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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

१७६ रामायणमीमांसा पञ्चम
बुल्के कहते हैं “इस सामग्री की अल्पता का ध्यान रखकर यह निस्सङ्कोच कहा जा सकता है कि समस्त
रामायण का आधार पाली गाथाओं में ढूंढना व्यर्थ है। रामायण रामकथा-सम्बन्धी आख्यान काव्य पर निर्भर है और
इस आख्यान काव्य की थोड़ी सी सामग्री पाली गाथाओं में आ गयी है। इसका अर्थ यह है कि जिस समय पाली
तिपिटक बनता रहा ( चौथी शताब्दी ई० पू० ) उस समय रामकथा को लेकर पर्याप्त मात्रा में आख्यान-काव्य की
रचना हो चुकी थी । आगे बढ़कर यह भी कहा जा सकता है कि रामायण की भी रचना हो चुकी थी ।”
बुल्के कहते हैं “उपर्युक्त सामग्री से ऐसा प्रतीत नहीं होता । सामजातक के अतिरिक्त पाली तिपिटक में
केवल पांच गाथाओं में रामायण के श्लोकों से शाब्दिक समानता पायी जाती है। यदि रामायण जैसे महाकाव्य की
रचना हुई होती तो गाथाओं के कवि इससे कहीं अधिक प्रभावित हुए होते । इसके अतिरिक्त रामायण की अपेक्षा
पाली तिपिटक की सामग्री पुराने आख्यान काव्य की शैली और छन्द से कहीं अधिक निकट है। सामजातक के
वृत्तान्त में भी सम्भवतः अन्धमुनि-पुत्र के वध की कथा का प्राचीन रूप सुरक्षित है ।”१
बुल्के के कथनानुसार सामजातक का वृत्तान्त सम्भवतः दशरथ द्वारा अन्धमुनि के पुत्र के वध की कथा
का आधार माना जा सकता है। परन्तु वह सङ्गत नहीं है, क्योंकि वाल्मीकिरामायण बुद्ध से अति प्राचीन है।
आधुनिक दृष्टिकोण से भी मुनि-पुत्र के क्रोध न करने और पुनर्जीवित हो जाने आदि कथाओं का वाल्मीकिरामायण में
अनुकृत न होने से रामायण में उनका अनुकरण सङ्गत नहीं । उपर्युक्त उद्धरणों से यह भी स्पष्ट है कि रामायण के
रचना-काल-सम्बन्धी ( बुल्के द्वारा दिये गये ) तर्क भी निस्सार हैं, क्योंकि उनके ही कथनानुसार पर्याप्त मात्रा में
आख्यान काव्यों की रचना हो चुकी थी; फिर 'गाथा' के कवि उनसे क्योंकर प्रभावित नहीं हुए ? साथ ही एक और
प्रश्न उठता है । अपार बौद्ध-साहित्यान्तर्गत रामकथा सम्बन्धी सामग्री इतनी कम मात्रा में क्यों मिलती है ? वस्तुतः
तो रामकथासम्बन्धी उपाख्यानों एवं गीतों का मूल भी वेद, उपनिषद् और वाल्मीकिरामायण ही हैं । रामायण
महाकाव्य के विद्यमान रहने पर भी बुद्ध के अनात्मवाद, अनीश्वरवाद और वेदाप्रामाण्यवाद का प्रभाव होने के कारण
बौद्धों की वेद, उपनिषद् और वाल्मीकिरामायण की ओर प्रवृत्ति कम ही हुई। बुल्के भी स्वीकार करते हैं कि
“आगे चलकर बौद्धों में रामकथा की लोकप्रियता घटने लगी” ।२ सर्वसम्मति से उस समय रामायणमहाकाव्य
के विद्यमान रहने पर भी ऐसा क्यों हुआ ? इसका कारण कहा ही जा चुका है ।
तिपिटक के ५४७ जातकों में यक्ष, दानव, नाग, रक्खस, बन्दर और अन्य असंख्य पशु आदि के विषय
में कितनी ही कहानियाँ मिलती हैं; परन्तु कहीं भी राक्षस रावण अथवा हनुमान् आदि रामायण के अन्य कपियों का
उल्लेख नहीं हुआ है । निष्कर्ष यह कि तिपिटक के रचनाकाल में रामकथासम्बन्धी स्फुट आख्यान काव्य प्रचलित हो
चुका था । लेकिन रामायण की रचना उस समय नहीं हो पायी थी ।”३
उपर्युक्त उद्धरण के अनुसार 'तिपिटक' के ५४७ जातकों में राक्षस रावण और हनुमान् आदि का उल्लेख
न होना रामायण के रचनाकाल के निर्णय के अपर्याप्त प्रमाण है। केवल इस आधार पर यह कदापि नही कहा जा
सकता कि उस समय रामायण की रचना ही नहीं हुई थी । स्वयं बुल्के के कथनानुसार रामकथासम्बन्धी अन्य उपाख्यान
पर्याप्त मात्रा में प्रचलित थे ही । अतः प्रश्न होता है कि फिर भी राक्षस रावण और हनुमान् का उल्लेख क्यों नहीं
हुआ ? किसी ग्रन्थ में किसी अन्य ग्रन्थ का अनुल्लेख या उसकी कथावस्तु का अनुल्लेखमात्र से यह नहीं कहा जा सकता
कि वह ग्रन्थ अथवा उसकी कथावस्तु का अस्तित्व ही नहीं था । स्वयं बुल्के भी यह न कह सकेंगे कि उस समय तक
रावण और हनुमान् उत्पन्न ही नहीं हुए थे या उपाख्यानों में उनका वर्णन नहीं था ।
वाल्मीकिरामायण पर बौद्ध प्रभाव के प्रसङ्ग में बुल्के का यह कहना कि 'पाली-तिपिटक की रचना
१. रामकथा, पृष्ठ १०३ । २. रामकथा, पृष्ठ ६४ अनुच्छेद ५४ । ३. वही; पृष्ठ १०३ ।

रामायण के पहले हुई थी, अतः रामायण पर बौद्ध प्रभाव का पड़ना असम्भव नहीं कहा जा सकता ।" १ सर्वथा
असङ्गत है यह बात पीछे कही जा चुकी है।
जैसे मन्त्रब्राह्मणात्मक वेदों के रहने पर भी उनके ईश्वरवाद, आत्मवाद एवं यज्ञवाद का प्रभाव त्रिपिटक
पर इसलिए नहीं पड़ा कि बौद्ध उनके विरोधी थे। इसी लिए रामायण के रहने पर भी बौद्धों के ग्रन्थों पर उसका
प्रभाव कम पड़ा है। पूर्ववर्ती रामायण पर त्रिपिटक का प्रभाव न होना ठीक ही है।
दिनेशचन्द्र सेन का अनुमान है कि "वाल्मीकि ने एक विशेष उद्देश्य से दशरथजातक का सरल वृत्तान्त
विकसित कर दिया है। बौद्ध तपस्या और भिक्षुपन की प्रतिक्रिया स्वरूप आदि कवि ने रामायण में हिन्दूगृहस्थ
जीवन का आदर्श अपने पाठकों के सामने रखा है।"
ह्वीलर भी रामायण का उद्देश्य बौद्धों के साथ जोड़ते हैं। इनके अनुसार रामायण का समस्त काव्य
ब्राह्मण और बौद्ध दोनों धर्मों के सङ्घर्ष का प्रतीक है, उसमें सिंहलद्वीप के बौद्धों के प्रति वाल्मीकि का विरोध और
द्वेष प्रकट है।२"
बुल्के स्वयं ही उपर्युक्त मतों का खण्डन करते हैं। उनके कथनानुसार "लङ्का और सिंहलद्वीप की
अभिन्नता संदिग्ध है। राक्षस ब्राह्मणों के विरोधी अवश्य हैं, लेकिन वे स्वयं भी यज्ञ करते हैं और नरभक्षी भी कहे
जाते हैं। रामायण में जो राक्षसों का चित्रण मिलता है उसमें उनके बौद्ध होने का कोई निर्देश नहीं मिलता।"३
इसके अतिरिक्त जब यह सिद्ध है कि रामायण की रचना बुद्ध के जन्म से पहले हो चुकी थी तब उसमें बौद्ध के द्वेष
की कल्पना ही क्योंकर सम्भव हो सकती है ?
रामायण में जाबालि-वृत्तान्त के अन्तर्गत बुद्ध के लिए 'चोर' और 'नास्तिक' शब्दों का प्रयोग अवश्य
ही हुआ है—
“यथाहि चोरः स तथाहि बुद्धस्तथागतं नास्तिकमत्र विद्धि ।” ( वा० रा० २।१०९।३४ )
इसी आधार पर ह्वीलर का कथन है कि “जाबालि बौद्ध-धर्म के प्रतिनिधि हैं और राम उनके विरुद्ध
ब्राह्मण-धर्म का पक्ष लेते हैं ।"४ इस पहलू पर भी ह्वीलर से बुल्के का मतभेद है। "बुल्के के अनुसार जाबालि बौद्ध-
धर्म का पक्ष न लेकर लोकायत ( चार्वाक ) दर्शन का प्रतिपादन करते हैं और राम उसका खण्डन करते हुए नास्तिकों
के प्रसङ्ग से बुद्ध का उल्लेखमात्र करते हैं। वस्तुतः जाबालि केवल लोकायत मत का ही नहीं किन्तु बौद्ध धर्म का भी
प्रतिपादन करते हैं। बौद्धों के क्षणभङ्गवाद के अनुसार ही जाबालि भी कहते हैं—
“अन्यो राजा त्वमन्यस्तु तस्मात् कुरु यदुच्यते ।” ( वा० रा० २।१०८।१०) । क्षणभङ्गवाद के
अनुसार पिता-पुत्र में कार्य-कारण भाव नहीं बन सकता । यद्यपि विज्ञानसन्तान में कार्यकारणभाव होता है तथापि
निमित्तकारण की ही उपपत्ति होती है, उपादानकारण की नहीं।
“बीजमात्रं पिता जन्तोः शुक्रं शोणितमेव च ॥” ( वा० रा० २।१०८।११ ) पिता जन्तु का बीज
( निमित्त ) मात्र होता है; जैसे यूका, लिक्षा आदि मनुष्य से उत्पन्न होने पर भी उससे उनका कोई सम्बन्ध नहीं
बनता वैसे ही तुम्हारा भी दशरथ से कोई सम्बन्ध नहीं।
“दानसंवनना होते ग्रन्था मेधाविभिः कृताः ।
यजस्व देहि दीक्षस्व तपस्तप्यस्व सन्त्यज ॥”
१. रामकथा, पृष्ठ १०४, अनुच्छेद ९० । २. वही, पृष्ठ १०४ । ३. रामकथा, पृष्ठ १०४ ।
४. वही, पृष्ठ १०५ । ५. वही, पृष्ठ १०५ ।
२३

