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रामार्चन पद्धति (जगद्गुरु रामानन्दाचार्य - सन्त कबीर व रविदास के दीक्षा-गुरु प्रणीत मूल ग्रन्थ)

Ramarchana Paddhati of Jagadguru Ramanandacharya

जगद्गुरु स्वामी रामानन्दाचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished26 पृष्ठ

श्रीरामार्चनपद्धति ८२३
रुच्यं दोषविवर्जित सह यथाऽशेषः प्रभो? भोक्तृभिः
स्वीकर्तुञ्च तथार्हसि त्वमधुना भक्त्यार्पितं ते मया॥४॥
हे राघव ? रघुकुल शिरोमणि श्रीरामजी ? आपने श्रीकौशल्या जी श्रीजनकनन्दिनी श्रीसीताजी
सर्वश्रेष्ठ गुणो से युक्त श्रीलक्ष्मण जी से सादर सस्नेह समर्पित नैवेद्यादि तथा पंपामे शबरी द्वारा स
स्नेह समर्पित लोकोत्तर दिव्य अद्भुत स्वादवाले फलादि तथैव श्रीभारद्वाज मुनि से सादर
समर्पित अति रस वाले फलादि तथा स्नेही ब्रजवासी जनो से समर्पित सुस्वादु दूध वह् अद्भुत
स्वाद वालो ताजा नवनीत-मक्खन और उन स्नेही यज्ञ पत्नियो से सादर समर्पित ताजे
घी से सम्पृक्त विविध भोज्य पदार्थ तथैव अन्य अनेक मुक्तजनो और साधारण स्थिति मे रह
रहे श्रीविदुर जी तथा उनकी धर्मपत्नि से सस्नेह समर्पित आपको अतिप्रिय अनेक प्रकार के
पाक से युक्त-नाना प्रकार के वानगी जो पथ्य तथा देखने मे अति सुहावे थे तथैव
रुचिकर और सब प्रकार के दोषो से रहित थे उन सबो को आपने अपने समस्त सेवको दिव्य
पार्षद्दो के साथ जैसे सस्नेह स्वीकार किया प्रभो? सर्व समर्थ श्रीरामचन्द्रजी ? आज मेरे द्वारा
आपको भक्ति पूर्वक सादर समर्पित इन भोज्य नैवेद्यादि को भी उसी प्रकार स्वीकार कर इस
अबोध आपके शरणापन्न बालक को कृतार्थ करे ।३-४
हरि ॐ नाभ्याऽआसीदन्तरिक्ष गुं शीष्णौद्यौः समवर्तत ।
पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथा लोकाँ२ऽअकल्पयन् ॥५॥
इस प्रकार विनम्र भाव से प्रार्थना कर पुन -सर्वकारणभूत सर्वेश्वर आपके ही नाभि से
अन्तरिक्ष आकाश उत्पन्न हुआ तथा शिर से द्युलोक तथा भूमि पाद्यो चरणो से और दिशाए कान
से उत्पन्न हुए है यानी पूर्वोक्त क्रमसे ही विश्वरूप आप से ही आकाशादि सभी लोक-स्थावर
जंगमादिक सब प्रपच उत्पन्न हुआ है अत विश्वरूप आपको आपकी ही सामग्री सादर समर्पण
कर रहा हूँ उन्हे स्वीकार करे ॥५॥
इति विज्ञाप्यार्घ्य जलेनप्रोक्ष्य श्रीमन्त्रराजेनाभिमन्त्र्य सुरभिमुद्रां प्रदर्श्य श्रीरामं
जनकात्मजामनिलजमित्यादिगुरुपरम्परामनुसंधाय निवेदयेत् ।
इस प्रकार नैवेद्योको स्वीकार करने के लिये सादर निवेदन कर अर्घ्य जल से प्रोक्षण करे ।
अनन्तर षडक्षर श्रीमन्त्रराज से अभिमन्त्रित कर सुरभि मुद्रा दिखाकर श्रीरामजी से लेकर अपने
आचार्य पर्यन्त के गुरुपरम्परा का स्मरण कर नैवेद्य निवेदन करे ।
ततो जलपानहस्तशोधनगण्डूषपाद्याचमनादिभिरभ्यर्च्य-
अनन्तर सर्वेश श्रीरामजी को जलपान कराना हाथ प्रक्षालन गण्डूष कराना और आचमन कराना
