राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
[ ४५ ]
सम्राट् कनिष्क का समय देते समय कल्हण लिखता है कि उस समय भगवान शाक्यसिंह का परि-
निर्वाण हुए १५० वर्ष हो गये थे । ( रा० १ : १७२ ) कल्हण की काल गणना इस समय से मिलायी
जाय तब भी ऐतिहासिक काल गणना की तुला पर ठीक नहीं उतरती है। कम-से-कम ४०० वर्षों का हेर-
फेर उसकी काल-गणना में हो जाता है । कल्हण ने तत्कालीन प्राप्य ऐतिहासिक सामग्रियों एवं जनश्रुतियों
के आधार पर अनुमान से समय दिया है । काल की ओर या तो कल्हण ने ध्यान नहीं दिया है अथवा
उसने जो कालक्रम दिया है और अब तक इतिहास से जो बातें सिद्ध होती हैं उनमें क्या दोष एवं त्रुटियाँ
हैं यह स्वतः विशेष अनुसंधान का विषय है। कल्हण की काल-गणना के अनुसार और अशोक की मान्यता
प्राप्त काल-गणना में शताब्दियों का अन्तर पड़ जाता है । हिरण्य एवं तोरमाण हूण थे परन्तु उन्हें कल्हण
ने गोनन्द की वंशावली से जोड़ा है ।
आश्चर्य है । कल्हण को ज्योतिष शास्त्र का ज्ञान था । उसने अपने अध्ययन के स्थान-स्थान पर
ज्योतिष सिद्धान्तों एवं काल गणना का उल्लेख किया है । तथापि उसकी काल गणना कैसे त्रुटिपूर्ण रह
गयी है इस पर अध्ययन अपेक्षित है। उक्त दोष के होते हुए भी यह स्वीकार करना पड़ेगा कि संस्कृत
साहित्य में कल्हण ने महाभारत काल से सुसंगत इतिहास उपस्थित किया है ।
राजतरंगिणी : राजतरंगिणी के तरंगों का तीन वर्गों में वर्गीकरण किया जा सकता है । श्री
स्टीन ने प्रथम वर्ग में तरंग एक, दो, तीन, द्वितीय वर्ग में तरंग चार तथा तृतीय वर्ग में पाँच, छ, सात
एवं आठ रखा है । श्री डाक्टर ए० एल० बैशम ने प्रथम वर्ग में तरंग एक, दो, तीन, द्वितीय वर्ग में तरंग
चार, पाँच, छ तथा तृतीय वर्ग में सात एवं आठ रखा है ।
श्री स्टीन का वर्गीकरण काल गणणानुसार है । चतुर्थ तरंग के उत्तरार्ध से कल्हण की काल गणना
क्रमबद्ध होती है । तरंग पंचम एवं षष्ठ का भाग गाथा एवं ऐतिहासिक दोनों कालों का मिश्रण है । सातवें
तथा आठवें तरंग की काल गणना सुनिश्चित है । श्री बैशम ने वर्गीकरण ऐतिहासिक तथ्य पर किया है ।
प्रथम वर्ग को वे परम्परा पर आधारित इतिहास कहते हैं । कल्हण ने इस काल के लिए कोई साक्ष्य उप-
स्थित नहीं किया है कि किस आधार पर उसका वर्णन सत्य माना जाय ! कल्हण ने कश्मीर के इतिहास का
जिससे महाभारत से किंचित् मात्र सम्बन्ध नहीं है गौरवपूर्ण पौराणिक घटनाओं के काल्पनिक समय से
सम्बन्ध स्थापित करने का प्रयास किया है ।
श्री बैशम द्वितीय वर्ग में तरंग चार, पाँच तथा छ अर्थात् कर्कोट एवं उत्पल वंश रखते हैं । इसे
कल्हण ने पूर्वकालीन इतिहासकारों के आधार पर लिखा है, जो घटनाओं अथवा राजाओं के समकालीन
थे । तृतीय वर्ग में श्री बैशम ने सप्तम तथा अष्टम तरंग रखा है । जिसका ज्ञान उसे प्रत्यक्षदर्शियों से
प्राप्त हुआ था । तरंग आठ का वह स्वयं प्रत्यक्षदर्शी था । दोनों ही वर्गीकरण काल एवं प्रमाण की दृष्टि से
उचित प्रतीत होते हैं ।
प्रथम तीन तरंग इस समय प्रतिपाद्य विषय हैं । सर्वश्री स्टीन तथा बैशम दोनों एक मत हैं कि
यह काल गाथा कालीन है । तरंग चार में पूर्वार्द्ध की अपेक्षा उत्तरार्द्ध में इतिहास की झलक अधिक मिलती
है । तरंग पाँच से इतिहास वर्णन आरम्भ होता है । यह काल राजा अवन्ति वर्मा ( सन् ८५५-८५६ ई० )
के समय से आरम्भ होता है । प्रथम तीन तरंग ऐतिहासिक सामग्री न होने के कारण छोटे हैं । परम्परा
एवं जनश्रुतियों पर आधारित हैं । कुछ पौराणिक गाथाओ पर आधारित हैं, और कुछ काल्पनिक हैं ।
[ ४४ ]
एवं अवसान के साथ ही साथ मुख्य घटनाओं का लौकिक सम्वत् देना आरम्भ करता है । तरंग सप्तम एवं
अष्टम् की काल गणना सर्वथा ठीक है । कल्हण शक सम्वत् १०७० तदनुसार लौकिक सम्वत् ४२२४
देता है । इससे लौकिक तथा शक सम्वत् की गणना मिल जाती है ।
आधुनिक सिद्धान्त है कि सप्तर्षि चलते नही। कल्हण कहता है कि युधिष्ठिर के शासन काल में मुनि
मघा नक्षत्र पर थे । सप्तर्षि एक शत वर्ष में मघा नक्षत्र पर आते हैं । ( रा० १ : ५३-५६ ) यह स्वतः
अध्ययन एवं अनुसन्धान का विषय है । कल्हण अपने इतिहास की रचना महाभारत कालीन गोनन्द प्रथम
के समय से आरम्भ करता है। कल्हण ने कलि तथा लौकिक सम्वतों का प्रयोग किया है। मालूम होता है
कि कल्हण ने अपनी काल गणना सुनिश्चित एवं स्थिर करने के लिए महाभारत काल अपनी काल सीमा
ग्रन्थ प्रारम्भ करने के लिए निर्धारित कर लिया था ।
महाभारत के पूर्व काश्मीर में क्या सम्वत् प्रचलित था पता नहीं चलता । कल्हण के समय में
कलि, लौकिक एवं शक तीनों सम्वत् प्रचलित थे । लौकिक सम्वत् को आधार मानकर यह काल-क्रमानुसार
इतिहास रचना आरम्भ करता है । एक मत है कि द्वापर के अन्त में महाभारत हुआ था । दूसरा मत है
कि कलियुग के ६५३ वर्ष पश्चात् महाभारत हुआ था । कलि सम्वत् के २५ वर्ष पश्चात् लौकिक सम्वत्
आरम्भ होता है ।
पुराकालीन लेखकों में कल्हण एक ऐसा महाकाव्यकार है जिसने राजाओ एवं घटनाओ के इतिवृत्त
के साथ सम्वत् वर्ष, मास एवं दिन दिया है । रामायण एवं महाभारत में संवत्सरों का प्रयोग नहीं किया
गया है । कल्हण का इस दिशा में भारतीय ही नहीं विश्व के इतिहास में महत्वपूर्ण योगदान है। शामी
अर्थात् सेमेटिक जाति इतिहास लिखने में निपुण मानी गयी है। परन्तु बाइबिल म जहाँ राजाओ का उल्लेख
किया गया है, वंशावली दी गयी है। यहाँ भी काल गणना नही की गयी है ।
राजतरंगिणी का इतिहास गोनन्द प्रथम से आरम्भ होता है। इस समय से कल्हण क्रमबद्ध इतिहास
लिखता है। कलि सम्वत् ६५३ तदनुसार लौकिक सम्वत् ६२८ होता है । गोनन्द प्रथम से अभिमन्यु प्रथम
का राज्य काल १२६६ वर्ष अर्थात् लौकिक सम्वत् ६२८ से १८६४ वर्ष तक होता है। इस काल में ३५
लुप्त राजाओं के अतिरिक्त कल्हण ०७ राजाओ का नाम तथा इतिहास देता है ।
गोनन्द वंश में गोनन्द तृतीय से युधिष्ठिर तक का राज्य काल १००२ वर्ष कल्हण देता है। वह
समय १८६४ से २८६६ लौकिक सम्वत् वर्ष होता है । इस काल में २१ राजाओं के इतिहास का संक्षिप्त
उल्लेख राजतरंगिणी में मिलता है । द्वितीय तरंग में ६ राजाओं का इतिहास है। उनका राज्य काल
१९२ वर्ष आता है। यह लौकिक सम्वत् २८९६ से ३०८८ तक होता है। तृतीय तरंग में १० राजाओ का
इतिहास है। उनका राज्य काल लौकिक सम्वत् ३०८८ से ३६७७ मध्य तक ५८६ वर्ष १० मास १ दिन
होता है । इससे केवल राजा रणादित्य का ही राज्य काल ३०० वर्ष दिया है जो स्पष्ट त्रुटिपूर्ण है। चौथे
तरंग कर्कोट वंश का काल लौकिक सम्वत् ३६७७ से ३९३१ अर्थात् २५४ वर्ष पाच मास सत्ताइस दिन
होता है । पंचम तरंग उत्पल वंश का आरम्भ राजा अवन्ति वर्मा लौकिक सम्वत् ३९३१ से होता है। इस