१७८ रामायणमीमांसा पञ्चम
इसी प्रकार के १६ वचनों के द्वारा जाबालि ने बौद्धों के समान ही वेदादि-शास्त्रों का अप्रामाण्य और
यज्ञ, तप, दान एवं दीक्षा आदि को निरर्थक कहा है। अस्तु, वेदप्रामाण्यबाधक होने के कारण ही राम ने चोरतुल्य
बौद्धादि नास्तिकों को धर्मानुसारी राजा द्वारा दण्डनीय कहा है।
बुल्के के मतानुसार “बुद्धसम्बन्धी श्लोक गौड़ीय पाठ और पश्चिमोत्तरीय पाठों में अप्राप्त होने के कारण
प्रक्षिप्त हैं।” परन्तु उनकी यह मान्यता सङ्गत नहीं, क्योंकि दाक्षिणात्य पाठ में, जो परम प्रामाणिक मान्य है, उक्त
श्लोक प्राप्त हैं । हाँ, यहाँ शङ्का की जा सकती है कि जब बुद्ध के जन्म के पूर्व राम के राजसिंहासन होने के समय
रामायण का निर्माण हुआ तो उसमें बुद्ध का उल्लेख क्यों कर सम्भव हुआ ? परन्तु उस शङ्का का खण्डन बहुत ग्रन्थों
के ही आधार पर हो जाता है । बुद्धजातकों तथा लङ्कावतारसूत्र के अनुसार अनेकों बुद्ध गौतम-बुद्ध के पूर्व भी
हुए थे। त्रेताकालीन लङ्कापति रावण को उपदेश करनेवाले बुद्ध त्रेता में भी थे। अतः राम के द्वारा बुद्ध का उल्लेख
असङ्गत नहीं । आदिरामायण की चर्चा भी व्यर्थ है, क्योंकि वाल्मीकिरामायण से भिन्न आदिरामायण नामक किसी
ग्रन्थ का अस्तित्व प्रमाणशून्य है ।
बुल्के के कथनानुसार “रामायण के रचना-काल में कोशल में बुद्ध-धर्म का पर्याप्त प्रचार हो चुका था,
अतः यह असम्भव नहीं कि वाल्मीकि ब्राह्मण-धर्म के वातावरण में रहते हुए भी परोक्षरूप से बौद्ध आदर्शों से प्रभावित
हुए थे । सीता का हिंसा के विरुद्ध भाषण, जो बौद्ध अहिंसा का स्मरण दिलाता है; प्रक्षिप्त माना जा सकता है ।
लेकिन राम का अत्यन्त शान्त और कोमल स्वभाव, उनकी सौम्यता आदि ध्यान में रखकर स्वीकार करना पड़ता
है कि वे मुनि पहले थे, क्षत्रिय बाद में । अतः इनके चरित्रचित्रण में किञ्चित् परोक्ष बौद्ध प्रभाव देखना निर्मूल
कल्पना नहीं प्रतीत होती है ।”१ परन्तु उनका यह कथन निरर्थक है, क्योंकि वेदों, उपनिषदों एवं रामायण आदि
सभी भरतीय ग्रन्थों में विविध प्रकार के व्यक्तियों का वर्णन मिलता है। जिन अति प्राचीन उपनिषदों का लक्ष्य ही
मुनिजनसम्मत अखण्ड अनन्त परब्रह्म का निरूपण है और जिनका आदर्श ही शान्ति, दान्ति, उपरति और तितिक्षा
है उनमें भी क्रूर मारणादि प्रयोगों के वर्णन मिलते हैं, परन्तु उनका लक्ष्य भी उग्र प्रकृतिवाले जनों को वैदिक
कर्म-काण्ड में विश्वास दिला कर उनको भी निवृत्तिमार्ग की ओर अग्रसर कर देना ही है। महाभारत में भी जहाँ
भीम जैसे उग्रतेजा का वर्णन है वहीं राम जैसे ही परम शान्त युधिष्ठिर का भी वर्णन है। शान्ति, दान्ति और अहिंसा
आदि का महत्त्व एवं गौरव वैदिक धर्म में बौद्ध धर्म के पूर्व से ही विद्यमान है। वेद, उपनिषदादि अत्यन्त प्राचीन
ग्रन्थ हैं और उनमें वर्णित वसिष्ठ, वामदेव, शुक, सनकादि महर्षियों के चरित्र इसके ज्वलन्त उदाहरण हैं। वस्तु-
स्थिति तो यह है कि अति प्राचीन वेद, उपनिषद्, रामायण एवं महाभारतादि ग्रन्थों से ही सत्य, अहिंसा आदि को
बौद्धों ने कुछ विकृत रूप में अपनाया है । मनु का माहात्म्य शतपथ आदि ब्राह्मण ग्रन्थों में वर्णित है; रामायण तथा
महाभारत में भी उनका नाम अत्यन्त आदर के साथ लिया जाता है। इन्हीं मनु महाराज के द्वारा वर्णित अहिंसा
और संन्यास-धर्म की शान्ति, दान्ति और अहिंसा आदि का सम्यक् अनुकरण भी बौद्ध नहीं कर पाये । सीता के
अहिंसासम्बन्धी भाषण और राम के सौम्य स्वभाव वर्णन पर परोक्षरूप से बौद्ध प्रभाव मानना सर्वथा निर्मूल ही है ।
जिन वेदों, उपनिषदों तथा मन्वादि शास्त्रों का प्रभाव बौद्धों की विकृत अहिंसा और शान्ति पर पड़ा था उनके अनुसार
सीता और राम की अहिंसा, शान्ति आदि समझनी चाहिये ।
*
१. रामकथा, पृष्ठ १०५ ।

षष्ठ अध्याय
रामायण के मूलस्रोत के सम्बन्ध में निराधार कल्पनायें
डा० वेबर का मत
डा० वेबर के मतानुसार रामकथा के दो मूल स्रोत है—एक दशरथजातक और दूसरा होमर का काव्य ।
बुल्के के लेखानुसार ही डा० वेबर के मत से अन्य कोई भी विद्वान् सहमत नहीं । वे स्वयं डा० वेबर के मत का
खण्डन करते हैं । “होमर के काव्य में नावों को बहुत महत्त्व दिया गया है । यदि वाल्मीकि इससे परिचित होते
तो उन्होंने सेना को समुद्र पार पहुँचाने के लिए सेतु के स्थान पर नावों का सहारा अवश्य लिया होता । होमर
तथा वाल्मीकि की रचना में जो साम्य ( स्त्री का हरण तथा धनुष-सन्धान ) है वह इतना सामान्य और साधारण
है कि जब तक अन्य विशेषताओं में कोई साम्य नहीं मिलता तब तक पारस्परिक प्रभाव मानने की आवश्यकता
नहीं ।”१
वस्तुतः उपर्युक्त पूर्वपक्ष और उत्तरपक्ष दोनों ही अकिञ्चित्कर हैं । वाल्मीकि वेद से परिचित थे; ऋग्वेद
में बड़ी से बड़ी समुद्री नावों का वर्णन है । तुग्रपुत्र भुज्यु की नाव के समुद्र में भग्न हो जाने पर अश्विनों ने अपनी
सौ यन्त्रोंवाली शतारित्रा नाव से भुज्यु को उसके पिता के पास पहुँचाया था । गङ्गा पार करने के लिए राम ने भी
नाव का उपयोग किया ही था । महर्षि वाल्मीकि को सत्य घटना का वर्णन अपेक्षित था । किसी काव्य-कल्पना अथवा
किसी का अनुसरण नहीं करना था । उन्होंने वेदों तथा उपनिषदों के अध्ययन से जो प्राप्त किया और परम्परा से
जो सुना, उसका ब्रह्माजी के आदेश से समाधिजा ऋतम्भरा प्रज्ञा के द्वारा साक्षात्कार कर उसी का उल्लेख किया ।
उनका यह रामायण किसी अन्य पुस्तक या आख्यान से प्रभावित नहीं है । भले ही, सर्वज्ञ होने के कारण उनको
रामायण-निर्माण के पूर्व ही पीछे घटी हुई एवं भविष्य में होनेवाली घटनाओं का ज्ञान रहा होगा तो भी उन्होंने
रामायण में रामचरित्र की घटनाओं एवं वस्तुस्थिति का क्रमिक एवं यथार्थ ही वर्णन किया है । महर्षि वाल्मीकि
राम के समकालीन थे और होमर आदि अत्यन्त अर्वाचीन हैं, अतः होमर के काव्य को रामायण का आधार मानना
युक्तिसङ्गत नहीं है ।
डा० याकोबी का मत
डा० याकोबी के अनुसार “रामायण की रामकथा स्पष्टतया स्वतन्त्र भागों के संयोग से उत्पन्न हुई है ।
प्रथम भाग अयोध्या की घटनाओं से सम्बन्ध रखता है और इसमें दशरथ प्रधान नायक हैं । द्वितीय भाग में दण्डकारण्य
तथा रावण सम्बन्धी कथा मिलती है । इसका मूलस्रोत देवतासम्बन्धी कथाएँ प्रतीत होती हैं । बहुत से विद्वान डा०
याकोबी के इस मत का आजकल भी समर्थन करते हैं ।
डा० याकोबी के अनुसार वैदिक सीता और रामायण की सीता की अभिन्नता असन्दिग्ध है ।२ इसके
अतिरिक्त गृह्यसूत्रों में सीता को पर्जन्यपत्नी कहा गया है । इससे स्पष्ट है कि राम इन्द्र का एक अन्य रूपमात्र हैं ।
वैदिक साहित्यमें इन्द्र का सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य वृत्र-वध है । इन्द्र वृत्र या अहि को मार कर पर्वत में रोके हुए पानी
को विमुक्त कर देते हैं । सायण के अनुसार वृत्र का अर्थ मेघ है जिसमें पानी वृत्र के ही द्वारा रोका जाता है । इन्द्र
१. रामकथा, पृष्ठ १०७ । २. वही, पृ० १०८ ।

और वृत्र का यह वृत्तान्त राम और रावण के युद्ध के रूप में प्रतिबिम्बित होता है। अतः रावण और वृत्र का मूलरूप
एक है। इसके अन्य लक्ष्य भी मिलते हैं—रावण के पुत्र मेघनाद की उपाधि इन्द्रजित् है और उसका भाई कुम्भकर्ण
एक गुफामें रहकर वृत्र का स्मरण दिलाता है। इन्द्र का दूसरा कार्य पणियों द्वारा चुराई हुई गायों की पुनः प्राप्ति
है (ऋ० सं० २।१२)। देवसुनी शरमा रसा नदी को पार कर इन गायों का पता लगाती है (ऋ० सं० १०।१०८)।
वैदिक काल में पशुपालन करनेवाले आर्यों के लिए गायों का जो स्थान था वही कृषकों के लिए खेती की सीता का
था, अतः गायों का हरण सीता-हरण में बदल गया। जिस तरह सरमा इन्द्र की सहायता करती है उसी तरह हनुमान्
भी राम के लिए सीता की खोज करते हैं। हनुमान् का गाँवों में लोकप्रिय होने का एकमात्र कारण यही हो सकता
है। याकोबी के अनुसार हनुमान् कृषि से सम्बद्ध कोई देवता थे। सम्भवतः वर्षाकाल के अधिष्ठाता देवता हों। वह
वायु-पुत्र हैं। बादलों के समान कामरूपी हैं और आकाश में उड़ते हैं। वह भी दक्षिण की ओर से, जहाँ से वर्षा
आती है, सीता अर्थात् कृषि सम्बन्धी शुभ समाचार लेकर राम के पास पहुँचते हैं। इस सबके अतिरिक्त इन्द्र का
एकनाम शिप्रवत् भी है (ऋ० ६।१७।२)। निरुक्त में "शिप्रे हनू नासिके वा" उल्लेख है। इससे इन्द्र और हनुमान्
इन दोनों का वर्षा के देवताओं से सम्बन्ध निर्दिष्ट होता है। लक्ष्मण रामके सहायकमात्र हैं। वे कहीं भी घटनाओं
की प्रगति को बदलने की चेष्टा नहीं करते। फिर भी उनका वैदिक देवता मित्र से सम्बन्ध असम्भव नहीं, क्योंकि
वे सुमित्रा के पुत्र हैं।"
डा० याकोबी के उपर्युक्त मत की समालोचना करते हुए बुल्के कहते हैं कि उनका मत कल्पनाप्रधान है।
इस कल्पना को प्रमाणित करने के लिए तर्क कम हैं। रामायण की सीता के वृत्तान्त पर वैदिक सीता के व्यक्तित्व
का प्रभाव हम भी मानते हैं, लेकिन दोनों में समानता की अपेक्षा भिन्नता अधिक है।" यद्यपि बुल्के का यह कथन
कि डा० याकोबी का मत कल्पनाप्रधान है, ठीक है; तथापि उनका भी मत निराधार है। पिछले प्रकरणों में मैंने यह सिद्ध
किया है कि कृषि की अधिष्ठात्री देवता रामायण की सीता का ही एक अंश है। इसी तरह राम और वृत्रहन्ता देवराज
इन्द्र दोनों भिन्न हैं। तथापि "इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते" (बृ० उ० २।५।१९) इत्यादि स्थलों पर परम ऐश्वर्य
के योग से परमेश्वर में इन्द्रपद का प्रयोग हुआ है। वही परमेश्वररूप इन्द्र राम के रूप में अवतीर्ण होते हैं। इतना
ही नहीं, देवराज इन्द्र परमेश्वर इन्द्र रूप राम का ही एक अंश हैं। इन्द्र और उपेन्द्र का असाधारण सम्बन्ध भी
प्रसिद्ध है, अतः इन्द्र-पत्नी और पर्जन्य-पत्नी शब्दों का प्रयोग भी रामायणीय सीता की अंशभूत कृषि की अधिष्ठात्री
देवता में युक्त ही है।
बुल्के कहते हैं कि "हनुमान् के सम्बन्ध में डा० याकोबी का यह अनुमान ठीक है कि रामायण में उनका
उल्लेख उनकी लोकप्रियता का एकमात्र कारण नहीं हो सकता। इसका कारण यही हो सकता है कि प्राचीन यक्ष
पूजा के साथ हनुमान् का सम्बन्ध स्थापित किया गया है", किन्तु उनका यह कथन भी असङ्गत है, क्योंकि वेदों,
रामायणों तथा प्राकृत भाषा के ग्रन्थों में सर्वत्र रामकथा तथा राम का महत्त्व वर्णित है। महाभारत के भीम और
अर्जुन के परम हितकर और पूज्य होने के कारण भी उनका महत्त्व है। निर्गुणवादी कबीर प्रभृति भी रामनाम का
सहारा लेते रहे हैं। रामनाम का माहात्म्य अत्यन्त प्रसिद्ध है। राम के परम-प्रिय भक्त तथा सीता के परम कृपा-
पात्र होकर उनसे अगणित वरदान प्राप्त करने के कारण ही हनुमान् की प्रख्याति बढ़ी। उसी के प्रभाव से राम-
भक्ति और रामतत्त्व-ज्ञान के अतिरिक्त लौकिक अभीष्ट सिद्धि भी हनुमान् की पूजा से प्राप्त होने के कारण सर्व-
साधारण में उनका महत्त्व और बढ़ गया। महाराष्ट्र के छत्रपति शिवाजी के गुरु समर्थ रामदास ने राष्ट्रोद्धार के लिए
गाँव-गांव में हनुमान् महावीर की स्थापना की। उत्तर भारत में गोस्वामी तुलसीदासकृत रामचरितमानस, हनुमान्-
चालीसा, सङ्कटमोचन आदि ग्रन्थों एवं रामलीलाओं के विस्तार से घर-घर हनुमान् की पूजा लोकप्रिय हुई। यक्षरूप
हनुमान् की पूजा का कोई प्रमाण कहीं भी प्राप्त नहीं होता। ऐसी निराधार कल्पना पाश्चात्यों के उच्छृङ्खल मस्तिष्क

