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सर्वकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 261

१८४ रामायणमीमांसा षष्ठ
के रूपान्तर हों। इस अनुमान का कोई आधार नहीं है, यह निर्मूल है। 'वृषाकपि' का अर्थ 'नरकपि' न होकर वराह
अथवा एकशृङ्ग वराह होता है। महाभारत में वृषाकपि को अनेक आर्य देवताओं (विष्णु, शिव, इन्द्र आदि) से
अभिन्न माना गया है। ऋग्वेद (१०।८६) में जो वृषाकपि का उल्लेख है वह सम्भवतः एक सूर्य देवता है जिसका
प्रतीक वराह था, अतः ऋग्वेदोय वृषाकपि का द्रविड़ सभ्यता के साथ कोई भी सम्बन्ध प्रमाणित नहीं होता। यह
अवश्य ही बहुत सम्भव है कि 'हनुमान्' नाम एक द्रविड़ शब्द का संस्कृत रूपान्तर है और इसका अर्थ 'नरकपि' है।
कारण यह है कि रामायण के अन्य वानरों की तरह हनुमान् भी वानर-गोत्रीय आदिवासी थे। वह एक प्राचीन
द्रविड़ देवता थे, इसके लिए सङ्केत भी नहीं मिलता। रामायण में हनुमान् की शक्ति के वर्णन में अतिशयोक्ति का सहारा
तो लिया गया है फिर भी उनके देवता होने का कहीं भी उल्लेख नहीं हुआ है।'"१
उपर्युक्त उद्धरण से स्पष्ट है कि दिनेशचन्द्र के मत का खण्डन बुल्के स्वयं ही करते हैं। परन्तु बुल्के का
कथन भी तर्क-सम्मत नहीं है। क्योंकि उपनिषद् भी वैदिक साहित्य है और रामतापनीय, रामरहस्य तथा मुक्ति-
कोपनिषद् आदि उपनिषदों में हनुमान् का चरित्र वर्णित है। समुग्ग जातक के वायुस्स पुत्र नामक विद्याधर को भी
हनुमान् ही समझना चाहिये, क्योंकि हनुमान् वायुपुत्र हैं ही। जैनों ने वानरों को विद्याधर माना ही है। साथ ही,
जब हनुमान् द्रविड़ शब्द का संस्कृत रूपान्तर मान्य है और उसका अर्थ नरकपि है तो उसके द्रविड़ देवता होने में क्या
आपत्ति है ? रामायण के अनुसार लाखों वर्ष प्राचीन राम एवं हनुमान् आदि की उपासना सर्वत्र होती आयी है।
द्रविड़ देश में भी विष्णु-भक्ति का प्रचार बहुत प्राचीन है। श्रीमद्भागवत-माहात्म्य में तो यहाँ तक उल्लेख है कि भक्ति
द्रविड़ देश में ही उत्पन्न हुई—
“उत्पन्ना द्राविड़े साहं वृद्धि कर्णाटके गता।” (भाग० मा० १।४८)
आज भी वैष्णव-मन्दिरों में द्रविड़ भाषामय प्रबन्ध बड़े आदर से पढ़े जाते हैं। अतः वहाँ राम के समान
ही हनुमान् को भी देवता माना जाना असम्भव नहीं कहा जा सकता। इसी तरह हनुमान् को आदिवासी मनुष्य
मानना भी रामायण से विरुद्ध है। पाश्चात्यों की निराधार कल्पनाओं से आर्ष रामायण का प्रामाण्य कहीं अधिक है।
रामायण में स्पष्ट उल्लेख है कि रावण ने ब्रह्मा से वरदान माँगा था कि मैं नर एवं वानर से भिन्न अन्य किसी के
द्वारा न मारा जा सकूँ। ब्रह्मा ने वैसा ही वरदान उसको दिया। तब सब देवताओं ने भगवान् विष्णु से रावण-वध
की प्रार्थना की और भगवान् विष्णु ने उनकी प्रार्थना स्वीकार की। तब ब्रह्मा ने देवताओं से कहा कि तुम लोग
वानर तथा ऋक्ष बनकर विष्णु की सहायता के लिए भूमि पर प्रकट हो जाओ। ब्रह्मा स्वयं जाम्बवान् हुए, रुद्र और
वायु हनुमान् हुए, इन्द्र के अंश से वाली और सूर्य के अंश से सुग्रीव का आविर्भाव हुआ। रामसम्बन्धी उपनिषदों में
भी इन बातों का वर्णन है। अतः यह कहना सर्वथा गलत है कि हनुमान् को देवता नहीं कहा गया है। इसी तरह
हनुमान् की शक्ति के वर्णन में अतिशयोक्ति की कल्पना भी निर्मूल है, क्योंकि रुद्र साक्षात् परमेश्वर हैं। वायु से
रहित होने पर प्रत्येक प्राणी की मृत्यु हो जाती है; अतः रुद्रावतार वायु-पुत्र हनुमान् की शक्ति का जो भी वर्णन है
वह अपर्याप्त ही कहा जा सकता है। उसमें अतिशयोक्ति की कल्पना भी सम्भव नहीं।
“पुत्रत्वं तु गते विष्णौ राज्ञस्तस्य महात्मनः।
उवाच देवताः सर्वाः स्वयम्भूर्भगवानिदम्॥
सत्यसन्धस्य वीरस्य सर्वेषां नो हितैषिणः।
विष्णोः सहायान् बलिनः सृजध्वं कामरूपिणः॥
मायाविदश्च शूरांश्च वायुवेगसमान् जवे।


१. रामकथा, पृष्ठ ११३-११५।