राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
६०६ राजतरंगिणी
निगूढदारदौर्गाल्म्यचिन्ताकृशवपुस्ततः ।
शुद्धान्तमविशज्जातु निशि दुर्लभवर्धनः ॥५०६॥
५०६. पत्नी के निगूढ दौरात्म्य की चिन्ता वश कृश शरीर दुर्लभवर्धन कदाचित्
रात्रि काल में शुद्धान्तःपुर में प्रवेश किया ।
सोऽपश्यत्सुरतक्लान्तिसुलभस्वापनिस्सहाम् ।
दुर्जारभर्तुरङ्गेषु प्रत्युप्तामिव वल्लभाम् ॥ ५०७ ॥
५०७. उसने देखा—सुरति क्रान्ति सुलभ स्वाप (शयन) युक्त (उसकी) वल्लभा
दुर्जांर भर्ता के अंग से लिपटी है।
श्वासैरगलितावेगैः कम्पयद्भिः कुचाङ्कुरौ ।
निवेदयन्तीं तत्कालमेव निर्वहणं रतेः ॥ ५०८ ॥
५०८. कुचांकुरों को कम्पित करते श्वास प्रश्वासों से तत्काल ही रति समाप्ति का
बोध करा रही थी ।
अन्यस्यापि क्रोधहेतुं पुनरप्यक्षमावहाम् ।
तां तथाऽवस्थितां वीक्ष्य स प्रजज्वाल मन्युना ॥ ५०६ ॥
५०९. दूसरों के लिये भी क्रोध निमित्त एवं अक्षम्य उसे, उस अवस्था में देखकर, वह
क्रोध से प्रज्वलित हो उठा ।
प्रजिहीर्षुः स रोषेण विमर्शेन निवारितः ।
प्रहृत्यैव प्रहृत्यैव द्विवृत्तं स्वममन्यत ॥ ५१० ॥
५१०. क्रोध से प्रहारेच्छुक, वह विमर्श के कारण निवारित हो, अपने को प्रहार
करने से बचा लिया ।
पाठभेद : श्यत्' तथा 'दुर्जार' का पाठभेद 'दुर्जात' मिलता है ।
श्लोकसंख्या ५०६ में 'जातु' का पाठभेद 'ज्ञानु'
श्लोक सख्या ५०८ में 'दयन्ती' का पाठभेद
मिलता है।
'दयन्तो' तथा 'दयन्तो' मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
५०६ ( १) शुद्धान्त : इसका शाब्दिक अर्थ श्लोक सख्या ५०९ में 'क्रोध' का पाठभेद
शुद्ध अन्तरीष होता है। यह रनिवास किंवा 'क्रुधो' तथा सुझाव है कि 'पुनः' का पाठभेद
अन्तःपुर के अर्थ में यहा प्रयुक्त किया गया है। 'मुने' होना चाहिये ।
पाठभेद : श्लोक सख्या ५१० में 'स' का पाठभेद 'स्म'
श्लोक संख्या ५०७ में 'सोऽपश्यन्' का 'योऽप- मिलता है ।
तृतीय तरंग ६०७
ततस्तथाविधः क्षुभ्यन् प्रकोपावेशसागरः ।
विचारवेलया तस्य वलाच्छममनीयत ॥ ५११ ॥
५११. तथाविध उस क्षुब्ध होते प्रकोपावेश सागर को उसकी विचार (वेला तट) ने
बलात् शान्त कर दिया ।
नमस्तस्मै ततः कोऽन्यो गण्यते वशिनां धुरि ।
जीर्यन्ते येन पर्याप्ता ईर्ष्याविषविषूचिकाः १ ॥ ५१२ ॥
५१२. उसे नमस्कार है—उसके 'अतिरिक्त अन्य कौन जितेन्द्रियों में अग्रणी है जो
पर्याप्त ईर्ष्याविष विसूचिका को नष्ट कर देता है ।
सोऽचिन्तयदहो कष्टश्चेष्टा रागानुगा इमाः ।
विचारवन्ध्याः क्षिप्यन्ते क्षिप्रं याभिरधो नराः ॥ ५१३ ॥
५१३. उसने चिन्तन किया—'अहो ! रागानुगामी ये चेष्टाएं कष्टकर है, जिनके द्वारा
विचार शून्य नर क्षण मात्र में नीचे फेंक दिये जाते हैं—
स्त्रीति नामेन्द्रियार्थोऽयमिन्द्रियार्था यथा परे ।
तथैव सर्वसामान्या वशिनामत्र काः क्रुधः २ ॥ ५१४ ॥
५१४. 'स्त्रीनाम की वस्तु इन्द्रियार्थ २ है; जैसे अन्य वस्तुएँ इन्द्रिय योग्य होती है,
उसी प्रकार वे सर्व सामान्य हैं, अतः यहाँ जितेन्द्रियों के लिये क्रोध का कौन अवसर है ?
निसर्गतराला नारीः को नियन्त्रयितुं क्षमः ।
नियन्त्रणेन किं वा स्याद्यत्सतां स्मरणोचितम् १ ॥ ५१५ ॥
५१५. 'निसर्ग तरल नारी को नियन्त्रित करने में कौन समर्थ है ? अथवा
नियन्त्रण से क्या होगा जो कि सज्जनों के लिये स्मरणीय हो ।
पाठभेद : पादटिप्पणियाँ :
श्लोक संख्या ५११ में 'क्षुभ्यन्त्र' का पाठभेद ५१४ (१) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का
'क्षुभ्यन्त्र' मिलता है । यह ८९ वाँ श्लोक है। यह पद सुभाषित है ।
पादटिप्पणियाँ : (२) इन्द्रियार्थ : यहाँ पर विषयों के अर्थ
५१२ (१) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का में प्रयुक्त किया गया है। न्याय शास्त्र के अनुसार
यह ८८ वा श्लोक है । रूप, शब्द, गन्ध, रस तथा स्पर्श है। 'स्त्री' यहा
पाठभेद : पर मालूम होता है छठे विषय के रूप में कल्हण
श्लोक संख्या ५१३ में 'कष्टा श्चेष्टा' का ने प्रयोग किया है ।
पाठभेद 'कष्टाः' श्चेष्ठा' मिलता है । ५१५ (१) राज तरंगिणी सूक्ति संग्रह का
यह ९० वा श्लोक है । यह पद सुभाषित है ।
६०८ राजतरंगिणी
यः शुनोरिव संघर्ष एकार्थाभिनिविष्टयोः ।
रागिणोर्यदि मानः स कोऽवमानस्ततः परः' ॥ ५१६ ॥
५१६. 'किसी एक वस्तु पर अभिनिवेश रखने वाले दो श्वानतुल्य दो रागियों का
जो संघर्ष है, वह यदि मान है, तो उससे बढ़कर अपमान क्या हो सकता है ?
ममकाग्रे मृगाक्षीषु क इत्यायं सचेतसाम् ।
स्वदेहेऽनुपपन्नोऽपि यः सोऽन्यत्र कथं मतः ॥ ५१७ ॥
५१७. 'बुद्धिमान् जनों का मृगाक्षियों में अपनत्व कैसे ठीक हो सकता है, जो कि
अपने देह में ही अनुपपन्न है, वह अन्यत्र कैसे संगत हो सकता है ?
उद्वेगोत्पादनादेषा वध्या चेत्प्रतिभाति मे ।
रागस्तद्विस्मृतः कस्मान्मूलमुद्वेगशाखिनः ॥ ५१८ ॥
५१८. 'उद्वेग उत्पन्न करने के कारण यह यदि मुझे वधयोग्य प्रतीत हो रही है तो,
वह राग कैसे भूल जाऊँ जो उद्वेग वृक्ष का मूल है।
सप्तपातालक्षिप्तमूलो रागमहीरुहः ।
भूमिभूतमनुत्पाट्य द्वेषमुन्मूल्यते कथम्' ॥ ५१६ ॥
५१९. "राग महीरुह का मूल सप्त पाताल यावत् निक्षिप्त है, अतएव भूमिभूत
रागोत्पाटन के बिना द्वेष का उन्मूलन कैसे सम्भव है ?