अध्याय रामायण के मूलस्रोत के सम्बन्ध में निराधार कल्पनाएँ १८१
की ही उपज है। अस्तु, जैसे बुल्के के कथनानुसार ही डा० याकोबी का यह मत कि वर्षाकाल के किसी अधिष्ठाता
देवता अथवा इन्द्र से हनुमान् की अभिन्नता में कोई प्रमाण या सङ्केत नहीं है वैसे ही बुल्के की उक्त कल्पना भी
सर्वथा निराधार ही है क्योंकि उसमें भी कोई प्रमाण नहीं है ।
डा० हॉपकिन्स के अनुसार महाभारत के 'शान्तिपर्व' में जो रामकथा मिलती है उससे डा० याकोबी
के कथन की पुष्टि होती है । इस कथा में जो रामचरित्र मिलता है वह किसी प्राचीन देवतासम्बन्धी आख्यान पर
आधारित होगा । बाद में इससे सीता कृषि की अधिष्ठात्री की कथा जोड़ दी गयी। अन्त में वाल्मीकि ने रावण,
हनुमान्, लङ्का आदि का वृत्तान्त लेकर उसे बढ़ाया है। बुल्के का कहना है कि "राम का व्यक्तित्व इन्द्र की कथाओं
से विकसित हुआ हो, यह तो शान्तिपर्व के प्रसङ्ग से विरुद्ध है। वहाँ १६ राजाओं के संक्षिप्त वृत्तान्त दिये गये
हैं । ये सब राजा महान् थे, परन्तु सभी मर गये । अतः सृञ्जय को अपने पुत्र की मृत्यु के कारण शोक नहीं करना
चाहिए। पर बेचारे बुल्के नहीं जान सके हैं कि राम विष्णुरूप से साक्षात् परमेश्वर परब्रह्म हैं। उनका जन्म और
मरण दोनों ही अतात्त्विक हैं। अवतार लीला में वे नर के तुल्य उत्पन्न हुए और असाधारणरूप से रामरूप से विष्णु-
रूप में परिवर्तित हो साकेत धाम चले गये । यह तथ्य वाल्मीकिरामायण के उत्तरकाण्ड के वर्णन से अत्यन्त स्पष्ट
है तथापि सृञ्जय को धैर्य बँधाने के लिये अत्यन्त स्थूल दृष्टि से उनके भी मर्त्यलोक से प्रस्थान करने की चर्चा की
गयी है।
“स चतुर्दश वर्षाणि वने प्रोष्य महातपाः ।
दशाश्वमेधान् जाहूथ्यानाजहार निरर्गलान् ॥” ( म० भा० १२।२९।५३ )
इस पद्य में चौदह वर्ष पर्यन्त वनवास के बाद अश्वमेध किये जाने का स्पष्ट उल्लेख है । हापकिन्स के
अनुसार यहाँ वनवास का अभिप्राय वानप्रस्थाश्रम से है, परन्तु यह मान्यता भी असङ्गत है, क्योंकि वानप्रस्थाश्रम में
काल की सीमा नहीं बाँधी जाती हं और न उससे लौट कर आना ही सम्भव होता है । अतः यहाँ वनवास का वानप्रस्थ
अर्थ नहीं किया जा सकता, इसलिए उक्त श्लोक वाल्मीकिरामायण की कथा के अनुसार ही है।
वाल्मीकिरामायण की कथा मुख्यरूप से वेदों पर ही आधारित है । वाल्मीकि स्वयं ही उसको वेद का
उपबृंहण ही मानते हैं, यह सिद्धान्त मन्त्ररामायण के विवरण से स्पष्ट है । परन्तु पाश्चात्य लोग अपनी कल्पनाओं के
आधार पर उस सिद्धान्त को दूषित करने का प्रयास करते हैं । इन्द्र, वृत्र आदि शब्द प्रत्यक्ष वृत्ति से देवराज इन्द्र
तथा वृत्रासुर के बोधक होते हुए भी परोक्ष वृत्ति से राम और रावण के बोधक भी होते हैं ।
डा० वान नेगेलैन के अनुसार भी रामकथा वैदिक साहित्य सामग्री से ही विकसित हुई है । "बुल्के उसे
कष्टकल्पना ही मानते हैं । 'पुरूरवा उर्वशी' ( ऋ० सं० १०।९५ ), 'रामः पृथुवैन्यः' ( ऋ० सं० १।११२ ) उर्वशी
आदि अप्सराओं का मनुष्यों के साथ विवाह रामकथा का बीज है। सीता के सौन्दर्य और उनके अलौकिक जन्म का
उल्लेख उनके अप्सरा होने का निर्देश है। सीता पृथ्वी के मानवीकरण का परिणाम है। राम और पृथु वैन्य
( ऋ० सं० १।११२।१५ आदि ) अभिन्न हैं ।'”
कष्टकल्पना तो नहीं, परन्तु विकृत कल्पना अवश्य ही हैं। रामायण के राम को वैदिक पृथु (वैन्य ) से
भिन्न मानने पर भी वहीं वर्णित राम से तो अभिन्न मानना ही होगा। प्रत्यक्ष रूप से पुरूरवा और उर्वशी राम एवं
सीता से भिन्न होने पर भी परोक्षरूप से अभिन्न ही हैं । गीता के अनुसार जो भी विभूतिमत् ऊर्जित सत्त्व है वह सब
भगवान् का अंशविशेष है—
१. रामकथा, पृ० १११ ।

१८२ रामायणमीमांसा षष्ठ
“यद् यद् विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा ।
तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंशसम्भवम् ॥” ( गी० १०।४१ )
डा० याकोबी यह भी कहते हैं कि “ईरानीय 'रामहुवास्त्र' तथा भारतीय राम का मूलस्रोत एक ही है ।
साथ ही वे यह भी स्वीकार करते हैं कि अवेस्ता के देवताओं के अस्पष्ट एवं धुंधले व्यक्तित्व के कारण इस प्रश्न का
निर्णय असम्भव है । फिर भी अन्य अनेक ग्रन्थों की अपेक्षा अवेस्ता बहुत प्राचीन है । उसकी भाषा भी वैदिक भाषा
के अत्यन्त निकट है, अतः वैदिक राम से अवेस्ता लेखक का प्रभावित होना असम्भव नहीं है । रामहुवास्त्र ( ह्वास्त्र )
का उल्लेख जेन्द अवेस्ता में प्रायः वायु तथा मिथ्र के साथ होता है । राम का अर्थ है शान्तिविश्राम, हुवास्त्र का अर्थ
चरागाह है, 'रामहुवास्त्र' का अर्थ है चरागाह में विश्राम । कहा जाता है कि प्रारम्भ में वायु एवं मिथ्र देवता से
'रामहुवास्त्र' चरागाह में विश्राम माँगा जाता था। बाद में रामहुवास्त्र स्वयं देवता बन गया । साथ ही वह अ छा
वायु स्वरूप हो गया । इसके नाम पर एक पूरा यश्त जेन्द अवेस्ता में मिलता है । इसका रचना-काल चौथी शती
ई० पू० माना जाता है ।” वस्तुतः जैसे वेदों तथा अन्य भारतीय ग्रन्थों में अपनी दुष्कल्पना भिड़ायी गयी है वैसी ही
जेन्द अवेस्ता आदि में भी दुष्कल्पनाएँ की गयी हैं । जिस रामहुवास्त्र पर जेन्द का एक पूरा यश्त है उसका पीछे
देवता बन जाने की बात दुरभिसन्धिमूलक ही हैं । वस्तुतः 'रामहुवास्त्र' का अर्थ है विश्राम का विस्तृत क्षेत्र; उसका
रामायण के राम से स्पष्ट ही सम्बन्ध है । प्रसिद्ध भारतीय हनुमन्नाटक में रामायणीय दाशरथि राम के नाम को
कविवरवचःस्तोम का विश्राम-स्थान कहा गया है—
“विश्रामस्थानमेकं कविवरवचसां जीवनं सज्जनानाम् ।”
इसी तरह असीरियन देवता रम्मन अथवा रम्मान या हिब्रू भाषा का रिमोन, जो मेघगर्जन का देवता
माना जाता है, भी रामायणीय राम से भिन्न नहीं है, कारण जैसे संसार के थाईलैण्ड आदि अनेक देशों में रामकथा
का प्रसार हुआ वैसे ही असीरिया में रामकथा का प्रसार हुआ हो यह असम्भव नहीं है । भारत में भी देहातों में मेघ
का गर्जना और बरसना राम का ही काम माना जाता है ।
हिब्रू में राम धातु का अर्थ है श्रेष्ठ । बाइबिल में इस धातु से अनेक नगरों के नाम तथा दो तीन व्यक्तियों
के नाम भी मिलते हैं । ( दे० एफ० बिगू : दिक्सियोनेर दि ला बिबल, पेरिस ) यह भी वेदों एवं रामायणों के राम
का परोक्ष प्रभाव ही है ।
दिनेशचन्द्र सेन के अनुसार “रामकथा के दो प्रधान स्रोत हैं दशरथजातक और दक्षिण में प्रचलित
रावण-सम्बन्धी आख्यान । तीसरा गौण आधार हनुमान्सम्बन्धी सामग्री भी है । इसमें वानरपूजा का अवशेष भी
पाया जाता है । रावण-सम्बन्धी आख्यानों में रावण की धार्मिकता, तपस्या तथा महत्त्व वर्णित है । इस मत की सिद्धि
के लिए जैन एवं बौद्ध ग्रन्थों का सहारा लिया जाता है । उनके अनुसार राम की अपेक्षा राक्षस और वानर अधिक
लोकप्रिय थे । लङ्कावतारसूत्र में रावण तथा बुद्ध का धार्मिक संवाद वर्णित है, परन्तु राम-रावण युद्ध का किञ्चित्
भी सङ्केत नहीं है । रावण रामकथा की उत्पत्ति से पूर्व ही प्रसिद्ध था । धर्मकीर्ति ( ६ठी शती ई० ) आदर्श बौद्ध
राजा रावण को रामायण के दोषारोपण से बचाने का प्रयत्न करता है ।'’
आश्चर्य है कि जब वेद, उपनिषद् एवं रामायण जैसे परम प्रामाणिक सद्ग्रन्थों में ऐतिहासिक, धार्मिक
तथा आध्यात्मिक रूप से सुस्पष्ट सुबोध रामकथा वर्णित है तब पाश्चात्य विद्वान् उसको विकृत करने के लिए इतस्ततः
कुशकाश का अवलम्बन करते हुए क्यों भटकते हैं ? यदि उनकी दृष्टि से वेद, उपनिषद् तथा रामायण प्रामाणिक
नहीं हैं तो जातक एवं उपाख्यानों की प्रामाणिकता का आधार ही क्या है ? यदि रामायण किसी अन्य मूलस्रोत के
आधार पर की गयी काव्यकल्पनामात्र है तो वह स्रोत तथा मूलभूत ग्रन्थ भी किसी अन्य मूलस्रोत के आधार पर