वंश के १५ राजाओ में ६ राजाओ के राज्याभिषेक का मास तथा दिन देता है। उनमें पाँच राजाओं का
सम्मिलित राज्य काल मिलाकर पाच वर्ष से अधिक नही होता । इस प्रकार पंचम, षष्ठ, सप्तम एवं अष्टम
तरंग के राजाओं का वर्ष, दिन मास तक देकर वह अपनी काल गणना सिद्ध करता है।
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सम्राट् कनिष्क का समय देते समय कल्हण लिखता है कि उस समय भगवान् शाक्यसिंह का परि-
निर्वाण हुए १५० वर्ष हो गये थे । ( रा० १ : १७२ ) कल्हण की काल गणना इस समय से मिलायी
जाय तब भी ऐतिहासिक काल गणना की तुला पर ठीक नही उतरती है। कम-से-कम ४०० वर्षों का हेर-
फेर उसकी काल-गणना में हो जाता है। कल्हण ने तत्कालीन प्राप्य ऐतिहासिक सामग्रियों एवं जनश्रुतियों
के आधार पर अनुमान से समय दिया है। काल की ओर या तो कल्हण ने ध्यान नहीं दिया है अथवा
उसने जो कालक्रम दिया है और अब तक इतिहास से जो बातें सिद्ध होती हैं उनमें क्या दोष एवं त्रुटियां
हैं यह स्वतः विशेष अनुसंधान का विषय है। कल्हण की काल-गणना के अनुसार और अशोक की मान्यता
प्राप्त काल-गणना में शताब्दियों का अन्तर पड़ जाता है । हिरण्य एवं तोरमाण हूण थे परन्तु उन्हें कल्हण
ने गोनन्द की वंशावली से जोड़ा है ।
आश्चर्य है । कल्हण को ज्योतिष शास्त्र का ज्ञान था । उसने अपने अध्ययन के स्थान-स्थान पर
ज्योतिष सिद्धान्तो एवं काल गणना का उल्लेख किया है । तथापि उसकी काल गणना कैसे त्रुटिपूर्ण रह
गयी है इस पर अध्ययन अपेक्षित है । उक्त दोष के होते हुए भी यह स्वीकार करना पड़ेगा कि संस्कृत
साहित्य में कल्हण ने महाभारत काल से सुसंगत इतिहास उपस्थित किया है ।
राजतरंगिणी : राजतरंगिणी के तरंगो का तीन वर्गों में वर्गीकरण किया जा सकता है । श्री
स्तीन ने प्रथम वर्ग में तरंग एक, दो, तीन, द्वितीय वर्ग में तरंग चार तथा तृतीय वर्ग में पाँच, छ, सात
एवं आठ रखा है । श्री डाक्टर ए० एल० बैशम ने प्रथम वर्ग में तरंग एक, दो, तीन; द्वितीय वर्ग में तरंग
चार, पाँच, छ तथा तृतीय वर्ग में सात एवं आठ रखा है ।
श्री स्तीन का वर्गीकरण काल गणनानुसार है । चतुर्थ तरंग के उत्तरार्ध से कल्हण की काल गणना
क्रमबद्ध होती है । तरंग पंचम एवं षष्ठ का भाग गाथा एवं ऐतिहासिक दोनो कालो का मिश्रण है । सातवें
तथा आठवें तरंग की काल गणना सुनिश्चित है । श्री बैशम ने वर्गीकरण ऐतिहासिक तथ्य पर किया है ।
प्रथम वर्ग को वे परम्परा पर आधारित इतिहास कहते हैं । कल्हण ने इस काल के लिए कोई साक्ष्य उप-
स्थित नहीं किया है कि किस आधार पर उसका वर्णन सत्य माना जाय । कल्हण ने कश्मीर के इतिहास का
जिससे महाभारत से किंचित मात्र सम्बन्ध नहीं है गौरवपूर्ण पौराणिक घटनाओं के काल्पनिक समय से
सम्बन्ध स्थापित करने का प्रयास किया है ।
श्री बैशम द्वितीय वर्ग में तरंग चार, पाँच तथा छ अर्थात् कर्कोट एवं उत्पल वंश रखते हैं । इसे
कल्हण ने पूर्वकालीन इतिहासकारों के आधार पर लिखा है, जो घटनाओं अथवा राजाओं के समकालीन
थे । तृतीय वर्ग में श्री बैशम ने सप्तम तथा अष्टम तरंग रखा है । जिसका ज्ञान उसे प्रत्यक्षदर्शियों से
प्राप्त हुआ था । तरंग आठ का वह स्वयं प्रत्यक्षदर्शी था । दोनों ही वर्गीकरण काल एवं प्रमाण की दृष्टि से
उचित प्रतीत होते हैं ।
प्रथम तीन तरंग इस समय प्रतिपाद्य विषय है । सर्वश्री स्तीन तथा बैशम दोनों एक .मत हैं कि
यह काल गाथा कालीन है । तरंग चार में पूर्वार्द्ध की अपेक्षा उत्तरार्द्ध में इतिहास की झलक अधिक मिलती
है । तरंग पाँच से इतिहास वर्णन आरम्भ होता है। यह काल राजा अवन्ति वर्मा ( सन् ८५५-८५६ ई० )
के समय से आरम्भ होता है । प्रथम तीन तरंग ऐतिहासिक सामग्री न होने के कारण छोटे है । परम्परा
एवं जनश्रुतियो पर आधारित है । कुछ पौराणिक गाथाओं पर आधारित हैं, और कुछ काल्पनिक हैं ।
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जैसे-जैसे तृतीय तरंग के पश्चात् कल्हण लिखता बढ़ता गया है वैसे-वैसे उसका इतिहास प्रामाणिक होता
गया है ।
प्रथम तीन तरंगों का वर्णन अस्पष्ट है । प्रणय कथानकों, असम्भव तिथियों एवं पौराणिक नामों को
निःसंकोच कल्हण ने लिया है । धार्मिक प्रवृत्ति होने के कारण पुराणों तथा उसकी गाथाओं में कल्हण का
अन्ध विश्वास था । पुराना विश्वास है कि काल अर्थात् कलि का काल द्वापर युग में लागू नहीं होता ।
अतएव कल्हण ने काल भी कलियुग के समय से आरम्भ किया है । कल्हण की शैली वैज्ञानिक है। उसने
अनुसंधान अर्थ ग्राह्य सामग्रियों को संग्रह कर अपना विचार एक स्फेयर की तरह स्वयं निश्चित किया है ।
ऐतिहासिक निष्कर्षों को उपस्थित करने में अपनी कला का अद्भुत परिचय दिया है ।
कल्हण पर पौराणिक प्रभाव होने का आक्षेप विद्वन् करते हैं । परन्तु यूनान जैसे देश में हिरोडोटस
तथा थूसाडाइम के अनुसार उस युग में भी जो यहाँ का स्वर्ण युग था, रण अभियान सूर्य तथा चन्द्र की
स्थिति से नियन्त्रित होता था । ग्रहण के कारण पोलो पेनिशियन युद्ध में यूनानी असफल हो गये थे ।
एनक्सा गोरस को एथेन्स की साधारण सभा ने इसलिये मृत्यु दण्ड दिया था कि सूर्य तथा चन्द्रमा यूनानी
कवियों की दृष्टि में देवता थे । ज्योतिष ज्ञान का प्रचार वजित था । सुकरात को इसलिये मृत्युदण्ड दिया
गया था कि वह देवी-देवताओं की पूजा में विश्वास न कर बुद्धिवादी था ।
कल्हण ने सम्राट् अशोक एवं कनिष्क जैसे महान् व्यक्तियों का अत्यन्त संक्षिप्त वर्णन किया है । इस
प्रकार हविष्क एवं जुविष्क का वर्णन किया गया है। इतिहास एवं पुराण में जैसे अन्तर नहीं किया गया
है । प्रारम्भिक वर्णन इतिहास की दृष्टि से अशुद्ध, अविश्वसनीय, कल्पना तथा जन-श्रुतियों पर आधारित
है । वह पुराण तुल्य पौराणिक शैली से लिया लगता है। इसमें कल्हण का दोष नहीं है। उसने रामायण,
महाभारत तथा पुराणों से सामग्रियां एकत्रित कर, काश्मीर के इतिहास को काल क्रमानुसार क्रमबद्ध करने
का स्तुत्य प्रयास किया है । साहित्यिक दृष्टि से इस काल में निहित वर्णन उपमा, अलंकार, विचित्र एवं
रोचक घटनाओं के संग्रह लगेंगे । वाण के हर्ष चरित के समान कल्हण ने भी दुर्लभ शब्दो का प्रयोग किया
है । तथापि किसी प्रकार के इतिहास के अभाव में कल्हण की राजतरंगिणी काश्मीर का आदर्श इतिहास
हो गयी है । यह अनुपम कृति है। दोषपूर्ण वास्तविक वैज्ञानिक इतिहास लिखने का यह अपनी शैली का
प्रथम प्रयास भारत में कहा जायगा ।
अनेक दोषों के होते हुए प्राचीन जगत इतिहास का आदर करने में पीछे नहीं था । भारतीय रचना-
कारों ने इतिहास-रचना की परम्परा स्थापित की थी । उनकी शैली तथा विचार अपना था । कल्हण की
रचना शैली से यह स्पष्ट प्रतीत होता है । समुद्र का ज्ञान भारतीयों के ऐतिहासिक ज्ञान का परिचायक