द्वेषो नामैष दुर्धर्षो जितो येन विवेकिना ।
क्षणार्धेनैव रागस्य तेन नामापि नाशितम् ॥ ५२० ॥
५२०. 'जिस विवेकी ने इस दुर्धर्ष द्वेष को विजित कर लिया, उसने क्षणार्ध में ही,
राग का नाम मिटा दिया ।
वीक्ष्यैतद्दिव्यया दृष्ट्या रागिणां वाच्यमौषधम् ।
ईर्ष्या जेया ततो रागः स्वयमाशाः पलायते ॥ ५२१ ॥
५२१. 'दिव्य दृष्टि पूर्वक देखकर इसे रागियों का औषध कहना चाहिए, ईर्ष्या विजय
करो, उससे राग स्वयं दिशाओं में पलायित हो जाता है।'
५१६ (१) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का ५१९ (१) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह
यह ११ वाँ श्लोक है। १३ वा श्लोक है।
५१७ (१) राज तरंगिणी सूक्ति संग्रह का ५२० (१) राज तरंगिणी सूक्ति संग्रह का
यह १२ वा श्लोक है। यह १४ वा श्लोक है।
पाठभेद : पाठभेद :
श्लोक संख्या ५१९ में 'नुनाट्य' का पाठभेद श्लोक संख्या ५२१ में 'वाच्य' का पाठभेद
'नुन्माद' मिलता है। 'शस्य' मिलता है।
तृतीय तरंग ६०९
इति ध्यात्वाऽलिखद्वर्णान् खङ्खस्यांशुकपल्लवे ।
'वध्योऽपि न हतो यत्त्वं स्मर्तव्यं तच्चवेत्यसौ' ॥ ५२२ ॥
५२२. इस प्रकार ध्यान कर खंख के अंशुक पल्लव पर इन वर्णों को लिखा—
'वध्य भी, जो तुम नहीं वध हुए, यह स्मरण रखना।'
जनैरलक्ष्यमाणेऽथ याते दुर्लभवर्धने ।
त्यक्तनिद्रः स मन्त्री तान् दृष्ट्वा वर्णानवाचयत् ॥ ५२३ ॥
५२३. बिना किसी के देखे दुर्लभवर्धन के चले जानेपर जागृत उस मंत्री (खंख)
उन वर्णों को देखकर पढ़ा।
दाक्षिण्यात्प्राणदस्त्यास्य खङ्खः स मनसा तदा ।
विसस्मारानङ्गलेखां दध्यौ तु प्रत्युपक्रियाम् ॥ ५२४ ॥
५२४. उस समय खंख अनंगलेखा को चित्त से विस्मृत कर दिया और दाक्षिण्य से
प्राण प्रद उसके प्रति प्रत्युपकार भावना धारण किया।
तस्योपकर्तुरचितं प्रतिकारमिच्छोः
चिन्ताऽविशन्न तु मनः स्मरबाणपङ्क्तिः ।
दृग्गोचरे परिचयप्रणयं प्रपेदे
निर्निद्रता न तु कदाचन राजपुत्री ॥ ५२५ ॥
५२५. उस प्रत्युपकारेच्छुक के मन में उपकर्त्ता के योग्य प्रत्युपकार करने की चिन्ता
प्रवेश की, न कि स्मरबाण पंक्ति। उसकी दृष्टि में अनिद्रता ने परिचय प्रणय प्राप्त किया,
न कि कभ' उस राजपुत्री ने।
धृत्वा सप्तत्रिंशतिमब्दान्स चतुर्भि-
र्मासैर्वन्ध्यां मूर्धनि रत्नं नृपतीनाम् ।
तस्मिन्काले लोकमवापोज्ज्वलकृत्यो
बालादित्यो बालशशाङ्काङ्कितमौलेः ॥ ५२६ ॥
५२६. वह चार मास न्यून सैंतीस वर्ष राजाओं का शिरोरत्न होकर उज्ज्वल कृत्य
शील बालादित्य, बाल शशांकांकित मौलि का लोक प्राप्त किया।
श्लोक संख्या ५२२ में 'तान्' का 'तद्' पाठ एवं ज्ञानेन्द्रियो के बाण सूचक है। क्योंकि किसी
भेद मिलता है। प्रकार का कर्म इन्हीं इन्द्रियों के द्वारा होता है।
पादटिप्पणियाँ : काम भावना की जागृति में इन्द्रियां ही सहायक
५२५ (१) स्मर : काम के हाथों में पाच होती हैं। इन्हीं इन्द्रियों के माध्यम से काम आक्रमण
पुष्प बाण होते हैं। समझता हूँ कि पांचो कर्म करता है।
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परिशिष्ट 'क'
नीलमत पुराण
( तरंग : १ : १४ : पृष्ठ-१० )
कश्मीर के पुरा कालीन इतिहास पर प्रकाश नीलमत पुराण द्वारा पड़ता है। कल्हण ने राजतरंगिणी
को बहुत कुछ सामग्री नीलमत पुराण से प्राप्त की है। कल्हण ने स्वयं इसे स्वीकार किया है।
नीलमत पुराण वास्तव में पुराणों की परिभाषा में पुराण है अथवा नहीं, उसका ऐतिहासिक महत्त्व
है या नहीं ? उसकी गणना पुराणों में की जा सकती है या नहीं ? यह विद्वानों की चर्चा का विषय रहा है।
कश्मीर में धार्मिक, ऐतिहासिक एवं काव्य ग्रन्थ लिखने की प्राचीन परम्परा रही है। 'योग वासिष्ठ' जैसा
ग्रन्थ भी या तो कश्मीर में लिखा गया था अथवा उसका प्राप्य वर्तमान संस्करण कश्मीरी है। (योग वासिष्ठ
कथा : भूमिका) एक मत है कि विष्णुधर्मोत्तर पुराण वैष्णव पुराण है। कश्मीर में लिखा गया था (स्मृति
तत्त्व : जीवानन्द विद्यासागर : २ : ४६७-४६८)। नीलमत पुराण की रचना कश्मीर उपत्यका में हुई
थी। यह निर्विवाद सिद्ध हो चुका है। यह पुराण नहीं उपपुराण है। स्थानीय किंवा लौकिक उपपुराण
वर्ग में आता है।
वायु पुराण (१ : १८१) में उल्लेख है : 'इतिहासपुराणाभ्यां वेदं समुपवृंहयेत् ।' वेद और पुराण
साथ स्थित थे। दोनों में निकट सम्बन्ध था। अथर्व वेद के व्रात्य सूक्त में इतिहास पुराण का चारों वेदों के
साथ उल्लेख किया गया है। मत्स्य पुराण के अनुसार परम पितामह ब्रह्मा वेद और पुराण दोनों के स्रोत हैं।
एक मत पुराण को वेद से प्राचीन मानता है। पुराणों को सरलतापूर्वक समझाने के लिए वेदों का अभ्युदय
हुआ है। वेद केवल सृष्टि विद्या पर प्रकाश डालता है। पुराणों का क्षेत्र अधिक व्यापक है। उनकी आख्यान
शैली वेदों के समान है। वे लगभग चार लाख श्लोकों में लिपिबद्ध हैं। वेद एवं पुराण दोनों पुराकालीन
आख्यानों पर आधारित हैं।
पुराणं सर्वशास्त्राणां प्रथमं ब्रह्मणा स्मृतम् ।
नित्यं शब्दमयं पुण्यं शतकोटिप्रविस्तरम् ॥
अनन्तरं च वक्त्रेभ्यो वेदास्तस्य विनिस्सृताः॥
—मत्स्य पुराण ३ : ३-४
पुराण वेद के प्राधिकार का आदर करता है। वैदिक सिद्धान्तों की व्याख्या करता है। उसे प्रमाण
मानता है।
'सर्ववेदार्थसाराणि पुराणार्थः ।'—नारदीय १ : ९ : १००
वेदाः प्रतिष्ठिताः सर्वे पुराणे नात्र संशयः ॥—नारदीय २ : २४ : १७ ; स्कन्द, रेवा, ॥२२ पृ०
यो न वेद पुराणं हि न स वेदार्थ किंचन ।—स्कन्द पुराण : रेवा खण्ड
आत्मा पुराणं वेदानाम् ।—स्कन्द पुराण रेवाखण्ड ॥२२ ढ०
२ राजतरंगिणी
पुराणों के लिए निम्नलिखित पाँच लक्षणों का होना आवश्यक माना गया है। इन लक्षणों के आधार
पर नीलमत पुराण को तौलना होगा।
सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च।
वंशानुचरितं चैव पुराणं पंच-लक्षणम्॥
—मार्कण्डेय पुराण १३५ : १३
पुराण में सृष्टि (सर्ग), प्रलय (प्रतिसर्ग), वंश, मन्वन्तरो तथा वंशानुचरित किंवा पुरातन चरित
का वर्णन किया जाता है। कौटिल्य ने इतिहास वर्ग में इतिवृत्त तथा पुराण को माना है। (अर्थशास्त्र १:३)
इतिवृत्त में ऐतिहासिक घटनायें अधिक रहती हैं। परन्तु पुराण में कथा, गाथा आदि का समावेश होता है।
सामाजिक जीवन को एक ओर प्रवृत्त करने के लिए, सर्वसाधारण को अनुप्राणित तथा उन्हें सुपथ पर
लाने के लिए पुराण ने अनादि काल से मार्ग दर्शन किया है। पुराण वर्णाश्रम धर्म, सदाचार, व्रत, उपवास,
तिथि-कल्प, दान, तीर्थ, श्राद्ध, राजधर्म, देवार्चन पूजा, विनय तथा शील का अद्भुत कोष है।
'नीलमत' पुराण, नील के मत का वर्णन करता है। इसमें भागवत, वायु, गरुड़, ब्रह्म, मार्कण्डेय,
स्कन्दादि पुराणों के समान विशाल ज्ञान-भण्डार, आख्यान तथा वस्तु सामग्री नहीं है। वह लघु ग्रन्थ है।
उसका क्षेत्र व्यापक नहीं है। सीमित है। नीलमत पुराण को महापुराणों की श्रेणी में रखना उचित नहीं
होगा। उसका महत्त्व लौकिक है। प्रादेशिक है। निस्सन्देह उसमें अन्य विषयों का भी उल्लेख है। उसकी
रचना शैली तथा वस्तु सामग्री उसे स्थानीय अथवा उपपुराणों के वर्ग में रखने के लिए प्रेरित करती है।
नीलमत पुराणों की श्रेणी में स्थान प्राप्त कर सकता है। वंशचरित का वर्णन करता है। कल्हण ने
उसमे ऐतिहासिक सामग्री ली है। शैली पुराणों जैसी प्राचीन है। उसमे संवाद प्रतिसंवाद रूप से
घटनाओं तथा कथा वस्तु का वर्णन किया गया है। उसमें माहात्म्यो का वर्णन है। कपटेश्वर, आश्रम स्वामी,
वितस्ता माहात्म्य का विस्तृत उल्लेख है। कुछ विद्वानो ने इसे माहात्म्य की श्रेणी में रखने का प्रयास किया
है। परन्तु कल्हण स्वयं नीलमत को पुराण मानता है न कि माहात्म्य । (अ० १ : १७८-१८३)
इस पुराण का शीर्षक महत्त्वपूर्ण है। 'मत' शब्द का प्रयोग किया गया है। नाम 'नीलमत' है। स्पष्ट
करता है। पुराण नील मुनि के मत का संग्रह है। वायु, मार्कण्डेय, गरुड, ब्रह्म पुराण के समान इसे भी
नील नाम से सम्बन्धित किया गया है।
मैं सन् १९६१ ई० में कश्मीर के भद्रवा स्थान में गया था। जिस समय मैं गया था मार्ग दुरुह था।
सड़कें बन रही थी। इस समय सड़कें बन गई है। यातायात सुगम हो गया है। बस तथा मोटर वहाँ पहुँच
सकती है।
भद्रवा में वासुकी नाग का एक मन्दिर है। मुझे मालूम हुआ कि वासुकी पुराण एक समय वहाँ प्रच-
लित था। अधिक अनुसन्धान पर निष्कर्ष निकला कि वह वासुकी नाम का कोई पुराण नहीं है। इसी प्रकार एक
रत्नाकर पुराण का उल्लेख मिला है। रत्नाकर पुराण का यदि कभी अस्तित्व रहा होगा तो वह भी कश्मीर
में रचित उपपुराण ही था। भारतवर्ष में इस प्रकार के १०० या इससे अधिक पुराण एवं उपपुराण प्रचलित
थे। अनेकों का उल्लेख मिलता है। अनेकों के नाम लोप हो गये है। कश्मीर उपत्यका से भद्रवा क्षेत्र कम सुन्दर
नहीं है। जिस समय में वहाँ गया था शाली अर्थात् धान के खेत लहलहा रहे थे। कटाई निकट होने के कारण
