सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
रामार्चन पद्धति (जगद्गुरु रामानन्दाचार्य - सन्त कबीर व रविदास के दीक्षा-गुरु प्रणीत मूल ग्रन्थ)

रामार्चन पद्धति (जगद्गुरु रामानन्दाचार्य - सन्त कबीर व रविदास के दीक्षा-गुरु प्रणीत मूल ग्रन्थ)

Ramarchana Paddhati of Jagadguru Ramanandacharya

जगद्गुरु स्वामी रामानन्दाचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished26 पृष्ठ

पृष्ठ 22, कुल 26 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 22

८२४ गङ्गा संहिता
अक्षयकीर्ति श्रीरामजी के दिव्य कथा प्रसङ्गो को सर्वदा गान करता हूँ । तथैव श्रीसीतानाथ राम
चन्द्रजी के दिव्य सर्वलोकोत्तर सुन्दर श्रीविग्रहका सर्वदा स्मरण करता हू और सर्वजन शरण्य श्री
सीतापति श्रीरामजी के सर्वोत्कृष्ट भक्ति को ही वरण यानी स्वीकार करता हूं जो सर्वजनो को
सायुज्य मुक्तिदायक है अन्यो की भक्ति नही क्योकि अन्यदेव सर्वदा के लिये सब जीवो को
सब जीवो या दुखो से अभय प्रदान करने मे समर्थ नही है ॥१॥
व्रजामिसीतापतिदिव्यमन्दिर तथाचसीतापतिसत्प्रपन्नताम् ।
युनज्मि सीतापतिचिन्तनेमनः तनोमि सीतापतिदाससङ्गतिम् ॥२॥
मै अन्य विषयोन्मुखता को छोडकर सर्वदा श्रीसीतापति श्रीरामजी के दिव्य मन्दिर के तरफ
ही जाता हू, तथा मनुष्य देह की सफलता के लिये श्रीसीतापतिजी की शरणागति को सर्वतो भाव
से स्वीकार करता हू । तथैव श्रीसीतापतिजी के चिन्तन मे मन को सदा लगाये रखता हू । और
श्रीसीतापतिजी के दास अनन्य सेवक मद्‌भक्तो के साथ संगति को अधिक से अधिक बढाया
करता हूं यानी श्रीरामदासो की सगति सदा किया करता हुँ अन्यो की नही ॥२॥
अवैमि सीतापतिमञ्जुबन्धुतातथाचसीतापतिदिष्टभोग्यताम् ।
ततश्चसीतापतिनित्यधामदां करोमिसीतापतिभक्तिमुत्तमाम् ॥३॥
मै श्रीसीतापतिजी के मञ्जु सुन्दर या दृढबन्धुता को स्वीकार करता हुँ । अथवा श्रीसीतानाथ
ही मेरे एकमात्र अनन्य बन्धु हैं इस बात को मै अवगम करता हूँ । तथा श्रीसीतानाथजी के द्वारा
निर्दिष्ट भोग्य पदार्थ को ही भोगता हुँ यानी मेरे कर्मानुसार मेरे लिये भोग्यतया समुपस्थित
पदार्थों को श्रीराम शेष बुद्धि से यथा योग्य उपभोग करता हुँ । तथैव श्रीसतापति के नित्यधाम
श्रीसाकेत को देनेवाली श्रीसीतापति श्रीरामजी की सर्वोत्कृष्ट भक्ति-शरणागति सर्वाभयप्रदप्रपन्नता को
स्वीकार करता हुँ॥३।
करोमि सीतापतिपाददासतां नमामि सीतापतिपादपङ्कजम् ।
पठामि सीतापतिकाव्यसंहति जपामि सीतपतिमन्त्रभूपतिम् ॥४॥
मै अन्य सोमान्य जनों की या देवोकी दासता को छोडकर श्रीसीतापतिजी के श्रीचरणकमलों
की दासता को ही स्वीकार करता हुँ और श्रीसीतापतिजी के चरणकमलो को ही सर्वदा नमन सादर
दण्डवत प्रणाम करता हूँ, तथैव श्रीसीतापतिजी के दिव्य गुण सम्पन्न काव्य समूहो को ही
सदा पाठ करता हुँ, और श्री सीतापतिजी के महामन्त्र मन्त्रराज षडक्षर महामन्त्र को ही एक
चित्ततया सदा जपता हुँ अन्य मन्त्र का नही, क्योकि अन्यमन्त्र चित्त मे भ्रम पैदा करने वाले
है निश्चित रूप से मोक्षदायक नही मोक्ष ही जीवात्माका चरमलक्ष्य है अत सायुज्य मुक्तिप्राप्ति
के लिये सदा श्रीरामषडक्षर महामन्त्र को ही जपता हुँ ॥४॥
करोमि सीतापतिविग्रहार्चनं तथा च सीतापतिमूर्त्तिदर्शनम्
गुणाब्धिसीतापतिनामकीर्त्तनं परेशसीतापतिपादवन्दनम् ।५।।
मै सर्वदा श्रीसीतापतिजी के दिव्य श्रीविग्रहका पूजन किया करता हुँ, तथैव श्रीसीतापतिजी
के सर्वमंगल कारक दिव्यमूर्त्तिका दर्शन सर्वदा किया करता हूँ, और सर्वगुणो के सागर श्रीसीता-