है, उसे पुरातन भारतीय जान चुके थे । कल्हण समुद्र का बहुत वर्णन करता है । भारतीयों की श्रेष्ठता
अन्य दिशाओं में बहुत बढ गयी थी । यदि उसका कोई अपवाद है तो कल्हण के आधार पर कहा जा सकता
है कि आधुनिक युग है ! पुरातन भारतीयों में सच्चे इतिहास का नितान्त अभाव नही था । उनके दृष्टिकोण
एवं बौद्धिक विकास में दोष नही था ।
भारत के इतिहास के अभाव में राज तरंगिणी को स्थानीय, लौकिक किंवा प्रदेशीय इतिहास कह
सकते हैं । भारतीय प्रवृत्ति की यह विशेषता है कि वह आध्यात्म की ओर अधिक झुकी थी । कहा जाता
है, विदेशी आक्रमणों के कारण राष्ट्रीय भावनायें उमड़ती हैं और शक्तिशाली इतिहास लिखने के लिए
अनुप्राणित करती हैं । भारत पर सिकन्दर के पूर्व विदेशी आक्रमण नहीं हुआ था। कभी कल्पना नही की
[ ४७ ]
यी थी कि राजविप्लव होगा। आक्रमणों के कारण व्यवस्था एवं राज-परम्परा अस्त-व्यस्त हो जायगी
हिन्दुस्तान में भारतीय धर्म के स्थान पर अन्य विदेशी धर्मों का प्राबल्य हो जायगा। उस समय इतिहास
लिखकर पूर्वकाल की स्मृति को सुरक्षित रखने का विचार नहीं उठा था।
यूनानी नगर राष्ट्र सर्वदा संघर्षशील थे। रोम का इतिहास सैनिक अभियानों का इतिहास है।
अतएव पश्चिम में इतिहास रखने एवं लिखने की विशेष रुचि हुई थी। कह सकते हैं, पश्चिम में नव-
जागरण के कारण आयी आधुनिकता से पूर्व कल्हण जैसा प्रतिभाशाली महान् ऐतिहासिक विश्व साहित्य
में अन्यत्र भी दुर्लभ है। उसे निःसन्देह पोलाइबियस तथा थुसाडाइड की पंक्ति में गौरव पूर्वक बैठाया जा
सकता है।
कल्हण के उद्धरणों से प्रतीत होता है कि काश्मीर में इतिहास लिखने की परम्परा प्राचीन-काल से
प्रचलित थी। यह परम्परा भारत के अन्य स्थानों में नहीं मिलती। काश्मीर ने अपनी एकाकी भौगोलिक
स्थिति के कारण अपना एक अलग व्यक्तित्व एवं चरित्र विकसित कर लिया था। अपने देश के गौरव तथा
इतिहास को लिपिबद्ध करने की भावना सर्वदा काश्मीर में जागरूक थी। इसका एक और कारण हो
सकता है। काश्मीर की सीमा पर लड़ाकू विदेशी राष्ट्र थे। काश्मीर का सम्बन्ध अन्य देशों से था। उनमें
इतिहास लिखने और रखने की भावना भारत की अपेक्षा अधिक जागरूक थी। सेमेटिक अर्थात् सामी जाति
के प्रभाव से प्रभावित होना असम्भव बात नहीं थी। अतएव काश्मीरियों ने भी अपने देश में इतिहास
लिखने की कल्पना की।
काश्मीर में संस्कृत साहित्य का यह एक मात्र इतिहास शेष रह गया था। जब कि मुसलिम काल
में सभी कुछ नष्ट कर दिया गया था। कौटिल्य के अर्थशास्त्र का अस्तित्व गत शताब्दी के पूर्व विश्व नहीं
जानता था। किन्तु राजतरंगिणी का अध्ययन, अध्यापन, अनुवाद उसके अस्तित्व काल से ही आरम्भ हो
गया था। उसके अस्तित्व से लोग परिचित थे। फिरदौसी के शाहनामा की तरह राजतरंगिणी गाथादि
का संकलन मात्र नहीं है। काश्मीर के हिन्दू और मुसलमान दोनों को अपने पूर्वजों का इतिहास होने के
कारण गर्व था और है।
राजतरंगिणी के अध्ययन का इतिहास : सन् ११५० ई० से अबतक राजतरंगिणी के लगभग
४९ अनुवादों तथा संस्करणों का पता लग सका है। ऐसी कोई शताब्दी नहीं व्यतीत हुई है, जिसमें तरं-
गिणी का कोई न कोई संस्करण अनुवाद अथवा प्रतिलिपि न की गयी हो। सन् ११५० से १३३९ ई०
का मध्यवर्ती काल काश्मीर का अत्यन्त संघर्षमय समय रहा है। उस समय यदि राजतरंगिणी पर कुछ
लिखा भी गया होगा तो पुरानी पुस्तकों के नष्ट करने तथा फूंकने के उन्माद में सिकन्दर बुत शिकन के
समय में अपना अस्तित्व लुप्त कर चुका है। सन् १३३९ ई० में मुसलिम शासन काश्मीर में स्थापित हुआ।
उस समय से जैनुल आब्दीन के काल सन् १४४६ ई० तक का समय काश्मीर के लिए अत्यन्त
उथल-पथल का रहा है। काश्मीर की जनता केवल ११ घरों को छोड़कर मुसलिम धर्म स्वीकार कर चुकी
थी। मन्दिर, मठ, जनाथय, शाला, विद्या वेश्म तथा विहार ध्वंशावशेष रह गये थे। पुस्तकें नष्ट की जा
चुकी थी। जैनुल आब्दीन (सन् १४४६-१४७२ ई०) के समय श्री जोनराज ने कल्हण के कार्य को
अपने समय तक लाकर अपनी राजतरंगिणी लिखी।
जोनराज के पूर्व अथवा उसका समकालीन मुल्ला अहमद था। उसने जैनुल आब्दीन के आदेश
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[ ४९ ]
सो. कलकत्ता ने प्रकाशित किया। श्री एम. ए. ट्रोयर ने (सन् १८४०-१८४२ ई०) में राजतरंगिणी का
फ्रेन्च अनुवाद तीन भागों में किया। बहाउद्दीन ने सन् १८४८ में लबुल तवारीख लिखा। श्री दीवान कृपा-
राम ने सन् १८७१ में गुलजार-ए. काश्मीर की रचना की। चारो राजतरंगिणियों का अंग्रेजी में सारानुवाद
श्री जोगेशचन्द्र दत्त ने किंग्स आफ काश्मीर के नाम से सन् १८७६ में किया। श्री हर गोपाल खस्ता ने
गुलदस्तये काश्मीर लिखा। श्री मुल्ला अतुल नवी ने सन् १८८४ में वजीबुल तवारीख लिखा।
राजतरंगिणी के पाठों के शुद्धीकरण तथा प्रकाशन का कार्य महामहोपाध्याय दुर्गा प्रसाद ने सन्
१८९२ ई० में किया। राज तरंगिणी मूल तीन भागों में प्रकाशित की गयी। वैज्ञानिक शैली से अध्ययन
तथा शोध का कार्य श्री स्टीन ने किया है। सन् १८९२ ई० में उन्होंने मूल संस्कृत का पाठशोधन कर मुद्रित
करवाया। इसका पुनर्मुद्रण सन् १९६० में हुआ है। पीर गुलाम हसन खुरहमी ने सन् १८९८ ई० में तारीख
लिखा जो हसन की तारीख के नाम से प्रसिद्ध है। इसका उर्दू अनुवाद श्रीनगर से प्रकाशित हो चुका है। श्री
स्टीन का प्रसिद्ध ऐतिहासिक अंग्रेजी अनुवाद सटिप्पण प्रथम बार सन् १९०० ई० में प्रकाशित हुआ था।
श्री गोविन्द कौल ने राज तरंगिणी वर्णित स्थानों का पता लगाया था। श्री स्टीन ने उनकी सहायता से शेष
स्थानों का और पता लगाया। इसका पुनर्मुद्रण सन् १९६१ में मोती लाल बनारसी दास, दिल्ली के यहाँ से
हुआ है। श्री निवारण चन्द्र विद्यारत्न ने सन् १९०४ ई०. में संस्कृत से बंगला अनुवाद कर प्रकाशित किया।
सन् १९१० ई० में प्रथम तरंग से छठवें तरंग का बंगाली लिपि में मूल तथा अनुवाद हितवादी तथा मनो-
रंजन कलकत्ता से बंगला संवत् १३१७ में प्रकाशित हुआ। इसमें अनुवादक का नाम नहीं दिया गया है।
सातवें तरंग का अनुवाद बंगला में दुर्गानाथ शास्त्री ने सन् १९११ ई० बंगला संवत् १९१८ में किया।
आठवें तरंग का बंगला अनुवाद सर्व श्री राम चरन तथा दुर्गानाथ शास्त्री ने सन् १९१२ ई० में चटगांव
निवासी हीरा लाल चट्टोपाध्याय ने कल्हण की राज तरंगिणी का अनुवाद बंगला में प्रकाशित किया। इसका
अनुवाद श्लोकानुसार नहीं है। एक मत है कि वह जोगेश चन्द्रदत्त के अंग्रेजी अनुवाद पर आधारित है।
सन् १९२९ में श्री माधव वेंकटेश लेले श्री स्टीन के अनुवाद के आधार पर मराठी में अनुवाद पूना
से प्रकाशित किया। श्री रणजीत सीताराम पण्डित ने आठो तरंग का अंग्रेजी अनुवाद सन् १९३५ में
किया। इसका पुनर्मुद्रण सन् १९६८ में हो गया है। श्री विश्वबन्धु शास्त्री ने सर्वश्री भीम देव, के. एम.
