सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 269, कुल 1049 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 269

अर्थात्, वानरों को इस युद्ध में मनुष्यरूप नहीं धारण करना चाहिये । वानर-दल में हम लोगों का यही
सङ्केत रहना चाहिये । इस उक्ति से यह सिद्ध नहीं होता कि राक्षस राक्षस न होकर मनुष्य ही थे, ऐसा कदापि नहीं
हो सकता । इसके विपरीत, इस उक्ति के आधार पर ही, यह सिद्ध होता है कि रामायण के वानर और राक्षसों में
कामरूप होने के कारण मनुष्यादिरूप धारण करने की क्षमता थी । वहीं यह भी उल्लेख है कि “मैं (राम); लक्ष्मण,
और अपने चार मन्त्रियों सहित विभीषण, ये सात मनुष्यरूप में रहेंगे । इन सातों को छोड़कर किसी भी मनुष्याकार
व्यक्ति का वध करना होगा ।”
“अहमेव सह भ्रात्रा लक्ष्मणेन महौजसा ।
आत्मना पञ्चमश्चार्यं सखा मम विभीषणः ॥” ( वा० रा० ६।३७।३५ )
राक्षस भी मनुष्यरूप धारण कर सकते थे । रावण मनुष्यरूप धारण कर संन्यासी का रूप धारण कर ही
सीता-हरणार्थ गया था । कवि (वाल्मीकि) रावण आदि के वास्तविक नाम से अपरिचित थे यह कहना भी पाश्चात्य
विद्वानों का दुःसाहसमात्र है । जो महर्षि राम-रावण के समकाल के हों वह रावणादि का नाम नहीं जानते हैं इस
बात को कोई भी विज्ञ व्यक्ति क्योंकर मान सकता है । जब डा० बुल्के आदि को उनका वास्तविक नाम ज्ञात नहीं
तो किस तर्क के आधार पर वे कह सकते हैं कि महर्षि वाल्मीकि ने जिन नामों का प्रयोग किया है वे अवास्तविक हैं ?
किसी इतिहासकार के सम्बन्ध में यदि कोई कहे कि वह वर्णनीय ऐतिहासिक व्यक्तियों के वास्तविक नाम नहीं जानता
था पर मैं भी नहीं जानता तो उसका ऐसा कहना उन्मत्त-प्रलाप ही समझा जाता है । आश्चर्य है कि जिनको रामायण
के प्रामाण्य पर विश्वास नहीं है उन्हें अन्य विषयों में उसके प्रमाणों का उद्धरण करने का क्या अधिकार है ? अतएव
वेदादि शास्त्रों तथा रामायण को प्रमाण माननेवाले लोगों के लिए डा० बुल्के की 'रामकथा' सर्वथा निरर्थक ही नहीं
अपितु हानिकारक भी है ।
रावण को एक सिर था कहते हुए बुल्के ने उसके भी प्रमाण में ५।१०।२४ का ही सङ्केत दिया है ।
( निष्क्रक्राम महामुखात् )—
“काञ्चनाङ्गदसन्नद्धौ ददर्श स महात्मनः ।
विक्षिप्तौ राक्षसेन्द्रस्य भुजाविन्द्रध्वजोपमौ ॥” ( वा० रा० ५।१०।१५ )
“तस्य क्रुद्धस्य नेत्राभ्यां प्रापतन्नश्रुबिन्दवः ।
दीप्ताभ्यामिव दीपाभ्यां सार्चिषः स्नेहबिन्दवः ॥” ( वा० रा० ५।४२।२३ )
हनुमान् ने रावण के काञ्चन अङ्गद से सन्नद्ध अलंकृत विक्षिप्त बाहुओं को देखा जो कि इन्द्रध्वज के तुल्य
थे । क्रुद्ध रावण के दोनों नेत्रों से इस तरह अश्रुबिन्दु गिरे मानो जैसे दो प्रदीप्त दीपकों से अर्चियुक्त स्नेह (तैल)
बिन्दु गिरते हों । सम्भवतः उपर्युक्त कथन के अन्तर्गत दो आँखें और दो भुजाओं के वर्णन के आधार पर रावण के
एक सिर होने की बात कही गयी है, परन्तु उसी सर्ग में रावण को कामरूपी कहा गया है जिससे उसमें इच्छानुरूप
रूप धारण करने की सामर्थ्य कही गयी है ।
“वृतमाभरणैर्दिव्यैः सुरूपं कामरूपिणम् ।” ( वा० रा० ५।१०।९ )
कामरूपी रावण नाना आभरणों से आवृत होकर सुन्दर रूपवाला था ।
अतः वैसा होने पर भी अन्यत्र वर्णित उसकी दस ग्रीवाओं का भी अपलाप नहीं किया जा सकता । रावण
का केवल दशग्रीव नाम ही नहीं किन्तु उसके दस मुख एवं बीस भुजाओं का वर्णन भी है और वही उसका निजी रूप
था । दण्डकारण्य में वह सीता के सामने पहले भिक्षुरूप में गया । पश्चात् उसने अपने निजी रूप को दिखाया ।