तथा श्रीचरण प्रक्षालन आदि प्रक्रियाओं से पूजा करके -
शृणोमिसीतापतिचित्रसत्कथा वदामिसीतापतिर्कीर्तिमक्षयाम् ।
स्मरामिसीतापतिदिव्यविग्रहं वृणोमिसीतापतिभक्तिमुत्तमाम् ॥१।
मै अन्य लौकिक विषयो से विरत होकर सर्वेश्वर श्रीसीता पति श्रीरामजी की सब वेदों से
अति अद्भुत रूप से वर्णित भवपाश नाशक कथा को सर्वदा सुनता हूँ तथा श्रीसीतापति की ही

८२४ गङ्गा संहिता
अक्षयकीर्ति श्रीरामजी के दिव्य कथा प्रसङ्गो को सर्वदा गान करता हूँ । तथैव श्रीसीतानाथ राम
चन्द्रजी के दिव्य सर्वलोकोत्तर सुन्दर श्रीविग्रहका सर्वदा स्मरण करता हू और सर्वजन शरण्य श्री
सीतापति श्रीरामजी के सर्वोत्कृष्ट भक्ति को ही वरण यानी स्वीकार करता हूं जो सर्वजनो को
सायुज्य मुक्तिदायक है अन्यो की भक्ति नही क्योकि अन्यदेव सर्वदा के लिये सब जीवो को
सब जीवो या दुखो से अभय प्रदान करने मे समर्थ नही है ॥१॥
व्रजामिसीतापतिदिव्यमन्दिर तथाचसीतापतिसत्प्रपन्नताम् ।
युनज्मि सीतापतिचिन्तनेमनः तनोमि सीतापतिदाससङ्गतिम् ॥२॥
मै अन्य विषयोन्मुखता को छोडकर सर्वदा श्रीसीतापति श्रीरामजी के दिव्य मन्दिर के तरफ
ही जाता हू, तथा मनुष्य देह की सफलता के लिये श्रीसीतापतिजी की शरणागति को सर्वतो भाव
से स्वीकार करता हू । तथैव श्रीसीतापतिजी के चिन्तन मे मन को सदा लगाये रखता हू । और
श्रीसीतापतिजी के दास अनन्य सेवक मद्‌भक्तो के साथ संगति को अधिक से अधिक बढाया
करता हूं यानी श्रीरामदासो की सगति सदा किया करता हुँ अन्यो की नही ॥२॥
अवैमि सीतापतिमञ्जुबन्धुतातथाचसीतापतिदिष्टभोग्यताम् ।
ततश्चसीतापतिनित्यधामदां करोमिसीतापतिभक्तिमुत्तमाम् ॥३॥
मै श्रीसीतापतिजी के मञ्जु सुन्दर या दृढबन्धुता को स्वीकार करता हुँ । अथवा श्रीसीतानाथ
ही मेरे एकमात्र अनन्य बन्धु हैं इस बात को मै अवगम करता हूँ । तथा श्रीसीतानाथजी के द्वारा
निर्दिष्ट भोग्य पदार्थ को ही भोगता हुँ यानी मेरे कर्मानुसार मेरे लिये भोग्यतया समुपस्थित
पदार्थों को श्रीराम शेष बुद्धि से यथा योग्य उपभोग करता हुँ । तथैव श्रीसतापति के नित्यधाम
श्रीसाकेत को देनेवाली श्रीसीतापति श्रीरामजी की सर्वोत्कृष्ट भक्ति-शरणागति सर्वाभयप्रदप्रपन्नता को
स्वीकार करता हुँ॥३।
करोमि सीतापतिपाददासतां नमामि सीतापतिपादपङ्कजम् ।
पठामि सीतापतिकाव्यसंहति जपामि सीतपतिमन्त्रभूपतिम् ॥४॥
मै अन्य सोमान्य जनों की या देवोकी दासता को छोडकर श्रीसीतापतिजी के श्रीचरणकमलों
की दासता को ही स्वीकार करता हुँ और श्रीसीतापतिजी के चरणकमलो को ही सर्वदा नमन सादर
दण्डवत प्रणाम करता हूँ, तथैव श्रीसीतापतिजी के दिव्य गुण सम्पन्न काव्य समूहो को ही
सदा पाठ करता हुँ, और श्री सीतापतिजी के महामन्त्र मन्त्रराज षडक्षर महामन्त्र को ही एक
चित्ततया सदा जपता हुँ अन्य मन्त्र का नही, क्योकि अन्यमन्त्र चित्त मे भ्रम पैदा करने वाले
