रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकोनविंशप्रकाशः १९. ( २०१ )
नसुखदायक ॥ अबटैरैनटारयोमौरैनमारचोहौं हठिहारयोधरि-
शायक । रावणनहिंमारतदेवपुकारतहैंअतिआरतजग-
नायक ॥ ५० ॥
टी०-ज्यों धनुषगुण शैलशृंग सदृश रावण शिर हैं हंसवंशावलीसदृश श्वेत
छत्र हैं ॥ ४८ ॥ रिपुबल करिकै खंडित हैं रणपांडित्यादि जाके ऐसे जे लक्ष्मण
हैं ते भूलि रहे कहे आश्चर्ययुक्त है रहे हैं तासों मनसा, वाचा, कर्मणा, रावणसों
लरिबो तजिकै ॥ ४९ ॥ मैं तन औ मनसों लज्जित होत हौं ॥ ५० ॥
मू०-राम-छप्पै ॥ जेहिशरमधुमदमरदिमहासुरमर्दनकी-
न्हेंउ। मारेहुकर्कशनर्कशंखरुतिशंखजोलीन्हेंउ ॥ निष्कंटकसु-
ग्कटककरचोकैटभवपुखंड्यो । खरदूषणत्रिशिराकबंधतरुखं-
डविहंड्यो ॥ कुंभकर्णजयहिसंहरचोपलनप्रतिज्ञातेटरौं । तेहि
बाणप्राणदशकंठकेकंठदशौंखंडितकरौं ॥ ५१ ॥ दोहा ॥ रघु-
पतिपठयोआसुही, असुहरबुद्धिनिधान ॥ दशाशिरदशहूदिशन-
को, बलिदैआयोबान ॥ ५२ ॥ मदनमनोरमाछंद ॥ भुवभार-
हिसंयुतराकसकोगणजाइरसातलमैंअनुराग्यो । जगमैंजयश-
ब्दसमैतिहिकेशवराजबिभीषणकेशिरजाग्यो । यमदानवनंदि-
निकेसुखसोंमिलिकैसियकेहियकोदुखभाग्यो । सुरदुंदुभिसी
सँगजाशररामकोरावणकोशिरसाथहिलाग्यो ॥ ५३ ॥ मंदोद-
री-विजयछंद ॥ जीतिलियेदिगपालशचीकेउसासनदेवनदीस-
बसूकी । बासरहूनिशिदेवनकीनरदेवनकीरहेसंपतितूकी । ती-
निहुंलोकनकीतरुणीनकीबारीबंधीहुतौदंडदुहूकी । सेवतश्वा-
नशृगालसोरावणसोवतसेजपरेअबभूकी ॥ ५४ ॥
टी०-कर्कश ( कठोर ) तरुखंड [ समताल ] ॥ ५१ ॥ असुहर [ प्राणहर ]
॥ ५२ ॥ मयदानवनंदिनी [ मंदोदरी ] [ सहोक्ति अलंकार है ] ॥ ५३ ॥ सदा
रावणके भयसों स्वर्गसों भागे जे इन्द्र हैं तिनके विरहसों शची [ इंद्राणीके ] जे
उष्ण उसासहैं तिनसों देवनदी [ आकाशगंगा ] सब सूकी कहे सूखि गई ॥५४॥