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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 425

२४८ रामायणमीमांसा द्वादश
रामासुर ने राम के बल की परीक्षा लेनी चाही । वहाँ युद्ध हुआ । अन्त में रामासुर ने अपनी पराजय मान ली ।
इसके बाद रामासुर ने उन्हें त्रिमंध नामक अस्त्र दिया ।
राम-वनवास
दशरथ वृद्ध थे । वे अपना उत्तराधिकारी राम को बनाना चाहते थे । कैकेयी की बाँदी कुब्जी के कान
में यह सूचना पड़ी । कुब्जी को राम से बैर था, इसलिए उसकी पीठ में एक कूब था । राम ने तीर मारा तो बाहर
आ गया । इसपर बड़ी हँसी हुई थी । राजा ने कैकेयी को वर दिया था । एक बार युद्ध में दैत्य ने बाण से दशरथ के
रथ का धुरा तोड़ दिया था । कैकेयी ने अपना हाथ पहिये में डाल कर ईश्वर से प्रार्थना की कि वह राजा की रक्षा
करे । रानी की सहायता से राजा विजयी हुए । इसपर राजा ने रानी को वर दिया । कुब्जी ने कैकेयी को यह वर
माँगने को तैयार कर लिया कि राम को १४ वर्ष का वनवास और भरत को राज मिले । राजा ने बहुत समझाया
पर रानी हठकर गयी । उन्होंने दुःखी हृदय से कैकेयी की बात मान ली । राम वन चले गये । वे मनुष्यों की भलाई
में सदा तत्पर रहते थे । उन्होंने भूमि को राक्षसों से मुक्त करने का निश्चय किया । दशरथ को राम के वियोग से
बड़ा दुःख हुआ और उनकी मृत्यु हो गयी । राम चलते-चलते सतोंग नदी के तीर पहुँचे वहाँ अहेरियों का राजा
खुनन रहता था । उसने कहा कि आप यहाँ जङ्गल का राज करें । राम ने धन्यवादपूर्वक इस भेंट को अस्वीकार कर
दिया । राम भरद्वाज के आश्रम में पहुंचे । ऋषि ने उनका बड़ा सत्कार किया । ऋषि ने शरभङ्ग आश्रम
जाने को कहा । वह आश्रम भी अयोध्या के निकट था । तब ऋषि ने शतकूट पर्वत पर रहने को कहा । राम
वहाँ जाकर रहने लगे । भरत और शत्रुघ्न राम का सिंहासनारोहण सुनकर बड़े प्रसन्न हुए । अयोध्या पहुंचे
तो वहाँ उत्सव के बजाय रोना पीटना हो रहा था । तुरन्त ही वे वस्तुस्थिति को समझ गये । वे राम के परम भक्त
थे । वे राम का राज्य कैसे ले लेते ? पिता की अन्त्येष्टि करके वे माताओं को साथ लेकर पैदल यात्रा करके राम के
पास पहुँचे और उनसे अयोध्या का राज्य करने का आग्रह किया । राम ने पितृभक्ति के कारण वैसा स्वीकार नहीं
किया और जो इस विपत्ति का मूल कैकेयी थी, उससे भी द्वेष नहीं माना । पर भरत भी राज करने को तैयार
नहीं हुए । तब राम की पादुकाओं को गद्दी पर बैठा कर राम के प्रतिनिधि होकर भरत राज संभालने को तैयार
हुए । भरत ने प्रार्थना की कि यदि आप १४ वर्ष के बाद अयोध्या न लौटे तो हम अग्नि में प्रवेश कर जायेंगे । दुःखी
मन से भरत अयोध्या लौट आये ।
गोदावरी-तट पर
राम उसके बाद और घने जंगलों में चले गये । वहाँ उनको एक राजा, जिसका नाम सुदर्शन था, मिला ।
वह अपनी रानी के साथ तप करता था । उसने राम से अपने साथ रहने का आग्रह किया, पर राम ने वहाँ रहना
स्वीकार नहीं किया । अब वे बीख राक्षस के उपवन में आये । उसको ईश्वर के वरदान से समुद्र एवं अग्निदेव का
बल प्राप्त था । राक्षस के कर्मचारियों ने उन्हें रोका । लक्ष्मण ने सबको मार डाला । बीख ने बदला लेने का निश्चय
किया, पर वह बली होने पर भी राम-लक्ष्मण का मुकाबला न कर सका । अन्त में मारा गया । आगे उन्हें एक
अप्सरा मिली जिसका नाम सोबरी था । ईश्वर की आराधना में त्रुटि होने से उसे जलते हुए जङ्गल में रहने का
शाप मिला था । शाप छूटने की शर्त यह थी कि जब राम उस वन में आकर आग बुझायेंगे तब उसकी मुक्ति होगी ।
राम ने उस दुःखिया की टेर सुनी । आग बुझा दी और अप्सरा को दिव्य रूप प्राप्त करा दिया । आगे राम ऋषि
अगत्त से आश्रम में पहुँचे । ईश्वर ने अपना वह अस्त्र जिससे उन्होंने त्रिपुर को मारा था, इन्हीं अगत्त के संरक्षण में
रख दिया था कि जब राम आयें तो वह उनको दिया जाय । ऋषि से अस्त्र लेकर राम गोदावरी-तट आये । वहाँ
इन्द्र ने पहले ही उनके लिए तीन पर्णकुटियाँ बना रखी थीं ।