रामास्वामी शास्त्री तथा ए. भास्करम् नायर के सहयोग से सम्पादित कर प्रथम से सप्तम तरंग मूल, पाठभेद
के सहित प्रथम खण्ड सन् १९६३ ई० में विश्वेश्वरानन्द वैदिक शोध संस्थान से प्रकाशित किया। वही पाठ
प्रस्तुत ग्रन्थ का रखा गया है। इसका दूसरा खण्ड अर्थात् आठवां तरंग वहीं से प्रकाशित किया गया है।
श्री गोपी कृष्ण शास्त्री ने सन् १९४१ ई० में प्रथम से सात तरंगो का हिन्दी अनुवाद किया है। यह अनु-
वाद काशी से प्रकाशित हुआ है। सन् १९६० में श्री राम तेज शास्त्री पण्डित पुस्तकालय, काशी ने मूल के
साथ हिन्दी अनुवाद प्रकाशित किया। श्री नीलम अग्रवाल ने हिन्दी अनुवाद सन् १९६८ ई० में किया है। सन्
१९६९ ई० इस लेखक ने काश्मीर कीर्तिकलश शीर्षक प्रथम से तीन तरंगों का अनुवाद किया है। नेशनल
पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली ने इसे प्रकाशित किया है। द्वितीय खण्ड तरंग ४ से ७ का हिन्दी अनुवाद भी
मुद्रण की स्थिति में है। अन्य सभी ग्रन्थों का आधार एक भाग कल्हण की राजतरंगिणी है। इस प्रकार
गत ९ शताब्दियों से राज तरंगिणी का अध्ययन, अध्यापन एवं लेखन कभी बन्द नहीं हुआ है और जबतक
इतिहास की ओर जगत् की रुचि रहेगी कभी बन्द नहीं होगा।
शुद्ध-पाठ
पृष्ठ शुद्ध पाठ अशुद्ध पाठ पृष्ठ शुद्ध पाठ अशुद्ध पाठ
४३ जलोद्भवम् जलोत्भवम् ४४० ययो ययो
७४ भेदाग्रैः भेदगिरेः ४६८ येष्टिताः वेष्टिता
८३ तिलांशोऽपि तिलाधोऽपि ४८५ शमं सम
९१ कौरव कौरष ५०७ यितुं यितु
१०९ विवाहोरुका विवाहात्का ५११ ऽधिनः ऽयिनः
११३ रङ्कूरं रफ्फूरं ५१४ निर्गर्वः निगर्वः
१२४ धुर्य्यः भूर्यः ५१९ ददर्शाग्रे ददाशग्रे
१७८ योषित्छिरो योषिच्छिरो ५२३ द्रुतम् द्रतम्
१८० वार बार ५२६ प्राहिणोत् प्राणिणात्
१८६ संस्पर्धा संस्पधं ५३१ आचख्यावश्व आचख्यावश्च
१९१ संशयम् सद्ययम् ५३२ गणोऽयं गणेऽयं
१९४ क्रोधा क्रोपा ५४० भवादृशैः भवादृशोः
२२३ दृष्ट्वैना दृष्ट्वनां ५४२ गृह्णातु गृह्णतु
२५४ देशं देश ५४२ सर्वमोचित्यं सर्वमोचित्य
२६९ सरलात्मना सरलात्मनः ५४६ शीर्णं शीण
३३४ जलौघो जलौघा ५४९ नामाङ्क मामाङ्क
३६५ वकेशं, वकश्वभ्रे, वकेशं, वकश्वभ्रे ५५१ दुर्लभम् दुलभम्
बकवत्यापगां बकवत्यापगा ५५१ सेतुमेतं सेतुमेत
३४३ द्विजाः द्विजः ५६४ जयन्ताख्यो जयन्ताख्या
४०६ राज्यग्नि राज्ञयग्नि ५७७ पस्पशाङ्गेषु प्रस्पशाङ्गेषु
४१० तावदन्यक्तं तावद्यक्तं ५७९ तं त
४३० कुम्भाम्भः कुम्भाम्भ ५७९ शान्तोत्सुक्याः शान्तोन्मुख्या
४३१ सर्वतोऽद्यपि सर्वतोद्य।ऽपि ५९८ कालम्ब्याख्यो कालम्बाख्यो
कश्मीर का इतिहास
अथ
श्रीकल्हणकृतायां राजतरङ्गिण्याम्
प्रथमस्तरङ्गः
श्रीगणेशाय नमः १
भूषाभोगिफणारत्नरोचिस्सिचयचारवे ।
मङ्गलाचरण
नमः प्रलीनमुक्ताय हरकल्पमहीरुहे ॥ १ ॥
१. उन भगवान् शिव२ को नमस्कार है जो सर्पों के आभूषण से आभूषित हैं; जिनका
शरीर सर्पों के फणों में स्थित रत्नों की दीप्ति द्वारा प्रदीप्त है। जो कल्पतरु स्वरूप हैं, और
जिनमें मुक्त जन प्रलीन ३ होते हैं।
पाठ भेदः
जाता है, तो उसका अर्थ पवित्र किंवा शुभ
श्रीगणेशाय नमः ; ओं श्रीकृष्णाय नमः ; ओं सौभाग्यशाली, भाग्यवान्, पूजनीय तथा महाभाग
सरस्वत्यै; आं श्रीगणेशाय नम. ; ओ नमोः समझा जाता है ।
नारायणाय ; ओम् , ओं भगवते वासुदेवाय; !'
ओं स्वस्ति ; अथ राजतरंगिणी आदि पाठों का भेद
मिलता है ।
गणेश के नाम आदि की विस्तृत व्याख्या
गणेश पुराण स्वयं करता है । वेद में गणपति
वाराणसी, पूना, इण्डिया आफिस लाइब्रेरी
शब्द मिलता है 'गणाना त्वा गणपति'—ऋग्वेद
तथा श्रीनगर की पाण्डुलिपियों में श्रीगणेशाय नम.
२:२३:१ । गणपति किंवा गणेश शब्द का अर्थ
मिलता है ।
गणों का अध्यक्ष अथवा लोकतंत्र का राष्ट्रपति
प्रथम श्लोक के शब्द 'भूषाभोगि' का पाठ-
लगाया जाता है । भारत गणतंत्र है । गण का
भेद 'भूषाहीन', 'मुक्ताय' का 'मुकुटा' तथा 'हर'
पति अथवा राजा, गणपति, गणेश, शाब्दिक
का 'पुरा' मिलता है ।
अर्थ से ठीक है । प्राचीन काल से गण राज्यों
के अधिपति को गणेश किंवा गणपति कहते थे ।
पादटिप्पणियाँ :
भारत में प्रचलित राष्ट्रपति शब्द में गणपति किंवा
१. (१) श्री गणेशाय नमः--कल्हण सनातन
गणेश का भाव आ जाता है । गणेश का नाम
काव्य रचना एवं कवि परंपरा का अनुकरण करता
ज्येष्ठराज भी है । महाभारत लिखने के समय
हुआ, राजतरंगिणी का प्रारंभ 'श्री गणेशाय नमः'
व्यास ने गणेश को अपना लिपिक बनाया था ।
से करता है। श्री शब्द जब नाम के साथ लगाया
२ राजतरङ्गिणी
गणेश का विद्वान् तथा पंडित और गोबर गणेश
का अर्थ मूर्ख के लिये कालान्तर में जाने लगा है।
संत ज्ञानेश्वर ने अपनी गीता की टीका के प्रथम
चरण में ही गणेश का बहुत सुंदर रूपक बाँधा है।
गणेश बुद्धि के अधिदेवता हैं। विघ्नविनाशक
तथा मंगलमूर्ति माने जाते हैं। इनकी मूर्तियों में
'नाग' यज्ञोपवीत देखा जाता है। अतः नाग जाति
से इनको किसी न किसी रूप से जोड़ा जा
सकता है। उनका विशाल मस्तक हाथी का मुख
स्वरूप, हाथों में परशु, पाश, माला तथा पुस्तक
हैं। लंबोदर अर्थात् पेट तुंदिल दिखाया जाता है।
अग्नि-सोम—मीठा लड्डू उन्हें प्रिय है। यह
उनकी माधुर्यप्रियता का परिचायक है। इसलिये
उन्हें ढुंढिराज कहा जाता है। उनकी पत्नियां
ऋद्धि तथा सिद्धि हैं। कही कही इनकी पत्नी
बुद्धि के होने का वर्णन मिलता है। शिव पार्वती
की संतान गणेश हैं। शिव पार्वती के संमिलित
रूप की कल्पना अर्धनारीश्वर है। शिव उसमें
अग्नि स्वरूप तथा पार्वती सोम हैं। अग्नि में
सोम की आहुति डालने का नाम यज्ञ है। अग्नि
अंश से कुमार किंवा स्कंद तथा सोम अंश से गणेश
अपने पिता-माता शिव-पार्वती के पुत्र कहे गए हैं।
(२) हर—कश्मीर में शैव मत, शैव
सिद्धांत आदि का व्यापक प्रचार था। कश्मीरी
अपने को शिव भक्त कहते हैं। शिव को विश्वात्मा
के रूप में देखते हैं। उनकी एकांत कामना शिव
में सायुज्य प्राप्त करने की होती है। यह भावना
कश्मीरी पंडितों में रूढ हो गई है।
शिव का रुद्र प्राथमिक रूप है। यह प्राकृतिक
शक्ति का द्योतक है। शैव दर्शन विकसित होकर
सभी देवताओं को अपने में मिलाता कालान्तर में
बहुदेववादी धार्मिक सिद्धांत के स्थान पर एकेश्वर-
वाद में परिणत हो जाता है। वह बुद्ध के आचार
किंवा नैतिक दर्शन का स्थान भी ले लेता है।
हलाहल विषपान करने के कारण उनका कंठस्थान
नीला पड़ गया है। अतएव उनका एक नाम
नीलकंठ हो गया।
शिव का नाम त्रिनेत्र है। उनका तृतीय नेत्र
भाल पर दोनों भ्रूके मध्य में है। उनका तृतीय नेत्र
खुलता है। सब कुछ भस्म हो जाता है। इसी
नेत्र के खुलने के कारण काम भस्म हो गया।
उसका नाम अनंग पड़ा। इस त्रिनेत्र रूपक की
एक और व्याख्या की जा सकती है। शिव योगी
हैं। योग सिद्धांत उनसे प्रारंभ होता है। यह
दृष्टि भ्रू मध्य होती है। यहाँ योनि मुद्रा करने पर
साधारण साधक को भी प्रकाश दिखाई पड़ता है।
दृष्टि यहाँ स्थिर होने पर ज्ञानचक्षु खुलते हैं।
ज्ञानचक्षु के खुलने पर मायाजाल, बंधन तथा
सांसारिक व्यवधान ज्ञानाग्नि में भस्म हो जाते हैं।
अतएव शिव को त्रिनेत्र उनके योगी होने के कारण
कहा गया है।
शिव के शरीर पर विषधर सर्पादि आभूषण हैं।
