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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 893, कुल 984 में से

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पृष्ठ 893

८६ राजतरंगिणी
हरिवंश पुराण में कैलाश शिखर पर गुह्यकों के साथ कुबेर के आगमन का वर्णन मिलता है।
(८५:१०) यक्ष जाति को गुह्यक एक शाखा किंवा उपवर्ग थे। उनमें तथा यक्षों में यह भिन्नता थी।
गुह्यक गणों की सम्पत्ति की रक्षा करते थे। उनका सैनिक वर्ग था। ये शक्तिशाली थे। काम साधारणतया
शस्त्रोपजीवी किंवा पहरा, चोकी, रक्षादि करना और शस्त्रादि चलाना था। उन्होंने महाभारत युद्ध में भाग
लिया था। यक्ष जाति के होते हुए भी उन्हें अलग गुह्यक संज्ञा उसी प्रकार दी गयी है जैसे हिन्दू होने पर
भी क्षत्रियों की अपनी अलग जाति शस्त्राश्रयी होने के कारण हो गयी।
वायु पुराण (अध्याय १०९) से प्रकट होता है कि गुह्यक लोग गन्ध अर्थात् ब्रह्म लोक में देवताओं
के साथ रहते थे। सत्य लोक सातवां किंवा अन्तिम लोक है। उनमें समस्त देवगण गन्धर्वों, अप्सराओं, यक्षों
तथा गुह्यको के साथ निवास करते हैं। वायु पुराण के (अध्याय ६९) में गन्धर्व, गुह्यक, यक्ष तथा पिशाचों
को असुरदेव की श्रेणी में रखा गया है। यहां पर सर्प, भूत, पिशाच, नाग एवं मनुष्यों को पृथ्वो लोक का
निवासी बताया गया है।
गुह्यकों की उत्पत्ति के विषय में वायु पुराण (अध्याय ९ १५, ३४) में क्या है-‘ब्रह्मा ने रजस्तम
प्रधान दूसरा शरीर धारण किया। उस अन्धकार में क्षुधाकुल होकर उन्होंने दूसरी प्रजा उत्पन्न को। वह
प्रजा जल को भक्षण करने के लिए कटिबद्ध हो गयी। हम जल की रक्षा करते हैं। कहते हुए जो उत्पन्न हुए
वे क्रोधी निशाचर राक्षस हुए। जिन लोगों ने कहा कि हम जल को खा जायेंगे, नष्ट कर देंगे ये क्रूरकर्मा
गुह्यक यक्ष कहलाये।
भागवत (१ ९३) में श्रीकृष्ण, अर्जुन, युधिष्ठिर आदि के रथारूढ़ गमन करने की शोभा की तुलना
गुह्यकों सहित कुबेर से की गयी है। गुह्यकों को कुबेर का साथी कहा गया है।
भगवान् के स्थूल तथा सूक्ष्म रूपो का वर्णन करते हुए सिद्ध, चारण, गन्धर्व, विद्याधर, असुर, गुह्यक,
किन्नर, अप्सराएं, नाग, सर्प विपुरुष, उरग, मातृकाएं, राक्षस, पिशाच, प्रेत, भूत, विनायक, कूष्माण्ड, उन्माद,
वैताल, यातुधान के वर्ग में गुह्यको को रखा गया है (स्कन्द० २.१०.६७ ११:१२:३, तथा १४.५)।
दक्ष यज्ञ में सती के प्राण विसर्जन काल में गुह्यक तथा प्रमथ गण उपस्थित थे। शिव के पार-
पद गुह्यक तथा प्रमथगण सती के साथ दक्ष यज्ञ में गये थे। सती के प्राण विसर्जन के साथ ही गुह्यकों
तथा प्रमथो ने क्रुद्ध होकर दक्ष यज्ञ में विघ्न उपस्थित किया। अस्त्र-शस्त्रो से आक्रमण किया। उनके भयंकर
आक्रमण वेग को देखकर भृगु ने यज्ञ द्वारा सहस्रों ऋभु नामक देवों को उत्पन्न किया। उन्होंने जलती लक-
डियो द्वारा प्रमथगण तथा गुह्यको पर आक्रमण किया। उन्हें भगाने में समर्थ हुए।
दक्ष यज्ञ के प्रसंग में गुह्यकालय अर्थात् गुह्यकों के निवास स्थान का उल्लेख किया गया है। सती के
प्राणाहुति से क्रुद्ध होकर वीरभद्र ने दक्ष के मस्तक को यज्ञ की दक्षिणाग्नि में डाल दिया। यज्ञ को विध्वंस
कर गुह्यक गण गुह्यकालय लौट गये। यहां पर गुह्यकालय हिमालय स्थित कैलास के समीपस्थ स्थान होना
चाहिए। वायु पुराण ने हिमालय का यही अंचल गुह्यकों का निवास-स्थान बताया है।
उत्तम हिमालय मृगया निमित्त गया था। वहा उसकी हत्या कर दी गयी थी। ध्रुव अत्यन्त क्रुद्ध
होकर त्रों के अनुचरों से सेवित उत्तर दिशा मे हिमालय की द्रोणी अर्थात् घाटी में गये। वहाँ नगर गुह्यकों
से जनाकीर्ण थे। (भागवत ४:१०:५) यहा पर भी निर्देश किया गया है। गुह्यक गण उत्तर दिशा में हिमा-
की घाटी किंवा द्रोणी में रहते थे।