अध्याय रामायण के मूलस्रोत के सम्बन्ध में निराधार कल्पनाएँ १८३
कल्पित कहे जा सकते हैं। इन बातों का उत्तर पाश्चात्यों एवं तदनुयायियों के पास नहीं है। तथापि वे अपनी
उच्छृङ्खल कल्पनाओं से विरत नहीं होते ।
स्वयं बुल्के ही रावण को कहीं जैन-धर्मावलम्बी तो कहीं बौद्धधर्मावलम्बी कहते हैं । निश्चय ही इन दोनों
कथनों में से एक तो भ्रामक है ही। जैन साहित्य में रावण की कथा स्वतन्त्ररूप से नहीं मिलती, रामकथा के
अन्तर्गत ही उसका उल्लेख है। बुल्के के कथनानुसार "जैन साहित्य में प्रचलित रामकथा स्पष्टतः वाल्मीकिरामायण
पर ही आधारित है। (५७ अनु० ) में वे कहते हैं— जैन-रामकथा में प्रारम्भ से ही उन लौकिक ग्रन्थों का उल्लेख
मिलता है जिनमें राम का शिकार करना, रावणादि का मांसाहारी होना, कुम्भकर्ण की छः महीने की निद्रा, रावण
का राक्षस तथा सुग्रीव आदि का वानर होने आदि की असत्य कथाएँ पायी जाती हैं । इससे स्पष्ट है कि जैन-रामकथा
वाल्मीकिरामायण के बाद उत्पन्न हुई है, अतः जैन-रामकथा में रामकथा का मूलस्रोत खोजना व्यर्थ है ।"
बौद्ध लङ्कावतारसूत्र
दिनेशचन्द्र सेन के मतानुसार "यह रचना पहले दूसरी शती ई० की मानी जाती थी और इसका प्रथम
अध्याय जिसमें लङ्कापति रावण तथा बुद्ध का संवाद मिलता है, प्रामाणिक माना जाता था । लेकिन आजकल इसके
प्रमाण मिलते हैं कि लङ्कावतारसूत्र चौथी शती ई० का है और उसका प्रथम अध्याय प्रक्षिप्त है। मूल भारतीय पाठ
अप्राप्य है। गुणभद्र ने उसका ४४३ ई० में अनुवाद किया था। इसके चीनी अनुवाद में रावण-बुद्ध-संवाद नहीं मिलता
और न रावण का कोई उल्लेख ही है। ५१३ ई० में इस रचना का पुनः चीनी भाषा में अनुवाद किया गया है और
इस छठी शताब्दी के अनुवाद में एक नया प्रथम अध्याय मिलता है, जिसमें रावण धर्म के विषय में बुद्ध से प्रश्न
करता है। इस अध्याय के प्रक्षिप्त होने के अन्तरङ्ग प्रमाण भी मिलते हैं। अन्य अध्यायों में गद्य और पद्य का सम्बन्ध
ऐसा है कि पद्य गद्य का अर्थ दुहराता है तथा सारी रचना बुद्ध तथा बोधिसत्त्व महामति के संवाद के रूप में है।
उसमें कहीं भी रावण का उल्लेख नहीं मिलता। केवल प्रथम अध्याय में पद्य गद्य का अर्थ नहीं दुहराता और इसमें
ऐसी कोई सामग्री नहीं है जो सूत्र को समझने के लिए आवश्यक हो। डी० टी० सुज़ुकि का अनुमान है कि रामकथा
की लोकप्रियता के कारण लङ्कावतारसूत्र का सम्बन्ध इससे जोड़ा गया है। लङ्कावतार का अर्थ है बुद्ध का लङ्का में
अवतार । लङ्का दक्षिण में मानी जाती थी । इसके अतिरिक्त इसमें रामकथा-विषयक कोई भी निर्देश नहीं मिलता ।
रावण सिंहलद्वीप का राजा हुआ हो इसके लिए भी वहाँ के प्राचीनतम ग्रन्थों में कोई प्रमाण नहीं पाया
जाता । दीपवंश ( चौथी शती ई० ) तथा महावंश (पांचवीं शती ई० ) सिंहलद्वीप के सबसे प्राचीन ऐतिहासिक
काव्य हैं इनमें रामकथा का निर्देश मिलता है। लेकिन सिंहलद्वीप के राजा रावण का कही भी उल्लेख नहीं पाया
जाता है।"
( अनु० १०३ में ) बुल्के का मत है कि "वाल्मीकि के पहले हनुमान् के विषय में आख्यान-काव्य प्रचलित
रहा होगा और वाल्मीकि ने उसका प्रयोग अपनी रामकथा के लिए किया होगा, दिनेशचन्द्र की इस धारणा के लिए
कोई प्रमाण नहीं मिलता। यह अनुमानमात्र ही है। वैदिक साहित्य में हनुमान् का कहीं भी उल्लेख नहीं हुआ है।
बौद्ध त्रिपिटक के जातकों में भी हनुमान् का नाम नहीं आया । अतः उनके विषय में रामकथा के पहले स्वतन्त्र
आख्यान प्रचलित थे, यह बहुत सन्दिग्ध है। समुग्गजातक ( जातक नं० ४३६ ) में एक वायुरस पुत्त नामक विद्याधर,
जो ऐन्द्रजालिक था, का उल्लेख मिलता है। लेकिन इसके सम्बन्ध में न तो हनुमान् का उल्लेख हुआ है और न किसी
अन्य वानर का ।
हनुमान् शब्द सम्भवतः एक द्रविड़ शब्द का रूपान्तर है। ( आण-नर, मन्दि-कपि ) जिसका अर्थ है
'नरकपि' । इसी कारण अनुमान किया गया है कि 'वृषाकपि' तथा हनुमान् दोनों किसी प्राचीन द्रविड़ देवता के नाम

१८४ रामायणमीमांसा षष्ठ
के रूपान्तर हों। इस अनुमान का कोई आधार नहीं है, यह निर्मूल है। 'वृषाकपि' का अर्थ 'नरकपि' न होकर वराह
अथवा एकशृङ्ग वराह होता है। महाभारत में वृषाकपि को अनेक आर्य देवताओं (विष्णु, शिव, इन्द्र आदि) से
अभिन्न माना गया है। ऋग्वेद (१०।८६) में जो वृषाकपि का उल्लेख है वह सम्भवतः एक सूर्य देवता है जिसका
प्रतीक वराह था, अतः ऋग्वेदोय वृषाकपि का द्रविड़ सभ्यता के साथ कोई भी सम्बन्ध प्रमाणित नहीं होता। यह
अवश्य ही बहुत सम्भव है कि 'हनुमान्' नाम एक द्रविड़ शब्द का संस्कृत रूपान्तर है और इसका अर्थ 'नरकपि' है।
कारण यह है कि रामायण के अन्य वानरों की तरह हनुमान् भी वानर-गोत्रीय आदिवासी थे। वह एक प्राचीन
द्रविड़ देवता थे, इसके लिए सङ्केत भी नहीं मिलता। रामायण में हनुमान् की शक्ति के वर्णन में अतिशयोक्ति का सहारा
तो लिया गया है फिर भी उनके देवता होने का कहीं भी उल्लेख नहीं हुआ है।'"१
उपर्युक्त उद्धरण से स्पष्ट है कि दिनेशचन्द्र के मत का खण्डन बुल्के स्वयं ही करते हैं। परन्तु बुल्के का
कथन भी तर्क-सम्मत नहीं है। क्योंकि उपनिषद् भी वैदिक साहित्य है और रामतापनीय, रामरहस्य तथा मुक्ति-
कोपनिषद् आदि उपनिषदों में हनुमान् का चरित्र वर्णित है। समुग्ग जातक के वायुस्स पुत्र नामक विद्याधर को भी
हनुमान् ही समझना चाहिये, क्योंकि हनुमान् वायुपुत्र हैं ही। जैनों ने वानरों को विद्याधर माना ही है। साथ ही,
जब हनुमान् द्रविड़ शब्द का संस्कृत रूपान्तर मान्य है और उसका अर्थ नरकपि है तो उसके द्रविड़ देवता होने में क्या
आपत्ति है ? रामायण के अनुसार लाखों वर्ष प्राचीन राम एवं हनुमान् आदि की उपासना सर्वत्र होती आयी है।
द्रविड़ देश में भी विष्णु-भक्ति का प्रचार बहुत प्राचीन है। श्रीमद्भागवत-माहात्म्य में तो यहाँ तक उल्लेख है कि भक्ति
द्रविड़ देश में ही उत्पन्न हुई—
“उत्पन्ना द्राविड़े साहं वृद्धि कर्णाटके गता।” (भाग० मा० १।४८)
आज भी वैष्णव-मन्दिरों में द्रविड़ भाषामय प्रबन्ध बड़े आदर से पढ़े जाते हैं। अतः वहाँ राम के समान
ही हनुमान् को भी देवता माना जाना असम्भव नहीं कहा जा सकता। इसी तरह हनुमान् को आदिवासी मनुष्य
मानना भी रामायण से विरुद्ध है। पाश्चात्यों की निराधार कल्पनाओं से आर्ष रामायण का प्रामाण्य कहीं अधिक है।
रामायण में स्पष्ट उल्लेख है कि रावण ने ब्रह्मा से वरदान माँगा था कि मैं नर एवं वानर से भिन्न अन्य किसी के
द्वारा न मारा जा सकूँ। ब्रह्मा ने वैसा ही वरदान उसको दिया। तब सब देवताओं ने भगवान् विष्णु से रावण-वध
की प्रार्थना की और भगवान् विष्णु ने उनकी प्रार्थना स्वीकार की। तब ब्रह्मा ने देवताओं से कहा कि तुम लोग
वानर तथा ऋक्ष बनकर विष्णु की सहायता के लिए भूमि पर प्रकट हो जाओ। ब्रह्मा स्वयं जाम्बवान् हुए, रुद्र और
वायु हनुमान् हुए, इन्द्र के अंश से वाली और सूर्य के अंश से सुग्रीव का आविर्भाव हुआ। रामसम्बन्धी उपनिषदों में
भी इन बातों का वर्णन है। अतः यह कहना सर्वथा गलत है कि हनुमान् को देवता नहीं कहा गया है। इसी तरह
हनुमान् की शक्ति के वर्णन में अतिशयोक्ति की कल्पना भी निर्मूल है, क्योंकि रुद्र साक्षात् परमेश्वर हैं। वायु से
रहित होने पर प्रत्येक प्राणी की मृत्यु हो जाती है; अतः रुद्रावतार वायु-पुत्र हनुमान् की शक्ति का जो भी वर्णन है
वह अपर्याप्त ही कहा जा सकता है। उसमें अतिशयोक्ति की कल्पना भी सम्भव नहीं।
“पुत्रत्वं तु गते विष्णौ राज्ञस्तस्य महात्मनः।
उवाच देवताः सर्वाः स्वयम्भूर्भगवानिदम्॥
सत्यसन्धस्य वीरस्य सर्वेषां नो हितैषिणः।
विष्णोः सहायान् बलिनः सृजध्वं कामरूपिणः॥
मायाविदश्च शूरांश्च वायुवेगसमान् जवे।


१. रामकथा, पृष्ठ ११३-११५।

नयज्ञान् बुद्धिसम्पन्नान् विष्णु तुल्यपराक्रमान् ।
सृजध्वं हरिरूपेण पुत्रांस्तुल्यपराक्रमान् ॥” ( वा० रा० १।१७।१-४,७ )
इस उद्धरण से स्पष्ट हो जाता है कि विष्णु की सहायता के लिए शक्तिशाली विष्णु तुल्य पराक्रम से युक्त
वानरों को उत्पन्न करने के लिए ब्रह्मा ने देवताओं से कहा था। वहीं ब्रह्मादि देवताओं का जाम्बवान्, वाली, सुग्रीव
एवं हनुमान् आदि के रूप में उत्पन्न होना भी वर्णित है।
“पूर्वमेव मया सृष्टौ जाम्बवानृक्षपुङ्गवः ।
वानरेन्द्रं महेन्द्राभमिन्द्रो वालिनमात्मजम् ।।
सुग्रीवं जनयामास तपनस्तपतांवरः ।
मारुतस्यौरसः पुत्रो हनुमान्नाम वानरः ॥
वज्रसंहननोपेतो वैनतेयसमो जवे ।
सर्ववानरमुख्येषु बुद्धिमान् बलवानपि ॥”
( वा० रा० १।१७।७,१०,१६,१७ )
रामरहस्य उपनिषद् में भी जाम्बवान्, हनुमान् आदि को ब्रह्मा, रुद्र आदि का अवतार कहा गया है ।
बुल्के का यह कथन कि “रामायण में वर्णित दण्डकारण्य और लङ्का की घटनाएँ अलौकिक एवं काल्पनिक
प्रतीत होती हैं,” निराधार ही है; क्योंकि वह वर्णन वस्तुस्थिति का ही यथार्थ चित्रण है । रावण जैसे शक्तिशाली
तपःप्रभाव से युक्त अनेक अनितरसाधारण शत्रुओं का वध करने के लिए विष्णु एवं विविध महान् देवताओं का नर
तथा वानर रूप में आविर्भाव के कारण कथावस्तु की अलौकिकता स्वाभाविक है। हाँ, बुल्के आदि पाश्चात्य विद्वान्
अवतारवाद में विश्वास न रखने के कारण ही ऐसे अनितरसाधारण वर्णन में अतिशयोक्ति की कल्पना करें तो उसमें
क्या आश्चर्य ? संसार में सब घटनाएँ साधारण ही नहीं होतीं; असाधारण घटनाओं का वर्णन भी असाधारण ही
होता है। अतः यह यथार्थ है कि सम्पूर्ण रामायण घटनामूलक है। उसका कोई अंश कल्पनामूलक नहीं है।
रामायण महाकाव्य के निर्माता को ब्रह्मा से यह वरदान मिला था कि तुम्हारी कथा में अनृत वाक्य न होगा ।
“न ते वागनृता काव्ये काचिदत्र भविष्यति ।” ( वा० रा० १।२।३५ )
इतना ही नहीं, उन महर्षि ने समाधिजा प्रज्ञा से रामायण से सम्बद्ध सभी घटनाओं का प्रत्यक्ष साक्षा-
त्कार कर ही उल्लेख किया है । इस कथन में रामायण ही प्रमाण है ।
डा० वेबर के अनुसार रामायण का समस्त काव्य एक रूपकमात्र है जिसके द्वारा दक्षिण की ओर आर्य-
सभ्यता और कृषि का प्रचार दिखलाया जाता है । प्रधान पात्र सीता, जिसका हरण पुनः प्राप्ति काव्य की कथावस्तु
कोई ऐतिहासिक व्यक्ति न होकर खेत की सीता (लाङ्गलपद्धति), जिसे आर्यकृषि का प्रतीक मानना चाहिये, का
मानवीकरणमात्र है । वैदिक सीता, कृषि की अधिष्ठात्री देवी, और रामायण की सीता अभिन्न हैं। रामायण में सीता
के जन्म और तिरोधान सम्बन्धी वृत्तान्त इनकी ओर निर्देश करते हैं । उसकी बहन उर्मिला के नाम का अर्थ लहराता
हुआ खेत समझना चाहिये । भवभूति के उत्तररामचरित में भी उसके पिता जनक का एक विशेषण 'सीरध्वज'
मिलता है जो कृषि से सम्बन्ध रखता है। (डा० बेलवलकर उसके पुत्र का भी उल्लेख करते हैं। कुश एक घास
का नाम है और लव लुनने में आता है । ) आदिवासियों के आक्रमणों से इस सीता, आर्यकृषि के प्रतीक, की रक्षा
राम पर निर्भर है। डा० वेबर के अनुसार राम दाशरथि और बलराम (हलभृत् ) का सम्बन्ध स्वयं सिद्ध है।
प्रारम्भ में ये एक थे, बाद के विकास में वे दो भिन्न-भिन्न पात्रों के रूप में प्रसिद्ध हो गये । राम का वनवास हेमन्त
ऋतु का प्रतीक है जब प्रकृति और विशेषकर कृषि का कार्य स्थगित होता है। इसके अतिरिक्त महाभारत में जहाँ
२४

