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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 263

१८६ रामायणमीमांसा षष्ठ
राम-राज्य का वर्णन है, वहाँ इस बात का उल्लेख मिलता है कि कृषि की असाधारण उन्नति हुई थी। वास्तव में
महाभारत के द्रोणपर्व और शान्तिपर्व के षोडशराजन्यक-वर्णन में राम-राज्य का वर्णन किया जाता है। इस वर्णन के
अनेक श्लोक रामायण में मिलते हैं ( वा० रा० ६।१२८ ), शान्तिपर्व ( अध्याय २९ ) में कृषि का उल्लेख है—
"कालवर्षीश्च पर्जन्याः सस्यानि रसवन्ति च ।
नित्यं सुभिक्षमेवासीद्रामे राज्यं प्रशासति ॥४८॥
नित्यं पुष्पफलाश्चैव पादपा निरुपद्रवाः।
सर्वा द्रोणदुघा गावो रामे राज्यं प्रशासति ॥५२॥"
पर्जन्य यथासमय जल बरसा कर सस्य उत्पन्न करते थे। उससे राम के राज्य-शासन के समय किसी
प्रकार का दुर्भिक्ष नहीं पड़ता था। वृक्ष सदा फल-फूलों से लदे रहते थे; गौएँ द्रोण (घड़े) परिमाण दूध देती थीं। १
यह डा० वेबर का मत निष्प्रमाण एवं कल्पनामूलक है; दाशरथि राम और बलराम, दोनों ही विष्णु के
अवतार होने के कारण तत्त्वतः एक होने पर भी दाशरथि राम चौबीसवें कल्प के त्रेता में हुए और उनके लाखों
वर्ष बाद बलराम २८ वें कल्प के द्वापर में हुए।
स्वयं बुल्के के लेखानुसार "डा० वेबर का उपर्युक्त मत बहुत समीचीन नहीं प्रतीत होता ।'''' 'दाशरथि
राम की दक्षिण-यात्रा के फलस्वरूप रावण और वाली के स्थान पर उनके भाई विभीषण और सुग्रीव तो राजा बनाये
जाते हैं, लेकिन दक्षिण की सभ्यता या कृषि में कोई महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुआ हो, रामायण में कहीं नहीं दिखलाया
जाता । यह कहना पड़ेगा कि जिस उद्देश्य की पूर्ति के लिए रामायणकाव्य लिखा गया वह पूरा न हो सका।
यदि कवि के मन में कृषिसम्बन्धी देवताओं का विचार सर्वोपरि था तो रामायण में कृषि को इतना कम महत्त्व
क्यों दिया गया है ? वास्तव में रामकथा तथा कृषि का कोई विशेष सम्बन्ध मानने की आवश्यकता प्रतीत नहीं होती।
आर्यों के आगमन के पहले ही कृषि भारतवर्ष तथा दक्षिण में विद्यमान थी ।”
डा० वेबर के पिछले छिछले मत के समान ही डा० बुल्के का मत भी निष्प्रमाण है वानरों, भालुओं तथा
रावण आदि को आदिवासी मनुष्य मानना भी रामायण के विपरीत कल्पना है। रामायण के अनुसार वाली, सुग्रीव
और हनुमान् आदि देवताओं के अवतार थे और वे वैदिक आर्यसभ्यता के ही अनुयायी थे। वाली सन्ध्यावन्दन
करने के लिए चारों समुद्रों की यात्रा प्रतिदिन करता था। हनुमान्‌जी ने भी सूर्यनारायण से वेदाङ्ग एवं व्याकरण
आदि का अध्ययन किया था। रावण स्वयं वेदज्ञ था। लङ्का में हनुमान् ने वेदपाठ सुना था। विभीषण ने रावण को
आहिताग्नि तथा वेदान्तपारङ्गत कहा था—
“एषोहिताग्निश्च महातपाश्च वेदान्तगः कर्मसु चाग्र्यशूरः ।” ( वा० रा० ६।१११।२३ )
"असौ ( हनुमान् ) पुनर्व्याकरणं ग्रहीष्यन् सूर्योन्मुखः प्रष्टुमनाः कपीन्द्रः ।
उद्यद्गिरेरस्तगिरिं जगाम ग्रन्थं महद्धारयनप्रमेयः ॥
नह्यस्य कश्चित् सदृशोऽस्ति शास्त्रे वैशारदे छन्दगतौ तथैव ।”
( वा० रा० ७।३६।४४, ४५ )
हनुमान् सूर्यनारायण से व्याकरण का अध्ययन करते हुए उदयाचल से अस्ताचल तक सूर्याभिमुख
होकर पीछे की ओर चलते थे । शास्त्रपाण्डित्य, छन्द आदि के ज्ञान में उनके समान कोई भी नहीं था । अस्तु; रावण
तथा हनुमान् आदि को आदिवासी अनार्य कहना साहसमात्र है। इसी तरह भारत में आर्यों के बाहर से आने की
कल्पना भी पाश्चात्यों की दुरभिसन्धिपूर्ण दुष्कल्पना ही है। अब इस मत का खण्डन भी हो चुका है। वेद, रामायण,
१. रामकथा, पृष्ठ ११८ ।