धान कुछ सूख चला था। हरियाली लोप हो रही थी। सुनहलापन आ गया था। मालूम होता था। सुनहले धान
की बालियां खेतो में खड़ी है । किंचित् मरुत् स्पर्श से विस्तृत धान क्षेत्र में सुनहली लहरें लहर लेने लगती थी ।
आधुनिक यन्त्रमय जगत् तथा प्रतिदिन के राजनैतिक उथल-पुथल, सामाजिक वैषम्यों से दूर, हिमाद्रि की
गोद में यह स्थान साधना तथा अध्यात्म चिन्तन के लिए अनुपम स्थान है ।
नीलमत पुराण का नाम—नीलमत, नीलमत पुराण, नील पुराण तथा कहीं-कही कश्मीर माहात्म्य
के रूप में मिलता है । स्वर्गीय डा० भण्डारकर ने इस पुराण को 'कश्मीर माहात्म्य' की संज्ञा दी है । यह
ठीक नही प्रतीत होता ।
कल्हण ने राज तरंगिणी में दो बार नीलमत, दो बार पुराण तथा एक बार नील पुराण नाम से नील-
मत पुराण का उल्लेख किया है । [ रा० त० १:१४,१६,१७१,१७८,१८३२ ]
नीलमत पुराण का ऐतिहासिक महत्त्व है। कुछ विद्वानो का मत है : 'नीलमत पुराण' सन् ६००-
७०० ई० के मध्य लिखा गया है। पुराणों का रचना-काल विवादास्पद है। पुराणों के रचना, संकलन, संस्क-
रणों का निश्चय नहीं हो सका है। कुछ विद्वानों का मत है । वायु पुराण ई० पूर्व ५००, ब्रह्माण्ड पुराण ई०
पूर्व ४००, विष्णुपुराण ७००-४०० ई० पूर्व, मत्स्य पुराण ३०० ई० पूर्व तथा भागवत पुराण का रचना काल
सन् ३१० ई० है । नीलमत पुराण के रचना-काल के विषय में अनेक मत है । यह निर्विवाद है नीलमत की
कथावस्तु अत्यन्त प्राचीन है। उसकी अनेक बातें पुराणों के विपरीत प्रतीत होती हैं। अनेक विषयों में
उसका अपना मत है। अपनी मौलिकता है। सहस्रों वर्ष से कश्मीर में प्रचलित जनश्रुतियो, कथाओं, पर-
म्पराओं, स्थानों, वंशावलियों का उल्लेख है। स्वीकार करना होगा । उसका रचना-काल चाहे प्राचीन न हो
फिर भी उसमें पुरातन तथ्यों का समावेश है ।
कल्हण के उद्धरण से स्पष्ट हो जाता है। नीलमतपुराण प्राचीन ग्रन्थ था। उसका अस्तित्व बारहवीं
शताब्दी के पूर्व था । आभ्यन्तर साक्ष्य से नीलमत की प्राचीनता सिद्ध होती है । क्षेमेन्द्र, जयरथ तथा कल्हण
ने बुद्ध भगवान् के सम्बन्ध के जो विचार प्रकट किये हैं वे नीलमत से सर्वथा भिन्न हैं—नीलमत के भगवान् बुद्ध
को महत्त्वपूर्ण स्थान पूजा, उपासना आदि के प्रसंग में दिया गया है। उसमें बुद्धका प्रादुर्भाव कहा गया है।
अवतार शब्द का न होना नीलमत की प्राचीनता प्रमाणित करता है। बुद्ध को अवतार माननेका समय बहुत
बाद का है। बुद्ध धर्म नीलमत पुराण में हिन्दू-धर्म का विरोधी मत किंवा धर्म रूप में चित्रित नही किया
गया है। नीलमत उस समय की कृति है जब कश्मीर में बुद्धधर्म प्रचलित था। आदर की दृष्टि से देखा
जाता था । हिन्दूधर्म में विस्तार से वर्णित कल्किअवतार, कृष्ण राधा, तुलसी आदि का अभाव नीलमत में खट-
कता है। इस बात की ओर संकेत करता है ग्रन्थ उस समय की रचना है जब कल्कि अवतार, राधा, तथा
तुलसी दल की कल्पना नहीं की गयी थी । हरचरित चिन्तामणि से भी नीलमत पुराण प्राचीन है ।
उसके समकालीन इसे रखना उचित नही है। हरचरित चिन्तामणि मे शिव को महत्त्वपूर्ण विशेष स्थान दिया
गया है। इस बात का प्रमाण है । शैव दर्शन तथा सिद्धान्त का कश्मीर में पर्याप्त विकास हो चुका था।
यह काल नीलमत का पूर्ववर्ती काल है। कल्हण का बौद्धों की तुलना यक्षों से करना साबित करता है ।
कश्मीर में बौद्धधर्म उसके समय प्रायः लोप हो चुका था। आदर खो चुका था। जब कि नीलमत में बुद्ध
तथा बौद्धोंका आदर किया गया है।
श्री लक्ष्मीधर ने कृत्य कल्पतरु ( नियत काल काण्ड ) जो बारहवी शताब्दी के पूर्व अर्धशती की
रचना है, उसमें ब्रह्मपुराण के श्लोकों का उद्धरण दिया है। प्रायः वे ही श्लोक नीलमत पुराण में भी
हैं। इस प्रकार के कम से कम साठ पद है। किन्तु प्रकाशित ब्रह्मपुराण में वे पंक्तियां नहीं मिलती । इससे
४ राजतरंगिणी
प्रतीत होता है, कोई एक और ब्रह्मपुराण का संस्करण उस समय उपलब्ध था अथवा ब्रह्मपुराण नामका कोई
एक और ग्रन्थ था । प्राप्त ब्रह्म पुराण का उल्लेख हेमाद्रि, शूलपाणी, वाचस्पति मिश्र आदि में मिलता है । तथा
दूसरे ब्रह्मपुराण का उल्लेख लक्ष्मीधर, जीमूतवाहन, अपरार्क, हरदत्त, अनिरुद्ध भट्ट आदि में मिलता है ।
निस्सन्देह मानना पड़ेगा । ब्रह्मपुराण में कश्मीर का जो उद्धरण दिया गया है वह कश्मीरी लेखरों की ही
रचना है। उसकी रचना कश्मीर में हुई थी । अधिक सम्भावना है। वह नीलमत पुराण से ली गयी है । नील-
मत के संस्करण होते रहे हैं। नवी दशवी शताब्दी में कश्मीर के शैवदर्शन का नीलमत पुराण में समावेश
करने का प्रयास किया गया है । नीलमत पुराण में विष्णुधर्मोत्तर पुराण के कुछ पद संशोधित किंवा परिवर्तित
रूप में मिलते हैं। इस पुराण का काल चौथी से पाँचवीं शताब्दी का मध्यकाल माना गया है । नीलमत में
वैष्णव, शैव तथा बौद्धधर्म एक साथ विकसित और रहते दिखायी देते हैं । कनिष्क के समय में बौद्धधर्म का
प्राबल्य कश्मीर में हो गया था । अतएव नीलमत का अस्तित्व कश्मीर में चौथी से छठी शताब्दी के पूर्व होना
निर्विवाद प्रतीत होता है । हुयेन्त्सांग (सातवी शताब्दी ) नील के मत का उल्लेख करता है । अतएव हुयेन-
सांग के पूर्व नील मत पुराण का कश्मीर में अस्तित्व था ।
कल्हण ने राजतरंगिणी ( त. १६ ) वर्णित प्रथम चार राजाओं गोनन्द, दामोदर, यशोवती तथा
गोनन्द द्वितीय तथा श्लोक सख्या १ : ५०-८२ नीलमत के श्लोकों से मिलाया जाय तो यह प्रमाणित होता
है कि कल्हण ने उन्हें नीलमत से लिया है। कल्हण ने सुप्त राजाओं का उद्धरण, ज्येष्ठेश की कथा, सोदर तीर्थ
वर्णन, पिशाच कथा, तोर्यों तथा सतीसर, नीलजा अर्थात् वितस्ता का वर्णन नील मत पुराण के आधार पर
किया है ।
पुराणो के समय-समय पर अनेक लेखको तथा सम्पादकों द्वारा संस्करण होते रहे हैं । कोई भी कागज
अथवा भोजपत्र पर लिखी गयी पुस्तक एक सहस्र किंवा दो सहस्रों वर्षों से अधिक काल तक स्थायी नही रह
सकती । अतएव उनका पुनर्लेखन अथवा संस्करण समय-समय पर होता रहा है । संस्करण किंवा पुनर्लेखन
करने वाले के लिये अपने समय की घटना अथवा अपने मतके प्रतिपादन हेतु कुछ न कुछ पुस्तकों में परिवर्धन,
परिवर्तन किंवा संशोधन कर देना असंभव नही है। पाठान्तर हो जाना स्वाभाविक है । नीलमत पुराण के पाठ
के विषय में भी यही बात कही जा सकती है ।
नीलमत पुराण का ऐतिहासिक महत्त्व निम्नलिखित कारणों से बढ़ जाता है :
( १ ) नीलमत पुराण तत्कालीन कश्मीर संस्कृति, तथा सभ्यता का जीता-जागता चित्र उपस्थित
करता है ।
( २ ) तत्कालीन धार्मिक कृत्यों, एवं संस्कारों आदि को प्रभावित किया है ।
( ३ ) कश्मीर के स्थानो, सरोवरों, जलप्रपातो, संगमों, मन्दिरो, देव स्थानों तथा तीर्थों का तथ्य
पूर्ण सच्चा भौगोलिक वर्णन, इन स्थानों से सम्बन्धित प्राचीन तथा तत्कालीन गाथाओ का
उल्लेख सत्यता के साथ करता है । जिस प्रकार जरूसलम का वास्तविक भूगोल स्वयं बाइबिल
है, उसी प्रकार कश्मीर का भूगोल स्वयं नीलमत पुराण है ।
( ४ ) कश्मीर की जनता का चरित्र चित्रण करता है ।
( ५ ) अनेक लुप्त राजाओं के चरित्र तथा उनके वंशो का उल्लेख करता है ।
( ६ ) अनेक जातियो, गोत्रों, उनके कश्मीर में आने, निवास करने, तथा उनके पारस्परिक आन्त-
रिक एवं बाह्य संबंधों तथा जीवन पर प्रकाश डालता है ।
परिशिष्ट क ५
( ७ ) कश्मीर के भौगोलिक चित्रण के साथ-साथ भूगर्भीय तथ्य का उल्लेख करता है। वे आधुनिक
अनुसन्धानों से सत्य प्रमाणित हुए हैं।
( ८ ) कश्मीर की जनता के लिए एक आचार संहिता उपस्थित करता है।
( ९ ) प्राचीन सनातन धर्म को संक्षिप्त रूप से कश्मीरी जनता के सम्मुख रखता है।
नीलमत पुराण में अन्य पुराणों के श्लोकों का किंचित् रूपान्तर के साथ उल्लेख मिलता है। नील-
मत पुराण के रचनाकार को पुराणों, तत्कालीन प्रचलित ग्रन्थो तथा शास्त्रों का ज्ञान था। पुराणो के
कुछ श्लोकों का नीलमत पुराण में उल्लेख मिलता है। (ब्रह्म० ४३४, १, २, २९)
विष्णुधर्मोत्तर पुराण के विषय में मत हैं कि लगभग ४४०-५५० ईस्वी मे लिखा गया था। इस पुराण के
श्लोक नीलमत पुराण में मिलते हैं। अनेक स्थानों, घटनाओ तथा प्रसंगो का उल्लेख नीलमत तथा इस पुराण
में एक जैसे लगते हैं।
राजा मिहिरकुल के लगभग १०० वर्ष पश्चात् तक कश्मीर मे अन्तर्द्रोह चलता रहा है। आन्तरिक
द्वेषो के कारण राजा लोग पीड़ित थे। कश्मीर का कोई विकास नही हो सका था। यही काल नीलमत
पुराण के प्रस्तुत संस्करण का हो सकता है। नीलमत पुराण का किसी दूसरे रूप में पूरा काल में अस्तित्व
होना सम्भव है। किन्तु वर्तमान नीलमत पुराण संस्करण का यहाँ काल है। नीलमत में उल्लेख आया है।
नीलमत इस ओर संकेत करता है---स्वभेदेनेह नश्यन्ति बद्धमूला नराधिपा. ( नी० 835 )
कश्मीर भूमण्डल की किस प्रकार रचना हुई ? उसकी वर्तमान भौगोलिक स्थिति का क्या कारण है ?