१८६ रामायणमीमांसा षष्ठ
राम-राज्य का वर्णन है, वहाँ इस बात का उल्लेख मिलता है कि कृषि की असाधारण उन्नति हुई थी। वास्तव में
महाभारत के द्रोणपर्व और शान्तिपर्व के षोडशराजन्यक-वर्णन में राम-राज्य का वर्णन किया जाता है। इस वर्णन के
अनेक श्लोक रामायण में मिलते हैं ( वा० रा० ६।१२८ ), शान्तिपर्व ( अध्याय २९ ) में कृषि का उल्लेख है—
"कालवर्षीश्च पर्जन्याः सस्यानि रसवन्ति च ।
नित्यं सुभिक्षमेवासीद्रामे राज्यं प्रशासति ॥४८॥
नित्यं पुष्पफलाश्चैव पादपा निरुपद्रवाः।
सर्वा द्रोणदुघा गावो रामे राज्यं प्रशासति ॥५२॥"
पर्जन्य यथासमय जल बरसा कर सस्य उत्पन्न करते थे। उससे राम के राज्य-शासन के समय किसी
प्रकार का दुर्भिक्ष नहीं पड़ता था। वृक्ष सदा फल-फूलों से लदे रहते थे; गौएँ द्रोण (घड़े) परिमाण दूध देती थीं। १
यह डा० वेबर का मत निष्प्रमाण एवं कल्पनामूलक है; दाशरथि राम और बलराम, दोनों ही विष्णु के
अवतार होने के कारण तत्त्वतः एक होने पर भी दाशरथि राम चौबीसवें कल्प के त्रेता में हुए और उनके लाखों
वर्ष बाद बलराम २८ वें कल्प के द्वापर में हुए।
स्वयं बुल्के के लेखानुसार "डा० वेबर का उपर्युक्त मत बहुत समीचीन नहीं प्रतीत होता ।'''' 'दाशरथि
राम की दक्षिण-यात्रा के फलस्वरूप रावण और वाली के स्थान पर उनके भाई विभीषण और सुग्रीव तो राजा बनाये
जाते हैं, लेकिन दक्षिण की सभ्यता या कृषि में कोई महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुआ हो, रामायण में कहीं नहीं दिखलाया
जाता । यह कहना पड़ेगा कि जिस उद्देश्य की पूर्ति के लिए रामायणकाव्य लिखा गया वह पूरा न हो सका।
यदि कवि के मन में कृषिसम्बन्धी देवताओं का विचार सर्वोपरि था तो रामायण में कृषि को इतना कम महत्त्व
क्यों दिया गया है ? वास्तव में रामकथा तथा कृषि का कोई विशेष सम्बन्ध मानने की आवश्यकता प्रतीत नहीं होती।
आर्यों के आगमन के पहले ही कृषि भारतवर्ष तथा दक्षिण में विद्यमान थी ।”
डा० वेबर के पिछले छिछले मत के समान ही डा० बुल्के का मत भी निष्प्रमाण है वानरों, भालुओं तथा
रावण आदि को आदिवासी मनुष्य मानना भी रामायण के विपरीत कल्पना है। रामायण के अनुसार वाली, सुग्रीव
और हनुमान् आदि देवताओं के अवतार थे और वे वैदिक आर्यसभ्यता के ही अनुयायी थे। वाली सन्ध्यावन्दन
करने के लिए चारों समुद्रों की यात्रा प्रतिदिन करता था। हनुमान्‌जी ने भी सूर्यनारायण से वेदाङ्ग एवं व्याकरण
आदि का अध्ययन किया था। रावण स्वयं वेदज्ञ था। लङ्का में हनुमान् ने वेदपाठ सुना था। विभीषण ने रावण को
आहिताग्नि तथा वेदान्तपारङ्गत कहा था—
“एषोहिताग्निश्च महातपाश्च वेदान्तगः कर्मसु चाग्र्यशूरः ।” ( वा० रा० ६।१११।२३ )
"असौ ( हनुमान् ) पुनर्व्याकरणं ग्रहीष्यन् सूर्योन्मुखः प्रष्टुमनाः कपीन्द्रः ।
उद्यद्गिरेरस्तगिरिं जगाम ग्रन्थं महद्धारयनप्रमेयः ॥
नह्यस्य कश्चित् सदृशोऽस्ति शास्त्रे वैशारदे छन्दगतौ तथैव ।”
( वा० रा० ७।३६।४४, ४५ )
हनुमान् सूर्यनारायण से व्याकरण का अध्ययन करते हुए उदयाचल से अस्ताचल तक सूर्याभिमुख
होकर पीछे की ओर चलते थे । शास्त्रपाण्डित्य, छन्द आदि के ज्ञान में उनके समान कोई भी नहीं था । अस्तु; रावण
तथा हनुमान् आदि को आदिवासी अनार्य कहना साहसमात्र है। इसी तरह भारत में आर्यों के बाहर से आने की
कल्पना भी पाश्चात्यों की दुरभिसन्धिपूर्ण दुष्कल्पना ही है। अब इस मत का खण्डन भी हो चुका है। वेद, रामायण,
१. रामकथा, पृष्ठ ११८ ।

जेन्दावेस्ता आदि किसी भी प्राचीन ग्रन्थ में ऐसा कोई उल्लेख, जो इसका द्योतक हो, प्राप्त नहीं होता। वस्तुतः
सम्पूर्ण भारतके निवासी भारतीय हैं; हिन्दू हैं और वैदिक हैं। वे सब भारतीय देवी-देवताओं के पूजक हैं, परन्तु
जङ्गलों में रहने के कारण नगरवासियों से भिन्न प्रतीत होते हैं तथापि भिन्न नहीं हैं। आदिवासी कोई जाति नहीं है;
आर्य लोग भारत के ही ( आदि ) अनादिवासी हैं। पाश्चात्यों ने फूट का बीज बोने के लिए जङ्गलनिवासी भारतीयों
को आदिवासी कहकर आर्यों का बाहर से आना माना है।१ कृषि की उन्नति रामराज्य का असाधारण गुण तो मान्य
ही है। जब कृषि की अधिष्ठात्री देवी सीता महाराज्ञी होकर भूतल पर विराजमान हों तो कृषि की उन्नति होना
स्वाभाविक ही है। सुभिक्ष का आधार भी तो उत्तम कृषि तथा उत्तम फल-फूल युक्त वृक्ष एवं दुधारू गाये ही हैं।
यही सब रामराज्य की प्रशस्ति के बोधक ग्रन्थों में मिलता है।
रामायण, महाभारत आदि की कथाओं में रूपक-कल्पना कोई नवीन वस्तु नहीं है; अतएव श्रीशङ्करा-
चार्य आदि की रूपककल्पना भी सङ्गत ही है—
“तीर्त्वा मोहार्णवं हत्वा रागद्वेषांश्च राक्षसान् ।
शान्तिसीतासमायुक्तः आत्मरामो विराजते ॥”
अर्थात्, मोहरूपी समुद्र को पार कर और राग, द्वेष आदि राक्षसों को मार कर शान्तिरूपी सीता से युक्त
होकर आत्मरूप राम विराजमान होते हैं। तदनुसार ही आनन्दरामायण में मनोदुर्वृत्ति के नाश को ही ताड़का-वध
तथा मनोवेग-भङ्ग को ही धनुर्भङ्ग, अविवेकवध को बालिवध, अज्ञानतरणोपाय को सेतुबन्ध, मद-निग्रह को कुम्भकर्ण-
वध, अहङ्कारघात को रावण वध माना गया है तथा हृदयाकाश-गमन को ही राम का अयोध्यागमन कहा गया है।२
इसी तरह राम-रावण-सङ्ग्राम और कौरव-पाण्डव-सङ्ग्राम को देवासुर-सङ्ग्राम का ही प्रतीक माना जाता है।
सन्त एकनाथ रचित 'भाव-रामायण' के सभी पात्र प्रायः आध्यात्मिक ही हैं। इतने पर भी ऐतिहासिक तथ्यों का
अपलाप नहीं किया गया है।
“सति कुड्ये चित्रोल्लेखः ।”
अर्थात् भित्ति रहने पर ही चित्र-निर्माण सम्भव है; वैसे ही राम-रावण एवं कौरव-पाण्डवों के ऐतिहासिक
अस्तित्व के आधार पर ही इन रूपकों की कल्पना उचित प्रतीत होती है।
अनुच्छेद १०९ में डा० बुल्के लिखते हैं, "रामकथा का ऐतिहासिक आधार मानते हुए भी एम० वेङ्कटरत्नम्
का विश्वास है कि यह वास्तव में मिस्र देश के रैमेसेस नामक राजा का इतिहास है। रैमेसेस के विषय में आधुनिकतम
खोज के आधार पर जो कुछ ज्ञात हुआ है उससे स्पष्ट है कि बाल्मीकिरामायण से उस राजा का कोई सम्बन्ध नहीं
हो सकता ।”३
एक पाश्चात्य विद्वान् के कथनानुसार ही 'वेङ्कटरत्नम् की मान्यता आधुनिकतम शोध से प्राप्त तथ्य के
विपरीत है। वस्तुतः ऐसा कथन दासतापूर्ण मनोवृत्ति का ही परिणाम है। दासता की मनोवृत्ति में अपने शास्त्र,
अपनी सभ्यता और अपना इतिहास तुच्छ तथा अविश्वसनीय और हर परायी बात सत्य एवं महत्त्वपूर्ण प्रतीत होने
लगती है। यही कारण है कि बहुत से भारतीय विद्वान् भी पाश्चात्यों का अन्धानुकरण करते हुए रामायण एवं महा-
भारत जैसे प्रामाणिक भारतीय आर्ष-इतिहासों का आधार अन्य राष्ट्रों के इतिहासों में खोजने में व्यस्त हैं। संसार
के सर्वप्राचीन, अनादि, अपौरुषेय ग्रन्थ वेद और उपनिषदों में भी जब रामकथा विद्यमान है तब उसका आधार
मिस्र के इतिहास में खोजने का—आधुनिक शोध के आधार पर उसके अप्रामाणिक सिद्ध होने पर भी—प्रयास
करना, शुद्ध दास-वृत्ति का ही परिचायक है।


