राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२ राजतरङ्गिणी
गणेश का विद्वान् तथा पंडित और गोबर गणेश
का अर्थ मूर्ख के लिये कालान्तर में जाने लगा है।
संत ज्ञानेश्वर ने अपनी गीता की टीका के प्रथम
चरण में ही गणेश का बहुत सुंदर रूपक बाँधा है।
गणेश बुद्धि के अधिदेवता हैं। विघ्नविनाशक
तथा मंगलमूर्ति माने जाते हैं। इनकी मूर्तियों में
'नाग' यज्ञोपवीत देखा जाता है। अतः नाग जाति
से इनको किसी न किसी रूप से जोड़ा जा
सकता है। उनका विशाल मस्तक हाथी का मुख
स्वरूप, हाथों में परशु, पाश, माला तथा पुस्तक
हैं। लंबोदर अर्थात् पेट तुंदिल दिखाया जाता है।
अग्नि-सोम—मीठा लड्डू उन्हें प्रिय है। यह
उनकी माधुर्यप्रियता का परिचायक है। इसलिये
उन्हें ढुंढिराज कहा जाता है। उनकी पत्नियां
ऋद्धि तथा सिद्धि हैं। कही कही इनकी पत्नी
बुद्धि के होने का वर्णन मिलता है। शिव पार्वती
की संतान गणेश हैं। शिव पार्वती के संमिलित
रूप की कल्पना अर्धनारीश्वर है। शिव उसमें
अग्नि स्वरूप तथा पार्वती सोम हैं। अग्नि में
सोम की आहुति डालने का नाम यज्ञ है। अग्नि
अंश से कुमार किंवा स्कंद तथा सोम अंश से गणेश
अपने पिता-माता शिव-पार्वती के पुत्र कहे गए हैं।
(२) हर—कश्मीर में शैव मत, शैव
सिद्धांत आदि का व्यापक प्रचार था। कश्मीरी
अपने को शिव भक्त कहते हैं। शिव को विश्वात्मा
के रूप में देखते हैं। उनकी एकांत कामना शिव
में सायुज्य प्राप्त करने की होती है। यह भावना
कश्मीरी पंडितों में रूढ हो गई है।
शिव का रुद्र प्राथमिक रूप है। यह प्राकृतिक
शक्ति का द्योतक है। शैव दर्शन विकसित होकर
सभी देवताओं को अपने में मिलाता कालान्तर में
बहुदेववादी धार्मिक सिद्धांत के स्थान पर एकेश्वर-
वाद में परिणत हो जाता है। वह बुद्ध के आचार
किंवा नैतिक दर्शन का स्थान भी ले लेता है।
हलाहल विषपान करने के कारण उनका कंठस्थान
नीला पड़ गया है। अतएव उनका एक नाम
नीलकंठ हो गया।
शिव का नाम त्रिनेत्र है। उनका तृतीय नेत्र
भाल पर दोनों भ्रूके मध्य में है। उनका तृतीय नेत्र
खुलता है। सब कुछ भस्म हो जाता है। इसी
नेत्र के खुलने के कारण काम भस्म हो गया।
उसका नाम अनंग पड़ा। इस त्रिनेत्र रूपक की
एक और व्याख्या की जा सकती है। शिव योगी
हैं। योग सिद्धांत उनसे प्रारंभ होता है। यह
दृष्टि भ्रू मध्य होती है। यहाँ योनि मुद्रा करने पर
साधारण साधक को भी प्रकाश दिखाई पड़ता है।
दृष्टि यहाँ स्थिर होने पर ज्ञानचक्षु खुलते हैं।
ज्ञानचक्षु के खुलने पर मायाजाल, बंधन तथा
सांसारिक व्यवधान ज्ञानाग्नि में भस्म हो जाते हैं।
अतएव शिव को त्रिनेत्र उनके योगी होने के कारण
कहा गया है।
शिव के शरीर पर विषधर सर्पादि आभूषण हैं।
भूतप्रेत अनेक योगिनियाँ आदि उन्हें घेरे रहती
हैं। योगों पर विष का प्रभाव नहीं पड़ता।
उस पर अदृश्य कही जानेवाली शक्तियों का प्रभाव
नहीं पड़ता। उसे योगिनियाँ अर्थात् नारी का
सुंदर रूप मोह नहीं सकता। पिशाचिनियाँ अर्थात्
नारी के विकृत रूप से वह भय भीत नहीं हो सकता।
सब स्थानों में वह समरूप रहता है। यह है मुक्ता-
वस्था। यही मुक्ति है। इस अवस्था के प्राप्त करने
पर शिव में सायुज्य हो जाता है।
(३) प्रलीन = विशेषण भूषाभोग तथा प्रलीन
दोनों शब्दों का प्रयोग शिव तथा कल्पतरु के लिये
किया जाता है। प्रलीन यहाँ शिव के साथ सायुज्य
के अर्थ में आया है। सालोक्य तथा सायुज्य में
अन्तर है। सालोक्य का अर्थ है शिव के लोक की
प्राप्ति। सायुज्य माने होता है स्वयं शिव में मिलकर
एक हो जाना। बाण के हर्षचरित में (१.१)
इसी प्रकार की शब्दावली का प्रयोग किया गया है।