इन प्रश्नों का उत्तर नीलमत पुराण देता है। गाथा रूप में यह सब बातें नीलमत पुराण में कही गयी है।
कश्मीर के तीर्थों, देव स्थानों तथा देश की रचना आदि का विषय नीलमत पुराण के लगभग दो-तिहाई
भागो में वर्णित है ( रा० १. १४. )
कल्हण ने राजतरंगिणी मे नीलमत के आधार पर सतीसर तथा जलोद्भव की गाथा का वर्णन
किया है। (रा० १: २५-२८) यही गाथा किंचित् परिवर्तित रूपमें महावश, सर्वास्तिवादी, चीनी विनय
सम्प्रदाय तथा हुयेन सांग ने दी है। आधुनिक भूगर्भीय अनुसन्धानो से प्रमाणित हो गया है। नीलमत वर्णित
गाथा तथ्यपूर्ण है। वह केवल कपोलकल्पना नहीं है।
नीलमत कश्मीर का भूगोल है। विश्वभूगोल का अन्य पुराणो के समान नीलमत वर्णन करता है।
सप्त द्वीप, नव वर्ष, सात कुल पर्वत, आदि का उसमें उल्लेख है। उसमें तीर्थों का भो उल्लेख है। कश्मीर
के पवित्र देव स्थानों, तीर्थ स्थानो का वर्णन नीलमत में यथायत् मिलेगा। उसमें नाग, शिव देवस्थान,
विष्णु देवस्थान, तीर्थ, वितस्ता के उद्गम स्थान से वारहमूला तक के तीर्थों, देवस्थानो, उसकी सहायक नदियों
का उल्लेख है। और कश्मीर के नामकरण पर भी नीलमत प्रकाश डालता है। नदियों तथा उनके स्थलों
का विस्तृत उल्लेख करता है। कश्मीर बाहर भारतवर्ष के तीर्थों तथा देवस्थानों का उल्लेख करता है।
उससे प्रतीत होता है। कश्मीर के भूगोल के साथ भारत के भूगाल का भी ज्ञान नीलमत रचनाकार
को था।
नीलमत में प्राचीन जातियों का वर्णन मिलता है। उनमें मुख्य नाग, पिशाच, दार्व, अभिसार,
गान्धार, जुहुन्द्रा, शक, खस, तंगण, माण्डव, मद्र, अन्तर्गिरि तथा बहिर्गिरि का उल्लेख है। नाग तथ पिशाच
जातियाँ कश्मीर में निवास करती थी। शेष जातियाँ कश्मीर की सीमावर्ती है। यवन शब्द का नाम के
लिये उल्लेख किया गया है।
६ राजतरंगिणी
काश्मीर के तत्कालीन सामाजिक तथा आर्थिक संगठन एवं व्यवस्था पर नीलमत प्रकाश
डालता है। वर्ण तथा आश्रम की उत्पत्ति तथा दर्शन पर नीलमत विचार नहीं करता । किन्तु उनकी मुख्य
प्रक्रियाओं तथा अंगों पर प्रकाश डालता है। चारों वर्णों के कर्त्तव्य का वर्णन करता है (नील० १४-१६ श्लोक)
कर्मकाण्ड, वेदाध्ययन, पुराण पाठ आदि, दान-दक्षिणा, राजनीति, तथा ब्राह्मणों के सम्बन्ध में
समाज की साधारण स्थिति क्या थी प्रकाश डालता है। क्षत्रियों को समाज में क्या स्थिति थी क्या
कर्त्तव्य था, ब्राह्मणों से क्या सम्बन्ध था आदि का वर्णन नीलमत में मिलता है। वैश्य तथा शूद्रों के कर्त्तव्य
पर प्रकाश डालता है। शूद्रों की निम्नस्थिति उस समय नहीं थी। जैसी आज है और समझी जाती है। ये
राजाओं के अभिषेक में भाग लेते थे। ये अस्पृश्य किंवा समाज में निम्नस्तरीय वर्ग नहीं थे। नीलमत में
विभिन्न जातियों का उल्लेख यथा औरभ्रुष, मल्ल, नट, एवं नर्तक, है। वर्णसंकर का उल्लेख नहीं मिलता ।
सूत, मागध, वन्दी का उल्लेख मिलता है ।
चारों आश्रमों के धर्म एवं कर्त्तव्यो के विषय पर नीलमत प्रकाश नहीं डालता । ब्रह्मचारी शब्द का प्रयोग
किया गया है। परन्तु उसका सम्बन्ध आचार से अधिक है, न कि विद्यार्थी जीवन से। नीलमत में बाल
विवाह प्रथा का उल्लेख नहीं है। संन्यास तथा वानप्रस्थ आश्रमों का उल्लेख है। नीलमत गृहस्थाश्रम तथा
तत्सम्बन्धी विधियों का विशेष वर्णन करता है।
तत्कालीन महिलाओं की स्थिति तथा समाज में इनका क्या स्थान था नीलमत वर्णन करता है। वह
ऐतिहासिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। कश्मीर की स्त्रियाँ परदा नहीं करती थीं। विरक्तों के मतानुसार नरक
का साधन नहीं थी। मनुष्यों के पतन का कारण नहीं थी। ये पुरुषों के समान समाज के सभी कार्यों
में समान भाग लेती थीं। वे घरों में बन्द नहीं थी। उनका स्थान, पर्वों, उत्सवों, धार्मिक कृत्यों
में पुरुष के समान था। वे कौमुदी उत्सव में भाग लेती थी। वे सुयोग्य गृहिणी रूप में चित्रित की गयी
हैं। वह खेतों के जोतने के उत्सव में गाती थी, नाचती थी, बाजा बजाती थी, इरामंजरी पूजा में वह वृक्ष
देवता के पास पूजन हेतु जाती थी। कश्मीर में प्रचुर मात्रा में सर्वत्र जल है। नाग, सरोवर, तड़ाग, हृद
एवं सरिताओं के तट पर सर्वदा कोई न कोई उत्सव होता रहता था। नर नारी जल क्रीड़ा साथ करते थे।
नीलमत आदेश देता है। कुमारी विशेषतः इन जल उत्सवों में अवश्य भाग लें। यह उत्सव श्रावणी के दिन
होता था। महिलायें सुसज्जित होती थी। पुरुषों के साथ क्रीडा करती थी। इस उत्सव का नाम महिमान
था । विभिन्न वर्ग की स्त्रियों की पूजा के लिये विभिन्न दिन निश्चित थे। माघ शुक्ल चतुर्थी, आश्वयुज, ज्येष्ठ
की चौथ, मार्गशीर्ष पूर्णमासी को महिलाओ की विभिन्न रूपों एवं प्रकारों से पूजा की जाती थी । मदन
त्रयोदशी के दिन पत्नी पति से पवित्र जल प्राप्तकर स्नान करती थी। दीप मालिका के दिन शय्या गृह सजाया
जाता था। महिलायें अकेले भी चन्द्रोदेव की पूजा करती थी। नीलमत में देवताओं के साथ ही साथ उनकी
देवियों का नाम है। उनकी पूजा का भी विधान किया गया है। कश्मीर की नदियां विभिन्न देवियों के रूप
हैं। उनके पूजा का विधान तथा समय निश्चित किया गया है। अन्य पुराणों में महिलाओं को वह स्थान
नहीं दिया गया है, जो नीलमत पुराण में प्राप्त होता है। नीलमत देवदासी प्रथा को मानता है। परन्तु उनका
काम मन्दिरों में नृत्य एवं गान करना भी भगवान की सेवा करना था। वह काम की साधन नहीं मानी
जाती थी। अतिथियों की सेवा तथा उनके सुख के लिये कार्य करना पुण्य कर्म माना जाता था ।
कश्मीर की आर्थिक समृद्धि केवल कृषि पर ही निर्भर नहीं थी। कश्मीर का व्यापार, तिब्बत,
तुर्किस्तान, मध्यएशिया, अफगानिस्तान तथा पंजाब से था । कुशान राजाओं के काल में यह व्यापार बहुत
परिशिष्ट क [top right: ७]
-वृद्धि कर गया था। हूण आक्रमणों के पश्चात् कश्मीर का बहिर्व्यापार मार्ग प्रायः बन्द हो गया। और
आर्थिक ढाँचा का आधार केवल कृषि तथा पंजाब और तिब्बत से व्यापार रह गया था। नीलमत के अनुसार
व्यापारी तथा व्यवसायी गणों का समाज में समादर होता था।
नीलमत पुराण कश्मीर के सामाजिक जीवन के उल्लासमय, आह्लादमय, आनन्दमय जीवन का
चित्रण करता है। प्रकृति की गोद में काश्मीरी पर्वों, उत्सवों की श्रृंखलाओं में प्रसन्नता पूर्ण जीवन, खेल-
कूद, पठन पाठन, आदि में व्यतीत करते थे। उनका समाज प्रगतिशील था। नीलमत सभी उत्सवों की
पीठिका में धर्म को स्थित रखता है। संगीत का सम्बन्ध गन्धर्वों से जोड़ा गया है। प्रत्येक पर्व एवं उत्सवों
पर संगीत का कार्यक्रम होता था। शास्त्रीय संगीत प्रचलित था।
पेशेवर गायक, सूत, मागध, वन्दी एवं चारण थे। वाद्य, वादिन एवं वाद्य भाण्ड प्रचलित था। घन,
वितत, तत, शुषिर, तन्तु तथा चर्म वाद्य उस समय भारत में प्रचलित थे। नीलमत आनद्धवाद्य तथा तन्त्रि-
वाद्य का उल्लेख करता है। इसके अतिरिक्त वेणु, शंख, घण्टा का भी उल्लेख मिलता है।
वीणा का नीलमत पुराण तीन बार उल्लेख करता है। कश्मीर का सत्तूर वीणा का ही विकसित
रूप है। वेणु का उल्लेख केवल एक बार नीलमत में भगवान् विष्णु के जगाने के सम्बन्ध में किया गया है।
शंख का उल्लेख दो बार किया गया है। पटह का उल्लेख नीलमत में दो बार वीणा के प्रसंग में किया गया
है। पटह नगाड़ा या दुग्गी की तरह बाजा है। इसका प्रचलन आज भी कश्मीर में है।