भूतप्रेत अनेक योगिनियाँ आदि उन्हें घेरे रहती
हैं। योगों पर विष का प्रभाव नहीं पड़ता।
उस पर अदृश्य कही जानेवाली शक्तियों का प्रभाव
नहीं पड़ता। उसे योगिनियाँ अर्थात् नारी का
सुंदर रूप मोह नहीं सकता। पिशाचिनियाँ अर्थात्
नारी के विकृत रूप से वह भय भीत नहीं हो सकता।
सब स्थानों में वह समरूप रहता है। यह है मुक्ता-
वस्था। यही मुक्ति है। इस अवस्था के प्राप्त करने
पर शिव में सायुज्य हो जाता है।
(३) प्रलीन = विशेषण भूषाभोग तथा प्रलीन
दोनों शब्दों का प्रयोग शिव तथा कल्पतरु के लिये
किया जाता है। प्रलीन यहाँ शिव के साथ सायुज्य
के अर्थ में आया है। सालोक्य तथा सायुज्य में
अन्तर है। सालोक्य का अर्थ है शिव के लोक की
प्राप्ति। सायुज्य माने होता है स्वयं शिव में मिलकर
एक हो जाना। बाण के हर्षचरित में (१.१)
इसी प्रकार की शब्दावली का प्रयोग किया गया है।
प्रथम तरङ्ग ३
भालं वह्निशिखाङ्कितं दधदधिश्रोत्रं वहन् संभृत-
क्रीडत्कुण्डलिजृम्भितं जलधिजच्छायाऽच्छकण्ठच्छविः ।
वक्षो बिभ्रदहीनकञ्चुकचितं यद्वाङ्गनाऽर्धस्य वो
भागः पुङ्गवलक्ष्मणोऽस्तु यशसे वामोऽथवा दक्षिणः ॥ २ ॥
२. जिनका वामांग नारी (पार्वती का) है। जिनका ललाट केसर तिलक से सुशोभित है।
जिनके कानों में दोलायमान कुण्डल क्रीड़ा करते हैं। जिनका कंठ शंख वर्ण उज्ज्वल है। जिनके
वक्षस्थल का दक्षिणांग नर (शिव' का) है। जिनके भाल पर वह्निशिखा अंकित है।
जिनके कानों के निकट केलित सर्पवृंद मुख खोलते रहते हैं। जिनके कंठ की छवि
विषपान करने के कारण मलिन नहीं होकर कांतिपूर्ण है। जिनका वक्षस्थल शेषनाग
कवच से वेष्टित है। वे अर्धनारीश्वर वृषभध्वज, चाहे दक्षिण अथवा वाम अंग हो, आपका
कल्याण करें।
वन्द्यः कोऽपि सुधास्यन्दाऽऽस्कन्दी स सुकवेर्गुणः ।
येन याति यशःकायः स्थैर्यं स्वस्य परस्य च ॥ ३ ॥
३. सुधा'धारा को भी मात करनेवाले सुकवियों का गुण वंदनीय है; जिनके कारण उनकी
तथा दूसरों की यशःकाया स्थिर हो जाती है।
कोऽन्यः कालमतिक्रान्तं नेतुं प्रत्यक्षतां क्षमः ।
प्राक्कथन कविप्रजापतींस्त्यक्त्वा रम्यनिर्माणशालिनः ॥ ४ ॥
४. प्रजा'पति के समान रम्य निर्माणशील कवियों के अतिरिक्त और किसमें इतनी क्षमता
है, जो भूतकाल की बातें प्रत्यक्ष मूर्तिमान आँखों के संमुख उपस्थित कर सके।
पाठभेदः
श्लोक संख्या दो में 'सम्भृत' का पाठभेद
'सम्भूत' 'जृम्भितं' का 'जुम्भित' मिलता है।
पादटिप्पणियाँ
२. (१) शिव—शिव की यहाँ वंदना अर्द्धनारीश्वर
के रूप में की गई है। शिव का दक्षिण अंग शिव
तथा वाम अंग पार्वती का माना जाता है।
पाठभेदः
श्लोक संख्या ३ में 'सुधा' का 'स्वधा' और
'येन' का 'येना' मिलता है ॥ ३ ॥
पादटिप्पणियाँ
३. (१) सुधा—सुधा अर्थात् अमृत पान करनेवाला
ही अमृतत्व प्राप्त करता है। यदि कोई अन्य
व्यक्ति अमृत पान करे तो उसका फल अपने को
नहीं मिल सकता। किंतु कवि अपने काव्यामृत
एवं लेखनी द्वारा अमर होकर, जिसके विषय में
अपनी लेखनी उठाता है, उसको भी उसके यश-
वर्णन द्वारा अमर बना देता है। काया अस्थिर है।
उसका नाश होता है। परंतु यशःकाया अपने यश
के कारण स्थिर हो जाती है। यदि वाल्मीकि कवि
नही होते, तो, राम की कथा और उनका यश कैसे
आज तक स्थिर रहता ?
पाठभेदः
श्लोक संख्या ४ में 'पती' का पाठभेद 'पती'
मिलता है ॥ ४ ॥
४ राजतरङ्गिणी
न पश्येत्सर्वसंवेद्यान् भावान् प्रतिभया यदि ।
तदन्यद्दिव्यदृष्टित्वे किमिव ज्ञापकं कवेः ॥ ५ ॥
५. यदि कवि में सर्व संवेद्य भावों के प्रकट करने की प्रतिभा न होती तो और किस प्रकार
माना जा सकता था कि उन्हें दिव्य दृष्टि प्राप्त है।
कथादैर्घ्यानुरोधेन वैचित्र्येऽप्यप्रपञ्चिते ।
तदत्र किंचिदस्त्येव वस्तु यत् प्रीतये सताम् ॥ ६ ॥
६. विचित्र घटनावलियों का विस्तृत समावेश कथा विस्तार के कारण इसमे नहीं किया
जा सका है, तथापि सत्पुरुषों को यत्र तत्र किंचित् रुचिकर कथानक भी मिलेंगे।
श्लाघ्यः स एव गुणवान् रागद्वेषबहिष्कृता ।
भूतार्थकथने यस्य स्थेयस्येव सरस्वती ॥ ७ ॥
७. वही गुणवान् श्लाघनीय है जिसकी वाणी राग-द्वेषों का बहिष्कार कर एक न्यायमूर्ति
के समान भूतकालीन घटनावलियों को यथार्थ रूप से प्रस्तुत करती है।
पादटिप्पणियाँ
४. (१) प्रजापति—सृष्टि के सर्जक परम पितामह
ब्रह्मा के लिये प्रजापति शब्द का प्रयोग किया गया
है । सृष्टि के सर्जन काल मे ब्रह्मा ने १० लोक-
कर्ताओ को उत्पन्न किया था । अ० वेद : ३:१०:
१३, ४.२५ १; ८:१ १७, ९ १:२४, ३०:७:७,
वाजसनेयि संहिता माध्यदिन शाखा : ८:३६, शतपथ
ब्राह्मण १.४:२१, तैत्तिरीय ब्राह्मण २:२ १०, मत्स्य
पुराण १:१ २५, प्रजापति की परिभाषा करता है—
'विश्वेप्रजाना पतयो येभ्यो लोका विनि सृताः' ।
वेद में प्रजापति शब्द प्रजापालक, सविता, अग्नि,
आदि देवो के लिये भी आया है। ऋग्वेद ४.५५:२,
६:५६, १०:८५.४३, अथर्ववेद; १० १.२१ ।
प्रजापतियो की संख्या कितनी थी, इस संबंध में
मतैक्य नही है । कहीं ७, कही ११, कही १३, कही
१४ और कहीं २१ संख्या उनको दी गई है। महा-
भारत मे २१ प्रजापतियों का उल्लेख मिलता है । यह
संख्या सबसे अधिक—ब्रह्मा, रुद्र, मनु, दक्ष, भृगु,
धर्म, तप, यम, मरीचि, अंगिरा, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह,
क्रतु, वसिष्ठ, परमेष्ठी, सूर्य, चन्द्रामा, कर्दभ, क्रोध
और विक्रीत, महाभारत में दी गई है । (आदि पर्व
१:२९, ३३; ३१.२६ २१; शांति पर्व ३३४:१५,
२७) । निम्नलिखित प्रजापतियों के नाम सभी
तालिकाओ मे पाए जाते है—मरीचि, अत्रि, अंगिरस,
पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, दक्ष, वशिष्ठ, भृगु, नारद ।
पाठभेद:
श्लोक संख्या ५ मे 'दन्यद्दिव्य' का पाठभेद
'दन्यदिव्य' मिलता है ॥ ५ ॥
श्लोक संख्या ६ मे 'चित्ये' का 'चित्यै',
'तदत्र' का 'तन्मात्र' तथा 'दस्त्येव' का पाठभेद
'दस्त्यत्र' मिलता है ।
श्लोक संख्या ७ में 'कृता' का पाठभेद
'ष्कृत:' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
७. (१) स्थेय—कल्हण ने स्थेय शब्द का प्रयोग
न्यायाधीश, न्यायकर्ता के अर्थ मे किया है । उसने
अपने को न्याय दृष्टि से एक न्यायकर्ता की तरह
परिस्थितियो के बीच रखा है । प्राचीन प्राप्त पुस्तकोँ,
अप्राप्य ग्रंथों के उद्धरणो, सभी प्रकार की ऐतिहासिक
सामग्रियो का निरीक्षण, अवलोकन तथा विवेक तुला
पर एक न्यायकर्ता की तरह तोलकर अपने मत तथा
विचार को राजतरंगिणी मे लिपिबद्ध किया है ।
प्रथम तरङ्ग ५
पूर्वैर्बद्धं कथावस्तु मयि भूयो निबध्नति ।
प्रयोजनमनाकर्ण्य वैमुख्यं नोचितं सताम् ॥ ८ ॥
८. पूर्वकालीन रचनाकारों द्वारा जो कथा वस्तुएँ निबद्ध कर दी गई हैं। उनका मैं क्यों
पुनर्लेखन कर रहा हूँ, इस प्रयोजन के हेतु को बिना समझे सत्पुरुषों का मुझसे विमुख
होना उचित नहीं है ।
दृष्टं दृष्टं नृपोदन्तं बद्ध्वा प्रमयमीयुषाम् ।
अर्वाक्काळभवैर्वार्ता तत्प्रबन्धेषु पूर्यते ॥ ६ ॥
९. जिन लेखको ने अपने समय के 'नृपों का इतिहास' लिपिबद्ध किया है, उनके पश्चात्
अर्वाचीन काल के कवि के लिये और क्या ऐसी बातें शेष रह गई हैं, जो अपने नूतन
प्रबंध के कारण पूर्ण करेंगे ?
