दोनों का ही था। दशकण्ठ ने आकर शिकायत की राम ने मेरे साथ बड़ा अन्याय किया है। परन्तु