नृत्य संगीत के साथ होता था। नीलमत नृत्य के प्रकार का वर्णन नहीं करता परन्तु नृत्य धार्मिक
उत्सवों, सामाजिक गोष्ठियों, ऋतुओं के आगमन, कृषि उत्सवों, फलों के पकने के समय होता था। हरवान
के पुरातत्त्व खनन कार्य में एक टाइल मिला है। उसपर खरोष्ट्री लिपि अंकित है। मध्यवर्ती मूर्ति झांझ बजा
रही है। वामवर्ती बंशी बजा रही है। और दक्षिणवर्ती एक जोड़ा नगाटा अर्थात् दुक्कड़ बजा रहा है। एक
में नृत्यशील स्त्री चित्रित की गयी है। एक महिला ढोल बजा रही है। कोटिसर मन्दिर से भी महिला नर्तकी
की मूर्ति मिली है। धार्मिक कृत्यों के साथ नृत्य खूब प्रचलित था। कश्मीर के नृत्यों ने सीमावर्ती देशों तथा
अंचलों की नृत्य कला को प्रभावित किया था। सावित्री विसर्जन पर्व आज भी काश्मीरी महिलायें मानती हैं।
किसी नदी के तट पर सात बार मूर्धा पर हाथ रख कर जाती और आती हैं। वह प्राचीन नृत्य का प्रती-
कात्मक रूप रह गया है। वसन्त आगमन काल में इरा पुष्प की मालाओं से विभूषित काश्मीरी महिलायें नृत्य
एवं गान करती थीं। अशोकाष्टमी पर्व पर भी नृत्य तथा गान होता था।
खेलों का काश्मीरी जीवन में बहुत महत्त्व था। श्रावणी पर्व पर कुमारियाँ जल क्रीडा करती थीं।
नीलमत में मल्ल विद्या अर्थात् कुष्टतोप्रियता का उल्लेख मिलता है। दीपावली पर जूआ खेलने की परिपाटी
प्रचलित थी। शिकार खेलने की प्रथा थी। हरवान के टाइल्स पर शिकारी बाण चलाता दिखाया गया है।
इसे नीलमत धनुर्घोष शब्द से व्यक्त करता है। नीलमत में स्कन्द पूजा के दिन खिलौना तथा पक्षियों के पैर
में सूत बाँधकर उड़ाना प्रचलित था।
नीलमत में भवन, गृह, आलय, वेश्म, आयतन, अट्टालक आदि शब्द विभिन्न शैलियों के मकानों के
लिये प्रयुक्त हुए हैं। श्रमणों के निवास स्थान को शाक्यवास तथा पूजा स्थान को चैत्य कहा जाता था। हिन्दू
मन्दिरों के बहुत नाम मिलते हैं। परन्तु उनकी रचना शैली पर नीलमत प्रकाश नहीं डालता। हरवान के
भग्नावशेष देखने से पता चलता है। मण्डप तथा गर्भ गृह मन्दिरों में होता था। मकानों पर सफेदी की जाती
थी। वे पुष्प, माला, फल, पत्तों तथा शाली से सजाये जाते थे। सडकों तथा चतुष्पथ का उल्लेख मिलता है।
८ राजतरंगिणी
वितस्ता माहात्म्य में सेतु अर्थात् पुल का उल्लेख आता है । परन्तु पुल की शैली तथा प्रकार पर कोई प्रकाश
नहीं पड़ता ।
नीलमत प्रतिमा बनाने का उल्लेख करता है। मूर्तियाँ पाषाण, मृत्, स्वर्ण, रजत, ताम्र, कांस्य, दारु,
बालुका, ग्रास तथा घृत की बनायी जाती थी । विष्णु की शयन मूर्ति का उल्लेख मिलता है । विष्णु की चतु-
रानन मूर्ति तथा आयुध पुरुष का वर्णन मिलता है ।
चित्रकला का प्रचार था । बुद्ध जन्म के दिन चैत्य सुन्दर चित्रसारियों से सजाये जाते थे। चित्र यन्त्र,
भूमि तथा भित्ति पर बनाये जाते थे । भूमिशोभा अर्थात् भूमि पर चित्र बनाना खूब प्रचलित था ।
नीलमत में परिधान का उल्लेख—वस्त्र, अम्बर, वासा, वसन, सवित, चीनांशुक, कम्बल तथा प्रावरण
रूप में मिलता है । चीनांशुक चीन से आयात किया रेशमी वस्त्र था । शाबरन का महाभारत में भी उल्लेख
मिलता है । पाणिनि तथा कौटिल्य को भी इसका ज्ञान था । पौटिस्य इम प्रावरक बहुता है । नये वस्त्र के
लिये 'अहत' शब्द का प्रयोग किया गया है । श्रमणों के चीवर तथा बिस्तर के चादर का भी वर्णन नीलमत
करता है । उद्वर्तन, उत्सादन तथा अनुलेपन का शृंगार के प्रसंग में वर्णन किया गया है ।
भोजन में सभी प्रकार के खाद्य पदार्थों का वर्णन मिलता है। शाक में सभी सब्जियाँ तथा शस्य में
सभी अन्न पदार्थों का समावेश हो जाता है । मास भोजन का भी उल्लेख मिलता है । विष्णु के पाँच दिन
पूजा के अवसर पर मास भोजन निषेध किया गया है । एक स्थान पर विष्णु पूजा के प्रसंग में बलि का
उल्लेख किया गया है । पिशाच, चन्दोदेव तथा भद्र काली को आमिष प्रसाद चढ़ाया जाता था । सुरापान
तथा असुरापान दोनों का उल्लेख मिलता है ।
राज्य की सात प्रकृति मानी गयी है । नीलमत में स्वामी तथा राष्ट्र की प्रकृति पर ही प्रकाश डाला
गया है । राजा के दैवी सिद्धान्त को नीलमत मानता है । उसे धर्म तथा राजशास्त्र के अनुसार व्यवहार करने
का आदेश देता है। नीलमत मन्त्रियों का उल्लेख करता है। परन्तु उनके कर्त्तव्याकर्त्तव्य पर प्रकाश नहीं डालता।
नीलमतपुराण सेना तथा युद्ध के प्रकार तथा संघटन पर प्रकाश डालता है । चतुरंग बल में, पदा-
तिक, अश्वारोही, गज तथा रथ सेना थी । युद्ध नियम के सम्बन्ध में नीलमत विस्तृत वर्णन उपस्थित करता
है । बालक राजा युद्ध में भाग नहीं ले सकता था । युद्ध क्षेत्र में भयभीत तथा भागते हुए शत्रु पर प्रहार
वर्जित था । पराजित राजा के राज्य का अपहरण नहीं किया जाता था। उसके उत्तराधिकारी को राज्य
वापस कर दिया जाता था । सन्तानहीन गर्भवती रानी अपने पति के सिंहासन को ले सकती थी । कश्मीर
में राजतन्त्र था तथापि उसमें लोक तन्त्र का अंश दिखायी देता है । राजाविहीन नगर के यात्रोत्सव में
प्रधान सब संस्कार तथा राजोचित कार्यों को करता था । राजा के वार्षिक अभिषेक के समय गणमुख्य,
वारमुख्य, पौरमुख्य का उल्लेख आता है । गणमुख्य गणराज्य के मुखिया थे ।
नीलमत पुराण कश्मीर के धार्मिक सम्प्रदाय तथा मतों का उल्लेख करता है । यह मत-मतान्तर
वैदिक देवताओं को केन्द्र मानकर चलते थे । बौद्ध भी भिन्न धर्म के स्थान पर एक सम्प्रदाय माना जाता था ।
मुख्य सम्प्रदाय, विष्णु तथा उसके अवतारों को लेकर चला था । नील मत में मत्स्य, कूर्म, हंस, अश्वशिर
अर्थात् हयग्रीव, नरसिंह, वामन, राम, कृष्ण का वर्णन मिलता है । राम नवमी पर ब्राह्मण तथा बुद्ध जन्म
पर शाक्यों को पूजा का विधान है किन्तु कृष्ण जन्म तथा तत्सम्बन्धी उत्सव का उल्लेख नीलमत में नहीं है ।
प्रतीत होता है कि कृष्ण को अवतार प्रारम्भ में नहीं माना गया था। दूसरा सम्प्रदाय शैव था। नीलमत
परिशिष्ट क ९
पुराण शिव को त्रिमूर्ति में एक मानता है। उमा को वह शिव से भी अधिक महत्त्व देता है। वितस्ता का
रूप उमा कश्मीर में धारण करती है। दुर्गा तथा शारदा की पूजा का भी विशेष महत्त्व था। शिवमत के
साथ गणेश, स्कन्द, शाख, विशाख, नैगमेश, की पूजा का भी विधान किया गया है।
विष्णु तथा शिव मत केअतिरिक्त ब्रह्मा, वरुण, अग्नि, रैवत, यम, इन्द्र, सूर्य, चन्द्रमा, कुबेर, बलदेव,
चन्दो देव, आदित्य, वसु, साध्य, विश्व देव, एवं मरुत की उपासना तथा पूजा देवता स्वरूप मान कर की
गई है। लक्ष्मी, उमा के अतिरिक्त सरिता देवियाँ यथा वितस्ता, विशोका, त्रिकोटि, हर्षपथा, तथा चन्द्रा-
वती क्रमशः उमा, लक्ष्मी, अदिति, शची, एवं दिति की रूप मानी गयी है।
नीलमत बुद्ध को विष्णु का अवतार मानता है। वैशाख मास में बुद्ध जन्मोत्सव मनाने का विधान
करता है। बुद्ध जन्म के समय चैत्य तथा शाक्यों के स्थानो को चूना पोत कर सफाई कराकर दीवालों को
चित्रकारी से सजाना चाहिए। गरीबों को दान, तथा भोज्य पदार्थों को चढाना चाहिये। उस दिन बुद्धप्रतिमा
को पवित्र सुगन्धित जल से स्नान कराना चाहिए। अन्य पुराणों तथा नीलमत पुराण के बुद्ध आदि में
अन्तर है। अन्य पुराण बुद्ध को अवतार मानकर भी उनके मत से लोगो को विरत होने के लिये प्रेरित करते हैं।
परन्तु नीलमत उनके मत का आदर कर उनकी उपासना की विधि प्रस्तुत करता है। कश्मीर में भी कल्हण