दाक्ष्यं कियदिदं तस्मादस्मिन् भूतार्थवर्णने ।
सर्वप्रकारं स्खलिते योजनाय ममोद्यमः ॥ १० ॥
१०. अतएव इस ग्रन्थ के लिखने की मेरी योजना यह है कि मैं सर्वांगीण पूर्ण क्रमबद्ध इतिहास
उपस्थित करूँ। जहाँ पुरातन इतिहास लेखकों की रचनाएं विश्रृंखलित हैं ।
[बायाँ स्तम्भ]
पाठभेदः
श्लोक संख्या ८ में 'मुख्यम्' का पाठभेद 'मुख'
मिलता है। श्लोक संख्या ९ तथा १० युग्मक हैं।
श्लोक संख्या ६ में 'बद्ध्वा' का पाठभेद 'बद्धा'
( 'बुद्ध्वा' ) तथा 'प्रमय' का 'प्रथम' मिलता है।
श्लोक संख्या १० में 'कारं' का 'कार'
पाठभेद मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ
९. (१) नृप—अमरकोशकार ने राजा के सात
नाम दिए हैं—(१) राजन् ( २ ) राट्, (३)
पार्थिव, (४) क्ष्माभृत्, (५) नृप, (६) भूप
और (७) महीक्षित् ।-क्षत्रिय वर्ग ८:१।
नृप का शाब्दिक अर्थ होता है 'मनुष्यों की रक्षा
करनेवाला।' राजा तथा नृप के अर्थों में किंचित् भेद
है। कल्हण ने यहाँ भूपति, राजा, महीपालादि शब्दो
का प्रयोग नहीं किया है। वैदिक साहित्य में भी यह
इसी अर्थ मे प्रयुक्त हुआ है। ऋग्वेदः २:१:१७,
४:२०:१, ७:६ ९:१, १०:४४: २-३; अथर्ववेद
५:१८:१-१५; तैत्तिरीय आरण्यक : ६:३:३ ।
[दायाँ स्तम्भ]
(२) इतिहास प्रयोजन—कल्हण अपने पूर्व
लेखको के इतिहास क्रम को जारी रखना चाहता
है। उसके इस कथन का अर्थ यह है कि
इतिहास लिखने की प्राचीन परंपराएँ रही है।
यदि आज भारतीय इतिहास ग्रंथ उपलब्ध नहीं
हो रहे है, तो इसका अर्थ यह न लगाया जाए
कि भारत में इतिहास लिखने की परंपरा थी ही
नहीं। कल्हण का यह संकेत स्पष्ट है कि वह
इतिहास लेखको की परंपरा को जारी रखना
चाहता है, ताकि अपने समय तक के राजाओं का
इतिहास जहाँ तक पूर्वलेखक लिख चुके हैं, उनमें
जोड़कर टूटी श्रृंखला के इतिहास के टूटे क्रम को
पुनः क्रमबद्ध कर दिया जाय ।
राजतरंगिणी नाम कल्हण के उर्वर
मस्तिष्क की मौलिक उपज है। उसके पूर्व ग्रंथ
नृप तथा राजाओ के नाम से संबंधित थे। उनका
नाम ग्रंथ के उद्देश्य का बोधक हो जाता था।
परंतु राजतरंगिणी एक ऐसा नाम है जो राजा
६ राजतरङ्गिणी
और सरित् किंवा तरंगिणी का मेल नहीं
खिलता। राजा मनुष्य है। तरंगिणी एक नदी
है। वह प्रकृति की देन जड पदार्थ है। कल्हण
ने राजाओं के चरित्र किंवा इतिहास का नूतन
नामकरण राजतरंगिणी नाम से किया है। कल्हण
के पश्चात् आनेवाले इतिहास लेखकों ने इस
नाम को अपनाया है। काश्मीर के इतिहास को
कल्हण के पश्चात् लिखकर इतिहास शृंखला को
कायम रखा है - जोनराज, श्रीवर तथा शुक
आदि सन् ११४८ से १५५६ ई० तक अर्थात्
मुगल काल के प्रारंभ तक कल्हण के पश्चात्
राजतरंगिणी लिखकर कल्हण द्वारा आरंभ किए
महाप्रयास को आनेवाली चार शताब्दियों तक जारी
रखा। इस तरंगिणी की धारा को सूखने नहीं दिया।
तरंगिणी अर्थात् नदी की धारा अविच्छिन्न
गति से बहती रहती है। तरंगिणी का पेटा एक सा
रहता है। परंतु उसमें सर्वदा नवीन जल आता
रहता है। प्रवाह के साथ बहकर गया जल पुन
लौटकर नहीं आता। तथापि धारा की गति
तथा जलस्रोत की शृंखला टूटती नहीं।
तरंगिणी के समान देश में राजा आते रहते
हैं जाते रहते हैं परंतु राज्य सिंहासन खाली
नहीं रहता। देश में नदी की धारा की तरह
राजपरंपरा अनवरत गति से अविशृंखल
क्रम से चलती रहती है। राज्य के शासन का
क्रम टूटता नहीं। राजा मरने के साथ ही दूसरे
व्यक्ति के रूप में जीता रहता है। इंग्लैंड के
राजा के जीवन, अभिषेक तथा मृत्यु के समय -
भगवान् राजा की रक्षा करे, राजा चिरंजीवी हो -
कहा जाता है। अर्थात् देश का राजा नहीं मरता,
बल्कि देश में राजा पदवीधारी व्यक्ति मरता है।
नदी के जलबिंदुओं के समान राजपरंपरा काल
प्रभाव के साथ चलती रहती है। उसमें जल
बिन्दुओं के तुल्य नामधारी राजा आते रहते हैं।
प्रवाह के साथ बह जाते हैं। उनके पीछे पुनः जल-
बिंदु आकर प्रवाह को पूर्ववद् जारी रखते हैं।
राज सिंहासन नदी के पेटा के समान है।
वहाँ राजा तुल्य जलबिंदु आते हैं और चले जाते
हैं। राज्य सिंहासन नदी के पेटा के समान कभी
जलतुल्य राजा से विहीन नहीं होता। राज्य तथा
शासन का क्रम नहीं टूटता। सिंहासन पर नदी
में आते नवीन जल के समान राजाओं की परंपरा
आती रहती है। यह प्रवाह कभी सूखता नहीं।
अनादिकाल से चला आया है। चला जायगा।
हमारा रहना और न रहना महत्त्वहीन है। नदी
प्रकृति के उषाकाल से जल बहाती समुद्र में मिलने
चली जा रही है। राजा सभ्यता के उदय काल से
होता आया है। काल प्रभाव से होता रहेगा।
उसकी यह आने जाने की परंपरा नहीं टूटेगी।
कितनी उदात्त कल्पना थी कवि कल्हण की।
उसने इतिहास की एक नवीन व्याख्या की है।
यह व्याख्या उतनी ही आधुनिक कही जायगी
जितने आधुनिक हम अपने होने का गौरव अनुभव
करते हैं।
तरंगिणी में लोल लहरियां उठती हैं।
उत्ताल तरंगें उठती हैं। भंवरें चक्कर खाती हैं।
उनका निर्मल जल गदले वर्षाकालीन जल में
परिणत हो जाता है। कलकल करती लहरियां
जलप्लावन का रूप धारणकर गरजने लगती हैं।
जल दूषित होता है। शरद ऋतु आती है।
जल पुनः निर्मल हो जाता है। शीत ऋतु में
ये ही लहरियां जम जाती हैं। तुषारपात के
कारण ठंडी श्वेत ओढ़नी ओढ़कर सब कुछ ठंडा
कर देती हैं। पादपों के पत्ते गिर जाते हैं। कुसुम-
झाड़ियां ठूंठ लगने लगती हैं। वसंत आता है।
तुषारपात का अवसान होता है। जमा बर्फ गलने
लगता है। धारा में गति आती है। पादपों में
नवकिसलय निकलते हैं। कुसुम-झाडियों में
कलियां मन ही मन मुस्कुराने लगती हैं। ग्रीष्म
काल आते ही जल धारा क्षीण होने लगती है।
उसकी यह क्षीणता उसकी महत्ता बढ़ा देती
प्रथम तरङ्ग
७
[बायाँ स्तम्भ]
है। वह तृषा बुझाने में, पादपों को विकसित
करने में, पुष्पों को सुरभि फैलाने में, उन्हें जल
से सीचकर उनमें उत्साह उत्पन्न करती है।
शांति प्रदान करती है।
पुनः घूमती वर्षा ऋतु आती है। नदी अपना
सुहावना रूप बदलकर हुंकार उठती है। किनारों
को काटती, वृक्षों को बहाती, जलप्लावन करती,
गरजती, मलिन रूप धारण करती, महार्णव से
मिलने चल देती है। ये ही बातें राजाओं तथा
राज्यों के विषय में कही जा सकती हैं। वर्षा-
कालीन नदी का जलप्लावन राज्यों की क्रांतियां,
शरद् ऋतु की निर्मलता राज्यों की स्थिरता, शीत
ऋतु की ठंड राज्यों की जड़ता, वसंत ऋतु की
सुरभि राज्यों का विकास, ग्रीष्मकालीन जल की
उपयोगिता राज्यों के शांतिकाल का द्योतक हैं।
नदी राज्य है। जल राज्य की जनता है। वर्षा-
कालीन मटमैला जल राज्य के दोषों को प्रकट
करता है। निर्मल धारा राज्य के गुणों को प्रकट
करती है। ग्रीष्मकालीन शीतल धारा जनता के
दुःख निवारणार्थ श्रेष्ठ कार्यों का रूपक प्रस्तुत
करती है। आततायियों के आतंक से सरिता जल
जनता को शीतलता प्रदान करता है। शांति देता
है। नदी के तट पर गर्मी से व्याकुल व्यक्ति जैसे
शीतलता, शांति, सुख का बोध करता है, उसी
प्रकार पीड़ित प्राणी राज्याश्रय प्राप्त करते ही
दुःख से पीड़ा से, त्राण पाता है।
नदी वर्षा में दूषित होती है। काव्यकारों ने
वर्षा ऋतु में नदियों का रजस्वला होना कहा है।
उस समय दोष के कारण उनका कोई स्पर्श नहीं
करता। ठीक उसी प्रकार राज्य में दोष आ जाने
पर कोई राज्य के पास आना नहीं चाहता। इसी
नदी का निर्मल जल पान करने वाला उसमें स्नान
तक करना नापसंद करता है।
राजा में दोष उत्पन्न होने पर राजा अपना
तो सर्वनाश करता ही है, दूसरों के भी नाश का
[दायाँ स्तम्भ]
साधन बन जाता है। उफनती वर्षा कालीन
तरंगिणी की प्रबल वेगधारा अपने ही दोनों तटों
को काटती है, अपने ही तटवर्ती फलप्रद
छायाप्रद वृक्षों को उखाड़ती वहाती नष्ट करती
है; भूमि के पादपों को सींचने के स्थान पर उन्हें
गलाती, गिराती; बहाती, अपनी सीमामर्यादा
लांघती देश को जलप्लावित करती है। उसी
प्रकार राजा अपनी मर्यादा अपनी सीमा उल्लंघन
करने पर क्रांति किंवा विप्लव का रूप उपस्थित
करने के कारण नष्ट हो जाता है। कल्हण ने इसी
लिये इतिहास, गाथादि शब्दों के स्थान पर
तरंगिणी शब्द का प्रयोग राज्यों के इतिहास के
लिये किया है।
कल्हण कवि था। कुलीन कवि था। एक
राजमंत्री का पुत्र था। कवि हृदय प्रकृति के अंक
में बैठकर सौंदर्य संचय करता है। कवि हृदय
प्रकृति से मूक वार्ता करता है। वह प्रकृति की
प्रतिभा से अपनी प्रतिभा का भंडार भरता है।
कवि सरस, अलंकृत, भाषा में अपना उद्देश्य
तथा विचार प्रकट करना चाहता है। उसकी
सुप्त चेतना कृति के साथ मिलते ही जागृत हो
जाती है। कवि कल्हण इसका अपवाद नहीं था।
कल्हण सफल इतिहास लेखक कवि था।
उसने एक सफल कवि की तरह तरंगिणी की
उपमा राज्य से दी है। राज्य श्रृंखला
इस तरंगिणी के जल बिंदु हैं। जल की
धारा राज का प्रवाह है, जो कभी सूखता
नहीं। तरंगिणी की यह धारा अविच्छिन्न रूप से
बहती रही है। राजतरंगिणी को इस धारा
को सोलहवीं शताब्दी तक जोनराज, श्रीवर,
शुकादि जैसे ऐतिहासिक कवि विद्वानो ने सूखने
नहीं दिया है। तरंगिणी आज भी सूखी नहीं
है। उसमें जल रहा है। आता रहेगा, चाहे इस
जलधारा में देश काल पात्र के अनुसार उसके रूप
रंग एवं स्वाद में क्यों न अन्तर पड़ गया हो ?