है निश्चित रूप से मोक्षदायक नही मोक्ष ही जीवात्माका चरमलक्ष्य है अत सायुज्य मुक्तिप्राप्ति
के लिये सदा श्रीरामषडक्षर महामन्त्र को ही जपता हुँ ॥४॥
करोमि सीतापतिविग्रहार्चनं तथा च सीतापतिमूर्त्तिदर्शनम्
गुणाब्धिसीतापतिनामकीर्त्तनं परेशसीतापतिपादवन्दनम् ।५।।
मै सर्वदा श्रीसीतापतिजी के दिव्य श्रीविग्रहका पूजन किया करता हुँ, तथैव श्रीसीतापतिजी
के सर्वमंगल कारक दिव्यमूर्त्तिका दर्शन सर्वदा किया करता हूँ, और सर्वगुणो के सागर श्रीसीता-

पतिजी के सर्व अमंगलो को अपहरण कर जप करनेवालों को सब प्रकार के मंगलों का प्रदान
करने वाले दिव्य नामोका सकीर्तन रातदिन किया करता हूँ । तथा सर्वेश्वर श्रीसीतापतिजी के
लोक कल्याणकारक चरणकमलो की वन्दना सदा किया करता हूँ, जिन श्री चरण की धूली के
स्पर्शमात्र से अघरूपा गौतम नारी का उद्धार हुआ तथा जिनके चिन्तन से अनन्त पतितो का
कल्याण हुआ उन पाद पद्मो की सदा वन्दना करता हूँ ॥५॥
भजामि सीतापतिमेवकेवलं रटामि सीतापतिमेव केवलम् ॥
श्रयामि सीतापतिमेव केवलं प्रयामि सीतापतिमेवेकेवलम् ॥
मै केवल श्रीसीतापतिजी का ही भजन-यानी सेवा करता हूँ अन्यो का नही, तथैव श्रीसीता
पतिजी के दिव्य नामो का ही रटन करता हूँ अन्य नामो का नही, और सर्वाश्रय दाता श्रीसीता
पतिजी का ही आश्रय लेता हूँ अन्यो का नही, तथा सर्वशरण्य श्रीसीतापतिजी के तरफ ही जाता
हूँ अन्यो के तरफ कदापि नही जाता हूँ ॥६॥
इत्याद्यनन्यतावेदनस्तोत्रपुरुषसूक्तादिकं पठन् प्रदक्षिण नमस्कारादिभिः सपूज्य
भगवन्तं श्रीसीतासमेतं श्रीरामचन्द्रं पर्यङ्के निवेश्य—
इत्यादि ज गु श्रीगगाधराचार्य प्रणीत अनन्यतावेदन दिव्य स्तोत्र तथा पुरुष सूक्त आदि को
पढता हुआ श्रीरामजी की प्रदक्षिणा तथा नमस्कार आदि से अच्छी तरह से पूजो करके श्रीसीताजी
के साथ भगवान् श्रीरामजी को पर्यंक मे सन्निवेश करके निम्न प्रकार से प्रार्थना करे—
पर्यङ्कासनमारुह्य सीतया सहितः प्रभो ? ।
निद्रां कुरुस्व भगवन् ? पार्षदैरभिरक्षितः ॥१॥
इति प्रार्थयन् निम्नाष्टकं गायन् शाययेत् ।
षडैश्वर्य परिपूर्ण सर्व समर्थ सर्वेश्वर श्रीरामजी ? स्वच्छस्फटिकसन्निभपर्यङ्कासन दिव्य पलंग
पर समारोहित होकर श्रीसीताजी के साथ श्रीहनुमदादिपार्षदो से अभिरक्षित होकर आराम करे यानी
सुखनिद्रा का अनुभव करे ॥१॥
इस प्रकार से प्रार्थना करते हुये निम्न श्रीरामदोलिकाशयनाष्टक का मधुर स्वर से गान करता
हुआ श्रीरामजी को सुलावे ।
माता गीत्वा स्वपुत्रं यदि शयनगतं संविधत्सोऽथ शेषिन ?
शेषत्वात्सात्म्यतत्वं गतवत इह मे कोशलाधीशजायाः ।
वात्सल्यातुल्यपात्रं स्वपिहि गुणगणोदारगीतेन गीतो
देहे सौधेऽतिशुद्धे भजनकलनतः स्वान्तदोलाऽधिशायी ।१।
पालने मे बालक माता का गीत सुनते सुनते सो जाते है अथवा गीत गाकर माता बच्चे
को सुलाती है ऐसा अनुभव है । इसलिये समस्त जगत का प्रयोजन होने के कारण हे शेषिन् !
