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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 85, कुल 984 में से

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पृष्ठ 85

१० राजतरङ्गिणी
दृग्गोचरं पूर्वसूरिग्रन्था राजकथाऽऽश्रयाः ।
मम त्वेकादश गता मतं नीलमुनेरपि ॥ १४ ॥
१४. मैंने अपने पूर्वगामी विद्वानों द्वारा रचित राजकथा विषयक ग्यारह ग्रन्थों तथा नील मुनि
के मत का निरीक्षण किया है।

उनके पुत्र राजा कलश (सन् १०६३-१०८९ ई०)
का समकालीन था। क्षेमेन्द्र संस्कृत साहित्य का
ख्यातिप्राप्त कवि हुआ है। उसकी पुस्तक 'नृपा-
वली' का उल्लेख कल्हण करता है। अभी तक
यह प्राप्त नहीं हो सकी है।
क्षेमेन्द्र प्रसिद्ध संस्कृत परिहास कथा लेखक है। प्रका-
शेन्द्र इनके पिता का नाम था। पितामह का नाम निम्ना-
शय था। प्रपितामह का नाम सिन्धु था। इसके पूर्व
पुरुष काश्मीर में अमात्य पद पर प्रतिष्ठित थे। उसने तंत्र
तथा आलोचक विद्वान् अभिनवगुप्त से साहित्य तथा
शास्त्रों का अध्ययन किया था। इन्होंने 'समय मातृका'
की रचना सन् १०५० ई० में की थी। 'दशावतारचरित'
की रचना सन् १०६६ ई० में की थी। रामायण,
महाभारत तथा बृहत्कथा का संक्षेप में रोचक वर्णन,
क्रम से रामायण मंजरी, भारत मंजरी तथा बृहत्कथा
मंजरी में किया है। 'बोधिसत्वावदान कल्पलता' में
पारमिता सूचक आख्यानों का वर्णन है। वह पद्य में
लिखी गयी है। 'औचित्य विचार चर्चा' में औचित्य
को काव्य का मूल भूत तत्त्व स्वीकार किया है।
'नर्ममाला' तथा 'देशोपदेश' परिहास कथा की
संस्कृत में अनुपम रचना है। उसमें उन्होंने तत्कालीन
समाज का सजीव चित्रण करते हुए उसकी मीठी चोट
की है। उनकी रचना का उद्देश्य विशुद्ध चरित्र चित्रण
के साथ-साथ चरित्र निर्माण भी है। इन्होंने कला-
विलास, चतुर्वर्ग संग्रह, चारुचर्या, समय मातृकादि, लघु
काव्य का रचना की है। भाषा के सुबोध सरस
विन्यास में क्षेमेन्द्र ने सरलता प्राप्त की है। भावों की
उदात्त व्यंजना में वह सिद्ध हस्त हैं। पाण्डित्य का
अनावश्यक प्रदर्शन तथा शब्द के चमत्कारों से दूर
रहने का प्रयास किया है। लोक प्रकाश में क्षेमेन्द्र स्वयं
अपना नाम 'व्यास दास' देता है। अपनी वंशावली
देता है। उसके अनुसार नरेन्द्र के पुत्र भोगीन्द्र थे।
भोगीन्द्र के पुत्र सिन्धु थे। सिन्धु के पुत्र प्रकाशेन्द्र थे।
प्रकाशेन्द्र के पुत्र क्षेमेन्द्र थे। क्षेमेन्द्र का पुत्र सोमेन्द्र था।
(२) नृपावली:—कल्हण ११ ग्रन्थों का नामो-
ल्लेख यहाँ नहीं करता। उसने क्षेमेन्द्र की 'नृपावली'
तथा हेलाराज को 'पार्थिवावली' का नाम स्पष्ट रूप
से दिया है। यह दोनों ग्रन्थ अभी तक प्राप्त नहीं हो
सके हैं। सुव्रत, पद्ममिहिर और श्रीच्छविल्लाकर के
ग्रन्थों का नाम कल्हण यहाँ नहीं देता है।
पाठभेद :
श्लोक संख्या १४ मे 'दृग्गोचरं पूर्व' का पाठभेद
'दृग्देश पूर्व' मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
१४(१) नीलमुनि—नीलमत पुराण नील मुनि
की रचना है। काश्मीर मंडल का यह एक
प्रकार से आद्य ग्रन्थ है। काश्मीर किस प्रकार
किसी समय जलपूर्ण सतीसर था, बारहमूला के
पास पर्वत भेदकर, किस प्रकार पानी निकाला
गया, काश्मीर की महाभारत काल में क्या अवस्था
थी, काश्मीर की परम्परा, पूजा, पर्व, तीर्थ,
त्यौहार, धर्म, रीति और रिवाज पर, यथेष्ट प्रकाश
नीलमत पुराण डालता है। इसका विस्तृत वर्णन
यथास्थान किया गया है।
नीलमत पुराण और राजतरंगिणी
राजतरंगिणी का श्लोक संख्या १६ में वर्णित
प्रथम ४ राजाओं तथा श्लोक संख्या ५०-८२ मे
नीलमत के श्लोकों को मिलाया जाय तो स्पष्ट
प्रतीत होगा कि कल्हण ने उन्हें नीलमत पुराण