राजतरङ्गिणी
विस्तीर्णाः प्रथमे ग्रन्थाः स्मृत्यै संक्षिपतो वचः।
सुव्रतस्य प्रबन्धेन छिन्ना राजकथाऽश्रयाः ॥ ११ ॥
११. पूर्वकालीन इतिहास ग्रन्थ विस्तृत थे। उन्हें स्मरण रखने के लिये सुव्रत ने उनका संक्षिप्त
संस्करण कर दिया था। अतएव वे छिन्न¹ अर्थात् लुप्त हो गए।
पादटिप्पणियाँ
११. (१) विच्छिन्न = लुप्त-आज भी विद्यालयों
में विस्तृत इतिहास ग्रन्थ के स्थान पर नोटों के पढ़ने
की प्रथा चल निकली है। विद्यार्थी विशाल
पाण्डित्यपूर्ण विस्तृत इतिहास ग्रंथो के चक्कर में
नहीं पड़ते। परीक्षाएँ पास करने के लिये नोटों
का आश्रय लेते हैं। विस्तृत इतिहास ग्रंथों का
केवल संदर्भ के लिये उपयोग किया जाता है।
सुव्रत के संक्षिप्त इतिहास का नाम कल्हण नहीं देता
है। पूर्व कालीन इतिहास ग्रन्थों का नाम भी कल्हण
नहीं देता है। प्रतीत होता है कि उसके समय
में मौजूद नहीं थे। प्रतीत होता है कि सुव्रत ने
विद्यार्थियों तथा पाठकों की सुविधा के लिये सरस
बोधगम्य तथा स्मरण रखने योग्य प्राचीन इतिहासों
को संक्षिप्त तथा वर्गीकृत कर दिया था। सुव्रत का
यह संक्षिप्त इतिहास प्रचलित तथा ख्यातिप्राप्त हो
गया। कल्हण इस बात का स्पष्ट उल्लेख करता
है। अतएव पूर्वकालीन विस्तृत इतिहासों की
प्रतिलिपि कर उन्हें रखना अथवा उसका पाठ
बंद हो गया था। उन दिनों आजकल जैसे
प्रकाशन तथा मुद्रण का साधन उपलब्ध नहीं था।
काश्मीर में काफी भोजपत्र के वृक्ष हैं। जोजिला
पास के मार्ग में बहुत वृक्ष मैंने देखा। उनसे
कुछ भोजपत्र उखाड़कर ले भी आया। भोजपत्र
काफी चौड़े और लम्बे होते हैं। परतो पर परतें
जमी रहती हैं। उन्हीं पर पुस्तक काली स्याही
से लिखी जाती थी। सुव्रत का इतिहास छोटा
था। अतएव उसी की प्रतिलिपियां पठन पाठन
के लिये बनने लगी होंगी। पुरातन इतिहास
ग्रंथ केवल संदर्भ, अनुसंधान तथा शोभा के लिये
रह गए होंगे। उनका स्वतः असामायिक तथा
अनुपयोग होने के कारण लोप हो जाना जैसा
कल्हण स्वयं स्वीकार करता है, कोई आश्चर्य
की बात नहीं मालूम होती।
कल्हण के समय सुव्रत द्वारा उल्लिखित
इतिहास ग्रंथ उपलब्ध नहीं थे। सुव्रत का इतिहास
भी अभी तक कहीं प्राप्त नहीं है, जो कल्हण
के समय प्रचलित था। संभव है, कल्हण की
राज तरंगिणी अधिक पूर्ण होने के कारण इसका
प्रचलन हो गया और सुव्रत का इतिहास उसी
प्रकार राजतंरगिणी लिखने के पश्चात् स्वतः लुप्त
हो गया, जिस प्रकार सुव्रत के इतिहास के कारण
प्राचीन इतिहास ग्रंथ स्वतः लुप्त हो गए थे।
कल्हण के इस उद्धरण से यह स्पष्ट प्रमाणित
होता है कि प्राचीन काल में इतिहास लिखने की
स्वस्थ परंपरा भारत में प्रचलित थी। गवेषणापूर्ण
अनुसंधान के आधार पर रचनाकारो ने गाथा
अथवा काव्य नहीं, अपितु इतिहासों की रचना
की थी। पाश्चात्य विद्वानो की धारणा कि भारत
में इतिहास लिखने की परंपरा नहीं थी, आमूल
मिथ्या प्रमाणित होती है।
ऐतिहासिक ग्रन्थों का धार्मिक महत्त्व नहीं
होता था। संस्कृत कल्हण के समय में भारत
में अनेक स्थानों मे राजभाषा थी । संस्कृत
में पत्र व्यवहार तथा लिखा पढ़ी होती थी।
इस समय बहुधा धार्मिक ग्रन्थ इसीलिये भारत
में पाए जाते हैं कि उन्हें धार्मिक मान लिया गया
था। वे धर्म से संबंधित कर दिए गए थे। उन्हें
प्रथम तरङ्ग
या प्रथामगमन्नैति साऽपि वाच्यप्रकाशने ।
पाटवं दृष्टवैदुष्यतोत्रा सुव्रतभारती ॥ १२ ॥
१२. यद्यपि सुव्रत की रचना ने ख्याति प्राप्त कर ली थी तथापि पांडित्याभिमान के कारण
उसकी रचना शैली दोषपूर्ण हो गई थी। अस्तु विषय प्रतिपादन में निपुणता प्राप्त
नहीं कर सकी।
केनाप्यनवधानेन कविकर्मणि सत्यपि ।
अंशोऽपि नास्ति निर्दोषः क्षेमेन्द्रस्य नृपावली ॥ १३ ॥
१३. यद्यपि क्षेमेंद्र१ की नृपावली२ काव्य रचना है तथापि अनवधानता के कारण उसमे इतनी
त्रुटियाँ रह गई हैं कि उसका कोई भी अंश निर्दोष नही कहा जा सकता।
संजो कर रखने की परंपरा चल पड़ी थी। चिंता हुई। एतदर्थ जो कुछ इतिहास ग्रन्थ शेष
ऐतिहासिक तथा राजाओं के चरित्र सम्बन्धी ग्रन्थो रह गये थे वे भी अनायास समाप्त हो गये।
को, यद्यपि वे संस्कृत में लिखे गए थे, धार्मिक मध्येशिया के लोग पूर्व मुस्लिम काल में
रूप नहीं दिया गया। ऐतिहासिक घटनाएँ तथा बौद्ध या हिन्दू धर्मानुयायी थे । रूसी पुरातत्त्व
राजाओं के चरित्र राजवंशवली किंवा प्रशस्ति विभाग के अनुसंधानों तथा खनन कार्यों से इस पर
मात्र रह गए थे। यथेष्ट प्रकाश पड़ा है। वहाँ मुसलमान पहुँचे । मुस्लिम
पूर्व काल में हुए राजाओं की वंशावली तथा धर्म स्वीकार करने के लिये बाध्य किया गया। बौद्ध
उनका चरित्र उनके हजारों वर्ष पश्चात् होनेवाले भिक्षुओं ने ग्रन्थो को गुफाओं में खोदकर गाड दिया।
राजवंशों किंवा जनता के लिये महत्त्वहीन हो गए वे ही प्राप्त होने वाले ग्रन्थ विश्व इतिहास की इस
थे। उनके पढ़ने लिखने से न तो पुण्यार्जन हो समय सामग्री बन रहे है। यही काम भारत में
सकता था और न धनार्जन । यह मनोभावना मुस्लिम शासन के सत्तारूढ़ होने के पश्चात्
बलवती हो गई होगी। अस्तु रामायण, पुराण हुआ। मिस्र, ईरान तथा एशिया माइनर के देशो
तथा महाभारत में वर्णित यत्र तत्र इतिहास को एक में प्राचीन ग्रन्थों का सर्वथा लोप हो गया। वहाँ के
आंशिक झलक मिल जाती है। उन्हे धार्मिक ग्रन्थ इतिहास को पिरामिडों, ध्वंसावशेषों और प्राप्त
की मान्यता देकर, उनका धर्म में समावेश कर होने वाले बिखरे शिलालेखो को पढ़कर जाना जा
लिया गया । रहा है।
मुसलमानी शासन काल में संस्कृत ग्रंथो पर पाठभेद :
विपत्ति आ गई। उन्हें फूंकने, उन्हे नष्ट करने श्लोक संख्या १३ मे 'कर्मणि' का पाठभेद
का धार्मिक उन्माद उत्पन्न हो गया। उन्हे 'कर्म्माणि' मिलता है।
पड़ना कुफ्र समझा जाता था। कितने ही ग्रंथ
लोगों ने स्वतः भय से फूंक दिए वो उन्हें जल पाद टिप्पणियाँ :
समाधि दे दी। काश्मीर मे यह बहुत बड़े पैमाने १३ (१) क्षेमेंद्र-कवि क्षेमेंद्र का एक नाम
पर हुआ। इस काल में जिन्होंने अपना धर्म नहीं व्यासदास भी है। कवि क्षेमेंद्र काश्मीर के राजा
त्यागा, उन्हें धार्मिक ग्रंथों को रक्षा की विशेष अनन्त देव (सन् १०२६-१०६३ ई०) और
२
१० राजतरङ्गिणी
दृग्गोचरं पूर्वसूरिग्रन्था राजकथाऽऽश्रयाः ।
मम त्वेकादश गता मतं नीलमुनेरपि ॥ १४ ॥
१४. मैंने अपने पूर्वगामी विद्वानों द्वारा रचित राजकथा विषयक ग्यारह ग्रन्थों तथा नील मुनि
के मत का निरीक्षण किया है।
उनके पुत्र राजा कलश (सन् १०६३-१०८९ ई०)
का समकालीन था। क्षेमेन्द्र संस्कृत साहित्य का
ख्यातिप्राप्त कवि हुआ है। उसकी पुस्तक 'नृपा-
वली' का उल्लेख कल्हण करता है। अभी तक