१. 'चातुर्वर्ण्यसंस्कृति-मीमांसा' । २. आनन्दरामायण, सर्ग ३ । ३. रामकथा पृ० १२० ।

१८८ रामायणमीमांसा षष्ठ
वानर और राक्षसों के सम्बन्ध में पाश्चात्यों के भ्रामक विचार
परिशिष्ट २ के अन्तर्गत डा० बुल्के लिखते हैं, "रामायण के वानर, ऋक्ष और राक्षस विन्ध्यप्रदेश तथा
महाभारत की आदिवासी अनार्य जातियां थीं। इसके विषय में प्रायः मतभेद नहीं है।" यह कथन रामायण के
सर्वथा विपरीत पड़ता है, इसकी अप्रामाणिकता पूर्व प्रसङ्गों में सिद्ध की जा चुकी है।१
इस परिशिष्ट में डा० बुल्के आगे लिखते हैं, "सी० वैद्य के मतानुसार वानर जाति के लोग सचमुच वानर
के समान दिखलायी पड़ते थे और इससे उनका यह नाम पड़ा। अन्य विद्वान् जैन-रामायण के अनुसार मानते हैं कि
वानर, ऋक्ष आदि नाम उन जातियों की ध्वजा के कारण उत्पन्न हुए। जिस जाति की ध्वजा पर बन्दर का चिह्न
था वह वानर जाति कहलाती थी एवं जिसकी ध्वजा पर रीछ का चिह्न था वह रीछ कहलाती थी, जैसा कि
आजकल रूसियों की ध्वजा पर रीछ तथा अंग्रेज जाति की ध्वजा पर सिंह का चिह्न होने से उस देश के वीरों को
ब्रिटिश लायन्स और रसियन बीयर्स कहते हैं। जैनों की राम-रावण कथा में वानरचिह्नाङ्कित ध्वजा-मुकुटधारी
जाति वानरवंशीय कही गयी है। यह मत असम्भव नहीं कहा जा सकता है। फिर भी जैनियों ने अनेक स्थलों पर
रामकथा में अनेक चिन्त्य परिवर्तन किये हैं। सबसे स्वाभाविक अनुमान यह है कि आजकल के आदिवासियों के
समान उन जातियों के विभिन्न कुल विभिन्न पशुओं और वनस्पतियों की पूजा करते थे। जिस कुल के लोग जिस
पशु या वनस्पति की पूजा करते थे, वे उसी के नाम से पुकारे जाते थे। इस पशु या वनस्पति पूजा को आज-
कल के विद्वान् टोटम कहते हैं। आधुनिक भारत के आदिवासियों में ऐसे टोटम या गोत्र विद्यमान हैं, जिनका उल्लेख
रामायण में हुआ है; अर्थात् वानर, ऋक्ष ( जाम्बवान् ) और गीध ( जटायु, सम्पाति और रावण )। आर० वी०
रसेल के अनुसार बन्दर और रीछ तेरह सर्वाधिक प्रचलित टोटमों में सम्मिलित हैं।"२
बुल्के के अनुसार ही जैन-रामकथा वाल्मीकिरामायण का विकृत रूप है। किसी पशु अथवा वनस्पति
की पुजा के कारण उनके नामों से पुकारे जाने अथवा किसी टोटम या गोत्र के नाम पर परिचय दिये जाने की
बात रामायणविरुद्ध न होकर विचारणीय हो सकती थी। शास्त्र-वचनों का उद्धरण देते हुए बताया जा चुका है कि
ब्रह्मा के आदेश से विशिष्ट देवगण ही वानर, रीछ आदि रूपों में अवतीर्ण हुए थे। यही कारण है कि उनमें
सामान्य ऋक्ष तथा वानरों से तो विशेषता स्पष्ट ही लक्षित होती है। साथ ही उनकी शक्ति, बल, पराक्रम, विद्या
आदि तो देवताओं से भी कहीं अधिक थी। यह प्राप्त वर्णनों से अत्यन्त स्पष्ट है। जटायु, सम्पाति आदि गृध्र, गरुड़,
अरुण आदि भी सामान्य पक्षियों के रूप में परिगणित नहीं किये जा सकते, क्योंकि वे विशिष्ट शक्तिशाली श्रीविष्णु
एवं राम आदि परमेश्वरस्वरूपों से सम्बद्ध थे। इसी तरह शेष, वासुकि, तक्षक आदि भी साधारण सर्प नहीं थे
तथापि मनुष्य भी नहीं थे; यह बात भी उनसे सम्बद्ध कथाओं से स्पष्ट हो जाती है।
बुल्के लिखते हैं, "छोटा नागपुर में रहनेवाली उंराओं तथा मुण्डा जातियों में तिग्गा, हलमान, बजरङ्ग
और गड़ी नामक गोत्र मिलते हैं : इन सब का अर्थ बन्दर ही है। इसी प्रकार रेड्डी, बरई, बसोर, मैना एवं खंगार
आदि जातियों में बानरद्योतक गोत्र मिलते हैं। सिंहभूम की भुइयाँ जाति हनुमान् के वंशज होने का दावा करती
है। वे अपने को पवन-वंश कहते हैं। ऋक्षसूचक गोत्र रेड्डी, बरई, गडबा, केवत, सुध आदि जातियों में मिलते हैं।
इसी प्रकार मैना, उराओं और बिहोर जातियों में गिद्ध या गिधि गोत्र प्रचलित हैं। उराओं, असुरों, खरिया आदि
आदिम जातियों की भाषा में 'रावना' शब्द का अर्थ गीध ही है। निष्कर्ष यह है कि हनुमान् की तरह ही रावण
का नाम भी एक वास्तविक अनार्य नाम का संस्कृत रूपान्तर ही है। रायपुर जिले के गोड़ अपने को रावण के
वंशज मानते हैं। उराओं का भी कहना है कि रावण से ही उनकी जाति उत्पन्न हुई है, अतः आदिवासियों का
१. रामकथा, पृ० १२१ । २. वही, पृष्ठ १२१-१२२ ।

अध्याय वानर और राक्षसों के सम्बन्ध में पाश्चात्यों के भ्रामक विचार १८९
रामकथा से सम्बन्ध अवश्य ही है। रामायण के ऋक्ष तथा वानर वास्तव में ऋक्ष, वानर तथा गीध गोत्रीय
आदिवासी थे।”१
वस्तुतः पाश्चात्य विद्वानों एवं उनसे प्रभावित अन्य लोगों का उपर्युक्त विचार भ्रामक एवं अशुद्ध है।
यत्र तत्र प्रचलित ऐतिह्य एवं किंवन्तियों के आधार पर वाल्मीकिरामायण जैसे आर्ष इतिहास का अपलाप नहीं
किया जा सकता। पिछले प्रकरणों में स्पष्ट कर दिया गया है कि रामायण के ऋक्ष, वानर आदि यथार्थतः देवता
थे। नर और वानर से भिन्न अन्य किसी के द्वारा न मारे जाने का वरदान रावण को प्राप्त था, अतः उसे मारने
के लिए विभिन्न देवता ही इस रूप में प्रकट हुए थे। इन सब का वैदिक धर्म, कर्म एवं संस्कृति से सम्बन्ध था।
यथार्थतः असुर, राक्षस, गिद्ध, गरुड़ एवं नाग आदि विभिन्न पत्नियों से उत्पन्न वैदिक प्रजापति कश्यप की ही
सन्तानें थीं। प्रसिद्धि अथवा किंवदन्ती अन्ध-परम्परामात्र होने से प्रमाण नहीं मानी जा सकती। जैसे अश्वकर्ण
नामक वृक्ष का अश्व के कानों से अथवा अश्वगन्ध नामक औषध का अश्व के गन्ध से अथवा मुसलमानों के धार्मिक
पर्व रमजान से राम का कोई सम्बन्ध नहीं है, वैसे ही कहीं कहीं कुछ जातियों के गोत्र, रावन, हनुमान्, वानर,
गीध आदि होने पर भी केवल नाम-साम्य के कारण ही प्रामाणिक इतिहासरूप वाल्मीकिरामायण के प्रसिद्ध वानरों,
ऋक्षों, जटायु, सम्पाति आदि गिद्धों को आदिवासी मनुष्य सिद्ध नहीं किया जा सकता। रामायण के अनुसार
सामान्य पशु-पक्षियों से उनकी विशिष्टता सिद्ध होती है। अस्तु, यथार्थतः आर्य वैदिक ही भारत के अनादिवासी
आदिवासी हैं; इनसे भिन्न आदिवासियों की चर्चा ही पाश्चात्य भेद-कारक नीति का षड्यन्त्र है।
परिशिष्ट २, अनुच्छेद १११ में डा० बुल्के लिखते हैं—‘‘वैदिक साहित्य, विशेष करके अथर्ववेद में
रक्षस्, राक्षस, पिशाच आदि भूतों का उल्लेख मिलता है। ये मनुष्यों के शत्रु हैं। इनके विरुद्ध अथर्ववेद में बहुत से
मन्त्र दिये गये हैं। इसी तरह राक्षस एक प्रकार से अनिष्ट, अशुभ, हिंसा और पाप का प्रतीक बन गया था और
बाद में रावण के क्रूर और हिंसात्मक अनुयायियों को भी यह नाम मिला। रामायण में राक्षसों का जो वर्णन
किया जाता है, वह ऋग्वेद में अनार्य दस्युओं के वर्णन से बहुत कुछ मिलता है। उनके मनुष्य होने का रामायण में
स्पष्ट उल्लेख मिलता है (दे० वा० रा० ६।३७।३३)। कवि वास्तविक नामों से अपरिचित था। अतः जो
नाम मिलते हैं वे सब वर्णनात्मक हैं....कुम्भकर्ण, मेघनाद, दशग्रीव, सुग्रीव, विभीषण, प्रहस्त (लम्बे हाथवाला)
इत्यादि।”२
आगे अनुच्छेद ११२ में लिखते हैं—‘‘यह सब होते हुए भी रामायण में कवि ने अद्भुत रस तथा
अतिशयोक्ति का बार-बार सहारा लिया है और इस कारण रामकथा को काल्पनिक ठहराने के लिए समालोचकों
को आधार अवश्य मिलता है। रावण के दस सिर थे, हनुमान् समुद्र लाँघते हैं और आकाश में उड़कर औषधि पर्वत
ले आते हैं, इस प्रकार के कथन बहुतायत से पाये जाते हैं। फिर भी रावण को केवल एक सिर था, ऐसा वर्णन भी
रामायण के कई स्थलों पर मिलता है। दशग्रीव नाम पहले रूपक के रूप में प्रयुक्त हुआ होगा (दशग्रीव अर्थात
जिसकी ग्रीवा दस अन्य साधारण ग्रीवाओं के समान बलवती हो) और बाद में वस्तुतः दशग्रीव धारण करनेवाले
प्राणी के अर्थ में लिया जाने लगा।”
अथर्ववेद में एक दशास्य (दशमुख) दशशीर्ष ब्राह्मण का उल्लेख है। इसका प्रभाव भी रावण के स्वरूप
की कल्पना पर पड़ा हो, यह असम्भव नहीं कहा जा सकता है।
ब्राह्मणो जज्ञे प्रथमो दशशीर्षो दशास्यः ।
स सोमं प्रथमः पपौ स चकारारसं विषम् ॥ ( अथ० सं० ४।६।१ )
हनुमान् के समुद्र लाँघने की कथा सम्भवतः किसी आश्चर्यजनक लङ्घन के आधार पर उत्पन्न हुई है। जब
१. रामकथा, पृष्ठ १२२ । २. वही, पृष्ठ १२३ ।