के काल तक विचारो में अन्तर पड़ गया था। क्षेमेन्द्र, वरदराज, कल्हण एवं जयरथ के लेखों में बौद्ध धर्म
को हिन्दू धर्म के विरोधो रूप में चित्रित किया गया है।
नाग पूजा का विशेष स्थान कश्मीर के प्रारम्भिक काल में है। मिश्र, यूनान, रोम, चीन, जापान,
फोनोशियन तथा अरबों में इस पूजा का विधान मिलता है। नीलमत शिव को व्याल यज्ञोपवीती कहा है।
वैष्णव मत ने भी नाग को भगवान् विष्णु की शय्या बनाकर स्वीकार किया है। विष्णु पुराण में विष्णु को नाग
का स्वामी कहा गया है। नीलमत में नाग देवता का अधिकार वर्षा, तूफान, तुषारपात पर था। वे नाग,
सरोवर तथा तड़ागों में निवास करते हैं। उनकी पूजा का विधान विस्तृत रूप से नीलमत पुराण देता है।
नीलमत पुराण तत्कालीन कश्मीर के व्रत, उत्सव आदि का विस्तृत वर्णन करता है। उनमें अश्व-
युज, कौमुदी, सुखसुप्तिका, देवोत्थान, नव संवत्सर महोत्सव, सप्तमी, मार्गशीर्ष पूर्णमासी, नव हिमप्रतोत्सव,
अष्टमी त्रय, पौष पूर्णमासो, उत्तरायण, तिल द्वादशी, तारा रात्रि, श्रावण अमाबस्या, चतुर्थ्यः, माघ पूर्णिमा,
महिमान, श्रावण द्वादशी; चित्ररात्रि, द्वितीय महिमान, फाल्गुनी, राजगीरस्नापन, कुष्पारम्भ, चन्दो देव पूजा,
पिशाच चतुर्दशी, चैत्रामा, नव संवत्सर, श्री पंचमी, चैत्र षष्ठी, चैत्र नवमी, वास्तु पूजा, चैत्र द्वादशी, मदन
त्रयोदशी, पिशाच प्रयाण, इरामंजरी पूजा, अक्षय तृतीया, बुद्ध जन्म, वैशाख पूर्णिमा, यवाग्रायण, विनायकाक्ष
तपः, स्वाति योग, प्रस्वापन, वैश्वदेव पूजा, दक्षिणायन, रोहिणी संयोग, श्रावणी, कृष्ण जन्म, मघामावसी,
भाद्रपद शुक्लकृत्य, षाढ पक्ष, महानवमी, अगस्त्य दर्शन, नवान्नविधान, वरुण पंचमी, अशोकिष्काष्टमी,
वितस्तोत्सव, चतुर्थ्यत्रितयं, अश्वदीक्षा, हस्तिदीक्षा, भद्रकाली पूजन, गृहदेव पूजा, श्यामा देवी पूजा यात्रो-
त्सव हैं।
नीलमत में दर्शन का प्रसंगवश वर्णन मिलता है। उसमें सर्ग, त्रिभुवन, सूर्य्य, चन्द्र, नक्षत्र, ग्रह,
ऋतु, पंच तत्त्व, महाभूत, प्रकृति, अनेक देवता वाद, एकेश्वर बाद, नरपशु रूप देव, आत्मवाद, विश्वदेवैवय
वाद, अद्वैत वाद, पूर्वजन्म, कर्मकाण्ड, भक्ति सम्प्रदाय, आचार, शैव पांचरात्र आदि पर प्रकाश पड़ता है।
नीलमत के १३९६ छन्दों में १३५७ अनुष्टुप् छन्द है।
२
८ राजतरंगिणी
वितस्ता माहात्म्य में सेतु अर्थात् पुल का उल्लेख आता है। परन्तु पुल की शैली तथा प्रकार पर कोई प्रकाश
नहीं पड़ता ।
नीलमत प्रतिमा बनाने का उल्लेख करता है। मूर्तियाँ पाषाण, मृण, स्वर्ण, रजत, ताम्र, कांस्य, दारु,
बालुका, ग्रास तथा घृत की बनायी जाती थीं। विष्णु की शयन मूर्ति का उल्लेख मिलता है। विष्णु की चतु-
रानन मूर्ति तथा आयुध पुरुष का वर्णन मिलता है।
चित्रकला का प्रचार था। बुद्ध जन्म के दिन चैत्य सुन्दर चित्रकारियों से सजाये जाते थे। चित्र वस्त्र,
भूमि तथा भित्ति पर बनाये जाते थे। भूमिशोभा अर्थात् भूमि पर चित्र बनाना खूब प्रचलित था।
नीलमत में परिधान का उल्लेख - वस्त्र, अम्बर, वासा, वसन, संवित, चीनांशुक, कम्बल तथा प्रावरण
रूप में मिलता है। चीनांशुक चीन से आयात किया रेशमी वस्त्र था। प्रावरण का महाभारत में भी उल्लेख
मिलता है। पाणिनि तथा कौटिल्य को भी इसका ज्ञान था। कौटिल्य इसे प्रावरक कहता है। नये वस्त्र के
लिये 'अहत' शब्द का प्रयोग किया गया है। श्रमणों के चीवर तथा बिस्तर के चादर का भी वर्णन नीलमत
करता है। उद्वर्तन, उत्सादन तथा अनुलेपन का श्रृंगार के प्रसंग में वर्णन किया गया है।
भोजन में सभी प्रकार के खाद्य पदार्थों का वर्णन मिलता है। शाक में सभी सब्जियों तथा शस्य में
सभी अन्न पदार्थों का समावेश हो जाता है। मांस भोजन का भी उल्लेख मिलता है। विष्णु के पाँच दिन
पूजा के अवसर पर मांस भोजन निषेध किया गया है। एक स्थान पर विष्णु पूजा के प्रसंग में बलि का
उल्लेख किया गया है। पिशाच, चण्डोदेव तथा भद्र काली को आमिष प्रसाद चढ़ाया जाता था। सुरापान
तथा असुरापान दोनों का उल्लेख मिलता है।
राज्य की सात प्रकृति मानी गयी हैं। नीलमत में स्वामी तथा राष्ट्र को प्रकृति पर ही प्रकाश डाला
गया है। राजा के दैवी सिद्धान्त को नीलमत मानता है। उसे धर्म तथा राजशास्त्र के अनुसार व्यवहार करने
का आदेश देता है। नीलमत मन्त्रियों का उल्लेख करता है। परन्तु उनके कर्त्तव्याकर्त्तव्य पर प्रकाश नहीं डालता।
नीलमतपुराण सेना तथा युद्ध के प्रकार तथा संघटन पर प्रकाश डालता है। चतुरंग बल में, पदा-
तिक, अश्वारोही, गज तथा रथ सेना थी। युद्ध नियम के सम्बन्ध में नीलमत विस्तृत वर्णन उपस्थित करता
है। बालक राजा युद्ध में भाग नहीं ले सकता था। युद्ध क्षेत्र में भयभीत तथा भागते हुए शत्रु पर प्रहार
वर्जित था। पराजित राजा के राज्य का अपहरण नहीं किया जाता था। उसके उत्तराधिकारी को राज्य
वापस कर दिया जाता था। सन्तानहीन गर्भवती रानी अपने पति के सिंहासन को ले सकती थी। कश्मीर
में राजतन्त्र था तथापि उसमें लोक तन्त्र का अंश दिखायी देता है। राजाविहीन नगर के यात्रोत्सव में
प्रधान सब संस्कार तथा राजोचित कार्यों को करता था। राजा के वार्षिक अभिषेक के समय गणमुख्य,
पौरमुख्य का उल्लेख आता है। गणमुख्य गणराज्य के मुखिया थे।
नीलमत पुराण कश्मीर के धार्मिक सम्प्रदाय तथा मतों का उल्लेख करता है। यह मत-मतान्तर
वैदिक देवताओं को केन्द्र मानकर चलते थे। बौद्ध भी भिन्न धर्म के स्थान पर एक सम्प्रदाय माना जाता था।
मुख्य सम्प्रदाय, विष्णु, तथा उसके अवतारों को लेकर चला था। नील मत में मत्स्य, कूर्म, हंस, अश्वशिर
अर्थात् हयग्रीव, नरसिंह, वामन, राम, कृष्ण का वर्णन मिलता है। राम नवमी पर ब्राह्मण तथा बुद्ध जन्म
पर दास्यों को पूजा का विधान है किन्तु कृष्ण जन्म तथा तत्सम्बन्धी उत्सव का उल्लेख नीलमत में नहीं है।
प्रतीत होता है कि कृष्ण को अवतार प्रारम्भ में नहीं माना गया था। दूसरा सम्प्रदाय शैव था। नीलमत
[परिशिष्ट क]
[९]
पुराण शिव को विभूति में एक मानता है। उमा को वह शिव से भी अधिक महत्त्व देता है। वितस्ता का
रूप उमा कश्मीर में धारण करती है। दुर्गा तथा शारदा की पूजा का भो विशेष महत्त्व था। शिवमत के
साथ गणेश, स्कन्द, शाख, विशाख, नैगमेश, की पूजा का भी विधान किया गया है।
विष्णु तथा शिव मत के अतिरिक्त ब्रह्मा, वरुण, अग्नि, रैवत, यम, इन्द्र, सूर्य, चन्द्रमा, कुबेर, बलदेव,
चन्दो देव, आदित्य, वसु, साध्य, विश्व देव, एवं मरुत की उपासना तथा पूजा देवता स्वरूप मान कर की
गई है। लक्ष्मी, उमा के अतिरिक्त सरिता देवियां यथा वितस्ता, विशोका, त्रिकोटी, हर्षपथा, तथा चन्द्रा-
वती क्रमशः उमा, लक्ष्मी, अदिति, शची, एवं दिति की रूप मानी गयी हैं।
नीलमत बुद्ध को विष्णु का अवतार मानता है। वैशाख मास में बुद्ध जन्मोत्सव मनाने का विधान
करता है। बुद्ध जन्म के समय चैत्य तथा शाल्यों के स्थानो को चूना पोत कर सफाई कराकर दीवालो को
चित्रकारी से सजाना चाहिए। गरीबो को दान, तथा भोज्य पदार्थों को चढाना चाहिये। उस दिन बुद्धप्रतिमा
को पवित्र सुगन्धित जल से स्नान कराना चाहिए। अन्य पुराणों तथा नीलमत पुराण के बुद्ध आदि में
अन्तर है। अन्य पुराण बुद्ध को अवतार मानकर भी उनके मत से लोगों को विरत होने के लिये प्रेरित करते हैं।