यह प्राप्त नहीं हो सकी है।
क्षेमेन्द्र प्रसिद्ध संस्कृत परिहास कथा लेखक है। प्रका-
शेन्द्र इनके पिता का नाम था। पितामह का नाम निम्ना-
शय था। प्रपितामह का नाम सिन्धु था। इसके पूर्व
पुरुष काश्मीर में अमात्य पद पर प्रतिष्ठित थे। उसने तंत्र
तथा आलोचक विद्वान् अभिनवगुप्त से साहित्य तथा
शास्त्रों का अध्ययन किया था। इन्होंने 'समय मातृका'
की रचना सन् १०५० ई० में की थी। 'दशावतारचरित'
की रचना सन् १०६६ ई० में की थी। रामायण,
महाभारत तथा बृहत्कथा का संक्षेप में रोचक वर्णन,
क्रम से रामायण मंजरी, भारत मंजरी तथा बृहत्कथा
मंजरी में किया है। 'बोधिसत्वावदान कल्पलता' में
पारमिता सूचक आख्यानों का वर्णन है। वह पद्य में
लिखी गयी है। 'औचित्य विचार चर्चा' में औचित्य
को काव्य का मूल भूत तत्त्व स्वीकार किया है।
'नर्ममाला' तथा 'देशोपदेश' परिहास कथा की
संस्कृत में अनुपम रचना है। उसमें उन्होंने तत्कालीन
समाज का सजीव चित्रण करते हुए उसकी मीठी चोट
की है। उनकी रचना का उद्देश्य विशुद्ध चरित्र चित्रण
के साथ-साथ चरित्र निर्माण भी है। इन्होंने कला-
विलास, चतुर्वर्ग संग्रह, चारुचर्या, समय मातृकादि, लघु
काव्य का रचना की है। भाषा के सुबोध सरस
विन्यास में क्षेमेन्द्र ने सरलता प्राप्त की है। भावों की
उदात्त व्यंजना में वह सिद्ध हस्त हैं। पाण्डित्य का
अनावश्यक प्रदर्शन तथा शब्द के चमत्कारों से दूर
रहने का प्रयास किया है। लोक प्रकाश में क्षेमेन्द्र स्वयं
अपना नाम 'व्यास दास' देता है। अपनी वंशावली
देता है। उसके अनुसार नरेन्द्र के पुत्र भोगीन्द्र थे।
भोगीन्द्र के पुत्र सिन्धु थे। सिन्धु के पुत्र प्रकाशेन्द्र थे।
प्रकाशेन्द्र के पुत्र क्षेमेन्द्र थे। क्षेमेन्द्र का पुत्र सोमेन्द्र था।
(२) नृपावली:—कल्हण ११ ग्रन्थों का नामो-
ल्लेख यहाँ नहीं करता। उसने क्षेमेन्द्र की 'नृपावली'
तथा हेलाराज को 'पार्थिवावली' का नाम स्पष्ट रूप
से दिया है। यह दोनों ग्रन्थ अभी तक प्राप्त नहीं हो
सके हैं। सुव्रत, पद्ममिहिर और श्रीच्छविल्लाकर के
ग्रन्थों का नाम कल्हण यहाँ नहीं देता है।
पाठभेद :
श्लोक संख्या १४ मे 'दृग्गोचरं पूर्व' का पाठभेद
'दृग्देश पूर्व' मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
१४(१) नीलमुनि—नीलमत पुराण नील मुनि
की रचना है। काश्मीर मंडल का यह एक
प्रकार से आद्य ग्रन्थ है। काश्मीर किस प्रकार
किसी समय जलपूर्ण सतीसर था, बारहमूला के
पास पर्वत भेदकर, किस प्रकार पानी निकाला
गया, काश्मीर की महाभारत काल में क्या अवस्था
थी, काश्मीर की परम्परा, पूजा, पर्व, तीर्थ,
त्यौहार, धर्म, रीति और रिवाज पर, यथेष्ट प्रकाश
नीलमत पुराण डालता है। इसका विस्तृत वर्णन
यथास्थान किया गया है।
नीलमत पुराण और राजतरंगिणी
राजतरंगिणी का श्लोक संख्या १६ में वर्णित
प्रथम ४ राजाओं तथा श्लोक संख्या ५०-८२ मे
नीलमत के श्लोकों को मिलाया जाय तो स्पष्ट
प्रतीत होगा कि कल्हण ने उन्हें नीलमत पुराण
प्रथम तरङ्ग ११
से लिया है। निष्कर्ष निकलता है। कल्हण ने, जैसा
वह स्वयं लिखता है, नीलमत पुराण का गंभीर
अध्ययन किया था।
कल्हण ने नील का पुनः उल्लेख प्रथम तरंग
की श्लोक संख्या २८, १८० में, नील कुण्ड का १८३,
१८५ में, कर्मकाण्ड, पंचम तरंग संख्या ९१ में
नीलजा (वितस्ता) नदी, नीलभू. सरिता अर्थात्
वितस्ता या झेलम नदी का नीलकुण्ड में पूजा का
तरंग ८-३३५, में उल्लेख किया है।
नीलमत पुराण कथन का उल्लेख कल्हण ने राज-
तरंगिणी के 'तरंग १:१४ में, लुप्त राजाओं
का उल्लेख १:३६ में; नीलमत पुराण के श्लोक का
उद्धरण १:७२ में, किया है। ज्येष्ठेश की कथा १:११३
में, सोदर तीर्थ का वर्णन उद्धरण १:१२३ में, बौद्धों
द्वारा नील पुराण के कर्मों का बन्द करना १:१७८ में,
पिशाचो की कथा १:१८४ में, काश्मीर के तीर्थों
तथा सतीसर की कथा आदि नीलमत पुराण से
लिया है।
नीलमत पुराण उपलब्ध है। कल्हण ने नीलमत
पुराण, नील मुनि तथा नील सम्बन्धी जिन बातो का
उल्लेख राजतरंगिणी में किया है, वे सब नीलमतपुराण
में मिलते हैं। नीलमत पुराण के श्लोकों का उद्धरण
राजतरंगिणी में मिलता है। कल्हण ने इसे स्वयं राज-
तरंगिणी में स्वीकार किया है। उन्हें उसने नीलमत
पुराण से लिया है। कल्हण नीलमत पुराण की
सत्यता तथा प्राचीनता सिद्ध करता है। प्राप्य नील-
मत पुराण कल्हण की सत्यता भी सिद्ध करता है।
साथ ही साथ नीलमत पुराण से जो लेना स्वीकार
करता है, वे नीलमत पुराण में मिलते हैं।
नीलमत पुराण का अध्ययन करने पर मेरी
प्रथम प्रतिक्रिया यह हुई कि नीलमत पुराण वास्तव
में काश्मीर का भूगोल है। काश्मीर के पर्वतों,
नदियों, जलाशयों, तीर्थों, देवस्थानों, उपत्यकाओं,
झरनो आदि, का 'विशद वर्णन पुराण करता है।
उसमें वर्णित स्थान, नदियों, स्रोतस्विनियाँ, पर्वतशिखर,
पर्वतमालाएँ, जलाशय, तीर्थ तथा देवस्थान आज भी
अपने मूल अपभ्रंश किंवा परिवर्तित नामों के साथ
जहाँ जिस स्थान पर उनका होना कहा गया है,
मिलते है। उनकी दिशा, उनके समीप के वर्णित
प्राकृतिक भौगोलिक स्थान, यथास्थान मिलते है।
मैंने स्वयं भ्रमण कर स्थानो का पता लगाया है।
बहुत से स्थान लोप हो गये हैं। लोग भूल गये हैं।
कुछ को मैने इन्हें नीलमत के आधार पर खोजा है।
उन्हे यथास्थान पाया है। यद्यपि लंबे काल और मुस्लिम
प्रभाव के कारण पुराने नामो तथा ख्याति को लोग
भूल गये है। नीलमत पुराण के रचनाकार ने काश्मीर
मंडल का भ्रमण कर आँखो देखा वर्णन किया है।
दूसरी बात और उल्लेखनीय है। नीलमत पुराण
काश्मीर की प्राचीन परम्परा, इतिहास, धर्म, आचार,
विचार, मतमतान्तर, कर्मकांड, सामाजिक जीवन,
पूजा-पाठ, रहन-सहन, का सजीव चित्रण करता है।
निस्संदेह तत्कालीन समाज का वास्तविक चित्र आंखो
के सम्मुख आ जाता है। नीलमत पुराण में वर्णित
स्थानो, उपस्थानों को, मूल श्लोको से मिलाकर
अध्ययन करने से वास्तविकता पर प्रकाश पडता है।
हुएन साग और नीलमत पुराण पर द्रष्टव्य है परिशिष्ट।
चीनी पर्यटक हुएनसाग ने काश्मीर की यात्रा
की थी। कल्हण से शताब्दियो पूर्व आया था। उसने
नीलमत द्वारा वर्णित काश्मीर के इतिहास तथा
कथाओ का उल्लेख किया है। निस्संदेह तत्कालीन
काश्मीर में नीलमत पुराण के प्रचलित होने की पुष्टि
करता है। कल्हण के वर्णन की सत्यता सिद्ध करता है।
कल्हण ने यथेष्ट ऐतिहासिक सामग्री राजतरगिणी
की रचना में नीलमत पुराण से ली है।
कल्हण द्वारा उल्लिखित कम से कम दो बातें
हुएनसांग के पर्यटन वर्णन में मिलती है। हुएनसाग
ने उन्हें तत्कालीन प्रचलित संस्कृत ग्रन्थों से लिया
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