१९० रामायणमीमांसा षष्ठ
स्पेन की सेना को मेक्सिको से हटना पड़ा तब अलवाराडो नामक सिपाही एक अत्यन्त चौड़ा नाला लांघने में समर्थ
हुआ था। यह देख कर मेक्सिकोनिवासी बोल उठे "यह सचमुच सूर्य-पुत्र है।" इसी तरह हनुमान् की कथा भी¹
उत्पन्न हुई होगी, यह सी० वी० वैद्य का अनुमान है।
बुल्के आदि के उपर्युक्त विचार, जिन्हें वे वैदिक साहित्य तथा वाल्मीकिरामायण से उद्धरण देकर सिद्ध
करने का प्रयास करते हैं, वैदिक साहित्य तथा वाल्मीकिरामायण से विरुद्ध हैं। उनके विचार अटकलबाजियों पर ही
आश्रित हैं। लाखों वर्ष की अतीत घटनाओं के सम्बन्ध में प्रत्यक्ष तथा अनुमान की प्रवृत्ति नहीं हो सकती है। केवल
प्रमाणभूत आप्तों के वचनों एवं लेखों के आधार पर ही अतीत वस्तुओं और घटनाओं को जाना जा सकता है। जहाँ वह
सब न हो, वहाँ किंवदन्तियों तथा कुछ आख्यानों के आधार पर कल्पना की जा सकती है। मिस्र के रैमसेस, या स्पेन
के अलवाराडो नामक सिपाही के किसी चौड़े नाले को लांघने की बात भी तो इतिहास से ही जानी जाती है। यदि
अन्य इतिहास ग्रन्थों का प्रामाण्य मान्य है तो सर्वप्राचीन वेद, उपनिषद् और उनपर आधारित समाधिजा प्रज्ञा से
अनुभूत महर्षि वाल्मीकि द्वारा प्रोक्त रामायण का प्रामाण्य अमान्य क्योंकर हो सकता है ? यदि समुद्र का लङ्घन
असम्भव है तो क्या चौड़े नाले का लङ्घन असम्भव नहीं हैं ? जो ईश्वर, देवता एवं उनकी विशिष्ट शक्तियों पर
विश्वास नहीं करते उनके लिए तो वेद, रामायण, महाभारत, पुराण सब अविश्वसनीय ही होंगे। ऐसी स्थिति में
बाइबिल एवं कुरान की चमत्कारपूर्ण बातों को भी असत्य कल्पना ही मानना पड़ेगा। वस्तुतः आज की अपनी शक्ति
के अनुसार ही लाखों वर्ष पूर्व के विशिष्ट व्यक्तियों की शक्ति का अनुमान नहीं किया जा सकता। महाराणा प्रताप का
डेढ़ मन का लौह-कवच आज के बड़े-बड़े पहलवान भी उठाने में समर्थ नही। क्या इसी से समझ लिया जाय कि यह
ऐतिहासिक तथ्य केवल मिथ्या कल्पना है ? गुड़गाँव जिले में किसी ग्राम में किसी खुदाई में १३ गज का मनुष्य
अस्थिपञ्जर मिला है। कहा जाता है कि उसके ऊपर के दाँतों में एक-एक दाँत साढ़े चार सेर का था। क्या इससे यह
बात सिद्ध नहीं होती है कि पूर्व काल के लोगों की शक्तियाँ बहुत बड़ी थीं। आज कोई अखण्ड भूमण्डल का सम्राट् नहीं
है तो क्या वैसा कभी कोई नहीं था, यही समझना चाहिये ?
पहले लोग रामायण में वर्णित पुष्पक विमान को भी असम्भव समझते थे, परन्तु अब वैसा नहीं समझा
जाता। आज भी कई बार अनेक सिरवाले लड़के उत्पन्न होते हैं और मर जाते हैं। ऐसे समाचार आये दिन समाचार-
पत्रों में छपते रहते हैं। भारतीय दृष्टिकोण से तो प्रत्यक्ष और अनुमानों के समान ही आगम एक स्वतन्त्र प्रमाण है;
अतः जैसे नेत्र प्रमाण से सिद्ध रूप को पुनः सिद्ध करने के लिए अन्य प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती उसी प्रकार
वेदादि शास्त्रों से सिद्ध वस्तु यदि प्रत्यक्षादि से सिद्ध न हो तो भी वेदादि प्रमाण से सिद्ध होने के कारण निस्सन्देह
मान्य है। अग्निहोत्रादि वैदिक कर्मों से स्वर्गादि की प्राप्ति होती है यह प्रत्यक्षादि-सिद्ध नहीं है तो भी मान्य है। पिता-
पुत्री, भाई-बहन की शादी से पाप होता है यह भी शास्त्र से ही सिद्ध है, इसमें अन्य प्रमाण नहीं, तब भी यह
सर्वमान्य है। इसी प्रकार अनादि, अपौरुषेय वेदों द्वारा वर्णित धर्म, ईश्वर, देवता मान्य होते हैं। अतः बुल्के आदि
की दृष्टि में दस सिरवाले किसी मनुष्य का होना यद्यपि असम्भव है तो भी अथर्ववेद में दस सिर, दस मुखवाले ब्राह्मण
का वर्णन है ही। इस वर्णन को ही रावण का वर्णन क्यों न माना जाय ? रावण भी ब्राह्मण ही था। वेदों में तीन
सिर वाले विरूपाक्ष का भी वर्णन है। केवल पाश्चात्यों की अटकल के आधार पर वेदशास्त्रों की उक्तियों को झुठलाया
नहीं जा सकता। वाल्मीकिरामायण के अनुसार हनुमान् का समुद्र-लङ्घन कोरी कल्पना नहीं है, सुन्दरकाण्ड के लम्बे
सर्ग में इसका विशद वर्णन है। जिस पर्वत से वे उछले और जहाँ वे उतरे तथा मार्ग में सुरसा, छायाग्राहिणी,
मैनाक आदि के मिलने का वर्णन कोरी कल्पना नहीं। पाश्चात्यों के समान ऋषि-महर्षि मिथ्या कल्पना नहीं करते थे,
न वे मिथ्या भाषण ही करते थे। मिथ्या कल्पना को पाण्डित्यपूर्ण सैकड़ों श्लोकों में लिखने में वे अवश्य ही सङ्कुचित
१. रामकथा, पृ० १२३-१२४ ।

अध्याय वानर और राक्षसों के सम्बन्ध में पाश्चात्यों के भ्रामक विचार १९१
होते । भारत में लाखों व्यक्ति वाल्मीकिरामायण विशेषतः 'सुन्दरकाण्ड' का पाठ कर अपनी-अपनी विविध कामनाओं
को प्राप्त करते हैं ।
अथर्ववेद में ही नहीं राक्षस, असुर आदि का वर्णन ऋग्वेद, यजुर्वेद आदि में भी है ।
“पिशाचेभ्यो विदलकारीं यातुधानेभ्यः कण्टकीकारीम् ।” ( यजुःसं० ३०।८ )
महीधरभाष्यम्—
“विदलकारीं वंशविदारिणीं वंशपात्रकारिणीम् । कण्टकी कर्म तत्कारिणीम् ॥”
यहाँ पिशाचों और यातुधानों के लिए पृथक् विधान है ।
‘न तद्रक्षांसि न पिशाचास्तरन्ति देवानामोजः प्रथमजमोजो ह्येतत् ।।’ ( यजुःसं० ३४।५१ )
महीधरभाष्यम्—
“रक्षांसि पिशाचाश्च तत् हिरण्यं न तरन्ति न हिंसन्ति । हि यस्मादेतत् हिरण्यं देवानां
प्रथममोजः । प्रथमोत्पन्नं देवानां तेज एवेदम् । राक्षस और पिशाच हिर

अर्थात्, वानरों को इस युद्ध में मनुष्यरूप नहीं धारण करना चाहिये । वानर-दल में हम लोगों का यही
सङ्केत रहना चाहिये । इस उक्ति से यह सिद्ध नहीं होता कि राक्षस राक्षस न होकर मनुष्य ही थे, ऐसा कदापि नहीं
हो सकता । इसके विपरीत, इस उक्ति के आधार पर ही, यह सिद्ध होता है कि रामायण के वानर और राक्षसों में
कामरूप होने के कारण मनुष्यादिरूप धारण करने की क्षमता थी । वहीं यह भी उल्लेख है कि “मैं (राम); लक्ष्मण,
और अपने चार मन्त्रियों सहित विभीषण, ये सात मनुष्यरूप में रहेंगे । इन सातों को छोड़कर किसी भी मनुष्याकार
व्यक्ति का वध करना होगा ।”
“अहमेव सह भ्रात्रा लक्ष्मणेन महौजसा ।
आत्मना पञ्चमश्चार्यं सखा मम विभीषणः ॥” ( वा० रा० ६।३७।३५ )
राक्षस भी मनुष्यरूप धारण कर सकते थे । रावण मनुष्यरूप धारण कर संन्यासी का रूप धारण कर ही
सीता-हरणार्थ गया था । कवि (वाल्मीकि) रावण आदि के वास्तविक नाम से अपरिचित थे यह कहना भी पाश्चात्य
विद्वानों का दुःसाहसमात्र है । जो महर्षि राम-रावण के समकाल के हों वह रावणादि का नाम नहीं जानते हैं इस
बात को कोई भी विज्ञ व्यक्ति क्योंकर मान सकता है । जब डा० बुल्के आदि को उनका वास्तविक नाम ज्ञात नहीं
तो किस तर्क के आधार पर वे कह सकते हैं कि महर्षि वाल्मीकि ने जिन नामों का प्रयोग किया है वे अवास्तविक हैं ?
किसी इतिहासकार के सम्बन्ध में यदि कोई कहे कि वह वर्णनीय ऐतिहासिक व्यक्तियों के वास्तविक नाम नहीं जानता
था पर मैं भी नहीं जानता तो उसका ऐसा कहना उन्मत्त-प्रलाप ही समझा जाता है । आश्चर्य है कि जिनको रामायण
के प्रामाण्य पर विश्वास नहीं है उन्हें अन्य विषयों में उसके प्रमाणों का उद्धरण करने का क्या अधिकार है ? अतएव
वेदादि शास्त्रों तथा रामायण को प्रमाण माननेवाले लोगों के लिए डा० बुल्के की 'रामकथा' सर्वथा निरर्थक ही नहीं
अपितु हानिकारक भी है ।
रावण को एक सिर था कहते हुए बुल्के ने उसके भी प्रमाण में ५।१०।२४ का ही सङ्केत दिया है ।
( निष्क्रक्राम महामुखात् )—
“काञ्चनाङ्गदसन्नद्धौ ददर्श स महात्मनः ।
विक्षिप्तौ राक्षसेन्द्रस्य भुजाविन्द्रध्वजोपमौ ॥” ( वा० रा० ५।१०।१५ )
“तस्य क्रुद्धस्य नेत्राभ्यां प्रापतन्नश्रुबिन्दवः ।
दीप्ताभ्यामिव दीपाभ्यां सार्चिषः स्नेहबिन्दवः ॥” ( वा० रा० ५।४२।२३ )
हनुमान् ने रावण के काञ्चन अङ्गद से सन्नद्ध अलंकृत विक्षिप्त बाहुओं को देखा जो कि इन्द्रध्वज के तुल्य
थे । क्रुद्ध रावण के दोनों नेत्रों से इस तरह अश्रुबिन्दु गिरे मानो जैसे दो प्रदीप्त दीपकों से अर्चियुक्त स्नेह (तैल)
बिन्दु गिरते हों । सम्भवतः उपर्युक्त कथन के अन्तर्गत दो आँखें और दो भुजाओं के वर्णन के आधार पर रावण के
एक सिर होने की बात कही गयी है, परन्तु उसी सर्ग में रावण को कामरूपी कहा गया है जिससे उसमें इच्छानुरूप
रूप धारण करने की सामर्थ्य कही गयी है ।
“वृतमाभरणैर्दिव्यैः सुरूपं कामरूपिणम् ।” ( वा० रा० ५।१०।९ )
कामरूपी रावण नाना आभरणों से आवृत होकर सुन्दर रूपवाला था ।
अतः वैसा होने पर भी अन्यत्र वर्णित उसकी दस ग्रीवाओं का भी अपलाप नहीं किया जा सकता । रावण
का केवल दशग्रीव नाम ही नहीं किन्तु उसके दस मुख एवं बीस भुजाओं का वर्णन भी है और वही उसका निजी रूप
था । दण्डकारण्य में वह सीता के सामने पहले भिक्षुरूप में गया । पश्चात् उसने अपने निजी रूप को दिखाया ।

अध्याय. उत्तरकाण्ड आदि को प्रक्षिप्त ठहरानेवाले तर्काभासों का खण्डन १९३
“दशास्यो विंशतिभुजो बभूव क्षणदाचरः।
स परिव्राजकच्छद्म महाकायो विहाय तत्॥
प्रतिपेदे स्वकं रूपं रावणो राक्षसाधिपः॥” (वा० रा० ३।४९।८,९)
अर्थात् अपना छद्ममय परिव्राजक रूप त्याग कर दस मुख, बीस भुजावाले अपने वास्तविक रूप को प्राप्त
हो गया। यह भी उल्लेख है कि जटायु ने रावण की दस बाहुओं को काट डाला, परन्तु वरदान के प्रभाव से पुनः
अन्य दस-दस बाहु उत्पन्न हो गयीं—
“जटायुस्तमतिक्रम्य तुण्डेनास्य खगाधिपः।
वामबाहून् दश तदा व्यपाहरदरिन्दमः॥
संछिन्नबाहोः सद्यो वै बाहवः सहसाऽभवन्।
विषज्वालावलीमुक्ता वल्मीकादिव पन्नगाः॥” (वा० रा० ३।५१।३८,३९)
‘संछिन्नबाहोः कर्तितबाहोः टीका रामाभिरामी।’
रावण के दस सिर और बीस भुजाएँ उपर्युक्त वचनों से प्रमाणसिद्ध हैं। उनका अलाप करना या उन्हें
कल्पनामात्र या रूपकमात्र कहना परम दुःसाहस है। महर्षि को मिथ्यावादी मानना और उन्हीं के काव्य का विचार
करना शुद्ध अज्ञता ही है। इतना ही नहीं, त्रिशिरा नाम का एक अन्य राक्षस भी लङ्का में था। उसके तीनों सिर
तीन किरीटों से ऐसे लगते थे जैसे तीन काञ्चन पर्वतों से युक्त हिमवान् शोभित हो।
“त्रिभिः किरीटैस्त्रिशिराः शुशुभे स रथोत्तमे।
हिमवानिव शैलेन्द्रस्त्रिभिः काञ्चनपर्वतैः॥ (वा० रा० ६।६९।२४)
किसी ग्रन्थ के सम्बन्ध में मूलग्रन्थ की उपेक्षा कर अपनी दुष्कल्पनाओं से किसी अंश को प्रक्षिप्त, किसी
अंश को रूपक और किसी अंश को अज्ञानमूलक कहना अत्यन्त अनुचित है। इस तरह तो बाइबिल और बुल्के की
रामकथा में ऐसी दुष्ट कल्पनाएँ की जा सकती हैं।
अनुच्छेद ११३ में भूगोल पर विचार करते हुए बुल्के लिखते हैं कि वाल्मीकि दक्षिण तथा मध्य भारत के
भूगोल से अपरिचित थे। इसका प्रमाण रामायण को पढ़कर मिलता है।” तथापि वे अपने कथन के समर्थन में
रामायण के किसी प्रसङ्ग को उद्धृत नहीं करते, अतः उक्त कथन निष्प्रमाण ही है। सिंहलद्वीप एवं लङ्का भिन्न-भिन्न
हैं, यह भवभूति, मुरारी तथा राजशेखर के ग्रन्थों के एवं वराहमिहिर की बृहत्संहिता के अनुसार भी सिद्ध है। बौद्ध-
साहित्य में सिंहलद्वीप को लङ्का कहा गया हो तो वह प्रमाणसिद्ध नहीं।
बुल्के आगे लिखते हैं कि “अधिकांश आधुनिक लेखक रामायण की लङ्का और किष्किन्धा दोनों को
मध्यभारत में रखते हैं।” यह कथन भी निराधार है। मध्यभारत स्थित किसी लङ्का में जाने के लिए हनुमान् को
समुद्र पार नही करना पड़ता। यदि समुद्रोलङ्घन का वर्णन ही मिथ्या है तो पाश्चात्यों की रामायण के विरुद्ध
दुरभिसन्धिपूर्ण कल्पनाएँ सुतरां मिथ्या ही हैं। सुतरां ऐसी कल्पनाओं से पूर्ण मिथ्या ग्रन्थ पर विचार कर समय का
अपव्यय करना भी असङ्गत ही है।

