राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१० राजतरंगिणी
नीलमत पुराण में मुख्य नागों किंवा जलस्रोतों अथवा चश्मों का वर्णन मिलता है। कश्मीर मण्डल
के चतुदिशाओं में स्थित दिक्पाल नागो तथा सहस्रो नागों के होने का उल्लेख किया गया है (जो० ९००-
९०५)
लगभग ६० नदियो का उल्लेख नीलमत पुराण में मिलता है वे कश्मीर तथा मद्रदेश दोनों क्षेत्रों
की है :
ज्ञात · अपगा (अयुक्त) चन्द्रभागा (चिनाव) गोदावरी (गोदर पर्वत के समीप) गोतमी (गोमती ?
वाराह पर्वत के समीप) हर्यपथा (आरपथ) अनन्त नाग के समीप वितस्ता में मिलती है। हिरण्या
(कनकवाहिनी) इरावती (रावी) कालोदक (नुन्द कोल गंगा सर से उद्गमित स्रोतस्विनी) कनक वाहिनी
(कनकनी) कया (अमया-गंगोद्भेद समीपस्य) कौण्डिन्य-कौलिन्य (नोवन्धन समीपस्य कौण्डिन्य सर से
उद्गमित स्रोत) कृष्ण (कृष्ण गंगा) क्षीर नदी (वत्सकुल) दूसरी मधुवती बन्दपोर का नाला है कुलेस गांव
के समीप उत्तर मे ऊलर लेक में मिलता है। श्वेत गंगा (एकमत में चित्ती नदी) मधुमती (पदुमती
अल्बेरूनी कथित) माहुरी (मवुर) श्याला (हमल) सन्ध्या (सुन्दवदार) सरस्वती (कनक्तोरी)
सिन्धु, तोषी (तोही ?) निलप्रस्था (माहुरी) उहृ (उह्न पाणिनि तथा ऊर्ध्वः दि० धर्मोत्तर पुराण)
वशोका (विसाऊ) वितस्ता (झेलम)।
अज्ञातः अधदुधान, भूर्जला, चन्द्रावती, चतुर्वेदी, चित्रपथा, देवहूत, देवकुल्या, देविका (देघ ?)
धन्याधरणी, गगा, (कश्मीर की अनेक नदियों को गंगा कहते है) गोशृन्दी, कुलार्णा, कुमुनारी, भृङ्गी,
मालिनी, मन्दाकिनी, मृग-मृगनन्दा, पालासा, परोष्णि, राहुला, रामहृद, ऋषिकुल्या, समूला, सरसा, शाण्डिली,
शतशिला, शिलामा, सुधा, सुगन्धा, सुखा (सुर्कग ?, तेलाला, त्रिकोटि, वैतरनी (एकमत है। सुपियान
के अधोभागीय रामग्यार नदी है।) विश्वमित्र।
महापद्म सर अर्थात् ऊलर लेक का वर्णन नीलमत पुराण में मिलता है। ऊलर लेक के स्थान पर
पूर्व काल में चन्द्रपुर नगर था। उसके जल में लोप अर्थात् जल में डूब जाने के पश्चात् उस स्थान पर ऊलर
लेक बन गया। सम्भव है कि पुरातन चन्द्रपुर का समस्त नगर भूचालादि के कारण भूमिस्य हो गया हो। भूमि
नीचे दब गयी हो। इस प्रकार उस स्थान पर पानी भर कर सर का रूप ले लिया होगा। कश्मीर में भूचाल
आना साधारण बात है। दो हजार वर्षों में भौगोलिक परिस्थितियों में बहुत कुछ परिवर्तन हो जाना
सम्भव है।
पुराण में शिव, शंकर किंवा महादेव से सम्बन्धित तीर्थों का वर्णन बहुत मिलता है। अन्य देवताओ
से सम्बन्धित तीर्थों का पर्याप्त उल्लेख है। किन्तु कश्मीर में शैव धर्म, शैव तन्त्र एवं दर्शन का अत्यधिक प्रभाव
होने के कारण अत्यधिक तीर्थ तथा देवस्थानो का सम्बन्ध शिव, उनके गण तथा शक्तियों से है।
भूतेश्वर माहात्म्य का उल्लेख नीलमत में आता है। इस माहात्म्य की गाथा में हरमुकुट पर्वत के अनेक
सरोवरों, तीर्थों तथा पवित्र स्थानों का वर्णन है। यह पर्वत शिव तथा पार्वती के तीर्थों से सम्बन्धित होने के
कारण अत्यन्त पवित्र माना गया है। कश्मीर के धार्मिक जीवन में अपेक्षाकृत अधिक महत्त्व इस पर्वत को
दिया गया है।
नीलमत पुराण में कश्मीर के पर्वतों का वर्णन है। हिमालय के अतिरिक्त बहिर्गिरि, (चुल्ल हिमवन्त),
अन्तर्गिरि (महा हिमवन्त) उपगिरि (शेवालिक तराई) उशीरूक (द्वार देश समीपस्य दक्षिण कश्मीर)।
यह पर्वत विनय वर्णित उशीरध्वज, दिव्यावदान का उशीर गिरि, पाली साहित्य का उशीनर, कथासरित-