परन्तु नीलमत उनके मत का आदर कर उनकी उपासना की विधि प्रस्तुत करता है। कश्मीर में भी कल्हण
के काल तक विचारो में अन्तर पड़ गया था। क्षेमेन्द्र, वरदराज, कल्हण एवं जयरथ के लेखों में बौद्ध धर्म
को हिन्दू धर्म के विरोधी रूप में चित्रित किया गया है।
नाग पूजा का विशेष स्थान कश्मीर के प्रारम्भिक काल में है। मिश्र, यूनान, रोम, चीन, जापान,
फोनीशियन तथा अरबों में इस पूजा का विधान मिलता है। नीलमत शिव को व्याल यज्ञोपवीती कहा है।
वैष्णव मत ने भी नाग को भगवान् विष्णु की शय्या बनाकर स्वीकार किया है। विष्णु पुराण में विष्णु को नाग
का स्वामी कहा गया है। नीलमत में नाग देवता का अधिकार वर्षा, तूफान, तुषारपात पर था। वे नाग,
सरोवर तथा तड़ागो में निवास करते है। उनकी पूजा का विधान विस्तृत रूप से नीलमत पुराण देता है।
नीलमत पुराण तत्कालीन कश्मीर के व्रत, उत्सव आदि का विस्तृत वर्णन करता है। उनमें अश्व-
युज, कौमुदी, सुखसुप्तिका, देवोत्थान, नव संवत्सर महोत्सव, सप्तमी, मार्गशीर्ष पूर्णमासी, नव हिमप्रवेशोत्सव,
अष्टमी क्षय, पौष पूर्णमासी, उत्तरायण, तिल द्वादशी, तारा रात्रि, श्रावण अमावस्या, चतुर्यमः, माघ पूर्णिमा,
महिमान, श्रावण द्वादशी; शिवरात्रि, द्वितीय महिमान, फाल्गुनी, राजनोत्स्थापन, कृष्यारम्भ, चन्दो देव पूजा,
पिशाच चतुर्दशी, चैत्रामा, नव संवत्सर, श्री पंचमी, चैत्र षष्ठी, चैत्र नवमी, वास्तु पूजा, चैत्र द्वादशी, मदन
त्रयोदशी, पिशाच प्रयाण, इरामंजरी पूजा, अक्षय तृतीया, बुद्ध जन्म, वैशाख पूर्णिमा, यवाग्रायन, विनादद्वादश
तपः, स्वाति योग, प्रस्वापन, वेदवदेव पूजा, दक्षिणायन, रोहिणी संयोग, श्रावणी, कृष्ण जन्म, मन्मनावशी,
भाद्रपद शुक्लकृत्य, धाठ पक्ष, महानवमी, अगस्त्य दर्शन, नवात्रविधान, वरन पंचमी, अशीतिकाष्टमी,
वितस्तोत्सव, चतुर्थात्रितयं, अश्वदीक्षा, हस्तिदीक्षा, भद्रकाली पूजन, गृहदेव पूजा, श्यामा देवी पूजा यात्रो-
त्सव है।
नीलमत में दर्शन का प्रसंगवश वर्णन मिलता है। उसमें मर्ग, त्रिभूवन, सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र, ग्रह,
ऋतु, पंच तत्त्व, महाभूत, प्रकृति, अनेक देवता वाद, एकेश्वर वाद, नरपशु रूप देव, आत्मवाद, विश्वदेवोद्भव
वाद, अद्वैत वाद, पूर्वजन्म, कर्मकाण्ड, भक्ति सम्प्रदाय, आचार, शैव पांचरात्र आदि पर प्रकाश पड़ता है।
नीलमत के १३९६ छन्दों में १३५७ अनुष्टुप् छन्द है।
२
१० राजतरंगिणी
नीलमत पुराण में मुख्य नागों किंवा जलस्रोतों अथवा चश्मों का वर्णन मिलता है। कश्मीर मण्डल
के चतुदिशाओं में स्थित दिक्पाल नागो तथा सहस्रो नागों के होने का उल्लेख किया गया है (जो० ९००-
९०५)
लगभग ६० नदियो का उल्लेख नीलमत पुराण में मिलता है वे कश्मीर तथा मद्रदेश दोनों क्षेत्रों
की है :
ज्ञात · अपगा (अयुक्त) चन्द्रभागा (चिनाव) गोदावरी (गोदर पर्वत के समीप) गोतमी (गोमती ?
वाराह पर्वत के समीप) हर्यपथा (आरपथ) अनन्त नाग के समीप वितस्ता में मिलती है। हिरण्या
(कनकवाहिनी) इरावती (रावी) कालोदक (नुन्द कोल गंगा सर से उद्गमित स्रोतस्विनी) कनक वाहिनी
(कनकनी) कया (अमया-गंगोद्भेद समीपस्य) कौण्डिन्य-कौलिन्य (नोवन्धन समीपस्य कौण्डिन्य सर से
उद्गमित स्रोत) कृष्ण (कृष्ण गंगा) क्षीर नदी (वत्सकुल) दूसरी मधुवती बन्दपोर का नाला है कुलेस गांव
के समीप उत्तर मे ऊलर लेक में मिलता है। श्वेत गंगा (एकमत में चित्ती नदी) मधुमती (पदुमती
अल्बेरूनी कथित) माहुरी (मवुर) श्याला (हमल) सन्ध्या (सुन्दवदार) सरस्वती (कनक्तोरी)
सिन्धु, तोषी (तोही ?) निलप्रस्था (माहुरी) उहृ (उह्न पाणिनि तथा ऊर्ध्वः दि० धर्मोत्तर पुराण)
वशोका (विसाऊ) वितस्ता (झेलम)।
अज्ञातः अधदुधान, भूर्जला, चन्द्रावती, चतुर्वेदी, चित्रपथा, देवहूत, देवकुल्या, देविका (देघ ?)
धन्याधरणी, गगा, (कश्मीर की अनेक नदियों को गंगा कहते है) गोशृन्दी, कुलार्णा, कुमुनारी, भृङ्गी,
मालिनी, मन्दाकिनी, मृग-मृगनन्दा, पालासा, परोष्णि, राहुला, रामहृद, ऋषिकुल्या, समूला, सरसा, शाण्डिली,
शतशिला, शिलामा, सुधा, सुगन्धा, सुखा (सुर्कग ?, तेलाला, त्रिकोटि, वैतरनी (एकमत है। सुपियान
के अधोभागीय रामग्यार नदी है।) विश्वमित्र।
महापद्म सर अर्थात् ऊलर लेक का वर्णन नीलमत पुराण में मिलता है। ऊलर लेक के स्थान पर
पूर्व काल में चन्द्रपुर नगर था। उसके जल में लोप अर्थात् जल में डूब जाने के पश्चात् उस स्थान पर ऊलर
लेक बन गया। सम्भव है कि पुरातन चन्द्रपुर का समस्त नगर भूचालादि के कारण भूमिस्य हो गया हो। भूमि
नीचे दब गयी हो। इस प्रकार उस स्थान पर पानी भर कर सर का रूप ले लिया होगा। कश्मीर में भूचाल
आना साधारण बात है। दो हजार वर्षों में भौगोलिक परिस्थितियों में बहुत कुछ परिवर्तन हो जाना
सम्भव है।
पुराण में शिव, शंकर किंवा महादेव से सम्बन्धित तीर्थों का वर्णन बहुत मिलता है। अन्य देवताओ
से सम्बन्धित तीर्थों का पर्याप्त उल्लेख है। किन्तु कश्मीर में शैव धर्म, शैव तन्त्र एवं दर्शन का अत्यधिक प्रभाव
होने के कारण अत्यधिक तीर्थ तथा देवस्थानो का सम्बन्ध शिव, उनके गण तथा शक्तियों से है।
भूतेश्वर माहात्म्य का उल्लेख नीलमत में आता है। इस माहात्म्य की गाथा में हरमुकुट पर्वत के अनेक
सरोवरों, तीर्थों तथा पवित्र स्थानों का वर्णन है। यह पर्वत शिव तथा पार्वती के तीर्थों से सम्बन्धित होने के
कारण अत्यन्त पवित्र माना गया है। कश्मीर के धार्मिक जीवन में अपेक्षाकृत अधिक महत्त्व इस पर्वत को
दिया गया है।
नीलमत पुराण में कश्मीर के पर्वतों का वर्णन है। हिमालय के अतिरिक्त बहिर्गिरि, (चुल्ल हिमवन्त),
अन्तर्गिरि (महा हिमवन्त) उपगिरि (शेवालिक तराई) उशीरूक (द्वार देश समीपस्य दक्षिण कश्मीर)।
यह पर्वत विनय वर्णित उशीरध्वज, दिव्यावदान का उशीर गिरि, पाली साहित्य का उशीनर, कथासरित-
परिशिष्ट क ११
सागर का उशीनर गिरि, तथा नीलमत का उसीरका है। कनसैल के उत्तर एक पहाड़ को उशीरगिरि कहते
हैं। पंजाब के उत्तर पीरपंचास पर्वत श्रेणी है। वह दक्षिणी तथा दक्षिणो पश्चिमी कश्मीर की सीमा है।
क्षेमेन्द्र उसे पंचाल धारा कहता है। नीलमत मे यह शब्द नहीं है। उसमें ब्रह्मा, विष्णु, महेश शिखर का
उल्लेख है। तीनों बनिहाल पास के पश्चिम है। उनमें नौ बन्धन सबसे ऊँचा शिखर है। यहीं मत्स्यावतार
में विष्णु ने नाव बाँधा था।
हरमुकुट किंवा हरमुण्डपर्वत हरमुख शिखर उत्तरी कश्मीर का है। वह सत्तरह हजार फिट ऊँचा है।
उत्तर मानस कश्मीरी गंगा का स्रोत है। इस पर्वत के उत्तर पूर्व पाद में हिमानी के समीपस्थ है। नन्दि
क्षेत्र तथा भूतेश्वर के तीर्थ यही है। मन्दि पर्वत मुन्द लोक (कालोदक) को हिमानी से भरता है।
भरत गिरि हरमुकुट के दक्षिण पूर्व है। अमरेश्वर हिमाच्छादित अमरनाथ है। महादेव गिर धुर
पश्चिमी अत्यन्त उच्च शिखर है। वह सिन्धु उपत्यका तथा पूर्वीय पर्वत माला के मध्य है। इन्द्र कील तथा
गौरी शिखर का नीलमत में वर्णन है। एक मत है। कश्मीर के पश्चिम किसी पर्वत का वह नाम है शारदी
के समीप ।
नीलमत पुराण तीर्थों तथा पवित्र स्थानों का वर्णन करता है। मुख्य उनमें निम्नलिखित हैं :
ज्ञात :
एल पत्र नाग (विचार नाग ग्राम समीपस्थ) अक्षपाल नाग (अचबल), अनन्त नाग, बहुरूप
(योरू ग्राम—पीरपंचाल पर्वत को दिशा में) भद्र काली (बदरकल ग्राम क्रमसर से चार मील दूरस्थ) भेड़ा