उत्तरकाण्ड आदि को प्रक्षिप्त ठहरानेवाले तर्काभासों का खण्डन

अपनी पुस्तक रामकथा के आठवें अध्याय के ११४ अनुच्छेद में रामायण के क्षेपक अथवा प्रक्षिप्त अंश को
दिखाते हुए बुल्के लिखते हैं, “रामायण के प्रायः समस्त आलोचक उत्तरकाण्ड को प्रक्षिप्त मानते हैं और इसके लिए
भिन्न भिन्न तर्क प्रस्तुत करते हैं। सबसे महत्त्वपूर्ण प्रमाण इस प्रकार हैं—
२५

१९४ रामायणमीमांसा षष्ठ
“वाल्मीकिकृत रामायण के तीन प्रचलित पाठों की तुलना करने से स्पष्ट होता है कि उत्तरकाण्ड की रचना
अन्य काण्डों के पश्चात् हुई थी ।”
बुल्के के इस तर्क का खण्डन पिछले प्रकरणों में किया जा चुका है । वस्तुतः दाक्षिणात्य, गौड़, मैथिल
आदि पाठ-भेद सप्तशती में भी हैं पर वे सभी पाठ प्रामाणिक माने जाते हैं । वेदों में भी शाखा-भेद से सभी पाठ-
भेद प्रामाणिक ही हैं । अतः वाल्मीकि ने काल-भेद तथा शिष्यों के भेद से कुछ पाठ-भेदों का उपदेश किया हो तो वह
असम्भव नहीं कहा जा सकता । अतः रामायण में भी दाक्षिणात्य, गौड़, काश्मीर पाठ-भेद सङ्गत हो सकते हैं ।
अन्य काण्डों के समान उत्तरकाण्ड में पाठ-भेद न होना यह सिद्ध नहीं करता कि वह पीछे का है और प्रक्षिप्त है ।
संस्कृत में एक कहावत प्रचलित है कि “सत्यारोपे निमित्तानुसरणं न तु निमित्तमस्तीत्यारोपः” आरोप होने पर
निमित्त की कल्पना होती है, निमित्त से आरोप की कल्पना नहीं की जाती । कभी मन्दान्धकार होने पर रज्जु
में सर्प का भ्रम नहीं होता, अतः यह नहीं कहा जा सकता कि मन्दान्धकार से सर्पभ्रम होना ही चाहिये । जहाँ
पाठ-भेद हो वहाँ निमित्त ढूँढ़ा जा सकता है; परन्तु जहाँ पाठ-भेद ही न हो उसे प्रक्षिप्त माना जाय तो जिन सर्गों
में पाठ-भेद है उनको भी प्रक्षिप्त मानना पड़ेगा ।
बुल्के का दूसरा तर्क है कि “युद्धकाण्ड के अन्त में जो फलश्रुति मिलती है उससे यह प्रमाणित होता
है कि इसके रचनाकाल तक रामायण की परिसमाप्ति यही मानी जाती थी ।
“रामायणमिदं कृत्स्नम्” ( वा० रा० ६।१२८।११६ ) ।”
उपर्युक्त तर्क भी निस्सार है । श्रीमद्भागवत आदि में कई प्रसङ्गों में फलश्रुति है, अतः बाद के अंश को
क्षेपक नहीं माना जाता ।
उनका तीसरा तर्क है, “बालकाण्ड के प्रथम सर्ग में एक अनुक्रमणिका मिलती है जिसमें केवल अयोध्या-
काण्ड से लेकर युद्धकाण्ड तक के विषयों का उल्लेख किया है । बाद में इस अनुक्रमणिका की अपूर्णता का अनुभव
हुआ और फलस्वरूप एक दूसरी अनुक्रमणिका की रचना की गयी जिसमें बालकाण्ड की सामग्री के साथ उत्तर-
काण्ड का भी निर्देश मिलता है ।”
उपर्युक्त कल्पना भी भ्रान्तिमूलक है । प्रथम सर्ग अनुक्रमणिका है ही नहीं । उसके मुख्य वक्ता भी
नारदजी हैं और वह मूलरामायण के नाम से प्रसिद्ध है । तत्पश्चात् ब्रह्मा के आदेशानुसार समाधि द्वारा मूलरामायण
प्रोक्त विषयों का साक्षात्कार कर रामायण का निर्माण किया गया; सम्भवतः बुल्के इसी को दूसरी अनुक्रमणिका
कहते हैं । परन्तु यथार्थतः यही पहली अनुक्रमणिका है । इस अनुक्रमणिका में उत्तरकाण्ड का उल्लेख है ।
“स्वराष्ट्ररञ्जनं चैव वैदेह्याश्च विसर्जनम् ।
अनागतं च यत्किंचिद्रामस्य वसुधातले ॥
तच्चकारोत्तरे काव्ये वाल्मीकिर्भगवानृषिः ॥” ( वा० रा० १।३।३८, ३९ )
“प्राप्तराज्यस्य रामस्य वाल्मीकिर्भगवानृषिः ।
चकार चरितं कृत्स्नं विचित्रपदमर्थवत् ॥
कृत्वा तु तन्महाप्राज्ञः सभविष्यं सहोत्तरम् ॥” ( वा० रा० १।४।१-३ )
उपर्युक्त श्लोकों का उद्धरण देते हुए बुल्के लिखते हैं¹ “इन दो उद्धरणों से स्पष्ट है कि बालकाण्ड की
इस भूमिका के रचनाकाल में उत्तरकाण्ड की सृष्टि प्रारम्भ हो चुकी थी फिर भी सीता-त्याग को छोड़कर किसी
१. रामकथा, पृष्ठ १२७ ।

अध्याय उत्तरकाण्ड आदि को प्रक्षिप्त ठहरानेवाले तर्काभासों का खण्डन १९५
अन्य विषय का उल्लेख न होने के कारण ऐसा प्रतीत होता है कि उत्तरकाण्ड उस समय अपना वर्तमान रूप और
विस्तार नहीं प्राप्त कर पाया था। इस तर्क की पुष्टि इससे भी होती है कि बाद में वाल्मीकिरामायण के उदीच्य
पाठ में एक तीसरी अनुक्रमणिका जोड़ी गयी है, जिसमें सातों काण्डों की सामग्री का ध्यान रखा जाता है।"
यह कथन सर्वथा असङ्गत है। किसी भी ग्रन्थ का रचनाकाल उसकी भूमिका के रचनाकाल से भिन्न
नहीं होता। अस्तु उत्तरकाण्ड का और सीतात्याग से अन्य विषयों का उल्लेख भी प्रक्षिप्त नहीं है। महाभारत,
रामायण, पुराण इन सभी ग्रन्थों में प्रसक्तानुप्रसक्त वर्णन की शैली ही होती है। वेदों के मन्त्र और ब्राह्मण भी
इसके अपवाद नहीं हैं। उनमें भी याग का वर्णन उसकी एक-एक विधियों की प्रशंसा में अर्थवाद के रूप में कई
आख्यान उपस्थित किये जाते हैं। उदीच्य-पाठ में तीसरी अनुक्रमणिका का होना 'उत्तरकाण्ड' के क्षेपक होने में
प्रमाण नहीं, किन्तु उसकी प्रामाणिकता और अप्रक्षिप्तता ही सिद्ध करता है। परम्परा प्राप्त उदीच्य-पाठ भी
प्रामाणिक है।
पुनः बुल्के कहते हैं, "उत्तरकाण्ड की रचना-शैली अन्य प्रामाणिक काण्डों की शैली से भिन्न है।
प्रारम्भिक ३३ सर्गों में रावण तथा हनुमान् की कथाओं के बाद ही रामचरित का वर्णन आगे बढ़ा दिया गया है
और तब भी असङ्गत अन्तरकथाओं के कारण कथानक में कोई प्रवाह नहीं है। (दे० नृग, निमि, ययाति, श्वेत,
इन्द्र, इल आदि के वृत्तान्त)। शेष सामग्री जो आधे से भी कम है रामचरित से सम्बन्ध तो रखती है लेकिन इसमें
भी एकता का अभाव खटकता है। सीता-त्याग, शत्रुघ्न-चरित, शम्बूक-वध, राम का अश्वमेध, सीता का तिरोधान
आदि में कोई विशेष सम्बन्ध नहीं है। इसके अतिरिक्त उत्तरकाण्ड में अवतारवाद की व्यापकता भी काण्ड को बाद
की रचना सिद्ध करती है।"
बुल्के के उपर्युक्त कथन में तर्कसङ्गति का अभाव है। वस्तुतः शैली-भेद भी प्रक्षिप्तता का प्रयोजक नहीं
हैं। एक ही लेखक के ग्रन्थ में अथवा वक्ता के प्रवचन में भी विषय-भेद से रचना, शैली एवं भाषा में भेद हो जाना
स्वाभाविक ही है। सुन्दरकाण्ड के श्लोकों की शैली भी अन्य काण्डों की शैली से भिन्न है—क्या इस आधार पर
उसको भी क्षेपक कहा जा सकता है ? ऋग्वेद से यजुर्वेद की शैली भिन्न है—क्या इस आधार पर यजुर्वेद को वेद ही
न माना जाय ? अतः उत्तरकाण्ड में नृग, निमि, ययाति, श्वेत, इन्द्र, इल, शत्रुघ्नचरित्र, शम्बूक-वध, अश्वमेध,
सीता-त्याग सभी सम्बद्ध एवं अप्रक्षिप्त हैं। केवल असङ्गत कह देने मात्र से कोई ग्रन्थ असङ्गत नहीं हो जाता।
वस्तुतः ग्रन्थ के अनुसार ही ग्रन्थ के सम्बन्ध में धारणा बनाना उचित है। पहले से ही एक धारणा बना कर उसके
आधार पर ग्रन्थ का परीक्षण और विश्लेषण करना असङ्गत है। एक धारणा बनाकर ही पाश्चात्य भारतीय ग्रन्थों
की आलोचना करते हैं। बुल्के साहब सङ्गति क्या है और कितने प्रकार की सङ्गति होती है, यह नहीं समझते हैं।
स्मृति का विषय हो और उपेक्षा का अनर्ह हो यही सङ्गति का लक्षण है।
'स्मृतिविषयत्वे सत्युपेक्षानर्हत्वम् ।"
यह सङ्गति भी ६ प्रकार की होती है—
"सप्रसङ्ग उपोद्घातो हेतुताऽवसरस्तथा ।
निर्वाहकैक्यकार्यैक्ये षोढ़ा सङ्गतिरुच्यते ॥"
प्रसङ्ग, उपोद्घात, हेतुता, अवसर, निर्वाहकैक्य और कार्यैक्य, यह छः प्रकार की सङ्गति है। जहाँ घटना
का वर्णन है, वहाँ तो घटना के अनुसार वर्णन करना पड़ता है। राम का दर्शन करने अनेक ऋषिगण आये, उनसे
वार्तालाप के विभिन्न प्रसङ्गों में वानरों एवं राक्षसों की चर्चा छिड़ गयी। राम प्रश्न करते हैं, ऋषिगण उत्तर देते
हैं—वाल्मीकि ने उसको अक्षरशः उद्धृत कर दिया। इसमें असङ्गति की कल्पना ही असङ्गत है। ईशावास्य उप-