मैं तथा श्रीकौशल्याजी दोनो का एक मात्र आपके अधीन होने से शेष रूप से अभेद होने के
१०४

८२६ गङ्गा सहिता
कारण मेरे तथा श्रीकौशल्याजी के अनुपम दुलारे श्रीरामजी ! भजन के कारण अत्यन्त निर्मल
सुधा-धवल प्रासाद रूपी मेरे देह मे मेरे मन रूपी दोला पर लेटे हुये तथा गुण गण कीर्तन
के गीत सुनते सुनते सो जाये मेरे मन मे स्थिर रूप से वास करे ॥१॥
कौशल्या कीर्तिर्धन्या यदुदरजनिमागाज्जगद्यत्तनुः स
श्रीरामो रावणास्याऽप्युपनवशिरसां कर्तितैकेषुणाद्राक् ।
जामाताऽन्वर्थनाम्नो नृपतिकुलमणेर्यो विदेहस्य कुर्यात्
स्वापं दोलां श्रितो हृन् मम दशरथसूर्भक्ति गङ्गाम्बुधौताम् ॥२॥
वह कौशल्या अपनी कीर्ति से धन्यवाद का पात्र है, क्योकि स्थूल सूक्ष्मचिदचिदात्मक यह
ससार जिसकी शरीर है, ऐसे श्रीरामजी ने जिसके उदर से अवतार-जन्म लिया था । इससे बडी
कीर्ति और क्या हो सकती है ? वह श्रीरामजी जिन्होने एक ही बाण से अत्यन्त लघुता से रावण
के दश मस्तको को काट दिया था तथा विदेह कहे जाने वाले राजाओ के कुलश्रेष्ठ ऐसे विदेह
के जो जामाता है । ऐसे श्रीरामजी श्रीदशरथजी के पुत्र मेरे भक्ति रूपी गङ्गाजल से पवित्र
ऐसे हृदय रूपी दोला पर रहनेवाले निद्रा को प्राप्त करे अर्थात् भक्ति से भरे मन मे सदावास
करे ॥२॥
नीलाभो नीलपद्मोद्भवकृतजगतीनाथ ! सीताधिनाथः
सद्भिर्भाग्योऽपि भोग्यं ननु निखिलमिदं यस्यलीलाधृताङ्गः ।
धन्वोन्मुक्तेषुणाऽब्जच्छदमिव सितवां स्ताटकोरः परेशो
भक्तिक्षीराब्धिशेषं सदपि मम मनोदोलिकांसोऽधिशेताम् ॥३॥
अपने नाभिकमल से उत्पन्न हुये ब्रह्माजी के द्वारा उत्पन्न किये गये जगत के स्वामी हे
श्रीरामजी नीलक्रान्ति वाले तथा श्रीसी

or something?
Wait, look at the character:
It looks like 'हृ' with an anusvara? No.
Wait, let's type out what it looks like:
It looks like हृच्चित्ते compressed, or हृच्चेते, or हृचित्ते, or द्विचित्ते?
Wait, look at the two characters:
First character: looks like 'ह' with 'ृ' -> हृ.
Second character: looks like 'च्च' with 'े' -> च्ते? No, 'त्त' with 'े' -> त्ते.
Wait, between them, is there a 'च्चि'?
No, there are only TWO compound characters!
Char 1: looks like 'हृ' or 'ह्रि' or 'द्वि' or 'हृच्'?
Wait, could it be 'हृत्' + 'स्'?
Wait, let's look at the image very closely at 800%:
Top of char 1:
A horizontal shirorekha.
Then a loop hanging down, curving to the right...
Wait! That's 'ह'!
Under 'ह', there is a 'ृ' loop curling backwards (to the left), exactly like 'ृ'!
Wait, but is there a 'c' or 'ch'?
Wait, look to the right of 'हृ':
There is 'च्चे'?
No, look at char 2:
It is 'त्ते'!

