रामार्चन पद्धति (जगद्गुरु रामानन्दाचार्य - सन्त कबीर व रविदास के दीक्षा-गुरु प्रणीत मूल ग्रन्थ)
Ramarchana Paddhati of Jagadguru Ramanandacharya
जगद्गुरु स्वामी रामानन्दाचार्य द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपतिजी के सर्व अमंगलो को अपहरण कर जप करनेवालों को सब प्रकार के मंगलों का प्रदान
करने वाले दिव्य नामोका सकीर्तन रातदिन किया करता हूँ । तथा सर्वेश्वर श्रीसीतापतिजी के
लोक कल्याणकारक चरणकमलो की वन्दना सदा किया करता हूँ, जिन श्री चरण की धूली के
स्पर्शमात्र से अघरूपा गौतम नारी का उद्धार हुआ तथा जिनके चिन्तन से अनन्त पतितो का
कल्याण हुआ उन पाद पद्मो की सदा वन्दना करता हूँ ॥५॥
भजामि सीतापतिमेवकेवलं रटामि सीतापतिमेव केवलम् ॥
श्रयामि सीतापतिमेव केवलं प्रयामि सीतापतिमेवेकेवलम् ॥
मै केवल श्रीसीतापतिजी का ही भजन-यानी सेवा करता हूँ अन्यो का नही, तथैव श्रीसीता
पतिजी के दिव्य नामो का ही रटन करता हूँ अन्य नामो का नही, और सर्वाश्रय दाता श्रीसीता
पतिजी का ही आश्रय लेता हूँ अन्यो का नही, तथा सर्वशरण्य श्रीसीतापतिजी के तरफ ही जाता
हूँ अन्यो के तरफ कदापि नही जाता हूँ ॥६॥
इत्याद्यनन्यतावेदनस्तोत्रपुरुषसूक्तादिकं पठन् प्रदक्षिण नमस्कारादिभिः सपूज्य
भगवन्तं श्रीसीतासमेतं श्रीरामचन्द्रं पर्यङ्के निवेश्य—
इत्यादि ज गु श्रीगगाधराचार्य प्रणीत अनन्यतावेदन दिव्य स्तोत्र तथा पुरुष सूक्त आदि को
पढता हुआ श्रीरामजी की प्रदक्षिणा तथा नमस्कार आदि से अच्छी तरह से पूजो करके श्रीसीताजी
के साथ भगवान् श्रीरामजी को पर्यंक मे सन्निवेश करके निम्न प्रकार से प्रार्थना करे—
पर्यङ्कासनमारुह्य सीतया सहितः प्रभो ? ।
निद्रां कुरुस्व भगवन् ? पार्षदैरभिरक्षितः ॥१॥
इति प्रार्थयन् निम्नाष्टकं गायन् शाययेत् ।
षडैश्वर्य परिपूर्ण सर्व समर्थ सर्वेश्वर श्रीरामजी ? स्वच्छस्फटिकसन्निभपर्यङ्कासन दिव्य पलंग
पर समारोहित होकर श्रीसीताजी के साथ श्रीहनुमदादिपार्षदो से अभिरक्षित होकर आराम करे यानी
सुखनिद्रा का अनुभव करे ॥१॥
इस प्रकार से प्रार्थना करते हुये निम्न श्रीरामदोलिकाशयनाष्टक का मधुर स्वर से गान करता
हुआ श्रीरामजी को सुलावे ।
माता गीत्वा स्वपुत्रं यदि शयनगतं संविधत्सोऽथ शेषिन ?
शेषत्वात्सात्म्यतत्वं गतवत इह मे कोशलाधीशजायाः ।
वात्सल्यातुल्यपात्रं स्वपिहि गुणगणोदारगीतेन गीतो
देहे सौधेऽतिशुद्धे भजनकलनतः स्वान्तदोलाऽधिशायी ।१।
पालने मे बालक माता का गीत सुनते सुनते सो जाते है अथवा गीत गाकर माता बच्चे
को सुलाती है ऐसा अनुभव है । इसलिये समस्त जगत का प्रयोजन होने के कारण हे शेषिन् !
मैं तथा श्रीकौशल्याजी दोनो का एक मात्र आपके अधीन होने से शेष रूप से अभेद होने के
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