देवी (बुदवार श्रीनगर से पश्चिम, गंगोद्भेद तीर्थ) भीमा देवी (फाक परगना में, डलतट पर खान ग्राम)
भूतेश्वर (हरमुकुट पर्वत श्रुतसर) चक्रधर तीर्थ (तस्कदर उद्भ), चोर मोचन=चीर प्रमोचन (ग्रंग ग्राम)
देवसर (छोटा सर, दक्षिण पूर्व उत्तर परगना) गणेश (गणेश बल लिदर नदी दक्षिण तटस्थ) गौतम नाग
(अनन्त नाग के उत्तर) हंसद्वार (मुन्द प्रस्थ गिर केसमीप । एक मत इसे हुंजा मानता है) हस्तिकर्ण नाग
(गांव बाग होम अर्थात् मरहोम के दक्षिण पूर्व दो मील पर) इष्टिका पथ (लार परगना में राम रादन
गांव) ज्येष्ठेश (हरमुकुट पर्वत मूल भूतेश्वर वशिष्ठाश्रम वांगय समीपस्थ) कपटेश्वर, (कोथर ग्राम) कपिल
तीर्थ (कपटेश्वर समीपस्थ ?) कालोदक (मुन्दकोल) कोटि तीर्थ (बारहमूला समीपस्थ कोटिसर)
खण्ड पुच्छ नाग (अनन्त नाग समीपस्थ झनबल) लोकपुण्य, (द्रिंग परगना में लरिकपुर
समीपस्थ नाग) लोवार (लिवर ग्राम—विजब्रोर से १० मिल उत्तर-पूर्व स्थित) महापद्म (उलर
लेक) मानस (मनसा बल) नन्दन नाग। (नन्दन सर—दरहल पास समीपस्थ) नन्दिकुण्ड, नन्दि
पर्वत, नन्दोश्वर (नन्दिक्षेत्र—हरमुकुट पर्वत पाद में) नारायण स्थान (भरस्तान ट्राल घाटी में)
पंचहस्त (पंजय ग्राम—दिवसर परगना में) पाण्डव तीर्थ (पाण्ड चक—श्रीनगर से दक्षिण-पूर्व पाच मील
स्थित) पुष्कर (पोस्कर-फिरोकपुर तथा कंग मध्य, पहाड़ी मूल की पूर्व दिशा में) राम तीर्थ (रामुह ग्राम)
स्वयम्भू (मच्छीपुर परगना में सुयम ग्राम) सोदर नाग (सुदर बल) तक्षक नाग (जयवन स्रोत समीपस्थ
जेवन स्थान) तारा सर (तर सर सिन्ध उपत्यका ?) त्रिपुरेश (त्रिफर गांव ढल से तीन मील दूरस्थ)
वराहमूला (वारह मूला) वशिष्ठाश्रम (वंगथ) वासुकी नाग (एक नाग पंचहस्त उपत्यका के दक्षिण या
भद्रव ?) (विजयेश्वर विजद्रार)
अज्ञात :
चन्द्रसर (सम्भवतः सिन्ध नदी तथा कश्मीर के मध्य ऊँचे पर्वत पर है)
१२ राजतरंगिणी
भारतवर्ष के निम्न लिखित तीर्थों का उल्लेख नीलमत में प्राप्य है :
गंगा द्वार, कुशावर्त, वृद्धजाह्न, नील पर्वत (कनखल), नैमिसार, हयशिरप, प्रयाग, वाराणसी, गंगा
सागर संगम, नदी वरुणा, असी, ब्राह्मणी, वैतरणी, महानदी, तमसा, शोण, सरयू, इक्षुमती, शतकुम्भा, वेद-
स्मृति, केदार, बदर, भृगुतुंग, यह सब तीर्थ पूर्व, पूर्व दक्षिण, तथा उत्तर पूर्व वर्तमान कनखल के हैं । पंच-
नद, कुरुक्षेत्र, पृथूदक, प्रभास, पुष्कर, रैवत, सिन्धु सागर संगम, कनकाबल के पश्चिम दिशा में स्थित हैं ।
क्षिप्रा, शाकम्भरी, विशाला, गोकर्ण, अगस्त्याश्रम, सुवर्ण, नर्मदा, रुद्रकोटि, सुमन्धा, गोदावरी, ताम्र-
वर्णी, उत्पलावती, तथा कावेरी कनखल के दक्षिण स्थित है ।
शिवकी वाराणसी से हरमुकुट की यात्रा के प्रसंग में नीलमत पुराण मे, प्रयाग, अयोध्या नैमिष,
गंगाद्वार, स्थानेश्वर, कुरुक्षेत्र, शतद्रु, विपाशा, तथा इरावती का उल्लेख मिलता है ।
कपटेश्वर माहात्म्य के सम्बन्ध में कुछ सामग्री नीलमतपुराण से प्राप्त होती है । कपटेश्वर वर्तमान
कोठर ग्राम है ।
शिव तथा शैवमत से सम्बन्धित तीर्थों के पश्चात् विष्णु भगवान् से सम्बन्धित तीर्थों तथा देव-स्थानों
का वर्णन मिलता है । काश्मीर में शिव माहात्म्य तथा शिव एवं पार्वती के संदर्भ में जितनी अधिक सामग्री,
साहित्य तथा लेख मिलते हैं, उसकी अपेक्षा भगवान् विष्णु के विषय में स्वल्प साहित्य, सामग्री तथा लेख
प्राप्य हैं ।
नीलमत पुराण के प्राप्य संस्करण के अनुसार प्रकट होता है । उसके रचना अथवा संस्करण के
समय कश्मीर में शैव मत तथा शिव पूजा का विशेष प्रचार था । शिव तथा पार्वती सम्बन्धी अनेक व्रत,
उपवास, उपासना तथा पूजा का प्रकार कश्मीर में प्रचलित था । विष्णु पूजा का महत्व जनता में शिव के
पश्चात् था । प्रारम्भ से ही शिव भक्ति तथा उपासना कश्मीर में अधिक लोकप्रिय भी है । इससे प्रकट
होता है । शिव उपासना तथा तत्सम्बन्धी गाथाओं का प्रमुख स्थान कश्मीरी जन जीवन में था । उनका
जीवन शैव दर्शन तथा तन्त्र द्वारा प्रभावित था । ( ११६९-१२४८ )
कश्मीर के तीर्थों का विस्तृत वर्णन नीलमत पुराण के श्लोक संख्या १२७१-१३७२ मे किया गया
है । इनका अध्ययन कश्मीर के तत्कालीन भौगोलिक ज्ञानवर्धन निमित्त विशेष महत्व रखता है । तीर्थों,
उनके स्थानीय महत्वों और उनसे सम्बन्धित गाथाओं एवं जनश्रुतियों तथा उनके माहात्म्यों का विशद वर्णन
सम्पूर्ण नीलमत पुराण में मिलता है ।
नीलमत पुराण के वर्णनों तथा भौगोलिक स्थितियों के कारण तीर्थों तथा उल्लिखित स्थानों का
पता निश्चयात्मक ढंग से लगाया जा सकता है । नीलमत पुराण के भौगोलिक वर्णनों के आधार पर आधु-
निक विद्वानों ने अनेक स्थानो का सफलतापूर्वक पता लगाया है । तीर्थों तथा देव-स्थानों के मूल नाम तथा
उनकी भौगोलिक स्थिति के भूल जाने का कारण कश्मीर की ९० प्रतिशत जनता का हिन्दू धर्म त्याग कर
मुस्लिम धर्मावलम्बी हो जाना है । उनकी दृष्टि में इन तीर्थों तथा देव-स्थानों का कोई धार्मिक महत्व नही
रह गया था । इस समय शायद ही कोई प्राचीन देव-स्थान तथा तीर्थ होगा जो मुस्लिम जियारत, मस्जिद
या कब्रिस्तान में परिणत न कर दिया गया हो अथवा उनके पास जियारतें आदि न बना दी गयी हों । इसमें
मुसलमानों को दोष नहीं दिया जा सकता । उन तीर्थों की कोई खबर लेने वाला नही था । उनकी पूजा,
उपासना, मरम्मत आदि समाप्त हो गयी । ये काल के थपेड़ों में नष्ट होने लगे । उनका इतिहास लोग भूल
परिशिष्ट क १३
गये। उनसे सम्बन्धित गाथाओं का लोप हो गया । इनके स्थान पर नए धर्म के इतिहास, गाथा तथा कथा-
नकों का प्रचलन हो गया। खण्डित मूर्तियों, मन्दिरों, देवस्थानो, तीर्थों के उपेक्षित ध्वंसावशेषो, उनके
पत्थरों तथा ईंटों का महत्व उनके इतिहास के इतिवृत्त के साथ खण्डहरों के ईंट पत्थरों से अधिक नहीं रह
गया। इन्हें नवीन धर्म ग्रहण करने वाली जनता अपने नवीन जियारतों, मजारो, मस्जिदों तथा मकानों में
लगाने लगी।
सिख तथा डोंगरा काल में पुराने तीर्थों, देवस्थानों आदि को पुनः जानने की इच्छा हुई । इस दिशा
में आधुनिक विद्वानों तथा अन्वेषकों ने स्तुत्य प्रयास किया है । प्राचीन पुस्तकें पढ़ी जाने लगी। उनके
आधार.पर तीर्थों तथा.देवस्थानों की खोज होने लगी। ध्वंसावशेषों, खण्डित मूर्तियों, मन्दिरो के खण्डहरो
को अन्वेषक विद्वान् खोजने लगे। इस विषय पर साहित्य का निर्माण होने लगा । लोकतन्त्र की स्थापना के
पश्चात् तथा उसके पूर्व उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम चरण में खनन कार्य तथा वैज्ञानिक ढंग पर अध्ययन
आरम्भ हुआ। इस समय केन्द्रीय तथा राज्य सरकार दोनों द्वारा संचालित पुरातत्व विभाग कार्य कर रहा
है। कश्मीर के इतिहास पर नवीन प्रकाश पड़ा है। उनका यथास्थान वर्णन किया गया है।
नीलनाग के जल स्रोत अर्थात् (वीर नाग) के भौगोलिक चित्रण से आरम्भ होकर बारहमुला की
गहरी घाटी में नीलमत पुराण का आख्यान समाप्त होता है ।
नीलमत पुराण पर डाक्टर वेद कुमारी द्वारा काशी विश्व विद्यालय की थीसिस नीलमत पुराण
द्रष्टव्य है । उसमें आलोचना के साथ अंग्रेजी में अनुवाद भी दिया गया है । अनुवाद के अतिरिक्त थीसिस का
शेष भाग पुस्तकाकार रूप में जम्मू तथा कश्मीर एकेडमी आफ आर्ट कलचर एण्ड लैग्वेज श्रीनगर जम्मूसे
सन् १९६८ में प्रकाशित हो चुका है ।