८२८ गङ्गा संहिता
स्तुत्यो नम्यश्चगम्यश्चिदचिदुभयव्यापिवर्म्मानिरूष्मा
रामः स्वापं म एयादसितमणितनुर्दोैलिकायां स चित्ते ॥
जो श्रीरामजी वीरो के अग्रसर हैं तथा जो देव, दानव, मनुष्य तथा अन्य प्राणियो के कर्ता
रक्षक तथा नाश करनेवाले भी है, सभी प्रशस्तियो से युक्त है हेयगुणो के स्पर्श से भी रहित
है । तथा जो परात्पर है, स्थूल एव सूक्ष्म चेतन तथा अचेतन को अपने शरीर मे समाये हुये है
तथा सर्वोत्कृष्ट विनय निरभिमानता आदि गुणो से सम्पन्न है ऐसे इसलिये केवल वे ही स्तुति
के प्रणाम के तथा ध्यान के योग्य है ऐसे नीलमणि के समान कान्ति से युक्त शरीरवाले श्री
रामजी मेरे मन रूपी पालने मे शयन करे मेरा मन सदा ही उनमे लगा रहे ॥८॥
ततो निवेदितनैवेद्यं मनसा चतुर्भागं परिकल्प्य हनुमदङ्गदसुग्रीवविभीषणेभ्यो-
निवेद्यानन्तरं पूर्वाचार्यादिभ्यः स्वाचार्येभ्यश्चनिवेद्य शेषं भागवतैः सहभुञ्जीत ।
अनन्तर श्रीरामजी को निवेदित नैवेद्य को मन से चारभागकी कल्पना करके 'हुं हनुमते नम'
इस मन्त्र से श्रीहनुमानजी को तथा 'अ अंगदाय नम' बोलकर श्रीअंगदजी को तथैव 'सुंसुग्रीवाय
नम' मन्त्र से श्रीसुग्रीव और 'वि विभीषणाय नम' बोलकर श्रीविभीषणजी को निवेदन करने के
बाद 'ॐ ब्रह्मादि समस्त पूर्वाचार्येभ्यो नम महा नैवेद्य समर्पयामि' ऐसा बोलकर समस्त पूर्वाचार्यो
को राजभोग का समर्पण करने के बाद 'ॐ स्वाचार्येभ्यो महाप्रसादं समर्पयामि' ऐसा बोलकर
स्वाचार्यजी को महाप्रसाद समर्पण करने के बाद शान्तचित्त से भागवत तथा समागत अभ्यागतों
के साथ महाप्रसाद का सेवन करे । श्रीवैष्णवो को यह खास ख्याल रखना चाहिये कि जब कभी
जो कोई भोज्य पदार्थ परेश श्रीरामजी को भोग लगाया जाय परोक्त विधि से सभी को समर्पण
करके ही स्वय सेवन करे एकाकी नही ।
रामानन्दोपदिष्टेयं श्रीरामार्चनपद्धतिः । मुमुक्षूणां मुदेश्चयाच्छ्रीरामप्रीतिकारिणी ॥१॥
अर्चकोयःसमभ्यर्च्यदास्यायेमामहर्दिवम् । प्रसाद्य सगणं रामं लभते गतिमुत्तमाम् ॥२॥
इत्यानन्दभाष्यकार जगद्गुरु श्रीरामानन्दाचार्यप्रणीत श्रीवैष्णवमताब्जभास्कर परिशिष्ट
Ψ श्रीरामार्चनपद्धतिः Ψ
卐 श्रीरामः शरणं मम 卐
"मङ्गलादीनि मङ्गलमध्यानि मङ्गलान्तानि च शास्त्राणि प्रथन्ते वीरपुरुषाणि भवन्त्यायुष्मत्पुरुषाणि
चाध्येतारश्चमङ्गलयुक्ता स्यु" इस स्मृति वचनानुसार आचार्य सम्राट् जगद्गुरु श्रीरामानन्दाचार्यजी
प्रबन्धप्रकरणान्त मे आशीर्वादात्मक मंगल वचन पूर्वक प्रकरणोपसहार करते है—
ज गु श्रीरामानन्दाचार्यजी से स्वशिष्य ज गु श्रीसुरसुरानन्दाचार्यजी के "तत्त्वं किम् ? आदि
दश प्रश्नों को निमित्त बनाकर सर्वलोकोपकारार्थ उपदिष्ट यह सर्वेश्वर श्रीरामचन्द्रजी के श्रीचरणों
मे अनन्य प्रीति करानेवाली श्रीरामार्चनपद्धति सब मुमुक्षुजनोके लिये सायुज्य मुक्ति प्राप्त कराने
वाली हो ॥१॥
जो अर्चक श्रीरामजी की पूजा इस श्रीरामार्चनपद्धति के विधानानुसार सदा त्रिकाल अच्छी
तरह से समाराधन करेगा वह श्रीरामजी के सब गणो के साथ उन्हे प्रसन्नकर सर्वोत्तम सायुज्य
मुक्ति को प्राप्त करेगा ॥२॥