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रामार्चन पद्धति (जगद्गुरु रामानन्दाचार्य - सन्त कबीर व रविदास के दीक्षा-गुरु प्रणीत मूल ग्रन्थ)

रामार्चन पद्धति (जगद्गुरु रामानन्दाचार्य - सन्त कबीर व रविदास के दीक्षा-गुरु प्रणीत मूल ग्रन्थ)

Ramarchana Paddhati of Jagadguru Ramanandacharya

जगद्गुरु स्वामी रामानन्दाचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished26 पृष्ठ

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पृष्ठ 24

८२६ गङ्गा सहिता
कारण मेरे तथा श्रीकौशल्याजी के अनुपम दुलारे श्रीरामजी ! भजन के कारण अत्यन्त निर्मल
सुधा-धवल प्रासाद रूपी मेरे देह मे मेरे मन रूपी दोला पर लेटे हुये तथा गुण गण कीर्तन
के गीत सुनते सुनते सो जाये मेरे मन मे स्थिर रूप से वास करे ॥१॥
कौशल्या कीर्तिर्धन्या यदुदरजनिमागाज्जगद्यत्तनुः स
श्रीरामो रावणास्याऽप्युपनवशिरसां कर्तितैकेषुणाद्राक् ।
जामाताऽन्वर्थनाम्नो नृपतिकुलमणेर्यो विदेहस्य कुर्यात्
स्वापं दोलां श्रितो हृन् मम दशरथसूर्भक्ति गङ्गाम्बुधौताम् ॥२॥
वह कौशल्या अपनी कीर्ति से धन्यवाद का पात्र है, क्योकि स्थूल सूक्ष्मचिदचिदात्मक यह
ससार जिसकी शरीर है, ऐसे श्रीरामजी ने जिसके उदर से अवतार-जन्म लिया था । इससे बडी
कीर्ति और क्या हो सकती है ? वह श्रीरामजी जिन्होने एक ही बाण से अत्यन्त लघुता से रावण
के दश मस्तको को काट दिया था तथा विदेह कहे जाने वाले राजाओ के कुलश्रेष्ठ ऐसे विदेह
के जो जामाता है । ऐसे श्रीरामजी श्रीदशरथजी के पुत्र मेरे भक्ति रूपी गङ्गाजल से पवित्र
ऐसे हृदय रूपी दोला पर रहनेवाले निद्रा को प्राप्त करे अर्थात् भक्ति से भरे मन मे सदावास
करे ॥२॥
नीलाभो नीलपद्मोद्भवकृतजगतीनाथ ! सीताधिनाथः
सद्भिर्भाग्योऽपि भोग्यं ननु निखिलमिदं यस्यलीलाधृताङ्गः ।
धन्वोन्मुक्तेषुणाऽब्जच्छदमिव सितवां स्ताटकोरः परेशो
भक्तिक्षीराब्धिशेषं सदपि मम मनोदोलिकांसोऽधिशेताम् ॥३॥
अपने नाभिकमल से उत्पन्न हुये ब्रह्माजी के द्वारा उत्पन्न किये गये जगत के स्वामी हे
श्रीरामजी नीलक्रान्ति वाले तथा श्रीसी

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